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डॅा., आषा गायकवाड. "इन्द्रधनुष का सतर ंगी स्वरुप". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891770.

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Streszczenie:
हमारी प्रकृति अनेक रंग¨ से सजी र्ह ुइ है। प्रकृति में फ ैल्¨ हुए सभी रंग इन्द्रधनुष अपने में समेटे ह ुए है। हर रंग का अपना अलग प्रभाव ह¨ता है। अपने मनपसंद रंग से किसी व्यंिक्त विष्¨ष की मानसिकता की जानकारी हम पूर्ण रुप से प्राप्त कर सकते ह ैं । प्रकाष का वर्ण विक्ष्¨पण -इन्द्रधनुष में विभिन्न रंग हमे क्य¨ ं प्राप्त ह¨ते है इस तथ्य की ख¨ज सन 1665 में न्यूटन द्वारा की गई थी। उन्ह¨ने ष्व ेत प्रकाष क¨ प्रिज्म से गुजारने पर उसके सात अवयवी रंग¨ क¨ परदे पर प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की थी। सूर्य के प्रकाष क¨ प्रिज्म में से गुजारने पर निर्गत किरण¨ं द्वारा परदे पर बनाये सात रंग¨ क े समूह क¨ ष्वेत प
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डा, ॅ. श्रीमती प्रतिभा श्रीवास्तव. "र ंग, स ेहत, सब्जियाँ - एक दृष्टिका ेण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.890493.

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Streszczenie:
रंगा ें का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इनके द्वारा हमें अपने चारों ओर की स्थितिया ें का ज्ञान होता ह ै आ ैर रंगा ें का प्रभाव ज्ञात हा ेता है। रंग मनुष्य की आँख में वर्णक्रम से मिलने पर छाया संब ंधी गतिविधियों से उत्पन्न होते ह ै। मूलरूप से इन्द्रधनुष क े सात रंगा ें का े ही रंगा ें का जनक माना जाता है। ये सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला व ब ैंगनी ह ै। मानवीय गुण धर्म में आभासी बोध के अनुसार लाल, नीला व हरा रंग हा ेता है। रंगा ें स े विभिन्न प ्रकार से वस्तु प ्रकाष स्त्रोत एवं श्रेणियां इत्यादि आती ह ै। प ्रकाष स्त्रोता ें के भा ैतिक, गुणधर्म जैसे प्रकाष विलियन, समावेषन, परावर्
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मुक, ुन्द कुमार. "वस्त्र अलंकरण म ें र ंगा ें की पुरातन भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888816.

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Streszczenie:
रंग वस्त्र आकल्पन (अलंकरण) का मूलाधार है। वस्त्र्ा के अनुरूप रंग द्रव्य¨ ं ;कलमेद्ध का चयन आ ैर उनक े प्रय¨ग की तकनीक, कलाकार अथवा रंगरेज के निजी दृष्टिक¨ण एवं उनक े अनुभव पर आधारित ह¨ती है। रंग¨ ं का, व्यक्ति की मन¨भावनाअ¨ ं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं पहल ुअ¨ं का अध्ययन करके वस्त्र्ा¨ं क े विविध प्रकार क े अनुसार रंगद्रव्य का सफलताप ूर्वक प्रय¨ग किया जाता ह ै। वस्त्र्ा रंर्गाइ की कला अतिप्राचीन ह ै। भारतवर्ष में र्कइ ऐसे प्रमाण मिलते ह ैं जिनमें वस्त्र्ा ब ुर्नाइ एवं वस्त्र्ा-रंर्गाइ के विषय र्में इ सा प ूर्व एवं उत्तरार्ध में मनुष्य¨ ं क¨ ज्ञान था। वस्त्र्ा ब ुनाई अ©र रंर्गाइ के इतिहास
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डॉ., व. ंदना चराटे. "र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889267.

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Streszczenie:
रंग मानवीय जीवन में विविध अनुभूतिय¨ ं एव ं संव ेदनाअ¨ं का पर्याय ह ै। मनुष्य की दुनिया भी विविध रंग¨ ं से बनी है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में भी विविध संस्कार¨ं का स्वरूप रंग¨ ं क¢ इर्दगिर्द ही समाया हुआ ह ै। ज¨ उत्साह, निराशा, सुख और दुख की अनुभूति करवाते है ं। इसी तरह मनुष्य का शरीर भी विविध रंग¨ ं से निर्मित है, ज¨ उसकी मानसिक आ ैर शारीरिक स्थिति का द्य¨तक है, रंग¨ ं का यह संतुलन प्रकृति अर्थात् ईश्वर प्रदŸा ह¨ता ह ै। इसमें गडबडी या असंतुलन ह¨ने पर मनुष्य अस्वस्थ ह¨ जाता ह ै, तब विविध उपचार या चिकित्सा पद्धति क¢ माध्यम से इन रंग¨ ं क¨ संतुलित कर मनुष्य क¨ स्वस्थ बनाने का प्रयास किया जाता है
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बी.एस., निगवाले. "''राजीव गाँधी जल प ्रबधंन मिषन का ग्रामीण क्षेत्रा ें म ें आर्थिक योगदान''". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.803446.

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Streszczenie:
भारतीय क ृषि मानसून का ज ुआं ह ै और यह ज ुआं भारतीय अर्थ षास्त्र और भारतीय जनता सनातन काल स े अपन े कंध े पर रखे ह ुए षून्य में ताक रही ह ै। वस्त ु स्थिति यह है कि जल के अभाव मे भारतीय कृषि ही क्या भारत के उद्योग धंधें, कल-कारखान े, और समूची अर्थव्यवस्था ही ठप हो जाती ह ै। पानी के अभाव मे ं गहराता विद्युत संकट, स ूख े पड ़े खेत आ ैर ब ंद पड ़े कल-कारखानों न े एक ओर हमार े राष्ट ªीय उत्पाद को प ्रभावित किया है वहीं द ूसरी तरफ हमारा अंतर्राष्ट ªीय निर्यात भी गड ़बड ़ाया है। फलतः एक आ ेर विद ेषी मुद ्रा की कमी की आप ूर्ति और द ूसरी ओर वर्त मान समस्याओं से निपटन े के लिए भारी वित्तीय प ्रब ंधन। ”ज
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डा, ॅ. स्मिता खानवलकर. "न ेतत्व, सहया ेग, प्रबन्धन एवं नवाचार में स ंगीत-एक रूपकालंकार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.887006.

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Streszczenie:
सम्पूर्ण विष्व में विषेषकर पाष्चात्य देषा ें म ें अधिकांष कार्यकारी समूहा ें में उनक े कार्यनिष्पादन में सकारात्मक वृद्धि ह ेतु विभिन्न प्रकार का संगीत प्रयुक्त किया जाता ह ै। जिनमें गूगल, ओरॅकल, रोल्स रायस, सीमेन्स, लाॅरियाल, डचब ैंक, बीबीसी, नोकिया, सेन्डा ेज, मोर्ग न स्टेनले आदि र्कइ ं संस्थाना ें क े नाम प्रमुखता से लिये जा सकते ह ैं। ये सभी संस्थान अपने क्षेत्र में वर्चस्व स्थापित कर चुके है ं एव ं प्रबन्धन क े क्ष ेत्र का प्रत्येक व्यक्ति इनके नाम से अछूता नहीं ह ै। इन संस्थाना ें में उनके वरिष्ठ नेतृत्व का े प्रषिक्षित करने क े लिये उन्हंे प्रकारान्तर से (ब ैन्ड एव ं वाद्यवृन्द क े माध्
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यशस्वी, गुप्ता. "आधुनिक युग म ें मंच की तकनीक". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885051.

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Streszczenie:
किसी भी कला अथवा विशिष्ट विचारा ें की प्रस्तुति के लिए कलाकार जिस विशिष्ट स्थान पर विराजमान हा ेते ह ैं उसे मंच कहा जाता है। रंजकता इसका प ्रमुख विषय होने क े कारण इसी का े रंगमंच भी कहते ह ै ं। पाश्चात्य देशा ें अथवा अ ंग्र ेजी भाषा में इसे स्टेज कहा जाता है। ऐसा प ्रतीत हा ेता ह ै कि मानव के उद्भव से पूर्व भी रंगमंच देवी देवताओं में प ्रचलित था। ज ेसे भगवान शिव का कैलाश पर्व, माता वागीश्वरी का हस्त में वीणा लेकर मयूर पर ब ैठना तथा इन्द्र क े दरबार में गा ंधर्व , किन्नर, एवं अप्सराओं का े नृत्य आदि मंच क े अस्तित्व की ओर ही संकेत करते ह ै ं। भारतीय संगीत एवं नाट्य परम्परा के अनुसार सर्व प ्रथ
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डा, ॅ. साधना चा ैहान. "आ ंतरिक एव ं बाह ्य सज्जा में र ंग स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890365.

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Streszczenie:
रंग हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा ह ै, जितनी ख ुबसुरत हमारी यह रंगीन दुनिया है, उतनी ही विलक्षण इन रंगा े की दुनिया ह ै। बचपन में हमे सिर्फ तीन प्राथमिक रंगा े के नाम सिखाये जाते है:- पीला, नीला और लाल, परन्तु सच तो यह है कि, किसी संख्या में रंगा े को सीमित नही कर सकते। रंगा े की का ेई गिनती नही होती, क्या ेंकि इस दुनिया में असंख्य रंग ह ै। इसका कारण यह ह ै कि किन्ही भी दो रंगा े का े मिलाकर हम एक तीसरे रंग का निर्माण कर सकते ह ै आ ैर उन दो रंगा े की मात्रा में फ ेरबदल करके हम अनेक हल्के आ ैर गहरे रंगा े का निर्मा ण कर सकते ह ै। इस तरह हम अलग अलग सामंजस्य (ब्वउइपदंजपवदे) से असंख्य रंगा े का न
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वन्दना, अग्निहोत्री. "नदिया ें म ें प्रद ूषण और हम". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883519.

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जल को बचाए रखना सभी की चिन्ता का विषय ह ै, व ैज्ञानिक राजन ेता, ब ुद्धिजीवी, रचनाकार सभी की चिन्ता है, जल कैस े बचे ? द ुनियाँ को अर्थात पृथ्वी को वृक्षों को, जंगलो को, पहाड ़ों को, हवा को, पानी को बचाना है। पानी का े बचाया जाना बह ुत जरूरी ह ै। पृथ्वी बच सकती ह ै, वृक्ष ज ंगल, पहाड ़ और मन ुष्य, पषु, पक्षी सब बच सकत े ह ै, यदि पानी को बचा लिया गया और पानी प ृथ्वी पर है ही कितना? पृथ्वी पर उपलब्ध सार े पानी का 97ण्4ः पानी सम ुद ्र का खारा जल है, जो पीन े लायक नही ह ै, 1ण्8ः जल ध ु्रवा ें पर बर्फ के रूप म ें विद्यमान है और पीन े लायक मीठा पानी क ेवल 0ण्8ः ह ै जो निर ंतर प्रद ूषित हा ेता जा रहा
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श्रीमति, स्वप्ना मराठे. "वर्तमान समयानुसार संगीत पाठ्यक्रम¨ ं म ें बदलाव की आवष्यकता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886835.

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Streszczenie:
युग परिवर्तन सृष्टि का सम्बन्धित नियम है, जिसक¢ अन्तर्गत सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक वातावरण भी बदलते रहते हैं। अतः युगानुकूल संगीत षिक्षा की पद्धति में भी परिवर्तन ह¨ना आष्चर्यजनक घटना नहीं है। भारतीय संस्कृति विष्व की उन संस्कृतिय¨ ं में से एक है जिसने सम्पूर्ण विष्व क¨ नई दिषा एवं सृजनात्मकता दी। ये व¨ धर¨हर ह ै जिसक¨ सुरक्षित रखने क¢ लिये हमारे संस्कृति प्रेमिय¨ ं ने अपने सम्पूर्ण जीवन की आहूति दी। संगीत मानव समाज की एक कलात्मक उपलब्धि ह ै। यह लयकारी सांस्कृतिक परम्पराअ¨ं का एक मूर्तिमान प्रतीक ह ै अ©र भावना की उत्कृष्ट कृति ह ै। अमूर्त भावनाअ¨ ं क¨ मूर्त रूप देने का माध्यम ही संगीत ह ै
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लोक, ेश वाहने. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय प्रयोग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884972.

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Streszczenie:
संगीत का सम्बन्ध मध ुर ध्वनि से ह ै जिसमें नियमित आ ंदा ेलन होते ह ै, वह ध्वनि जा े संगीत में प ्रया ेग की जाती ह ै ’’नाद’’ कहलाती ह ै। कहने का अर्थ यह ह ुआ कि संगीतोपया ेगी ध्वनि को नाद कहते है ं। नाद ही संगीत का आधार ह ै। संगीत एक उत्कृष्ट ललित कला ह ै जिसका मुख्य आधार नाद अथवा आवाज ह ै इसी कारण रस कला का े नाद ब ्रह्म पुकारा गया ह ै। इस कला को हम स्वरांे का ए ेसा सम्मिश्रण कह सकते ह ै ं जा े कलाकार की हृदयगत भावनाओं का े मध ुर बनाकर दूसरा ें क े सामने प ्रकट करता ह ै इसलिए संगीत को हृदय की भाषा तथा हृदयगत भावनाओं का े प ्रकट करने की भाषा माना जाता हैं अ ंग्र ेज विद्वान रस्किन कहते ह ै, ’’अन
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डा, ॅ. अर्चना रानी. "वर्ण-सौन्दर्य द्वारा दर्शक स े संवाद करती भारतीय कला". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.888762.

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कला और सौन्दर्य-ये दा े शब्द कला जगत में एक ज ैसे होते हुए भी बह ुत विस्तृत ह ैं। स्थूल तैार पर हम कला आ ैर सा ैन्दर्य में का ेई अन्तर नहीं कर पाते। सा ैन्दर्य एक मानसिक अवस्था ह ै आ ैर वह देश-काल से मर्या दित है। इस सा ैन्दर्य रूपी व ृक्ष की दो शाखायें ह ैं-एक प्रकृति तथा दूसरी कला। कलागत सौन्दर्य पर दा े दृष्टियों से विचार किया जा सकता है। पहली दृष्टि यह है जिसमें हम कलाकार को क ेन्द्र में रखकर विचार करते ह ै ं अर्थात् कलाकार की कल्पना में किस प ्रकार कोई कलाकृति आकार ग्रहण करती ह ै आ ैर वह किस रूप में दर्श कों क े सम्मुख प्रकट हा ेती ह ै। दूसरी दृष्टि में दर्श क का े क ेन्द्र में रखा जाता ह
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Streszczenie:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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डा, ॅ. निषा जैन. "जन जातीय रंग कला एव ं सामाजिक जीवन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889253.

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Streszczenie:
जनजातीय समाज सभ्य एव ं विकसित समाज की तुलना में भिन्न प ्रकृति के हा ेते ह ैं। उनकी अपनी विषिष्ट संस्कृति हा ेती है। प ्रत्येक जनजाति को स्वयं की संस्कृति उन्ह ें दूसरी जनजातियों से भिन्न बनाती ह ै। परम्परागत रूप से विरासत में प ्राप्त र्ह ुइ संस्कृति उनके जीवन का आधार ह ै। इस विषिष्ट संस्कृति कें कारण वे अपनी बहुत सी आवष्यकताए ं प ूर्ण करते ह ैं। विभिन्न सामाजिक उत्सवों रीति रिवाजा ें में जनजातीय कला की झलक दिखलाई देती ह ै।प ्रत्येक जनजाती क े सदस्य कला एवं रंगा ें के माध्यम से जीवन की ख ुषियां मनाते ह ैं जो उनक े परम्परागत वस्त्रा ें, रंग बिरंगे आभूषणों एवं श्र ृंगार से दिखलाई देता ह ै। इस क
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डा, ॅ. भारती जोशी विभागाध्यक्ष. "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888766.

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रंग हमारे दिमाग और शरीर पर अत्यधिक प्रभाव डालता ह ै।सूर्य से प ्राप्त उर्जा रंगा ें में समाहित हा ेती ह ै।प ्रकृति का सा ैन्दर्य हर घण्टे, हर दिन, हर वर्ष परिवर्तित होता रहता ह ै। प ्रकृति का हर रंग प ्राणी का मित्र ह ै बस आवश्यकता ह ै धैर्यपूर्वक प्रकृति की मूक भाषा का े सीखने, समझने, आ ैर आत्मसात करने की । ख ुली जगह में देख ें, प ्रकृति ने कैसे रंगा ें का ताना बाना बुना ह ै रंगा ें क े एक शेड का े दूसरे श ेड से कितनी सुन्दरता क े साथ मिलाया ह ै । आसमान का नीलापन कितना शान्तिदायक है आ ैर कितने प ्रशस्त होने की भावना से ओत प ्रोत ह ै। प ृथ्वी की हरीतिमा कैसी शीतल और तुष्टि प ्रदायनी ह ै। सुर्य
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मनीषा, भट्ट. "उत्तराखण्ड की सामाजिक पृष्ठभ ूमि आ ैर लोकसंगीत का सम्बन्ध". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886966.

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समाज शब्द का प्रयोग हम बहुधा दैनिक बोलचाल की भाषा में करते ह ैं, समाजशास्त्र की भाषा में कह ें तो व्यक्तिया ें क े समूह का े ही समाज नहीं कहा जा सकता, व्यक्तिया ें में पाये जाने वाले पारस्परिक सम्बन्धो ं की व्याख्या का े ही समाज कहा जाता ह ै। ‘मैकाइवर एवं प ेज ने इस संदर्भ में उचित ही कहा है कि ‘‘समाज सामाजिक सम्बन्धा ें का जाल है।’’ सामाजिक सम्बन्धों क े लिए तीन बातें आवश्यक है - 1. व्यक्तिया ें का े एक-दूसरे का आभास (जानकारी) होना। 2. उनमें अर्थ पूर्ण व्यवहार होना, तथा 3. उनका एक-दूसरे क े व्यवहार से प्रभावित होना। विश्व मानव समाज की वृहत्तम इर्काइ है और इसका महत्वपूर्ण अ ंग ह ै, समाज। लोक स
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सृष्टि, जैन. "सचित्र जैन पाण्डुलिपियों म ें र ंग की भ ूमिका (आदिपुराण क े सन्दर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890551.

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्रथम- पिचुमंद नामक झाड़ी का गा ेंद आ ैर ब ेल को तिल के तेल में जलाकर काजल बनाया जाय तत्पश्चात् उसे लाख के जल के साथ लोहे क े बर्तन में भली भाँति भृ ंगराज तथा भल्लात्तक के रस क े साथ घोंटने पर स्याही बनती ह ै। द्वितीय- काजल की आधी मात्रा में गा ेंद तथा गोंद की आधी मात्रा में बेल लेकर ताँब े के बर्तन में लाख के रस क े साथ घा ेंटें। तृतीय- ब ेल तथा उसस े दा े गुना गा ेंद से दा े गुना काजल लेकर (लगभग) 6 घण्टा ें तक घा ेंटन े पर व ्रज के समान पक्की स्याही बन जाती है इसप ्रकार आदिपुराण में लिखने के लिये स्याही का प्रया ेग ह ुआ है। आदिपुराण के चित्रा ें में से कुछ चित्रा ें के माध्यम से मैने रंगा ें
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हरीश, वर्मा. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय प्रयोग". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884616.

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संगीत क े बिना भारतीय फिल्मों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय सिनेमा की पहचान उसका सषक्त संगीत ही ह ै। भारतीय फिल्में चाह े व े किसी भी भाषा (अर्था त् हिन्दी, तमिल, ब ंगाली, मराठी, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम) की हों, संगीत उनमें प ्रमुख होता ह ै। क्षेत्रीय बोलिया ें जैसे भोजप ुरी, राजस्थानी, ब ंुदेली, छत्तीसगढ़ी आदि में बनने वाली फिल्मों में तो संगीत ही उनका मूल तत्व होता ह ै। भारत में सर्वा धिक फिल्में हिन्दी भाषा में बनती हैं जा े विश्व भर में लोकप्रिय हा ेती हैं। अतः आगे हम भारतीय फिल्मों की चर्चा हिन्दी फिल्मों का े केन्द्र में रखकर ही करेंगे। भारतीय संगीत का आधार शास्त्रीय संगीत ही ह ै
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उसर ेठ, राम क. ुमार. "बैगा जनजाति की वनोपज संग्रह की स्थिति का अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 44–46. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20216.

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ैगा जनजाति एक आदिम जनजाति ह ै। जा े सदा स े ही वना ें क े मध्य निवास करती आयी ह ै। वन ही इनक े जीवन का प ्रम ुख आधार रह े ह ै। इस जनजाति क े सामाजिक, सा ंस्कृतिक, धार्मि क एव ं आर्थि क पक्ष वना ें पर ही निर्भ र रह े ह ै। वर्त मान म ें वना ें क े राष्ट ªीय उद्यान एव ं वन विभाग क े निय ंत्रण म ें आ जान े स े इस जनजाति क े र्कइ परिवारा ें का े वन क्ष ेत्र स े बाहर विस्थापित किया गया ह ै। र्कइ क्ष ेत्रा ें म ें वना ें क े अधिक कटाव एव ं द ूसर े क्ष ेत्रा ें क े ला ेगा ें का लगातार इन क्ष ेत्रा ें म ें आकर बसन े स े ब ैगा जनजाति की वना ें पर निर्भ रता प ्रभावित र्ह ुइ ह ै। ब ैगा जनजाति क े आर्थि क
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डा, ॅ. बी. वर्षा. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय स ंगीत की प्रास ंगिकता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886838.

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भारतीय विद्वानों ने संगीत र्का े इ ष्वरीय वाणी माना है। यह समस्त सृष्टि, नाद क े अधीन ह ै तथा नाद का े ब ्रह्म कहा गया ह ै, क्या ेंकि नाद सर्व त्र व्याप्त ह ै। यह सम्प ूर्ण ब ्रह्माण्ड ही नादमय ह ै। नाद से ब ्रह्म, ब ्रह्म से शब्द, शब्द से वाक्य तथा वाक्य से गीत बनता है, अतः यह कहा जा सकता है कि नाद संगीत का प्राण है। हर्ष, उल्लास, उमंग, यह व्यक्ति क े जीवन का श्रृंगार ह ै, जब व्यक्ति सामाजिक बंधनों अथवा समस्याओं मे ं उलझकर कमजा ेर होने लगता ह ै, तब उसमें प ुनः शक्ति तथा जोष भरने का कार्य जिन कलाओं में ह ै, उन्हें ललित कलायें कहा जाता है और ललित कलाओं में संगीत का स्थान सर्वोच्च माना जाता ह ै।
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डा, ॅ. साधना चा ैहान. "र ंगा े का समाज पर प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890579.

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प ्रकृति आ ैर मनुष्य का रिश्ता चिंतन के प ्राचीन छोर से वर्तमान तक दर्शन, कला और साहित्यिक विमर्श का केन्द्र रहा ह ै। अतः रंग भी इस से अछूते नही ं ह ै।’’सूरज की पहली किरण जब किसी वस्तु पर पड़ती ह ै तब वह वस्तु रंगमय हा े जाती ह ै। का ेई रंग आपको इस तरह छूता है कि आपकी कल्पना में र्कइ ख्वाब जागने लगते ह ै ं। कभी कोई रंग आपका े इस तरह मोहित कर लेता ह ै कि आप उसके साथ लय मिलाते हुए जीवन का छंद जीने लगते ह ै ं। आ ैर कभी कोई रंग आपकी स्मृति में ठहर आपको प ्रफुल्लित रखता ह ै।’’1 चित्र मानवीय मन को अभिव्यक्त करने का एक जरिया है। ’’मालवा की परिधि में पूर्वोक्त शिलाचित्र भीम ब ेटका में विविध रुप में प
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प, ्रो. श्रद्धा दुब े. प्राध्यापक इतिहास. "अजन्ता के चित्र एवं र ंग स ंयोजन (गुप्तकालीन कला क े परिप्रेक्ष्य म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.892002.

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गुप्तकाल भारत के इतिहास का स्वर्ण -युग कहा जाता ह ै। सुख समृद्धि आ ैर व ैभव के इस काल में सभी कलाओं का समान रूप से उन्नयन ह ुआ। इस युग की सबसे बड ़ी देन ह ै अजंता के भित्तिचित्र। चित्रकारों ने गहन अधंकरामयी गुफाओं में ब ैठकर जिन अपार्थिव कृत्तियों का सृजन किया वे अप्रतिम है। इनमें कथावस्तु और विषय तो भगवान तथागत के जीवन आ ैर जातक कथाआ ें से ही लिए किन्तु उन्ह े ं किसी सीमा में बांध कर नहीं रखा। उनमें सैकड ़ों वर्षों का लोकजीव दर्पण की भाँति प ्रतिबिम्बित है।अजंता में अर्ध-चन्द्राकार पर्व त का े काटकर 29 गुफाएँ बनाई गई ह ै। यह समूहा ें में ब ंटी हुई ह ै। इनमें दसवी ं आ ैर नवीं गुफाएँ बीच के समू
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प्रज्ञा, पाण्ड ेय गरिमा यादव. "स्वच्छताः भारत की चुनौती". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883539.

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किसी भी द ेश की उन्नति का आधार स्वच्छता व स्वास्थ्य है। स्वच्छ पर्यावरण ही किसी भी समुदाय की स्वास्थ्य स्थिति को ऊंचा उठान े में सहायक है। स्वच्छ पर्यावरण सम ुदाय क े लोगा ें के जीवन स्तर को सुधारन े में सहायक हो सकता है। साथ ही वह समुदाय मं े रोगों के चक्र को तोड ़न े में भी सक्षम ह ै। सरकार व आम जनता के प्रयास व सहभागिता द्वारा विभिन्न संसाधनों का प्रया ेग किया जा रहा ह ै आ ैर ब ेहतर परिणाम हेत ु प्रयासरत हंै। इसके द्वारा समुदाय का सामाजिक-आर्थिक विकास, स्वच्छ पर्यावरण हेत ु संब ंधित सांस्कृतिक कारक, समुदाय की क्षमता, व्यवहार, कान ून आदि का उपया ेग ब ेहतर तरीके से हा े रहा है। भारत द ेश सम्प
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गीताली, सेनग ुप्ता. "मानव स्वास्थ्य एवं प्रदूषण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.803458.

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‘‘स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मन का निवास होता ह ै।’’ उत्तम स्वास्थ्य प ्रत्येक मन ुष्य के लिए अम ूल्य निधि है, दीर्घ आयु एव ं उत्तम स्वास्थ्य का अट ूट ब ंधन है। इस संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दी र्गइ परिभाषा सर्वमान्य है -’’ स्वास्थ्य संप ूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक निरोगता की अवस्था हैं तथा मात्र बीमारी या द ुर्बलता की अन ुपस्थिति को स्वास्थ्य नही माना जा सकता है।’’ अर्था त स्वास्थ्य एक सामान्य व्यक्ति क े लिए स्वस्थ्य वातावरण में, स्वस्थ्य परिवार मे ं, स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य दिमाग का वास है। प्राकृतिक वातावरण की संुदरता प ेड ़ - पौधे, जीव - जंत ुआ े, नदी - तालाब, पर्वत
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गा, ैरव यादव. "स ंगीत क े प्रचार प्रसार में स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886968.

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बीसवीं शताब्दी क े पूर्वा द्र्ध को व ैज्ञानिक क्रांति क े अभ्युदय का समय कहा जा सकता है, जहाँ व ैज्ञानिक अविष्कारों क े अ ंतर्गत कुछ ऐसे उपकरणों का अविष्कार ह ुआ जिन्होंने संगीत क े प्रचार-प्रसार का े तीव्रता प्रदान की। संचार साधनों क े प्रारंभिक दौर में संगीत क े क्षेत्र में एक वैज्ञानिक अविष्कार का विश ेष महत्व ह ै ,जिसने भारतीय संगीत के क्षेत्र में ही नहीं वरन् विश्व में क्रांति ला दी यह था रेडिया े का आगमन। भारत में इसकी स्थापना सन् १९२७ ई. में र्ह ुइ । सन् १९३६ ई. में इ ंडियन स्टेट ब ्रॉडकास्टिंग स ेवा का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया। उस समय आकाशवाणी एक सशक्त माध्यम था शास्त्रीय संगीत क
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Streszczenie:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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ब, ृजेश क. ुमार. "भारतीय चित्रकथाआ ें (काॅमिक्स) म ें र ंग सया ेजन क े ग्राफिक अभिप्राय". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.890567.

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रंग संया ेजन के आधार पर ग्राफिक अभिप्राय एक व्यवस्थित और प्रबन्धात्मक विचार धारा का े कला की भाषा में संया ेजन कहते ह ै। जिसका विभिन्न समस्या अन्तराल आ ैर क्षेत्रा ें में विभाजित करने ए ंव रेखाओं, आकृतियों, वर्णा े (रंगा ें), ताना े तथा वयन आदि के चयन का े व्यवस्थित करने से सम्बधित ह ै।चित्रकथा (काॅमिक्स) में रंगा ें का सयोजन का इतिहास काफी प ुराना रहा ह ै। मानव ने जब सर्व प ्रथम आँखे खोली ता े वह प ्राकृतिक वातावरण के बीच रहते ह ुए शिकार करके अपना पेट भरने लगा। परिणाम स्वरूप अपने प ्राकृतिक वातावरण को देखकर उसने पत्थरों, चट्टानों, गुफाआ ें आदि की दीवारांे पर का ेयले, पत्थर तथा प्रकृति प्रद्दत
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डाॅ., आरती तिवारी. "सामाजिक मुद ्दे एव ं पर्यावरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574865.

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मन ुष्य अपन े पर्यावरण क े साथ ही जन्म लेता ह ै। और उसके बीच ही अपना जीवन यापन करता ह ै। द ूसर े शब्दों में सारा समाज पर्यावरण के बीच अर्था त प्रकृति की गोद में अपना जीवन यापन करता ह ै। किन्त ु इस जीवनयापन के लिए मन ुष्य मुख्य रूप से पर्यावरण पर निर्भर करता है। अपन े जीवन को स ुचारू रूप से चलाए रखन े एव ं उसे और अधिक ब ेहतर बनान े के लिए मन ुष्य निर ंतर प्रयास करता है तथा इसके लिए वह प्राक ृतिक संसाधनों का दोहन करता है। इस प्रकार मन ुष्य आदिम युग स े आज तक निरंतर प्रकृतिक संसाधनों से अपना जीवन चलाता आया है। जिससे प्रकृति का े कुछ नुकसान भी पहुंचा है। क्योंकि मन ुष्य न े आधुनिकता की अंधीदौड में
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डा, ॅ० नमिता त्यागी. "र ंग एवं रसाभिव्यक्ति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888772.

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मानव जीवन का उद्देश्य क्रियाशीलता अथवा निर्मा ण में निहित है। इससे रहित जीवन श ून्य से अधिक नही ं होता। एक कलाकृति में मानव अपने अनुभवों का े निश्चित चित्र तत्वों एवं सौन्दर्य सिद्धान्तों क े आधार पर ही अभिव्यक्ति करता है। इस रूप सजृन की प्रक्रिया का े कला की संज्ञा प्रदान की जाती ह ै। हृदय अनुभूति क े परिणाम स्वरूप ही कला की भाषा भावों स े परिपूर्ण है। भाव का अर्थ हा ेता ह ै, भावना, उद्वेग, आव ेग, संव ेग, उन्मेष, इच्छा, प ्रकृति आ ैर व्यंग इत्यादि का अ ुनभव। यह अनुभव हमारी इन्द्रियों क े द्वारा हमारे आन्तरिक मन मस्तिष्क में उतर कर हमारी आत्मा को प ्रभावित करता ह ै। यह भाव सुख एवं दुख के रूप म
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प, ्रो. सुनीता जैन. "महान संगीतज्ञ तानस ेन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886067.

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तानस ेन एक महान संगीतज्ञ थे। अब ुल फजल बादशाह अकबर क े उदार संरक्षण में विभिन्न संगीतज्ञा ें क े हा ेने का वर्ण न करता ह ै, उनमें वह पहला स्थान संगीत सम्राट तानस ेन का े प ्रदान करता ह ै।। तानसेन उस युग क े सर्व श्र ेष्ठ प ्रतिभावान संगीतज्ञ थ े। तानस ेन की प्रशंसा करते ह ुए अब ुल फजल ने लिखा ह ै ’’ भारत में उसक े समान गायक एक सहस्त्र वर्षो से नहीं ह ुआ’’ तानस ेन का जन्म 1531-32 में ग्वालियर से लगभग 43 किला ेमीटर दूर ब ेहट ग्राम में एक गा ैड़ ब ्राम्हण परिवार में ह ुआ था। इनका प ्रारंभिक नाम त्रिलोचन पांडे था, बाल्यकाल से ही उन्ह ें संगीत में विशेष अभिरूचि थी। ग्वालियर के नरेश मानसिंह तोमर ने
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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क, ंचन क. ुमारी. "मधुवनी चित्रकला म ें र ंगा ें का समाव ेष". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889288.

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Streszczenie:
भारत एक प ्राचीन सा ंस्कृतिक देश ह ै। यहाँ की कला एवं संस्कृति में लोककला का अनूठा समन्वय दिर्खाइ देता ह ै। अनेक विद्वानों ने समय-समय पर लोककला क े महत्त्व को बताया ह ै। लोककलाऐं हमारे देश में लोक परम्पराओं संस्कृति का दर्प ण ह ै। जो विभिन्न रीति रिवाज उत्सव में देख े जा सकते ह ै। भारत जैसे ं देश में विभिन्न प्रान्तों में विविध रूपों में लोककला देखी जा सकती ह ै। जा े विभिन्न नामों से जानी जाती ह ै। जा े विश्वभर में ख्याति प ्राप्त ह ै-मधुवनी की लोक चित्रकला उन्हीं में से एक है। मधुवनी का नाम शायद इसलिए हुआ क्या ेंकि इस नाम का अपना एक महत्व ह ै। जा े यहा की लोक चित्रों में मधु जैसी मिठास है। दर
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श्रीमती, प. ूनम शर्मा. "विकलांग चित्रकारा ें के चित्रा े ं म ें र ंगा ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.890535.

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रंगा ें के बिना जीवन अपूर्ण ह ै। विकलांग चित्रकारों के चित्रों में रंगा ें का विश ेष महत्व ह ै नीरस जीवन जीने को मजबूर ये कलाकार शारीरिक अक्षमताओं के उपरांत भी अपनें चित्रा े ं में रंगा ें के विशिष्ट संया ेजन कर, उन्ह ें जीवित रुप प ्रदान कर , प ्राण डाल देते ह ै ं ,चित्रा े ं द्वारा मूक अभिव्यक्ति इतनी सशक्त होती ह ै कि देखने वाला स्वप्न में भी यह नहीं सा ेच पाता कि इस चित्र का े बनाने वाला विकला ंग ह ै। ए ेसे विशेष कलाकारों के रंगा ें का चयन अति विलक्षण होता है। वर्णों की विभिन्न रंगता ें के कारण ही हम वर्ण विशेष का नाम ज्ञात कर पाते ह ै ं। इन कलाकारा ें के चित्रा ें में रंगा ें के मान का वि
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अनूप, मा ेघ े. "वर्तमान समयानुसार संगीत पाठ्यक्रमा ें म ें बदलाव की आवश्यकता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886988.

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भारतीय कलाओं में नवीन प्रया ेग एव ं संभावनाए ँ भारतीय कलाओं में संगीत कला का विशेष महत्व ह ै। संगीत कला अन्य कलाआ ें की तरह मानसिक बोध कराने की अनुक ृति नहीं करती, बल्कि वह स्वयं की इच्छा की अनुकृति है आ ैर यह बोध कराने की क्रिया इसी की छाया ह ै। संगीत के सशक्त प्रभाव का यही कारण है कि वह स्वयं असली तत्व की अभिव्यक्ति करता है। संगीत कला किसी विश ेष सीमित आनन्द, दुःख, पीड़ा, भय, शांति या प्रसन्नता क े व्यक्त नहीं करती बल्कि वह इनके सामान्य आ ैर सार्वभौमिक स्वरूप का े अभिव्यक्ति देती है। संगीत हमारी आत्मा में भक्तिमय अनुभूतिया ं भर देता ह ै। संगीत द्वारा छात्र का बौद्धिक, भावात्मक आ ैर आध्यात्मि
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विशाल, यादव. "बद्रीनाथ आर्य क े वाॅश र ंग पद्धति मंे प ्रया ेगधार्मि ता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.892050.

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Streszczenie:
भारतीय आधुनिक कला की प्रारंभ 19वीं सदी के मध्य से मानी जाती है। जब अंग्र ेजी शासक ने यूरा ेपियन कला में भारतीय कलाकारा ें को प ्रशिक्षित करने के लिए मद्रास, कलकत्ता, मुंबई, लाहौर व लखनऊ में कला महाविद्यालय स्थापति करने का निर्ण य लिया। इन कला महाविद्यालया ें ने स्वाभाविक अंग्र ेजी पद्धति से चित्रण करने वाले अ ंग्र ेजी कलाकारा ें की नियुक्ति ह ुई। इसी दौरान जापान के कलाकार हिदिसा आ ैर र्ताइ कान कलकत्ता आए जिन्होंने वाॅश पद्धति का प्रषिक्षण भारत में सर्व प ्रथम अविन्द्रनाथ ठाकुर का े दिया और इसी प्रकार भारत में वाॅश पद्धति का जन्म ह ुआ। जब भारतीय वाॅश पद्धति की बात आती है ता े सबसे पहले बंगाल स्
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डा, ॅ. ़संगीता सक्सेना. "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888792.

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जीवन का समूचा ताना-बाना रंगा ें से बना ह ै, चाहे हमारे वस्त्र हांे, घर हो, या गाड़ी हो। सबकी पहचान रंगा ें क े साथ ह ै। रंगा ें का मनुष्य क े जीवन आ ैर मन पर विशिष्ट प ्रभाव होता ह ै। रंग प ्रकृति की बहुमूल्य देन ह ै आ ैर मानव क े जीवन का सा ैंदर्य भी। उषाकाल की लालिमा, नीलाभ नभ, भूरे पहाड़, तिनकों, पा ैधों आ ैर प ेड़ों की हरिताभा, फीरोज़ी समुद्र- सबकुछ विशिष्ट और अद्भुत। मनुष्य आ ैर प ्रकृति का संब ंध भी अटूट ह ै। कभी बसंती पीला तो कभी हरियाला सावन, कभी सिताभ ता े कभी तमावृता रात। ऐसे ही मनुष्य की जीवन-यात्रा भी ह ै। कभी सुनहली आशा ता े कभी निराशा की कालिमा। मेघाच्छादित आकाश मन को भी धुँधला द
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सीमा, कदम. "धरती क े ताप की दवा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883026.

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आज धरती माॅ ं का द ुःख सर्वविदित है। उसे संभाले रखन े वाले तत्व-जल, वनस्पति, आकाश आ ैर वाय ु, विकास की चिमनियों स े निकलन े वाले धुए ं के कारण हांप रहे हैं । भू-मण्डलीकरण की लालची जीभ न े इन सभी तत्वों को बाजार में सुन्दर पैकिंग में भर व्यापार की वस्त ु क े रूप में प ेश कर दिया है । इन चारों के कम होन े से पाॅ ंचव े अंग यानी अग्नि न े आज प ूरी धरती को भीतर-बाहर से घेर लिया है । जिसके कारण धरती का भीतर-बाहर सब तपन े लगा ह ै । इसीलिए ‘पृथ्वी दिवसों’ की आड ़ में संयुक्त राष्ट्र टाइप धरती के द ूर क े रिश्त ेदार आईसीयू में डाॅयलिसिस पर लेटी धरती को शीशों क े कमरों से झांकत े रहत े हैं । धरती क े बु
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रेड्डी, डॉ.एम. नारायण. "मृदुला गर्ग की कहानियों में सामाजिक चित्रण". Sahitya Samhita 9, № 9 (2023): 1–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.10071863.

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मृदुला गर्ग ने भोगे हुए यथार्थ को अपने साहित्य में हू-ब-हू चित्रित करने का प्रयास किया है। उसके बाद धीरे-धीरे उनकी सोच का दायरा बढ़ता चला गया। अपने युगीन व्यक्ति और समाज की सहज झलक इनकी कहानियों में देखी जा सकती है। उन्होंने अपनी कहानियों में युग-जीवन को तथा युग जीवन के संदर्भ में व्यक्ति के जीवन को विभिन्न कोणों, प्रसंगों तथा स्थितियों में देखा है और भिन्न-भिन्न आयामों का चित्रण प्रस्तुत किया है। अब हम समाज को और सामाजिक संगठन को सुनियोजित करने के लिए, उसे तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित कर सकते हैं- 'उच्च', 'मध्य' और 'निम्न' वर्ग। किसी भी नगरीय समाज को इन तीनों वर्गें की वि
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रामवीर, सिंह. "समाजिक समस्याऐं व पर्यावरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883543.

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सामाजिक पर्या वरण ;ठपव ैवबपंस म्दअपतवदउमदजद्ध में परिवर्ति त हो रहा है फलस्वरूप पर्या वरण संघटों क े मौलिक गुणा ें म ें परिर्वतन हो रहा है। स्वस्थ जीवन के लिए पर्यावरणीय परीक्षण आवश्यक ह ै, विकास क े संचालन के लिए नत्य व अनत्य संसाधनों का े उपयोग द ुर्लभ एव ं अमूल्य संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता न े पर्यावरण प ्रबन्धन को अव्यन्त महत्वप ूर्ण बना दिया है। 1 पर्यावरण के प ्रति सचेत संवद ेनशील तथा जागरूक बनाया जाना भी ब ेहद जरूरी है, लोगो को यह समझाया जाना आवश्यक है कि आखिर हमारा पर्या वरण या परिस्थितिक त ंत्र क ैसे प्राकृतिक आपदाआ ें से हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करता है तथा पर्यावरण का संरक्षण व
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ऋचा, उपाध्याय. "विभिन्न कालान्तर्गत तत् वाद्या ें म ें अधुनातन प्रयोग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884966.

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भारतीय संगीत में अनेक प्रकार क े तत् वाद्यों की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है । आदि मानव ने अपनी रुचि एवं ब ुद्धि क े आधार पर कलात्मक विविध तत् वाद्यों की नी ंव ही नहीं डाली वरन् उनका उपयोग कर मानव जीवन का े भौतिक धरातल से ऊँचा उठाकर कला को दिव्य तथा आलौकिक धरा पर लाकर प्रतिष्ठित कर दिया । तत् वाद्यों की श्रेणी में किये गये प ्रया ेगा ें क े माध्यम से ही संगीत क े सिद्धान्तों ,श्र ुति, स्वर, सप्तक, एक स्वर से दूसरे स्वर की दूरी, मूछ्र्र च्ना पद्धति आदि का े प ्रमाणित व निष्चित किया जा सका । आज भी इसमें निरंतर अधुनातन प ्रयोग किये जा रह े ह ंै, जिस प्रकार स े प ्र त्येक वस्तु में समयंातराल क े
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डा, ॅ. पि ्रयंका व. ैद्य. "गुरू-शिष्य परम्परा बनाम द ूरस्थ शिक्षा कथक नृत्य के स ंदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886109.

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यह ष्लोक भारतीय दर्ष न, संस्कृति व परम्परा में गुरू क े स्थान का े दर्षा ता है। हमारी प्रत्येक यज्ञ आह ुति में, हर पूजा में इस ष्लोक को बा ेला जाता ह ै। क्या यह हमारे जीवन में गुरू क े स्थान को नही ं दर्षा ता? भारतीय दर्ष न में मनुष्य का े कर्म और ज्ञान के समन्वित रूप से ही स्वीकार किया गया है। उसके ये दो रूप ही उसे समाज में पहचान एवं प ्रतिष्ठा प ्राप्त करने में मार्ग प ्रषस्त करते ह ै ं। माता-पिता मनुष्य का े जन्म देन े क े कारक ह ैं, परन्तु ब ुद्धि, ज्ञान व कर्म का प ्रकाष गुरू के द्वारा ही मनुष्य को प ्राप्त होता है। आज की पीढ़ी नये ज्ञान के प्रकाष में जो कि व ैज्ञानिक ज्ञान है, कम्प्यूटर
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अमृता, सोनी. "स ंगीत चिकित्सा (एक नवाचार)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.885055.

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भगवान श्री विष्णु से एक बार नारद जी ने प ूछा आप कहां रहते हैं। तब उन्होंने कहा ह े नारद ना ही मैं ब ैकुण्ठ में रहता ह ूं आ ैर ना ही या ेगिया ें क े हृदय म े।ं लेकिन मेरे भक्त जहां गायन वादन करते ह ै ं वहां मैं मूर्त रूप में उपस्थित रहता हूं। (नारद भक्ति सूत्र) ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण मानव-जगत में नित नए प्रया ेग हा े रहे ह ैं। जब ये प ्रया ेग जीवन क े अभिन्न अंग बन जाते हैं, तब मानव फिर अभिनव अनुसंधान में प ्रवृत्त हा े जाता है। यद्यपि संगीत स्वयं एक विज्ञान है, किन्तु अभी उसकी सिद्धी क े लिए वर्षा ें की तपस्या अपेक्षित ह ै। इधर कुछ समय से व ैज्ञानिकों का ध्यान संगीत की ओर गया ह ै, लेकिन संग
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आशा, द. ेवी. "हिंदी-साहित्य म ें प्रकृति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883531.

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हंदी साहित्यकारों का प्रकृति-प्रेम सर्वविदित है। आदिकाल , मध्यकाल आ ैर आधुनिककाल सभी कालों में प्रकृ ति पर काव्य-रचनाए े ं होती रहीं । प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकरप्रसादजी लिखत े है ं- ले चल मुझे भुलावा द ेकर मेर े नाविक धीर े-धीर े-जहाँ निर्जन मे ं सागर-लहरी-अंबर के कानो ं में गहरी-निच्छल प्र ेमकथा कहती हो--तज कोलाहल की अवनि कवि न े यहाँ मानव की शांतिप्रियता को इ ंगित किया है ।मानव कोलाहलप्रिय नहीं है, और न ही वह ए ेसी धरती चाहता है।( सागर की लहर) और (अब ंर) के रूप में प्रकृति न े भी मानव से प्र ेम ही किया ह ै ।आज विचारणीय विषय यह है कि फिर ए ेसा क्या है, क्यो ं है, कौन ह ै जो मानव और प्रकृति
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डा, ॅ. अनुराधा अवस्थी. "तनाव प्रब ंधन म ें स ंगीत की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886839.

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तनाव का अर्थ मनुष्य के मन आ ैर मस्तिष्क की उस दशा से ह ैं जिसमें वह अपने विचारों में किसी दबाव और बेचैनी का अनुभव करता ह ै यह ब ेचैनी उसक े शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डालती ह ै तनाव की स्थिति ऐसे हार्मोन का स्तर बढ़ा देती है जिससे धड़कन तेज हो जाती ह ै, रक्तचाप बढ़ने लगता ह ै और विभिन्न व्यक्तिया ें में विभिन्न लक्षण देख े जाते है। तनाव प ्रबंधन का अर्थ कुछ ऐसी मनेाव ैज्ञानिक आ ैर शारीरिक क्रियाआंे की प ्रणाली विकसित करने से ह ै जिन्ह े ं सीख कर मनुष्य क े शरीर आ ैर मन पर पडने वाले दुष्प ्रभावा ें को कम किया जा सकता ह ै। रिचर्ड लज़ारस तथा सुसैन फोक मेन के अनुसार जब मनुष्य के पास किसी लक्ष्य तक पह
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डा, ॅ. कुमकुम भारद्वाज. ""अम ूर्त चित्रकला शैली म ें र ंग संया ेजन"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890369.

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वर्ण अर्था त रंग किसी भी कलाकृति का प्राण ह ै जा े दृष्टि एवं प ्रकाश पर निर्भ र करता ह ै प्रत्येक वस्तु में का ेई न कोई रंग विद्यमान होता ह ै अतः किसी भी वस्तु की पहचान रंगा ें क े कारण होती ह ै। रंग प ्रकाश का गुण ह ै रंग का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता ह ै अपितु अक्षपटल द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला प्रभाव रंग ह ै एक ही रूप की दा े वस्तुआ ें को प ृथक-प ृथक रंगा ें द्वारा पहचाना जाता ह ै रंग वस्तु का वह गुण है जिसका अनुभव हम नेत्रा ें द्वारा करते है प्रकाष की उपस्थिति में ही हम किसी वस्तु का े देख सकते ह ै अतः प ्रकाश हमें रंगा ें का बा ेध कराता ह ै। तूलिका और रंगा ें का निर्मा ण क े संब ंध म
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डा, ॅ. कुमकुम भारद्वाज. ""अम ूर्त चित्रकला शैली म ें र ंग संया ेजन"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890487.

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वर्ण अर्था त रंग किसी भी कलाकृति का प्राण ह ै जा े दृष्टि एवं प ्रकाश पर निर्भ र करता ह ै प्रत्येक वस्तु में का ेई न कोई रंग विद्यमान होता ह ै अतः किसी भी वस्तु की पहचान रंगा ें क े कारण होती ह ै। रंग प ्रकाश का गुण ह ै रंग का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता ह ै अपितु अक्षपटल द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला प्रभाव रंग ह ै एक ही रूप की दा े वस्तुआ ें को प ृथक-प ृथक रंगा ें द्वारा पहचाना जाता ह ै रंग वस्तु का वह गुण है जिसका अनुभव हम नेत्रा ें द्वारा करते है प्रकाष की उपस्थिति में ही हम किसी वस्तु का े देख सकते ह ै अतः प ्रकाश हमें रंगा ें का बा ेध कराता ह ै। तूलिका और रंगा ें का निर्मा ण क े संब ंध म
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रेखा, धीमान. "मुगल कालीन रंग निर्माण -प्रक्रिया (जहाँगीर काल क े संदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890563.

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म् ुागल चित्रकला सम्प ूर्ण एषिया में स्वतंत्र आ ैर महत्वपूर्ण पहचान बनाये हुए है। तैमूर वंष की पांचवी पीढ़ी क े बाबर ने सन् 1527 में भारत के कुछ हिस्सा ें पर अपना आधिपत्य कर मुगल संस्कृति का े स्थापित किया। जिसे ह ुमा ंयू , अकबर, जहाँगीर, षाहजहँा आ ैर आ ैरंगज ेब आदि षासकों ने विस्तार दिया। इस समय सभी कलाआ ें का समुचित विकास हुआ। षाहजहँा के षासन काल तक म्ुागल कालीन चित्रकला चरम - व ैभव को प ्राप्त थी। इस पर्र इ रानी, चीनी आ ैर पष्चिमी कला ष ैली का प ्रभाव पडा। इस समय चित्रकला लघ ु आ ैर स्फ ुट चित्रा ें क े रुप प ्रभावषाली रही। ’जहाँगीर काल (1605 स े 162र्7 इ . तक) चित्रकला लघ ुचित्रा ें क े रुप
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आरती, दुबे. "''सिने स ंगीत में शास्त्रीय प्रया ेग-संगीतकार स्व. नौषाद द्वारा''". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.886824.

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संगीत क े विविध रूपों में सुगम संगीत का विषिष्ट स्थान ह ै। इस विधा के अ ंतर्गत आने वाला सिने संगीत या चित्रपट संगीत जनमानस में अन्य विधाओं की अपेक्षा सर्वाधिक लोकपि ्रय है। अपनी सरलता चमत्कारपूर्ण अभिव्यक्ति की प ्रधानता आ ैर भाव प ्रवणता क े कारण यह जनमानस में अत्यंत लोकपि ्रय ह ै। सिने संगीत की जनसाधारण में अत्यंत लोकप्रियता के अनेक कारण ह ैं। सिने संगीत शब्द प ्रधान एवं भाव प ्रधान होता ह ै। इस कारण जनसामान्य का े उसमें अपनी भावनाए ँ अपना सुख दुःख नजर आता ह ै आ ैर वो इसके सरलतम रूप में अपनी व्यक्तिगत जिंदगी की स्थितियों क े अनुभव क े रूप में अपने आपका े देख पाता ह ै, इसकी सादगी के जरिए उसे
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पवनेन्द्र, कुमार तिवारी. "मध्यकालीन पुस्तक चित्रा े तथा लघु चित्रा े म ें र ंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891930.

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मध्यकालीन भारत में चित्रण क े लिए रंग र्कइ प ्रकार के पदार्थो जैसे खनिजों या ेगिका े अथवा प्राकृतिक लवणा ें से प ्राप्त किये जाते थे। कुछ रंग प ्राकृतिक वस्तुओं जैसे वनस्पति जैव पदार्था े स े प ्राप्त किये जाते थे। उदाहरण क े लिए नीम तथा कृमिदाना आदि काजल का प्रयोग न क ेवल चित्रा े में बल्कि लेखन कार्य में भी बडे प ैमाने पर हुआ। इसी प ्रकार लाल स्याही चाँदी तथा सा ेने में लिखा होने क े कारण स्वणाक्षरी शेत्याक्षरी नाम दिया गया । लाल स्याही का प्रयोग अहमाया े क े अन्त में हाशिये खीचने में व ृन्तों रेखाओं यंत्रा ें आदि में हुआ। स्वर्ण रजत चूर्ण से लिखी जाने वाली प ुस्तके अधिक व्यय-साध्य थी उनमें
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निधि, गुप्ता. "उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन हेतु विभिन्न स्तरों पर संस्थागत ढांचा एवं कार्य: एक विमर्श". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 11, № 1 (2024): 122–27. https://doi.org/10.5281/zenodo.11001993.

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उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य एवं संपदाओं  से सम्पन्न पर्वतीय राज्य है, यहाँ पर एक ओर हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं है तो दूसरी और सदूर तक विस्तृत हरी-भरी वनराजियों है। यहाँ एक ओर सुन्दर फूलों की घटिया है, वहीं दूसरी ओर सूखे- नंगे कठोर पहाड़, नदियों और झरनों का कल- कल निनाद, सभी के मन को मोह लेता है। परंतु प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ते मानवीय क्रिया-कलापों से यहाँ प्रकृति का रौद्र रूप भी उत्तराखंड में  विभिन्न आपदाओं के रूप में  यदा- कदा देखने को मिलता है, जिसमें बाढ, भकम्प, भूस्खलन, वनाग्नि, ब अतिवृष्टि, अनावृष्टि व बादल फटना आदि प्रमुख आपदाएँ है, जो राज्य में आपदाओं की संवे
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