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Artykuły w czasopismach na temat „समानता”

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Tiwari, Dr Pooja. "Gender Equality: A Burning Question." International Journal for Research in Applied Science and Engineering Technology 12, no. 12 (2024): 1597–98. https://doi.org/10.22214/ijraset.2024.66088.

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लœिगक समानता ,एक मौिलक मानव अिधकार होनेके अलावा ,शांितपूणŊसमाजो ंको Ůाɑ करनेके िलए आवʴक है,िजससेपूणŊ मानव Ɨमता और सतत िवकास हो | लœिगक समानता अथाŊत एक ऐसा िवʷ जहाँकोई भी ʩİƅ अपनी लœिगक पहचान के कारण डर मŐन रहेया िहंसा का सामना न करना पड़े|लœिगक समानता मŐसमान अिधकार ,समान अवसर ,सʃान तथा िबना िकसी डर के अपनी पहचान ज़ािहर करनेकी छू ट आिद शािमल हœ| लœिगक समानता पर ŵी चतरिसंह मेहता Ȫारा Ůकािशत लेख “ मानव िवकास और मिहलाएं ‘ʼमŐिलखा हैकी िवʷ मŐलगभग आधी आबादी मिहलाओंकी हैपर उɎŐपुŜषो ंके समान अवसर Ůाɑ नही हœ,यह कटुसȑ हैकी मिहलो ंको पुŜषो ंसेअिधक काम करना पड़ता हैिकȶुउनके कायŘ की कोई कीमत ही नही आंकी जाती ह
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प्रा., डॉ. विशाखा डेरे. "शाश्वत विकास एक समाजशास्त्रीय अध्ययन". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 2 (2025): 383–86. https://doi.org/10.5281/zenodo.15560816.

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शाश्वत विकास हा  लोकांच्या गरजा पूर्ण करण्याचा एक मार्ग आहे. आपल्याकडील अनेक नैसर्गिक संसाधने संपुष्टात येत असल्याने त्यांचा सुज्ञपणे वापर करणे ही आपली   सामाजिक जबाबदारी आहे नैसर्गिक संसाधनाचा उपयोग करताना आपल्या येणाऱ्या भावी पिढ्यांसाठी त्या शिल्लक राहिला पाहिजे हा विचार करणे सुद्धा आवश्यक आहे. तसेच निसर्गाचा समतोल बिघडणार नाही अशा प्रकारे संसाधनांचा वापर करणे आहे. सामाजिक समानता: शाश्वत विकासाचा आणखी एक महत्त्वाचा पैलू म्हणजे आर्थिक लाभ समाजात अधिकता समान रीतीने वितरित करण्याची आवश्यकता आहे. सध्याच्या युगात, अपारंपरिक संसाधने जलद गतीने वापरली जात आहेत ज्यामुळे ही संसाधने धोक
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शर्मा, अभिषेक, та अन्नू शर्मा. "समावेशी वर्ग में शिक्षा समता और समानता भीमराव रामजी अंबेडकर का दृष्टिकोण". Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal 02, № 03 (2023): 350–57. http://dx.doi.org/10.59231/sari7611.

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डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का समावेशी वर्ग में शिक्षा, समता और समानता का दर्शन भारत के सामाजिक आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के दशकों में हम विभिन्न विधानों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पहुंच और समानता के मुद्दों में व्यस्त रहे हैं इन में अम्बेडकर ने शिक्षा, शैक्षिक संस्थान, जाति, धर्म, स्त्री आदि मामलों पर प्रकाश डाला । अंबेडकर का मानना हैं की समता और समानता यह हर इंसान की जरूरत ही नहीं यह सभी का अधिकार है । जो खुलकर और बेबाकी से बाबा साहब (बी. आर. अम्बेडकर ने समाज को बताया। बी. आर. अम्बेडकर ने समाज के उन सभी वर्गों को समावेशी कहा, जिनका समाज के अन्य वर्गों द्वारा क
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डॉ., घन आनंद लक्ष्मीकांत. "महिला आणि लिंग समानता धोरण". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 25 (2023): 12–14. https://doi.org/10.5281/zenodo.8242472.

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प्राचीन काळापासून पितृसत्ताक वर्चस्वामुळे प्राचीन  महिलांमध्ये भेदभाव केला जात आहे. प्राचीन काळापासून महिलांकडे पाहण्याचा दृष्टीकोन दुरययम असून जगात पुनरुत्पादक हक्क, कामगार, शिक्षण आणि आरोग्याशी संबंधित कायदे, महिलांवर अत्याचार आणि शोषण करण्यासाठी आजही उपयोगात आणले जात आहेत. समान हक्काचे कायदे असलेल्या देशातही कायदे असूनही वास्तविकता अशी आहे की पुरुषांना उच्च पातळीवरील आर्थिक व्यवस्थेमध्ये सहज प्रवेश घेता येतो. शिवाय त्यांचे राजकारण आणि सांस्कृतिक जगतात फार मोठ्या प्रमाणात प्रतिनिधित्व होत.आजही महिलांना समानतेची वागणूक देण्यासंदर्भात कायदे होवूनही प्रत्यक्षात त्याची अमंलबजावणी होत असताना
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डॉ., रश्मी बी.वी. "लैंगिक समानता और सोशल मीडिया". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 31 (2023): 18–20. https://doi.org/10.5281/zenodo.8365621.

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Streszczenie:
भारत में स्त्रीयों की स्थिति कभी भी सम्मानजनक नहीं रहीं । अपने और व्यक्तिगत प्रयासों से अवश्य किचन से बाहर भी एक दुनिया बना ली हैं, पर वहाँ भी वह स्वतंत्र नहीं हैं, क्यॊंकि हमारी मानसीकता नहीं रही । जिन महिलाओं को सोशल मीडिया का साथ मिला है वह यौनिकता और सेक्सुयलिटी से अधिक अस्मिता और अधिकार की बातें करें तो बेहतर है । क्योंकि जैसे ही हम बौद्धिक समाज में प्रवेश करके अपनी एक सम्मानित छवि का निर्माण करने में सफल हो जाते हैं । हमारी जिम्मेदारी उन महिलाओं के प्रति बढ़ जाती है  जो आज भी सोशल मीडिया इसमें बहुत बडी़ भूमिका निभा सकता है । इस समाज को बनाए रखने के लिए पुरुषों ने जिस सामन्ती मानसिकत
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डॉ.सचिन, एस. जयस्वाल. "स्त्री-पुरुष समानता आणि शाश्वत विकास: एक संशोधन अभ्यास". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 100–105. https://doi.org/10.5281/zenodo.15240934.

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Streszczenie:
मानव समाजाच्या प्रगतीसाठी समानता आणि शाश्वत विकास या दोन घटकांना अनन्यसाधारण महत्त्व आहे. स्त्री पुरुष समानतेचा अर्थ पुरुष आणि स्त्रिया यांच्यात समतोल राखण्याचा प्रयत्न नव्हे, तर समाजातील प्रत्येक पुरुषाला योग्य हक्क, संधी आणि आदर मिळावा, हे सुनिश्चित करणे होय. लैंगिक समानतेच्या चर्चेमध्ये अनेकदा महिलांच्या अधिकारांवर भर दिला जातो, पण पुरुषांशी संबंधित विशिष्ट सामाजिक, मानसिक आणि भावनिक प्रश्नांनाही तितकेच महत्त्व द्यायला हवे.
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संतोष, कुमार सिंह. "आर्थिक परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तिकरण". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES (ISSN 2348–3318) 9, № 4 (Oct.-Nov.-Dec. 2022) (2022): 65–71. https://doi.org/10.5281/zenodo.7541217.

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Streszczenie:
हमारे देष की अर्थव्यवस्था में आधी आबादी के समान रूप से भाग न लेने के कारण उत्पादकता लाभ के मामले में हम बहुत कुछ खो रहे हैं। हमारे देष की आधी आबादी नवाचार और उद्यमषीलता के लाभ से वंचित है और गैर-पारिश्रमिक, कम उत्पादक और गैर-आर्थिक गतिविधियों तक सीमित है तो ऐसे में हमारा देष विकास के नए सोपान की ओर कैसे अग्रसर होगा? आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बदलने के साथ-साथ अपनी पितृसत्तात्मक मानसिकता में भी परिवर्तन लाने की आवष्यकता है तभी जाकर आर्थिक क्षेत्र में महिलाएँ पूर्ण क्षमता का सही इस्तेमाल कर सकती हैं। समकालीन परिदृष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था ने लैंगिक स्तर पर असमानताओं को जन्म दिया है
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डॉ., प्रदीपशा. ढोले. "महिलांचे सशक्तिकरण आणि राजकीय सहभाग". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 328–30. https://doi.org/10.5281/zenodo.15250966.

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पृथ्वीवरील अर्धी लोकसंख्या म्हणजे स्त्रीवर्ग. या स्त्री वर्गाचे सर्वांगीण जीवनमान सुधारणे व त्यांना सक्षम करणे म्हणजे महिला सशक्तिकरण होय.महिला सशक्तिकरण केवळ एक शब्द नाही तर तो एक विचार आहे.जो महिलांच्या विकासावर,समाजाच्या प्रगतीवर आधारित आहे.सामाजिक समानता, आर्थिक स्वावलंबन, राजकीय सहभाग,शिक्षण आणि आरोग्य या क्षेत्रात स्त्रीची प्रगती घडवून आणणे हा सशक्तिकरणामागे मुख्य उद्देश आहे.कारण पुरुष आणि स्त्रियांमध्ये समानता निर्माण करणे त्यांना समान संधी मिळवून देणे आणि समाजातील अनिष्ट रूढी व परंपरांवर मात करणे, स्त्रीला आर्थिक दृष्ट्या सक्षम करणे, तिला शिक्षण आणि रोजगाराच्या संधी उपलब्ध करून देणे,ति
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शर्मा, आस्था. "उज्बेकिस्तान व भारत के सामाजिक परंपराएँ : समानता की भावना". Oriental Renaissance: Innovative, educational, natural and social sciences 4, № 22 (2024): 84–90. https://doi.org/10.5281/zenodo.13765645.

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उज़्बेकिस्तान मध्य एशियाई देशों में से एक है,&nbsp;<strong>जिसकी राजधानी ताशकंद है</strong>,&nbsp;<strong>जो अरल सागर की सीमा से लगा हुआ है</strong>।&nbsp;उज़्बेकिस्तान का क्षेत्र मैदानी इलाकों और पहाड़ी इलाकों का एक संयोजन है।&nbsp;भारत के साथ उज़्बेकिस्तान के संबंध सौहार्दपूर्ण रहे हैं तथा इन दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंध प्राचीनकाल से ही चले आ रहे हैं। इन्हीं सांस्कृतिक संबंधों की झलक इतिहास में भी दिखाई देती है।भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच ऐतिहासिक रूप से बहुत सी समानताएँ हैं, जैसे:पाली और संस्कृत साहित्य में कंबोज के नाम से वर्तमान उज्बेकिस्तान के कुछ हिस्सों का अक्सर उल्लेख मिलता है।प्
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Sengar, Mansi, та Suruchi Bhatia. "जेंडर इक्वालिटी :विकास की पहली कड़ी". ज्ञान गरिमा सिंधु 69 (31 січня 2021): 131–39. https://doi.org/10.5281/zenodo.6043376.

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Streszczenie:
यह लेख लैंगिक समानता के बारे में बात करता है और सभी जेंडर के लिए समानता का अभ्यास करने के महत्व को समझाने की कोशिश करता है। (This article talks about gender equality and tries to explain the importance of practicing equality for all genders.)
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Baghel, Devendra Kumar. "Work done by Dr. Bhimrao Ambedkar for labour upliftment." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 9, no. 5 (2024): 309–17. https://doi.org/10.31305/rrijm.2024.v09.n05.038.

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Dr. Bhimrao Ambedkar gave priority to labour upliftment through social and economic equality for the exploited and deprived sections of Indian society. His policies and efficiencies paved the way for ending the inequality prevailing in Indian society. He dedicated his life to fight for equality, justice, and respect in society. His labour related policies and efficiencies, such as guarantee of equal pay and proper systematic labour related legal rights for workers, helped them to become financially stable. In this study, we will focus on the major aspects related to labour upliftment of Dr. Bh
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Tiwari, Dr. Usha Kiran. "भारतीय महिला साहित्यकारों का लैंगिक समानता में योगदान: एक समाजशास्त्रीय विवेचन". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 35 (2024): 32–35. https://doi.org/10.5281/zenodo.13856014.

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Abstract&nbsp;समाजशास्त्रीय विचारकों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति समाज की मूलभूत इकाई है और इस इकाई का व्यक्तित्व एक विशिष्ट सामाजिक पृष्ठभूमि के अंतर्गत ही पुष्पित और पल्लवित होता है। साथ ही उस सामाजिक पृष्ठभूमि का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर निश्चित रूप से पड़ता है। हम कितनी भी लैंगिक समानता की बात कर लें पर वास्तविकता तो यही है कि भारत जैसे विकासशील देश में आज भी लैंगिक समानता बहुत महँगी है, जिसका लाभ सिर्फ मध्यम उच्च वर्ग तथा उच्च वर्ग के लोग ही उठा पाते हैं । निम्न वर्ग तथा मध्यम वर्ग के लिए लैंगिक समानता सिर्फ कुछ ही क्षेत्रों में उपलब्ध है । ऐसे में विशेष रूप से भारतीय महिला साहित्यकारों ने
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यादव, शिव नन्दन. "भारतीय संविधान एवं सामाजिक न्याय". Humanities and Development 16, № 1-2 (2021): 62–64. http://dx.doi.org/10.61410/had.v16i1-2.13.

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समानता लोकतान्त्रिक व्यवस्था और विकास का मूल सिद्धान्त है। समानता से आशय है, जाति, धर्म लिंग, वर्ग आदि के भेदभाव के बिना सभी व्यक्तियों कोे अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए समान अवसर और सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिए। यदि कुछ वर्ग या व्यक्तियों का समूह सामाजिक या क्षेत्रीय विषमताओं के कारण विकास की दौड़ में पीछे रह गया, तो समाज का यह कर्तव्य है कि वह इन्हें विकास की दौड़ में बराबरी पर लाये, समकालीन भारत में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के बावजूद निष्पक्ष एवं व्यवहारिक रूप में पिछड़ वर्गों का सामाजिक उत्थान करना चिंतनशील बुद्धिजीवियों के समक्ष एक चुनौती है, स्मरणीय है कि सामाजिक उत्थान एक सम
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काळे, डॉ संदीप बी. "लिंगभावात्मक समानता : महिला सक्षमीकरण आणि मानवी हक्क". SK International Journal of Multidisciplinary Research Hub 11, № 12 (2024): 371–76. https://doi.org/10.61165/sk.publisher.v11i12.74.

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दावा शेर्पा. "मुनामदन खण्डकाव्यको समाज भाषिक अध्ययन". Interdisciplinary Research in Education 8, № 1 (2023): 39–47. http://dx.doi.org/10.3126/ire.v8i1.56725.

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Streszczenie:
समाज भाषिक अध्ययन विशेषतः समाजशास्त्र, मानवशास्त्र र मानवीय समाजका सम्पूर्ण पक्षको सांस्कृतिक प्रतिमान, सम्भावना र सन्दर्भसहित भाषामाथिको अध्ययन हुन्छ । खण्डकाव्यका पत्राहरूको प्रयुक्त भाषाका आधारमा समाज र भाषा तथा भाषा र संस्कृतिको अध्ययन गरिएको छ । तसर्थः मुना, मदन, नैनी फुपु, आमा, भोटे र गुन्डाद्वारा प्रयुक्त भाषिक सञ्चारमा भाषाको समाजपरक र समाजको भाषापरक अध्ययन गरिएको छ । समाज भाषिक सिद्घान्तअनुसार मानिसको सोच्ने प्रक्रिया भाषाले निर्धारण गर्दछ, जसलाई भाषिक सापेक्षतावाद भनिन्छ । यहीँ सिद्घान्त नै ‘मुनामदन’को साहित्य, साहित्यकार र समाजशास्त्रीय भाषिक अध्ययनका आधार हुन् । यसमा प्रकृतिक, ईश्व
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वानखेडे, व्ही. एस. &. मानवते यु. एच. "बुद्धाचे राजकीय विचार : एक अभ्यास". International Journal of Classified Research Techniques & Advances 4, № 3 (2025): 116–20. https://doi.org/10.5281/zenodo.15287135.

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<em>बुद्धांनी असा संदेश दिला की सर्व मानव हे समान आहेत जन्मावरून कोणी उच्च किंवा नीच होत नाही. स्वातंत्र्य, समता, बंधुता, न्याय या लोकशाही तत्वाचा प्रचार प्रसार केल्याचे पाहायला मिळते. या संशोधन लेखांमध्ये बुद्धाच्या स्वातंत्र्य, समता, बंधुता, न्याय या विचारांचा शोध घेण्याचा प्रयत्न केला आहे . बुद्धांनी चक्रवर्ती राजा संबंधी&nbsp; विचार, राज्याच्या उत्पत्तीचा सिद्धांत,लोकनियुक्त महासमंत ,दहा राजधम्म, भिक्षू संघामध्ये असलेली समानता&nbsp; त्यांची कार्यपद्धतीचा&nbsp; उल्लेख त्रिपिटक साहित्यामध्ये आपल्याला पाहायला मिळते.</em>
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डॉ., रंजना प्रल्हादराव शहाणे. "स्वामी दयानंद सरस्वतीयांचे राजकीय विचार". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 7 (2025): 65–69. https://doi.org/10.5281/zenodo.14770705.

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Streszczenie:
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824&ndash;1883) हे भारतीय सुधारक, धार्मिक नेता आणि समाजवादी विचारवंत होते. त्यांच्या जीवनाचा मुख्य उद्देश भारतीय समाजाच्या सर्वांगीण सुधारणा आणि जागरूकतेला महत्त्व देणे होता. त्यांचा प्रभाव केवळ धार्मिक पातळीवरच नाही, तर समाज आणि राजकारणाच्या स्तरावरही महत्त्वपूर्ण होता. स्वामी दयानंद सरस्वती यांचे राजकीय विचार त्यांच्या धार्मिक आणि सामाजिक सुधारणांच्या विचारधारेचा विस्तार होते. त्यांनी जेव्हा भारतीय समाजाची स्थिती पाहिली, तेव्हा त्यांना स्पष्टपणे जाणवले की समाजात प्रचलित असलेल्या कुप्रथा, धर्मांधते आणि जातीवाचक भेदभावामुळे भारतीय समाज प्रगतीच्या मार्गावर जाऊ शकत नाही.
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कुमार, भूपेन्द्र. "जलवायु परिवर्तन वार्ता और भारत: समानता का प्रश्न". International Journal of Political Science and Governance 6, № 2 (2024): 105–14. http://dx.doi.org/10.33545/26646021.2024.v6.i2b.373.

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Anjali, Prasad. "वर्तमान परिदृश्य में लैंगिक समानता एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 6, № 5 (Special Issue) (2019): 19–26. https://doi.org/10.5281/zenodo.6586118.

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भारत एक धर्म प्राण देश है जिसमें पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था के कारण पितृसत्तात्मक व्यवस्था विद्यमान रही है और पुरुष प्रधान समाज होने के कारण सभी नियम रीति रिवाज कायदे कानून व्यवहार की विधियां आदि पुरुषों के हितों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं कन्याओं का उम्र में ही विवाह कर देना और शिक्षा के मार्ग में उनके घरेलू कार्यों की उत्तरदायित्व की भावना डाल देना उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए घातक साबित होता है कम उम्र में ही विवाह हो जाने के उपरांत गर्भ धारण कर लेना और उसके उपरांत उसके स्वास्थ्य के प्रति अनभिज्ञता का प्रदर्शन हो, सहन करना पड़ता हैI महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आर्थिक सशक्तिक
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कराडे., प्रा. डॉ. सुजाता. "लिंगभाव समानतेसाठी महिलांचे जागतिक योगदान". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 35 (2024): 154–59. https://doi.org/10.5281/zenodo.13859301.

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सारांश:&nbsp;&nbsp; &nbsp; आज माहिती तंत्रज्ञानाच्या युगामध्ये लिंगविषयक समानता &nbsp;आहे. &nbsp;जागतिक पातळीवर मानवी प्रगतीतील महत्त्वाचा टप्पा असला तरी आजही महिलांची स्थिती जागतिक पातळीवर चिंताजनक आहे.कारण आज प्रत्येक देशामध्ये रूढी परंपरेमध्ये समाज गुरफटला आहे. &nbsp;काही देशांमध्ये पुरुष आजही स्त्रियांचे स्थान दुय्यम मानले जाते. &nbsp;त्याच्याकडे आजही असमानतेच्या नजरेतून पाहिले जाते. लिंगभाव समानता आणण्याकरिता जागतिक धोरणे ही सर्व जगाने &nbsp;स्वीकारून जगात सामाजिक विकास हा लिंगभाव असमानतेची वाटचाल न करता समानतेकडे नेवून सकारात्मक घडवून आणत आहे. &nbsp;
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बरई Barai, त्रिभुवन Tribhuvan. "एउटा छर्लङ्ग प्रेमकथामा नारीवादी स्वर Euta Chharlanga Premkathama Narivadi Swar". Tribhuvan University Journal 33, № 2 (2019): 223–32. http://dx.doi.org/10.3126/tuj.v33i2.33653.

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प्रस्तुत लेखमा भवानी भिक्षुद्वारा लिखित ‘एउटा छर्लङ्ग प्रेमकथा’ को नारीवादीसमालोचना सिद्धान्तका आधारमा विश्लेषण गरिएको छ । उत्तरआधुनिकतावादसँग निकटसम्बन्ध राख्ने तथा सन् १९६० पछि स्थापित भएको नारीवाद नारीहरूको हक, अधिकार,स्वतन्त्रता, समानता, स्वाभिमान र अस्तित्वको पक्षमा आवाज उठाउने एक प्रकारकोसमालोचाना सिद्धान्तसँग सम्बन्धित छ । प्रस्तुत सन्दर्भमा नारीवादको सामान्य चिनारी दिँदैनारीवादका प्रमुख मान्यताका साथै कृति विश्लेषणका नारीवादी आधारहरूको समेत निर्धारणगरिएको छ । कथामा वर्णित कार्यव्यापार र घटित घटनाहरूको सापेक्षतामा मूल्याङ्कन गर्दातिब्बती समाजमा नारीहरूलाई पुरुषजस्तै हक, अधिकार, स्वतन्त्
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अहिरवार, हरिचरण, та दिनेश प्रसाद वर्मा. "''ग्रामीण विकास में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण'' (सीधी जिले के विशेष सन्दर्भ में)". Anthology The Research 9, № 1 (2024): H 57 — H 64. https://doi.org/10.5281/zenodo.11300220.

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This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research"&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=8981 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; Abstract : भारतीय संविधान की उद्देशिका,&nbsp;मूल अधिकार,&nbsp;मूल कर्तव्य तथा नीति निर्देशक सिद्धांतो में स्त्री-पुरुष समानता के सिद्धांत का उल्लेख किया गया है। भार
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कौल, अविनाश कुमार. "भक्ति आंदोलन, सामाजिक संरचना, जाति प्रथा, धार्मिक सहिष्णुता एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण". International Journal of Science and Social Science Research 2, № 3 (2024): 149–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.14210186.

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भक्ति आंदोलन ने मध्यकालीन भारत की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परिवेश में गहरा प्रभाव डाला। यह आंदोलन उस समय उभरा जब सामाजिक असमानता, जाति प्रथा और धार्मिक कट्टरता अपने चरम पर थीं। भक्ति संतों जैसे कबीर, तुलसीदास, मीराबाई और गुरु नानक ने धर्म के जटिल रीति-रिवाजों और जाति आधारित विभाजन के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने समानता, सद्भाव और भाईचारे के मूल्यों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। भक्ति आंदोलन ने निम्न जातियों और महिलाओं को सामाजिक और धार्मिक रूप से सशक्त होने का अवसर प्रदान किया। इस आंदोलन ने जाति आधारित भेदभाव को चुनौती दी और सभी मनुष्यों की समानता पर जोर दिया। भक्ति संतों की वाणी में स
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राजेन्द्र, कुमार, та उपासना. "शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 10, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 43–45. https://doi.org/10.5281/zenodo.7944517.

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महिलाएं अपने प्रति होने वाले सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक अन्याय, लिंग भेद व समानता, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक शक्तियों के नकारात्मक प्रभाव के विरुद्ध जागरूक हो जाएं तो यह समझा जा सकता है कि उनका सशक्तिकरण हो रहा है। उसके महत्व को स्वीकार किया जा सके तथा उसे समान नागरिक एवं समान अधिकार की स्थिति तक ला सके। शिक्षित महिलाएं ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं जिससे वह सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में अपना सहयोग दे सकती हैं। वर्तमान समाज में शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा महिलाएं अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना सकती हैं। आज महिलाओं की स्थिति में जो परिवर्तन हुए है
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डॉ., सचिन दत्तात्रय भोसले. "भारतातील लिंगभावाच्या राजकारणाची स्थित्यंतरे". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 03 (2024): 29–36. https://doi.org/10.5281/zenodo.14237766.

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समाजातील अनेक महत्त्वपूर्ण घटकांपैकी स्त्री हा एक घटक आहे. परंतु पूर्वीपासूनच स्त्रीला समाजात पुरुषांच्या बरोबरीचे स्थान नव्हते. भारतात तर स्त्रियांना अत्यंत हीन दर्जाची व तुच्छतेची वागणूक दिली जात आली आहे. शतकानुशतके त्यांना रूढी, परंपरा, धर्माज्ञा व कायदे याद्वारे पारतंत्र्यात ठेवण्यात आलेले आहे. त्यामुळे आपल्या देशात बालविवाह, हुंडाप्रथा, पडदा पद्धती, देवदासी आणि वेश्या व्यवसाय आदी सामाजिक समस्या निर्माण झाल्या. स्त्रिया शिक्षणापासून ही वंचित राहिल्या त्यांचे हक्क व स्वातंत्र्य नाकारले गेले. त्यांना सहाय्यक व सहधर्मिणी बनण्याऐवजी घरकाम करणारी दासी व आपल्या भोगविलासाचे साधन बनविले गेले. भारत
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डॉ0, सोनिया डबास. "समाज में समानता और न्याय: सामाजिक प्रगति के मुख्य स्तंभ". Academic 2, № 12 (2025): 735–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.14724293.

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डॉ., मिलन बर्मन. "संस्कृत परंपराओं में सार्वभौमिक मूल्य:मानवाधिकारों की उत्पत्ति का अन्वेषण". International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary 3, № 5 (2024): 229–32. https://doi.org/10.5281/zenodo.14583077.

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यह अध्ययन संस्कृत परंपराओं में निहित सार्वभौमिक मूल्यों और मानवाधिकारों की उत्पत्ति के बीच संबंधों का अन्वेषण करता है। आधुनिक युग में मानवाधिकारों को नई अवधारणा माना जाता है, लेकिन इसके मूल प्राचीन भारतीय संस्कृत साहित्य, जैसे वेद, उपनिषद और स्मृति ग्रंथों में गहराई से समाहित हैं। इन ग्रंथों में मानव गरिमा, न्याय, अहिंसा, समानता और स्वतंत्रता जैसे मूल्यों का वर्णन मिलता है, जो वर्तमान मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुरूप हैं। इस अध्ययन में संस्कृत शास्त्रों के महत्वपूर्ण श्लोकों और विचारों का विश्लेषण किया गया है, जो सार्वभौमिक समानता, सामाजिक न्याय और परस्पर सम्मान को प्रोत्साहित करते हैं। निष्कर्
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Verma, Shalini. "Gender Inequality in the Field of Music." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 9 (2024): 10–13. https://doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n9.003.

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Gender equality refers to a state in society where women and men enjoy equal rights in marriage, social, and economic aspects. Conversely, gender inequality implies that one gender is given more importance over the other. Gender inequality is observed in various fields across the globe, and the field of music is no exception. In Indian music, the number of male singers and instrumentalists has historically been higher than that of females. In the Vedic period, women participated equally in all three forms of art—singing, instrumental music, and dance. During the Ramayana era, women were also g
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श्रेष्ठ Shrestha, चन्द्रमान Chandraman. "आफर कवितासङ्ग्रहमा दलित चेतना". Saraswati Sadan सरस्वती सदन 10, № 1-2 (2024): 51–64. http://dx.doi.org/10.3126/ss.v10i1-2.68617.

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प्रस्तुत शोधलेखमा उन्मुक्त पुस्ताद्वारा लेखिएको ‘आफर’ कवितासङ्ग्रहको दलित चेतनाका आधारमा अध्ययन गरिएको छ । सामाजिक, सांस्कृतिक र आर्थिक दृष्टिले उत्पीडनमा पारिएका जातिहरूको समुदाय नै दलित हुन् । मनुवादी हिन्दू वर्णव्यवस्थामा आधारित नेपाली समाजमा दलित समुदायले लामो समयदेखि शोषण र उत्पीडन भोग्दै आएका छन् । दलित मुक्तिका लागि सर्वप्रथम भारतका भीमराव अम्बेडकरले सङ्गठित रूपमा आवाज उठाउने काम गरे । तिनै दलितका समस्यालाई प्रस्तुत गर्दै दलितमुक्तिको आह्वान गरिएको साहित्य नै दलित साहित्य हो । हिन्दू वर्णव्यवस्थाको विरोध, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उत्पीडनको विरोध, स्वतन्त्रता, समानता र बन्धुत्वको भावना, श्
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फुलसावंगे, प्रा. गजानन भिकाजी. "जागतिक पातळीवर महिला सक्षमीकरण : शाश्वत विकास". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 35 (2024): 42–44. https://doi.org/10.5281/zenodo.13856048.

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सारांश:&nbsp;&nbsp; &nbsp; लैंगिक समानता आणि महिला सबलीकरण साध्य करणे हे प्रत्येक १७ उद्दिष्टांसाठी अविभाज्य आहे. सर्व उद्दिष्टांमध्ये महिला आणि मुलींच्या हक्कांची खात्री करूनच न्याय आणि समावेश, सर्वांसाठी काम करणाऱ्या अर्थव्यवस्था आणि भविष्यातील पिढ्यांसाठी सामायिक वातावरण टिकवून ठेवता येईल. शाश्वत विकासासाठी अंमलबजावणी करताना असेही लक्षात येते की जागतिक स्तरावर लिंग समानता साध्य करण्यात समाज अयशस्वी &nbsp;ठरत आहे &nbsp;असे चालू राहिल्या २०३० पर्यंत ३४० दशलक्ष आपण अधिक महिला आणि मुली अत्यंत गरीब राहतील आणि चार पैकी एक मध्यम आणि किंवा गंभीर अन्नसुरक्षित जाणवेल मानवनिर्मित हवामान बदलामुळे वाढणा
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प्रा., डॉ. एन. एस. गेडाम प्रा. डॉ. एन. एस. गेडाम. "महिलांचे अधिकार आणि महिला सबलीकरण". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 30 (2023): 145–48. https://doi.org/10.5281/zenodo.8394773.

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&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; महिला सबलीकरण म्हणजे कायदे व महिला कल्याण कार्यक्रमाच्या माध्यमातून आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक व राजकीय&nbsp; सर्व क्षेत्रांमध्ये महिलांना पुरुषांच्या बरोबरीने हक्क व दर्जा प्रदान करणे होय. महिलांना विकासाची संधी उपलब्ध करून स्त्री-पुरुष असमानता नष्ट करणे होय. भारतीय संविधानात महिला-पुरुष, श्रीमंत-गरीब आणि साक्षर-निरक्षर यांना समान संरक्षण प्रदान करण्यात आले आहे. कायद्यापुढे समानतेसाठी व शोषणमुक्त समाजाच्या स्थापनेसाठी कटिबद्ध असलेल्या आपल्या संविधानाच्या निर्मात्यांनी सर्वांना सामाजिक-आर्थिक आणि राजकीय न्याय देण्याची ग्वाही देतानाच संविधानापुढे स्त्री-पुरुष
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प्रा., डॉ. सुरेश चंद्रकांत मेहेत्रे, та पूजा ज्ञानोबा शेळके कु. "महात्मा गांधींचे आर्थिक समानतेविषयीचे विचार". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 05 (2023): 140–43. https://doi.org/10.5281/zenodo.10072917.

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महात्मा गांधी यांच्या मते, भारताचा परिपूर्ण आर्थिक विकास करण्यासाठी सामाजिक आणि राजकीय क्षेत्राबरोबरच आर्थिक क्षेत्राचाही विचार करणे महत्त्वाचे आहे. स्वातंत्र्यपूर्व काळात भारतावर इंग्रजांचे राज्य होते. इंग्रजांच्या जाचक आणि असहाय्य नीतीमुळे भारतामध्ये आर्थिक दारिद्र्यता निर्माण झाली होती. आर्थिक असमानता निर्माण होण्यामागचे प्रमुख कारण म्हणजे औद्योगिकरण आहे हे गांधीजींच्या लक्षात आले. त्यामुळे त्यांनी लघु उद्योगांना चालना देण्याचे ठरविले. औद्योगिकीकरणामुळे भारतातील बंद पडलेले कुटिरोद्योग सुरू करून लोकांना स्वदेशी वस्तू वापरण्यासाठी प्रेरित केले. गांधीजींचा या मागचा मुख्य हेतू असा होता की, आयात
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शशिकान्त, भारती. "शहरी क्षितिज: डॉ. बी.आर. अंबेडकर की शहरीकरण के माध्यम से दलित मुक्ति की दृष्टि". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 2 (2025): 322–28. https://doi.org/10.5281/zenodo.15560674.

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डॉ. बी.अर. ऄंबेडकर के क्ांक्षतकारी क्षवचारों ने भारत में सक्षदयों परु ानी जाक्षतगत ईत्पीड़न की संरचनाओं को चनु ौतीदी। सामाक्षजक सुधार के क्षिए ईनके कइ ईपायों में, शहरीकरण समानता के क्षिए ईनके दृक्षिकोण का एक कें द्रीय क्षहस्सा थाऄंबेडकर मानते थे क्षक शहरीकरण और औद्योक्षगकीकरण का संयोजन दक्षितों को ग्रामीण जाक्षत पदानक्ु म द्वारा िगाए गएसामाक्षजक और अक्षथाक प्रक्षतबंधों से मक्षु ि क्षदिाने का एक माध्यम प्रदान करता है। यह शोध पत्र शहरीकरण के माध्यम सजाक्षतगत भेदभाव को समाप्त करने के क्षिए ऄंबेडकर की सामाक्षजक-अक्षथाक रणनीक्षत का गहन क्षवश्लेषण प्रस्ततु करता है। आसरणनीक्षत के क्षसद्ांत, ईनके काया
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ब ेगम, आब ेदा. "छŸासगढ ़ क े महाप ुरूषा ें का सामाजिक समरसता म ें या ेगदान’". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 87–90. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201914.

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सामाजिक समरसता एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा करना एवं इसे ठीक प्रकार से कार्यान्वित करना आज समाज एवं राष्ट ्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसके लिए हमें सर्वप्रथम सामाजिक समरसता के अर्थ का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। संक्षेप में इसका अर्थ है सामाजिक समानता। यदि व्यापक अर्थ द ेखें तो इसका अर्थ है जातिगत भेदभाव एव ं अस्पृश्यता का जड ़मूल से उन्मूल कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहाद र् बढ ़ाना तथा समाज के सभी वर्गों एव ं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना। समरस्ता का अर्थ है सभी को अपन े समान समझना। सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है इस बात को हृदय से स्वीकार
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प्रसाद, रचना. "NEP 2020 का समाजशास्त्रीय मूल्यांकन: समावेशिता और समानता के सन्दर्भ में". International Journal of Humanities and Arts 7, № 1 (2025): 339–43. https://doi.org/10.33545/26647699.2025.v7.i1e.162.

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अर्याल Aryal, पदमप्रसाद Padamprasad. "दनुवारी र नेपाली भाषाका क्रियापदको तुलना {Comparison of Danuwari and Nepali language verbs}". Pragyajyoti 4, № 1 (2021): 130–39. http://dx.doi.org/10.3126/pj.v4i1.45203.

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विभिन्न जातजातिको सङ्गमस्थल नेपालका १२३ भाषाहरूमध्ये दनुवार जाति र यसको भाषापनि एक राष्ट्रिय भाषा हो । दनुवारी भाषी नेपालका सातै प्रदेशमा छरिएर बसेका भए पनि यिनकोमुख्य उद्गम स्थल र अधिक सङ्ख्यामा बसोवास चाहिँ वाग्मती प्रदेशमा नै भएको तत्थ्याङ्क पाइन्छ ।यो भाषा भारोपेली भाषा परिवारको मागधीवर्गबाट विकिसित भएको हो । कुनै पनि भाषाकोअभिव्यक्ति क्षमता शब्दभण्डारको क्षमतामा निर्भर रहन्छ । विश्वका हरेक जातिका भाषिक प्रयोगमात्यस भाषाका शब्दवर्गको महत्त्वपूर्ण स्थान हुन्छ । सञ्चारसामथ्र्यको मापन गर्ने मूलआधार पनिशब्दस्रोत नै हो । शब्दहरूको सम्पन्नता र अर्थवहन क्षमताले भाषालाई जीवन्त बनाउँछ । परम्परित रभ
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एटम Atom, नेत्र Netra. "तीन बराबर पाँच कथामा सामाजिक तथ्य". Kaladarpan कलादर्पण 5, № 1 (2025): 13–23. https://doi.org/10.3126/kaladarpan.v5i1.74729.

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प्रस्तुत लेखमा केशवराज ज्ञवालीको ‘तीन बराबर पाँच’ कथालाई कार्यपीठिकाका रूपमा लिएर यसमा अभिव्यक्त सामाजिक तथ्यहरूले पात्रका जीवनमा पारेका प्रभावहरूको निरूपण गरिएको छ । सामाजिक तथ्य भनेको व्यक्तिभन्दा बाहिर रहेर समाजलाई निर्माण एवम् नियन्त्रण गर्ने परिवार, धर्म, शिक्षा, सामूहिक मूल्य, सामाजिक प्रवाह, चेतना आदिको समष्टि शक्ति हो । ‘तीन बराबर पाँच’ कथामा आएका घटनाशृङ्खला, पात्रहरूको क्रियाकलाप र चिन्तन तथा विचारधारासित जोडिएर यसको परिवेशले भौगोलिक, प्राकृतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पहिचानको सूक्ष्म अवलोकन गर्दै स्थानीयतालाई नेपालव्यापी कार्यपीठिका बनाएको सन्दर्भ स्थापित गर्नु यस लेखको उद्देश्य हो । य
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रीतेश रावत. "असंगघोष के काव्य में मानवीय अस्मिता की चेतना". International Journal of Multidisciplinary Research in Arts, Science and Technology 2, № 10 (2024): 27–33. https://doi.org/10.61778/ijmrast.v2i10.87.

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असंगघोष का जन्म मध्यप्रदेश के जावद नामक छोटे से कस्बे में 29 अक्टूबर 1962 ई0 को हुआ। असंगघोष 21वीं शताब्दी के विख्यात हिन्दी कवि है। विषमता और विद्रूपता के प्रति विद्रोह करते हुए सामाजिक समानता के पुरोधा, दलितों के शोषण का विरोध, प्रस्थापित व्यवस्था के विरूद्ध उठायी गई ईमानदार आवाज परिवर्तित समानांतर समाज व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश, मानवाधिकार के प्रति सजगता जैसी बहुआयामी चेतना से अनुप्राणित असंग जी की कविताओं में नई शती को विद्रोह की ताकत देने वाला आस्थावान विमर्श प्रस्तुत हुआ है। स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा भारतीय संविधान के प्रणीत मूल्य है जो असंगघोष की कविताओं में हमें देखने को मिलता है। स
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प्रा., डॉ. एन. एस. गेडाम. "महिलांचे अधिकार आणि महिला सबलीकरण". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 30 (2023): 144–46. https://doi.org/10.5281/zenodo.8394803.

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<strong>प्रस्तावना</strong><strong>:&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; </strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; महिला सबलीकरण म्हणजे कायदे व महिला कल्याण कार्यक्रमाच्या माध्यमातून आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक व राजकीय&nbsp; सर्व क्षेत्रांमध्ये महिलांना पुरुषांच्या बरोबरीने हक्क व दर्जा प्रदान करणे होय. महिलांना विकासाची संधी उपलब्ध करून स्त्री-पुरुष असमानता नष्ट करणे होय. भारतीय संविधानात महिला-पुरुष, श्रीमंत-गरीब आणि साक्षर-निरक्षर यांना समान संरक्षण प्रदान करण्यात आले आहे. कायद्यापुढे समानतेसाठी व शोषणमुक्त समाजाच्या स्थापनेसाठी कटिबद्ध असलेल्या आपल्या संविधानाच्
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प्रा., डॉ. एन. एस. गेडाम. "महिलांचे अधिकार आणि महिला सबलीकरण". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 30 (2023): 144–46. https://doi.org/10.5281/zenodo.8394835.

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<strong>प्रस्तावना</strong><strong>:&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; </strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; महिला सबलीकरण म्हणजे कायदे व महिला कल्याण कार्यक्रमाच्या माध्यमातून आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक व राजकीय&nbsp; सर्व क्षेत्रांमध्ये महिलांना पुरुषांच्या बरोबरीने हक्क व दर्जा प्रदान करणे होय. महिलांना विकासाची संधी उपलब्ध करून स्त्री-पुरुष असमानता नष्ट करणे होय. भारतीय संविधानात महिला-पुरुष, श्रीमंत-गरीब आणि साक्षर-निरक्षर यांना समान संरक्षण प्रदान करण्यात आले आहे. कायद्यापुढे समानतेसाठी व शोषणमुक्त समाजाच्या स्था
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प्रा., डॉ. एन. एस. गेडाम. "महिलांचे अधिकार आणि महिला सबलीकरण". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 30 (2023): 144–46. https://doi.org/10.5281/zenodo.8394874.

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<strong>प्रस्तावना:&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; महिला सबलीकरण म्हणजे कायदे व महिला कल्याण कार्यक्रमाच्या माध्यमातून आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक व राजकीय &nbsp;सर्व क्षेत्रांमध्ये महिलांना पुरुषांच्या बरोबरीने हक्क व दर्जा प्रदान करणे होय. महिलांना विकासाची संधी उपलब्ध करून स्त्री-पुरुष असमानता नष्ट करणे होय. भारतीय संविधानात महिला-पुरुष, श्रीमंत-गरीब आणि साक्षर-निरक्षर यांना समान संरक्षण प्रदान करण्यात आले आहे. कायद्यापुढे समानतेसाठी व शोषणमुक्त समाजाच्या स्थापनेसाठी कटिबद्ध अ
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BK, Janak. "चाणक्य र मार्क्सको राजनीतिक सिद्धान्तको तुलनात्मक अध्ययन". Journal of Deukhuri Multiple Campus 3, № 4 (2025): 54–64. https://doi.org/10.3126/jdmc.v3i4.80557.

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प्रस्तुत शोध लेखलमा चाणक्यको अर्थशास्त्र र कार्ल माक्र्सको माक्र्सवादमा आधारित राजनीतिक सिद्धान्तहरूको छोटो रूपमा तुलनात्मक अध्ययन गरिएको छ। चाणक्यले तत्कालिन भारतीय सभ्यताका लागि प्रस्ताव गरेको राजनीतिक, आर्थिक र प्रशासनिक सिद्धान्त र माक्र्सले औद्योगिक क्रान्तिपछिको पश्चिमी समाजका लागि प्रस्ताव गरेका वर्ग संघर्ष र आर्थिक व्यवस्थाका सिद्धान्त बिचको सैद्धान्तिक र व्यवहारिक अन्तर खोज्ने प्रयत्न यस अध्ययनमा गरिएको छ । यस शोधलेखमा तुलनात्मक अध्ययनमार्फत दुवै बीचारधाराको राजनीतिक, सामाजिक र आर्थिक दृष्टिकोणहरूमा रहेको समानता र भिन्नतालाई स्पष्ट पार्ने प्रयास गरिएको छ । यसका साथै, यी सिद्धान्तहरूको
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पौडेल Poudel, लतादेवी Latadevi. "'युद्धविराम जिन्दावाद’ कथामा : विश्वदृष्टि {Worldview in the story "Yuddha Biram Zindabad"}". Kaladarpan कलादर्पण 3, № 1 (2023): 77–86. http://dx.doi.org/10.3126/kaladarpan.v3i1.55211.

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प्रस्तुत लेख महेशविक्रम शाहको ‘युद्धविराम जिन्दावाद’ कथामा विश्वदृष्टिसँग सम्बन्धित छ । कथाको अध्ययनसँग सम्बन्धित छ । साहित्यको माक्र्सवादी चिन्तमा आधारित विभिन्न दृष्टिकोणहरूमध्ये फ्रान्सेली चिन्तक लुसिएँ गोल्डमानद्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त हो विश्वदृष्टि । यस सिद्धान्त अन्तर्ग साहित्यिक रचनाका विषयवस्तुलाई समाजका वास्तविकतासँग जोडेर हेर्ने गरिन्छ । यसलाई साहित्यको समालोचनाको नवीन र प्रचलित पद्धतिका रूपमा लिइन्छ । यस लेखमा गोल्डमानको विश्वदृष्टिसँग सम्बन्धित मान्यतामा केन्द्रित भई कृतिको अध्ययन तथा विश्लेषण गरिएको छ । गोल्डमानका विचारमा एउटा वर्ग वा समूहको जीवनजगत् बारेमा सुसङ्गत दृष्टि नै वि
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Saraswat, C. M. "शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिग समानता के लिए परिवर्तित नीति एवं व्यवहार". SDES-International Journal of Interdisciplinary Research 2, № 3 (2021): 205. http://dx.doi.org/10.47997/sdes-ijir/2.3.2021.205-208.

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बरई Barai, त्रिभुवन Tribhuvan. "परालको आगो कथाको विमर्शप्रस्तुतिमा दृष्टिविन्दुपात्र". Prithvi wangmaya 14 (12 вересня 2024): 144–54. http://dx.doi.org/10.3126/pw.v14i01.69766.

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प्रस्तुत लेखमा दृष्टिविन्दुपात्रको सैद्धान्तिक पर्याधारको केन्द्रीयतामा गुरुप्रसाद मैनालीद्वारा लिखित ‘परालको आगो’ कथामा अङकित विमर्शको मूल्याङकन गरिएको छ । ‘परालको आगो’ कथाको दृष्टिविन्दुपात्रका माध्यमबाट अभिव्यक्त विमर्श पहिल्याउनाका निम्ति यो अध्ययन गरिएको हो । प्राथमिक एवम द्वितीयक स्रोतका सामग्रीको उपयोग गरी दृष्टिविन्दुपात्रको सैद्धान्तिक पर्याधारलाई आधार बनाई गुणात्मक शोधविधि अपनाई यस लेखलाई पूर्णता प्रदान गरिएको छ । लैङगिक समानतायुक्त अवधारणाको प्रस्तुति, महिला र पुरुषको सहकार्यात्मक सम्बन्धमा जोड तथा सीमान्तीयतासम्बन्धी अवधारणाको अभिव्यक्ति गरी तीनओटा सूचकका केन्द्रीयतामा प्रस्तुत कथा
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पौडयाल Poudyal, शालिकराम Shalikram. "अक्षर कवितासङग्रहका कवितामा प्रगतिवादी चेतना". Shabda Sadhana शब्दसाधना 7, № 1 (2024): 35–43. https://doi.org/10.3126/shabdasadhana.v7i1.75085.

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प्रस्तुत लेखमा लेखनाथ ज्ञवालीको अक्षर कवितासङग्रहमा रहेको प्रगतिवादी चेतनाको विश्लेषण गरिएको छ । यस लेखमा अक्षर कवितासङग्रहलाई प्राथमिक स्रोत सामग्रीको रूपमा तथा प्रगतिवादी अवधारणालाई द्वितीयक स्रोतको सामग्रीको रूपमा उपयोग गरिएको छ । दुवै प्रकृतिका सामग्रीको सङकलन पुस्तकालयीय कार्यबाट गरिएको छ र सामग्री विश्लेषणमा प्रगतिवादी चेतनाका अभिलक्षणहरूमध्ये युगचेतना र समाज परिवर्तनको स्वर, क्रान्तिचेत र देशप्रेम, शोषण र उत्पीडनका विरुद्धको सङघर्षको स्वर, जीवन सङघर्षको स्वर र सौन्दर्यचेतलाई आधार मानिएको छ । प्रगतिवादी साहित्यले मानवीय समानता र स्वतन्त्रताका पक्षमा आवाज उठाउँछ । साहित्यमा गतिशील, ऐतिहास
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Chaulladain, Prem Prasad. "संस्कृत र नेपाली सन्धिको तुलना". Prajnik Bimarsha प्राज्ञिक विमर्श 5, № 10 (2023): 24–44. https://doi.org/10.3126/pb.v5i10.71388.

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प्रस्तुत लेख संस्कृत र नेपाली सन्धिको तुलनात्मक अध्ययनमा केन्द्रित छ । यसैले यस लेखमा सन्धिको सैद्धान्तिक आधार तयार पारी उक्त सैद्धान्तिक आधारले निर्देश गरेअनुसार संस्कृत र नेपाली सन्धिका वैशिष्ट्य प्रस्तुत गर्नुका साथै तिनको तुलना गरी प्राप्त भएको निचोड प्रस्तुत गरिएको छ । विश्लेषणात्मक र तुलनात्मक विधिको उपयोग गरी सन्धिप्रक्रियासँग सम्बद्ध परिवेश, ध्वनिपरिवर्तन, संरचना र क्षेत्रका आधारमा संस्कृत र नेपाली सन्धिको तुलना गर्दा प्राप्त भएको मुख्य निष्कर्ष के हो भने सन्धि दुई भाषिक एकाइको संयोजन हुँदा हुने ध्वनितात्त्विक परिवर्तन हो । दुई भाषिक एकाइको संयोजन हुँदा पनि परिवर्तन नहुने स्थिति चाहिँ
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शर्मा Sharma, मुकुन्द Mukunda. "थारू, मगर र बाहुन जातिमा प्रचलित लोकरामायणका परिवेशमा जातीय, सामाजिक र सांस्कृतिक अनुकूलन {Common among the Tharu, Magar and Bahun castes Caste in the environment of Lokramayana, Social and cultural adaptation}". Saraswati Sadan सरस्वती सदन 5, № 1-2 (2021): 113–25. http://dx.doi.org/10.3126/ss.v5i1-2.62562.

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प्रस्तुत लेख थारू, मगर र बाहुन जातिमा प्रचलित लोकरामायणमा चित्रित सांस्कृतिक परिवेशमा गरिएको अनुकूलनको पहिचानमा केन्द्रित छ । अनुकूलन तुलनाको विषय हो। भिन्नभिन्न जाति, भाषा, संस्कृति र भूगोलमा प्रचलित लोकसाहित्यका समान विषयवस्तुयुक्त प्रबन्धात्मक र नृत्य वा नाट्यमूलक विधाका परिवेश चित्रणमा सामान्यतः समानता नै पाइन्छ भने लोकसामग्रीका संवाहकले ती सामग्रीलाई आआफ्नो जाति, भाषा, संस्कृति र भूगोल अनुसार अनुकूलन गरी प्रस्तुत गर्दा परिवेशमा भिन्नता पनि आएको हुन्छ । यस आधारबाट हेर्दा तराईका थारू समुदायमा प्रचलित रामायणका परिवेश मूलतः मूलसामग्री अनुकूल हुनुका साथै नेपालको तराई भूभागको भूगोलगत परिवेश र थ
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ज्योति, कुमारी. "किशोरियों का विकास और सामाजिक असमानता". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 45–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.7703645.

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किशोरावस्था नारी के जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इस अवस्था में वह यौवन की दहलीज पर होती है। बालावस्था तथा यौवन के बीच की अवस्था होने के कारण किशोरावस्था भारी के मानसिक, भावनात्मक तथा मनोवैज्ञानिक विकास की दृष्टि से अत्यंत परिवर्तनशील होती है। यदि मानव संसाधन विकास के उद्देश्य से चलाए जाने वाले विकासात्मक कार्यक्रमों में किशोरियों को शामिल न किया जाए तो सर्वांगीण बाल विकास का दृष्टिकोण उपेक्षित रह जाता है। सामाजिक असमानता तब होती है जब किसी दिए गए समाज में संसाधनों को असमान रूप से वितरित किया जाता है, आमतौर पर आवंटन के मानदंडों के माध्यम से, जो व्यक्तियों की सामाजिक रूप से परिभाष
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Bhashkar, Bhadoriya Dr. Vinay Prakash Gaur. "बालश्रमिकों पर मानवाधिकार की सार्थक उपादेयता". International Educational Applied Research Journal 09, № 02 (2025): 20–25. https://doi.org/10.5281/zenodo.14911398.

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रामधारी सिंह दिनकर की में पंक्तियां आज भी प्रासांगिक हैं और तब तथा प्रासंगिक रहेंगी जब तज्ञ समता और समानता के आदर्श चरितार्थ नहीं हो जाते और इस मानय समता और समानता शे मार्ग में एश ना अवरोध नआ श्रम समाज से विकास में बाठाश्रमिश शा यह अयरोय शेषठा भारत में ही नहीं वरन पूरे विष्य में व्याप्त है और समाज को अस्तित्व से साथ ही इसका जन्म हुआ है।नाठाश्रमिश प्रथा ऋणदाता और ऋण प्राप्तकर्ता से बीच से सम्बन्धों को बताता है जो अपने दैनिक जीवन की आर्थिक अनिवार्यताओं को पूरा करने के लिए कण होता है और माता द्वारा प्रस्तुत शर्तों शो स्वीकार कर होता है। समझौते की प्रमुख शर्त यह होती है शिहोने वाला अपनी सेवाओं या
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