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Bhole, R.V. "जुआन चीत्कार : एक विश्लेषण". Journal of Research & Development 16, № 5 (2024): 95–96. https://doi.org/10.5281/zenodo.11191307.

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Abstract:
        डॉ. यशोदानाथ झाक जन्म मधुबनी जिलाक ग्रामरत्न सरिसब-पाही स्थित पलिवार महिषी मूलक वत्सगोत्रीय श्रोत्रिय ब्राह्मण पण्डित धरानाथ झाक प्रपौत्र, सुकवि पण्डित गणनाथ झाक पौत्र, कवि पण्डित आनन्दनाध झाक पुत्रक रुपमे छओ जून 1944 ई. में भेल छलनि । यशोदा बाबूकः जन्म ओहि परिवारमे भेल छलनि जे ‘झा परिवार’ मिथिला के कहए, देशसे बाहर विदेशोमे अपन विद्वताक हेतु पूजित-सम्मानित होइत रहैत छल, देश-विदेशकेर विश्वविद्यालयमे बेर-बेर एहि परिवारक चर्चा होइत रहत छल। ओहि परिवारक चर्च करैत डॉ. जगदीश मिश्र लिखने छथि- “ कवि डॉ. यशोदानाथ झाजीक पितामह पाँच भाइ । पाँचो एकसँ बढ़ि एक सर
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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निशा, प. ंवार. "ज ैव विविधता एवं संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882969.

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Abstract:
पृथ्वी अपन े म ें असीम संभावनाए ं एकत्रित किये ह ुए है । प ्रकृति के अन ेकान ेक विविधताओ ं की कल्पना कर ही इस बात का पता लगाया जा सकता ह ै कि संभावनाए ं पक्ष की ह ै या विपक्ष की तात्पर्य प ृथ्वी पर अथाह कृषि भूमि, जल वृक्ष, जीव-जन्त ु तथा खाद ्य पदार्थ थे, परन्त ु मानव के अनियंत्रित उपभोग के कारण ये सीमित हा े गये ह ै । पर वास्तव में हम अपन े प्रयासों से इन संपदाओं का उचित प ्रब ंध कर इसे भविष्य के लिए उपयोगी बना सकत े ह ै । जैव विविधता किसी दिये गये पारिस्थितिकी त ंत्र बायोम, या एक प ूर े ग ृह में जीवन क े रूपों की विभिन्नता का परिणाम है । ज ैव विविधता किसी जैविक त ंत्र के स्वास्थ्य का घोतक ह
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म, ुकेश दीक्षित. "सामाजिक समस्याएं व पर्या वरण: उच्चतम न्यायालय की भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882783.

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Abstract:
पर्यावरण से मानव का गहरा संब ंध ह ै। मन ुष्य जब से इस पृथ्वी पर आया, उसन े पर्या वरण को अपन े साथ जोड ़े रखा है। सूर्य, चन्द ्रमा, पृथ्वी, पर्वत, वन, नदियां, महासागर, जल इत्यादि का प्रयोग मन ुष्य मानव विकास के आर ंभ से करता आ रहा है। मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में लकड ़ी, भोजन, वस्त्र, दवायें इत्यादि प्राप्त करन े हेत ु प्राकृतिक सम्पदा का शुरू से उपयोग किया है और वर्त मान मे निर ंतर जारी है। सामाजिक परिवर्त न क े साथ औद्योगिक विकास एव ं जनसंख्या वृद्धि म ें पर्यावरण को प्रभावित किया है। औद्योगीकरण के कारण व्यक्ति आज अपनी आवश्यकता क े अन ुरूप पर्यावरण को बदलन े के लिये सक्रिय कारक बन गया है। वन
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प्रगति, वर्मा. "प्राक ृतिक संसाधनों का संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882980.

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Abstract:
मानव जीवन का अस्तित्व, प्रगति विकास संसाधनों पर निभ्रर करता है । आदिकाल स े मन ुष्य प्रकृति स े विभिन्न प्रकार की वस्त ुएँ प्राप्त कर अपनी आवष्यकताओं को प ूरा करता ह ै वास्तव में संसाधन व े ह ै जिनकी उपया ेगिता मानव क े लिए हो, अन्य जीवों क े समान ही मानव भी पर्यावरण का ही एक अंग ह ै परन्त ु एक विभिन्नता जो सहज ही परिलक्षित होती ह ै वह यह है कि अन्य जीवों की त ुलना में मानव अपन े चारो ं ओर के पर्या वरण का े प्रभावित तथा कुछ अर्थो में उसे नियंत्रित कर पान े की पर्याप्त क्षमता ह ै यही कारण है कि मानव का पर्यावरण के साथ संब ंधों को इतना महत्व दिया जाता ह ै । आधुनिक जीवन में मानव तथा पर्या वरण के
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चा ैधरी, र. ेखा. "हिन्दी साहित्य म ें नारी पात्रा ें का मना ेविज्ञान". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 91–97. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201915.

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Abstract:
नारी मनोविज्ञान के संबंध में नारी मनोभावों के विभिन्न पक्षें में अचेतन, काम, अहम, अंतद्व र्न्द, हीनता, श्रेष्ठता, आत्मपीड़न, परपीड़न, कुन्ठा की अभिव्यक्ति द ेखन े को मिलती है। मानव मन के विभिन्न स्तरों पर नारी मन की व्यथाओं, भावनाओं संवदनाओं के विभिन्न पक्ष इन उपन्यासों में उभर कर आत े है। इन उपन्यासां में पात्रों की गहन मानसिक प्रक्रिया को उपन्यासकारों न े स्पष्ट किया है साथ ही इन नारी मन और उनके व्यक्तित्व के मूल द्वन्दो को व्यक्त किया हैं इस अध्ययन में जो मनोवैज्ञानिक उपनन्यास चुने गये उनके मार्मिक जीवन की जटिलता के कारण युवा मनोविज्ञान, व्यक्तित्व मनोविज्ञान और असामान्य जीवन की अभिव्यक्तियां
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डाॅ., आरती तिवारी. "सामाजिक मुद ्दे एव ं पर्यावरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574865.

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Abstract:
मन ुष्य अपन े पर्यावरण क े साथ ही जन्म लेता ह ै। और उसके बीच ही अपना जीवन यापन करता ह ै। द ूसर े शब्दों में सारा समाज पर्यावरण के बीच अर्था त प्रकृति की गोद में अपना जीवन यापन करता ह ै। किन्त ु इस जीवनयापन के लिए मन ुष्य मुख्य रूप से पर्यावरण पर निर्भर करता है। अपन े जीवन को स ुचारू रूप से चलाए रखन े एव ं उसे और अधिक ब ेहतर बनान े के लिए मन ुष्य निर ंतर प्रयास करता है तथा इसके लिए वह प्राक ृतिक संसाधनों का दोहन करता है। इस प्रकार मन ुष्य आदिम युग स े आज तक निरंतर प्रकृतिक संसाधनों से अपना जीवन चलाता आया है। जिससे प्रकृति का े कुछ नुकसान भी पहुंचा है। क्योंकि मन ुष्य न े आधुनिकता की अंधीदौड में
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प, ूर्णेन्द ु. शर्मा. "पर्यावरण संरक्षण सब का दायित्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883541.

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Abstract:
सृष्टि के प्रारम्भ से वर्त मान युग तक मन ुष्य न े विकास की लम्बी यात्रा तय की है। किन्त ु इस यात्रा में वह जीवन के शाश्वत सत्य को पीछ े छोड ़कर अकेला आगे निकल आया है जिसके परिणाम में पर्यावरण की प्रलयंकारी समस्याओं न े जन्म ले लिया ह ै आ ैर विश्व समुदाय विगत र्कइ दशकों से इनसे जूझता हुआ आग े बढ ़न े का प्रयास कर रहा है। 1972 में इसकी गम्भीरता को द ेखत े हुए स्टाॅकहोम मे ं संयुक्त राष्ट ª सम्म ेलन आयोजित किया गया जिसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी न े पर्यावरण संरक्षण एव ं मानव जाति के कल्याण हेत ु दिय े गये अपन े वक्तव्य म ें कहा कि, ’’मन ुष्य तब तक सभ्य एव ं सच्चा मानव नहीं हो सकता जब तक कि वह सम्प
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ब ेगम, आब ेदा. "छŸासगढ ़ क े महाप ुरूषा ें का सामाजिक समरसता म ें या ेगदान’". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 87–90. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201914.

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Abstract:
सामाजिक समरसता एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा करना एवं इसे ठीक प्रकार से कार्यान्वित करना आज समाज एवं राष्ट ्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसके लिए हमें सर्वप्रथम सामाजिक समरसता के अर्थ का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। संक्षेप में इसका अर्थ है सामाजिक समानता। यदि व्यापक अर्थ द ेखें तो इसका अर्थ है जातिगत भेदभाव एव ं अस्पृश्यता का जड ़मूल से उन्मूल कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहाद र् बढ ़ाना तथा समाज के सभी वर्गों एव ं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना। समरस्ता का अर्थ है सभी को अपन े समान समझना। सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है इस बात को हृदय से स्वीकार
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आलोक, गोयल किरण बड े़रिया राकेश कवच े. "विकास के लिए पर्या वरण क े क्षेत्र म ें मनुष्य की नैतिक भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574866.

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Abstract:
मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्त ुलन विकास मार्ग का सन्त ुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्त ुलन व्यक्ति ही नहीं समूच े समाज और मानव स ंसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण ह ै। स ुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मन ुष्य प्रक ृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रक ृति से उसका रिष्ता अहिंसक आ ैर आत्मीयता का था। स्वार्थ आ ैर भोग संस्क ृति के कारण अब यह न क ेवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’ मन ुष्य क े अन ैतिक आचरण से जहां पर्यावरण सहित लगभग सभी क्षेत्रों मंे पतन हुआ ह ै वहीं अच्छ े आचरण और सामाजिक स्वीकृति से किया जान े वाले व
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किरण, बड ेरिया आलोक गा ेयल राकेश कवचे. "ज ैव विविधता और जलवायु परिवर्तन एक दृष्टिकोण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882063.

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Abstract:
जैव विविधता हमार े लिए बहुत महत्त्वप ूर्ण ह ै। ये हमार े जीवन के अभिन्न अ ंग है ं। अभी तक लगभग 1.75 मिलियन प्रजातिया ें की पहचान हो चुकी है। हालाँकि वैज्ञानिकों का मानना ह ै कि हमार े ग्रह पर लगभग 13 मिलियन प्रजातियाँ हैं। विभिन्न प्रजातियों की उपस्थिति न े मानव क े लिए इस ग्रह को आवास योग्य बनान े म ें मदद की ह ै। इनके बिना हम अपन े जीवन की कल्पना नहंी कर सकत े। जैव विविधता हमार े जीवन के लिए आवश्यक र्कइ वस्त ुएँ एव ं सेवाएँ उपलब्ध कराता ह ै। ये वो स्तम्भ ह ैं जिन पर हमन े अपनी सभ्यता बसायी ह ै। आर्थिक समृद्धि के लिए उत्तरदायी र्कइ उद्या ेगों का आधार ये जैव विविधता ह ै। इनको खतरा पहुँचान े का
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रान, ू. उपाध्याय. "प्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883012.

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Abstract:
भारतवर्ष में प ्राचीन शास्त्रों, व ेद-पुराणों मे ं, धर्म ग्रन्थो में तथा ऋषि-मुनियों न े पर्या वरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया है । व ेदों में प ्रकृति प ्रदत्त पर्या वरण को द ेवता मानकर कहा गया है कि- ‘‘या े द ेवा ेग्नों या े प्सु चो विष्वं भ ुव नमा विव ेष, यो औषधिष ु, या े वनस्पतिषु तस्म ें द ेवाय नमो नमः’’ अर्था त जा े स ृष्टि, अग्नि, जल, आकाष, प ृथ्वी, और वाय ु से आच्छादित ह ै तथा जो औषधियों एव ं वनस्पतिया ें में विद्यमान ह ै । उस पर्यावरण द ेव को हम नमस्कार करत े है । प्रकृति मानव पर अत्यंत उदार रही ह ै । पृथ्वी पर अपन े उद्वव के बाद से ही मानव अपन े अस्तित्व के लिय े प्रकृति पर निर्भर रहा
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खापर्ड े, स. ुधा, та च. ेतन राम पट ेल. "कांकेर में रियासत कालीन जनजातीय समाज की परम्परागत लोक शिल्प कला का ऐतिहासिक महत्व". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 53–56. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20218.

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Abstract:
वर्त मान स्वरुप म ें सामाजिक स ंरचना एव ं ला ेक शिल्प कला म ें का ंक ेर रियासत कालीन य ुग म ें जनजातीय समाज की आर्थि क स ंरचना म ें ला ेक शिल्प कला एव ं शिल्प व्यवसाय म ें जनजातीया ें की वास्तविक भ ूमिका का एव ं शिल्प कला का उद ्भव व जन्म स े ज ुड ़ी क ुछ किवद ंतिया ें का े प ्रस्त ुत करन े का छा ेटा सा प ्रयास किया गया ह ै। इस शा ेध पत्र क े माध्यम स े शिल्पकला म ें रियासती जनजातीया ें की प ्रम ुख भ ूमिका व हर शिल्पकला किस प ्रकार इनकी समाजिकता एव ं स ंस्क ृति की परिचायक ह ै एव ं अपन े भावा ें का े बिना कह े सरलता स े कला क े माध्यम स े वर्ण न करना ज ैस े इन अब ुझमाडि ़या ें की विरासतीय कला ह
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ओमपाल, सिंह, та हेम ेन्द्र सिंह डा॰. "बौद्धिक सम्पदा और बच्चा ें की शिक्षा से सम्बन्धित समस्याएँ". International Journal of Research - Granthaalayah 6, № 9 (2018): 332–39. https://doi.org/10.5281/zenodo.1443513.

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Abstract:
शिक्षा मानव जीवन का श्रं ृगार है । शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति एक विशिष्ट व्यक्तित्व को प्राप्त करन े में सक्षम हो सकता है । अन ेक बार अशिक्षित व्यक्ति भी प्रभावशील होता है; परन्त ु, शिक्षा क े अभाव म ें वह मुख्य रूप से अपन े परिवेश से ही अधिकतम ज ुड़ा हुआ रहता है जिस क े कारण वह अपनी उन विशिष्टताओं का े व्यापक रूप प्रदान करन े में प्रायः अक्षम रहता है जिन से कि वह सम्पूर्ण भारतीय और विदेशी नागरिकों को लाभ पहुँचा सक े । वर्तमान वैश्विक परिदृश्य यह संकेत करता है कि वह देश वैश्विक धरातल पर टिका नहीं रह सकता जिस के नागरिक शिक्षा से वंचित हैं । भारतीय परिप्रेक्ष्य में बच्चों की शिक्षा से सम्बन्
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डॉ., सुरेश चौधरी रणवीर सिंह. "बौद्ध धर्म में कर्मवाद और पुनर्जन्म का विवेचन". International Educational Applied Research Journal 09, № 04 (2025): 97–101. https://doi.org/10.5281/zenodo.15546376.

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Abstract:
कर्मवाद बौद्ध-धर्म का महत्वपूर्ण प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धान्त से हुआसिद्धान्त है जिसका उदय है। महात्मा बुद्ध भी यही कहने  कि कर्म हो प्रधान है। कर्त्ता कर्म करने में स्वतंत्र है। समस्त त्राणी अपने फलों के अनुसार ही फल प्राप्त करते हैं। जो नेता करता है वैसा ही फल प्राप्त करता है। कर्म का विधान कहीं बाहर से आरोपित नहीं किया जाता है बल्कि यह हमारी अपनी ही प्रकृति में कार्य करता है। मानसिक आदतों का निर्माण, बुराई की और गदतो हुई प्रवृति-आवृति का होना जाने वाल प्रभाव सब कुछ कर्म-विधान के अंतर्गत आता है। कर्मफल से कोई भी व्यस्ति तच नहीं सकती है। भूतकाल वास्तव में वर्तमान एवं भविष्य को जन्म
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कुलदीप та अरोरा सारिका. "स्त्री शिक्षा के विकास एवं विभिन्न आयोगों एवं समितियों द्वारा समस्याओं के समाधान सुझाव". RECENT EDUCATIONAL & PSYCHOLOGICAL RESEARCHES 13, № 1 (2024): 72–76. https://doi.org/10.5281/zenodo.11003424.

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Abstract:
अन्य व्यवसायां े के विपरीत, एक छात्र के समग्र विकास की जिम्मेदारी परू ी तरह से शिक्षक के कंधांे पर हाते ी है। नतीजतन, स्कूलांे को प्रशिक्षकांे को सुव्यवस्थित और व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए ताकि वे अपन े छात्रांे के समग्र विकास मंे सार्थक और संपूर्ण तरीके से योगदान द े सकंे। भारत मंे शिक्षक शिक्षा मंे बहुत कम निवेश हुआ है, इस तथ्य के बावजूद कि यह छात्रां े की उपलब्धि को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है। राष्ट्र की समृद्धि के लक्षित स्तर को प्राप्त करने के लिए शिक्षक शिक्षा मे ं पण्ूर् ा सुधार अत्यतं महत्वपण्ूर् ा है। हम लगातार विकासात्मक गतिविधियों में लगे हुए हं,ै और हमारी राष्ट्री
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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मध, ुलिका वर्मा. "नवीं कक्षा क े विद्यार्थियों का क ुक्षी म ें चल रहे समग्र स्वच्छता अभियान क े प्रति जागरूकता का विकास". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882323.

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Abstract:
बाप ू के जीवन का संद ेष था ’’वह जो सचमुच म ें भीतर से स्वच्छ है। वह अस्वच्छ बनकर नही रह सकता‘‘ बाप ू जी सफाई पर बहुत जोर द ेत े थे। बाप ू का विष्वास था कि स्वच्छता समग ्र होनी चाहिये। और इसमें सब सामिल हा ें। ग ंद े और द ूषित दिमाग में स्वच्छ विचार उत्पन्न नही हा े सकत े है और एक निर्मल स्वच्छ व्यक्ति अपन े आसपास गंदगी मंे नही रह सकत े ह ै।प ्रस्त ुत शोध समग्र स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता का विकास करन े एक प ्रयास है । प ्रस्त ुत शा ेध में धार जिले के कुक्षी क्षेत्र मे ं स्थित विद्यालय में कक्षा 9वीं क े 35 विद्यार्थिया ें को प ्रायोगिक समूह के रूप में चयनित किया गया। समग्र स्वच्छता अभिया
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डाॅ., र. ेखा ग. ुप्ता. "जनसंख्या दबाव जनित भ ूमि उपयोग/भ िूम आवरण म ें परिवर्तन (मध्यप्रदेश के संदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–6. https://doi.org/10.5281/zenodo.883016.

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Abstract:
मानव और प्राक ृतिक संसाधनों में अन्योन्य आश्रित संब ंध है। मानव प्रकृति से प्राप्त ज ैविक-अज ैविक सम्पदा पर ही अपन े ज्ञान एव ं कौशल का उपयोग करके उन्हें बहुमूल्य सेवा एव ं वस्त ुआ ें मे ं परिवर्ति त करता है एव ं आर्थिक विकास को दिशा एव ं गति प्रदान करता ह ै। मानव के बिना प ्रकृति की इस सम्पदा का कोई मूल्य नहीं है। मानव ही विकास का साधन एव ं साध्य दोना ें है। प्रा े. पी.एल. रावत ने कहा ह ै कि, मन ुष्य आर्थि क विकास का आदि एव ं अंत दोनों है किन्त ु जब मानव अपनी बढ ़ती हुई आवश्यकताओं की प ूर्ति के लिए इन प्राकृतिक संपद¨ का अत्यधिक शोषण या दोहन करन े लगता ह ै तो मानव व प्रकृति के बीच संत ुलन बिगड
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सरिता, बोबड ़े. "बरली ग्रामीण महिला विकास संस्थान का पर्या वरण संरक्षण म ें योगदान का अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883022.

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Abstract:
मन ुष्य का जीवन पर्यावरण से प्रभावित होता ह ै। स्वस्थ एव ं स्वच्छ पर्यावरण मानव जीवन का आधार हैं । इसीलिए पर्यावरण का संरक्षण प ्रत्येक नागरिक का कत्र्त व्य ह ै। प्रस्त ुत एकल अध्ययन म ें एक समाजसेवी स ंस्था द्वारा अपन े महिला प्रषिक्षणार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक कर समाज में कार्य करन े के लिए प्रेरित किया जाता हैं। सौर ऊर्जा उपकरणों का निर्मा ण कर उनका घर ेलू एव ं व्यावसायिक उपयोग करना , जैविक खेती करना, एव ं पर्या वरण प ्रद ूषण का स्वाथ्य पर पडन े वाले प्रभावों से परिचित करवाकर पर्यावरण संरक्षण के प्रति संरक्षणात्मक प ्रवृति का विकास कराया जाता हैं। इस अध्ययन में उपकरण के रू
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क, ु. ़कांता राधवानी '1, та ़नीता सिंह 2. डाॅ. "मन्नू भंडारी की कहानिया ें म ें विवाहित महिलाओं के संघर्ष". International Journal of Research - Granthaalayah 6, № 5 (2018): 54–58. https://doi.org/10.5281/zenodo.1254133.

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Abstract:
मन्नू भंडारी स्वातंत्रोत्तर काल की समाजधर्मी लेखिका हैं। समाज में आने वाले स्थूल और सूक्ष्म परिवर्त नों को सही धरातल पर पकड़ने की अपूर्व क्षमता उनकी लेखनी में है। परिवर्त नों का प्रभाव सदा ही दोहरा होता है - बाह्य और आत ंरिक। एक प्रभाव व्यक्ति को अंदर से क ुरेदता है तो द ूसरा समाज जीवन को खोखला बना द ेने में बराबर सहयोग पहुँचाता है। ल ेखिका न े दांपत्य-जीवन की समस्याओं को दोहरे स्तर पर उठाया है, उन्होंने अपनी कहानी में नारी-पुरुष परंपरागत स्थूल संबंध में बदलत े संबंध की सूक्ष्म प्रक्रिया का चित्रण किया है। मन्नू भंडारी नारी जीवन में पुरुष क े साथ को अनिवार्य मानती है ल ेकिन वह पति की अंधनुगामी
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प्रज्ञा, पाण्ड ेय गरिमा यादव. "स्वच्छताः भारत की चुनौती". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883539.

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Abstract:
किसी भी द ेश की उन्नति का आधार स्वच्छता व स्वास्थ्य है। स्वच्छ पर्यावरण ही किसी भी समुदाय की स्वास्थ्य स्थिति को ऊंचा उठान े में सहायक है। स्वच्छ पर्यावरण सम ुदाय क े लोगा ें के जीवन स्तर को सुधारन े में सहायक हो सकता है। साथ ही वह समुदाय मं े रोगों के चक्र को तोड ़न े में भी सक्षम ह ै। सरकार व आम जनता के प्रयास व सहभागिता द्वारा विभिन्न संसाधनों का प्रया ेग किया जा रहा ह ै आ ैर ब ेहतर परिणाम हेत ु प्रयासरत हंै। इसके द्वारा समुदाय का सामाजिक-आर्थिक विकास, स्वच्छ पर्यावरण हेत ु संब ंधित सांस्कृतिक कारक, समुदाय की क्षमता, व्यवहार, कान ून आदि का उपया ेग ब ेहतर तरीके से हा े रहा है। भारत द ेश सम्प
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मिश्रा, आन ंद म. ुति र्, та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति क े पर ंपरागत चिकित्सा पद्धति एव ं स्वास्थ्य का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 79–86. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201913.

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Abstract:
परम्परागत चिकित्सा प्रणाली मानव के ज्ञान द्वारा अर्जित चिकित्सा की ऐसी विधि है जो कई पीढि ़यों से चली आ रही है। जिसके प्रयोग से मन ुष्य कई प्रकार के असाध्य रोगों का उपचार करन े में समर्थ रहा है। आदिवासियों का जीवन मुख्यतः जंगलों पर आश्रित रहा है। मन ुष्य शुरूआत से ही अपन े भोजन, आश्रय और चिकित्सा के लिए प्रकृति पर ही निर्भर रहा है। वत र्मान में चिकित्सा प्रणाली में अंतर होने के उपरांत भी चिकित्सा पद्धंतियो का आधारभूत उद ेश्य मन ुष्य के स्वास्थ्य तथा कल्याण की कामना ही हैं। समाज में स्वास्थ्य व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है, तथा रोग मुक्ति की लालसा करता है । जनजातीय समापन में आज भी चिक
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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ज्योति, ढोल े. ""विश्वविद्यालयीन विद्यार्थिया ें म ें पर्या वरण जागरूकता: एक अध्ययन"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.881961.

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Abstract:
आज हम 21वीं सदी म े प्रव ेष कर च ुके है, जिसम ें विज्ञान आ ैर प्रा ैद्योगिकी एक महत्वप ूर्ण भूमिका निभा रहे ह ै। इस प्रगति न े जहां एक आ ैर ब्रह्माण्ड के अन ेक रहस्या ें को सुलझाया ह ै । वही द ूसरी और मानव का अन ेकान ेक सुख सुविधाए ं प्रदान की है। इन मानवीय प्रगति एव ं विकास म े पर्यावरण तो सद ैव सहायक रहा है, परन्त ु इस विकास की दौड ़ मे हमन े पर्यावरण की उप ेक्षा की आ ैर उसका अनियन्त्रित शोषण किया ह ै। तात्कालिक लाभा ें के लालच मे मानव न े स्वयं अपन े भविष्य को दीर्घ कालीन संकट मे डाल दिया है। परिणामस्वरूप जीवन क े स्त्रोत पर्यावरण का अवनयन होता जा रहा है। इसी परिप ेक्ष्य मे यह परियोजना कार्
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बी.एस., निगवाले. "''राजीव गाँधी जल प ्रबधंन मिषन का ग्रामीण क्षेत्रा ें म ें आर्थिक योगदान''". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.803446.

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Abstract:
भारतीय क ृषि मानसून का ज ुआं ह ै और यह ज ुआं भारतीय अर्थ षास्त्र और भारतीय जनता सनातन काल स े अपन े कंध े पर रखे ह ुए षून्य में ताक रही ह ै। वस्त ु स्थिति यह है कि जल के अभाव मे भारतीय कृषि ही क्या भारत के उद्योग धंधें, कल-कारखान े, और समूची अर्थव्यवस्था ही ठप हो जाती ह ै। पानी के अभाव मे ं गहराता विद्युत संकट, स ूख े पड ़े खेत आ ैर ब ंद पड ़े कल-कारखानों न े एक ओर हमार े राष्ट ªीय उत्पाद को प ्रभावित किया है वहीं द ूसरी तरफ हमारा अंतर्राष्ट ªीय निर्यात भी गड ़बड ़ाया है। फलतः एक आ ेर विद ेषी मुद ्रा की कमी की आप ूर्ति और द ूसरी ओर वर्त मान समस्याओं से निपटन े के लिए भारी वित्तीय प ्रब ंधन। ”ज
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वत्स, मनोज कुमार, та प्रमोद कुमार मौय. "‘‘वृद्धों की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं के कारण एवं समाधान’’". Humanities and Development 18, № 02 (2023): 22–27. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.138.

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Abstract:
हाल के दशकों में जहां एक ओर भारत में वृद्धो की जनसंख्या बढ़ी है वहीं दूसरे ओर नएप्रकार के मूल्य एव ं सम्बन्धां के प्रतिमान उभर रहे हैं। समय के साथ-साथ मानव प्रगति पथ पर बढ़ताजा रहा है। कहा जाता है परिवर्तन प्रकृति का नियम है परंतु मानव अपनी बौद्धिक क्षमता के सहारे सेअनेक परिवर्तन करता आ रहा है। नित नयी सुविधाएं जुटाना उसका लक्ष्य रहता है और उसकी यहलालसा उन्नति का कारण बनती है। आज मानव उन्नति के उस शिखर पर पहुंच चुका है जहां सेविकास की गति को पंख लग गए हैं। विकास की गति अधिक तीव्र हा े गई है शिक्षा का प्रचार प्रसारतेजी से हो रहा है, शिक्षा से प्राप्त ज्ञान के कारण मानव का रहन-सहन, खान-पान एवं सोच
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षषि, जोषी. "विस्थापन, पुनर्वा स एव ं पर्या वरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883036.

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Abstract:
मन ुष्य अपनी सुख समृद्धि, भोग एव ं महत्वकांक्षाओं की प ूर्ति हेत ु जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों एव ं पर्या वरणीय तत्वों का अनियोजित एव ं अनियन्त्रित प्रयोग कर रहा ह ै, इस कारण पयावरणीय विघटन एव ं असंत ुलन की स्थिति उत्पन्न हो र्गइ है। जल, वायु, भूमि, वन एव ं खनिज संजीवनी का निरन्तर विघटन हो रहा है, जल स्त्रोत स ूख रहे है, वातावरण विषाक्त हा े रहा है आ ैर भूमि का क्षरण भी हो रहा है। वनो ं के विनाष से पर्यावरण ह्ास में वृद्धि ह ुई है। इन सबके के साथ ही एक अमानवीय सामाजिक समस्या उत्पन्न हुई है और वह ह ै विस्थापन और पुनर्वास की समस्या। प ्रकृति के नजदीक निवास कर रहे लोगों की व्यथा, आदिवासी जनजातिया
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उषा, कुमठ. "जलवायु परिवर्तन आ ैर भारतीय क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883553.

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Abstract:
भारतीय अर्थ व्यवस्था की आधारशिला कृषि है। कृषि एव ं जलवाय ु परिवर्त न का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प ्रभाव कमजा ेर कृषक पर पड ़ रहा है। वर्षा की मात्रा में परिवर्त न होन े से फसलो ं की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड ़ा है। जलवायु म ें होन े वाला परिवर्त न हमारी राष्ट ªीय आय का े भी प्रभावित कर रहा ह ै। द ेश के बहुत से भागो ं में अल्प वर्षा से फसलें सूख जाती है या अति-वृष्टि से बह जाती है जिसस े न केवल खाद्यानों का उत्पादन कम हुआ बल्कि उनकी कीमत े भी त ेजी से बढ ़ गई। जलवायु परिवर्त न से फसला ें की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं ह ुई बल्कि उसकी ग ुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड ़ा है। तापमान के बढ
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अनिता, सिंह, та सिंह रागिनी. "प्राकृतिक संसाधन एव ं उनका संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.838917.

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Abstract:
्रकृति न े मन ुष्य को सभी जीवनोपया ेगी संसाधन म ुक्त हस्त से प्रदान किये हैं। आदिमानव अपनी समस्त आवष्यकताओं की प ूर्ति के लिये प ूरी तरह प्रकृति पर निर्भर करता था, किंत ु आदि मानव से आध ुनिक मन ुष्य बनन े की विकासयात्रा म ें मन ुष्य न े प्राकृतिक संसाधनों का भरप ूर दोहन किया फलस्वरूप प्रकृति की अक ूत संपदा धीर े-धीर े समाप्त हा ेन े लगी। इस क्रम मे ं विभिन्न प्रजातियाँ विलुप्त प्रजातियो ं की श्रेणी में पहुँच गयी ं, शेष बची हुई प ्रजातिया ें और स्वयं मन ुष्य प ्रजाति को बचाये रखन े के लिय े भी प ्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण अत्यावष्यक हो गया है। इस हेत ु विभिन्न सुरक्षात्मक कदम उठान े के साथ-सा
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अर्च, ना परमार. "पर्यावरण संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883529.

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Abstract:
मानव शरीर प ंच तत्वों- प ्रथ्वी, जल, वाय ु, अग्नि आ ैर आकाश स े ही बना ह ै। य े सभी तत्व पर्या वरण के धोतक है। प ्रकृति मे मानव को अन ेक महत्वप ूर्ण प्राकृतिक सम्पदायें भी ह ै। जिसका उपयोग मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में करता आया है ज ैसे- नदियाँ, पहाड ़, मैदान, सम ुद ्र, प ेड ़-पौधे, वनस्पति इत्यादि। प्रथ्वी पर प्राकृतिक संसाथनों का दोहन करन े से प्राकृतिक संसाथनो के भण्डार तीव्र गति से घटत े जा रह े है, जिससे पर्यावरण में असन्त ुलन बढ ़ रहा है। उसके परिणाम स्वरूप जल की कमी, आ ेजा ेन परत में छेद का पाया जाना, वना ें की अत्यधिक कर्टाइ से वना ें की कमी आना, सम ुद ्रों का जल स्तर बढना, ग्लेशियरों
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हरीश, केशरवानी. "खेती के नये आयामः समझा ैता क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883533.

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Abstract:
बढ ़ती जनसंख्या, बदलती जीवन शैली, कृषिगत उत्पादों का व्यवासायीकरण क े साथ साथ मौसमी परिवर्तनशीलता, उत्पादन प्रवृत्ति मे बदलाव और कृषिगत विषमता के परिणाम स्वरूप सबस े प्रमुख म ुददा कृषि के सुधार और विकास का ह ै। मानव अपन े विकास की चाहे जो सीमा निर्धारित कर ले पर ंत ु उसकी उदरप ूर्ति जमीन से उगे आनाज या उसके प्रसंस्करण स े ही होगी। कृषि के संदर्भ मे तमाम प्रकार के बदलावों क े परिणाम स्वरूप कृषि प ्रणाली मे भी बदलाव द ेखे जा सकत े हैं। साथ ही विश्व की जनसंख्या त ेजी के साथ बढ ़ रही ह ै तथा भारत के संदर्भ मे यह तथ्य है कि यह विश्व की द ूसरी सर्वाधिक जन ंख्या वाला द ेश है जा े 2030 तक यह चीन का े
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ममता, का ेठारी. "पर्यावरण संरक्षण एव ं हिन्दू धर्म". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883537.

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Abstract:
पर्यावरण के अन्तर्गत वायु जल भूमि वनस्पति प ेड़ पौधे, पशु मानव सब आत े है । प ्रक ृति में इन सबकी मात्रा और इनकी रचना कुछ इस प्रकार व्यवस्थित है कि प ृथ्वी पर एक संत ुलनमय जीवन चलता रह े । विगत करोंड ़ांे वर्षो से जब से पृथ्वी मन ुष्य पशुपक्षी और अन्य जीव-जीवाणु उपभा ेक्ता बनकर आये तब से, प्रकृति का यह चक्र निर ंतर और अबाध गति से चल रहा ह ै । जिसको जितनी आवष्यकता है व प्रकृति से प्राप्त कर रहा है आ ैर प्रक ृति आगे के लिये अपन े में और उत्पन्न करके संरक्षित कर लेती है । मानव इतिहास का अवलोकन कर े तो आज स े प ंाॅच सौ सात सा ै वर्ष प ूर्व मन ुष्य प ्रकृति के समीप था । प्रक ृति से मिले भोजन पर साम
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अर्च, ना मेहरा. "बदलता पर्या वरण और मानव-व्यवहार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.838912.

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Abstract:
मानव और पर्या वरण के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रायः हम किसी बुर े कार्य के लिए व्यक्ति को दोष द ेत े ह ै किन्त ु सच्चाई यह है कि उसम ें पर्या वरण भी उतना ही दोषी होता ह ै, अतः पर्या वरण की क्षति के कारण आज मानव का अस्तित्व संकट में पड ़ गया है। अब पर्या वरण चेतना को जगाना अतिआवष्यक हा े गया ह ै क्योंकि पर्यावरण भौतिक रूप मे ं नहीं सामाजिक रूप मंे भी मानव समाज का े घेर े हुए है। किसी व्यक्ति के व्यवहार को द ेखकर उसके पर्या वरण का सहज अन ुमान लगाया जा सकता है। इसमें प्राकृतिक द ृष्य, वन उपवन, नदी, पर्वत, जीव जन्त ु के साथ-साथ जलवाय ु और जनसंख्या इन सबकी महत्वप ूर्ण भूमिका होती ह ै। इनमें जब भी अस
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डॉ., सुषमा ज. ैन. "प्रया ेगात्मक कला - एक विशलेषण". International Journal of Research - Granthaalayah 6, № 12 (2018): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.2544823.

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Abstract:
अभिव्यंजना अथवा भावाभिव्यक्ति द्वारा सौंदर्य सृजन मनुष्य मात्र को चरम संतुष्टि प्रदान करता रहा है। फिर उसका माध्यम क ुछ भी हो अभिव्यक्ति ही कलाकार का मुख्य उद्देश्य रहता है वह अपन े उद्देश्य क े अन ुरूप माध्यम भी खोज लेता है। यह प्रक्रिया आदिमकाल से लेकर वर्त मान तक अनवरत रूप से जारी है। सर्वप्रथम मानव ने पत्थरों से शिलापट्टा ें पर आड़ी तिरछी र ेखाएँ उकेरी तत्पश्चात उसने प्रकृति प्रदत्त रंगा ें तथा जानवरों की चर्बी को माध्यम बनाया उसमें भी विविधता दर्शाने क े लिए उसने रंगों को पारदर्शी तथा अपारदर्शी रूप में उपयोग किया कहीं पूरक तथा कहीं अर्द्ध पूरक शैली का प्रयोग किया । कहीं र ेखाएँ खीची तथा क
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Sharma, Dr Meena. "Evolving Perspectives: The Changing Landscape Of Literature And Its Modern Interpretations." Journal of Survey in Fisheries Sciences 08, no. 1 (2021). https://doi.org/10.53555/sfs.v8i1.3538.

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Abstract:
प्रत्येक रचना एक प्रक्रिया है और यह प्रक्रिया हमे ंअपन ेसमय की प्रबल भावनाओ ंके रूबरूखड़ा कर दतेी है, जो किसी को क्षमा नहीं करती। यह प्रश्न उनतमाम लोगो ंके लिए, जो कला के बगैर और जो अभिव्यक्ति कला करती है उसकेबगैर जिन्दा नहीं रह सकते सिर्पफ यह जाननेका है कि कैसे इतनी सारी विचारधराओंकी प्रतिबंध् शक्ति की मौजूदगी मंे सजृन की आश्चर्यजनक आज़ादी मुमकिन है। जब हम साहित्य और सस्ंकृति के बदलत ेपरिवेश और परिप्रेक्ष्य मे ंसोच मे ंसोच एवं मूल्यों स ेउत्पÂ समस्याओ ंकी चुनौती को स्वीकार करनेके बजाय पिफर वही पुरानेसमाधन प्रस्तुत करते हैं तो इसका अभिप्राय यह है कि हम अपनी ऊर्जा एवं ऊष्मा खोचुके हैं। यह स्थितिउ
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सिंह गुरूपंच, कुबेर. "वैष्वीकरण के युग में भारतीय पत्रकारिता का योगदान". International Journal of Advances in Social Sciences, 30 червня 2024, 103–6. http://dx.doi.org/10.52711/2454-2679.2024.00018.

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Abstract:
आज भारतीय पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है। अध्ययन का मुख्य उद्ेदष्य वैष्वीकरण द्वितीयक स्त्रोतों पर आधारित है। इसमें विभिन्न राज्यों में प्रेस क्लब में हिन्दी पत्रकारिता की दषा एवं दिषा पर प्रकाष डालते हुए विभिन्न परिस्थितियों पर चर्चा की आषा है। भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता पर पूंजीवाद हावी हो रहा है। पत्रकारिता को निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे लोगों के चंगुल से बाहर निकालने की चुनौती है। वैष्वीकरण के युग में हिन्दी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैष्वीकरण ने सम्पूर्ण संसार को एक परिवार में परिवर्तित कर दिया है। वैष्वीकरण का व्यापक प्रभाव मीडिया] साहित्य] संस्कृति] कला और भाषा पर
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सिंह गुरूपंच, कुबेर. "वैष्वीकरण के युग में भारतीय पत्रकारिता का योगदान". International Journal of Reviews and Research in Social Sciences, 30 червня 2024, 107–10. http://dx.doi.org/10.52711/2454-2687.2024.00018.

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Abstract:
प्रस्तावना:- आज भारतीय पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है। अध्ययन का मुख्य उद्ेदष्य वैष्वीकरण द्वितीयक स्त्रोतों पर आधारित है। इसमें विभिन्न राज्यों में प्रेस क्लब में हिन्दी पत्रकारिता की दषा एवं दिषा पर प्रकाष डालते हुए विभिन्न परिस्थितियों पर चर्चा की आषा है। भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता पर पूंजीवाद हावी हो रहा है। पत्रकारिता को निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल कर रहे लोगों के चंगुल से बाहर निकालने की चुनौती है। वैष्वीकरण के युग में हिन्दी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। वैष्वीकरण ने सम्पूर्ण संसार को एक परिवार में परिवर्तित कर दिया है। वैष्वीकरण का व्यापक प्रभाव मीडिया, साहित्य, संस्कृति, क
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प्रीति, पाण्डे (अवस्थी). "प्रदूषण मुक्त नगर नियोजन का उत्कृष्टतम उदाहरण: हड़प्पा सभ्यता". 2 листопада 2017. https://doi.org/10.5281/zenodo.1040481.

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Abstract:
वर्तमान में पर्यावरणीय समस्याओं से सम्पूर्ण विश्व ग्रस्त है। ये समस्यायें प्रदूषण क े रूप में सर्वत्र दिखाई देती हैं। हमारे पर्यावरण अथवा जीवमण्डल क े भौतिक, रासायनिक एवं ज ैविक गुणों क े ऊपर जो हानिकारक प्रभाव पड़ता है, प्रदूषण कहलाता है। क ुछ दशकों से प्राकृतिक जलवायु में विस्मयकारी परिवर्तन होने लगे हैं ज ैसे जहाँ सूखा होता था वहाँ बाढ ़ आने लगी है। अतिवृष्टि वाले क्षेत्र सूखाग्रस्त होने लगे हैं। धरती क े तापमान में वृद्धि, अम्लीय वर्षा क े फलस्वरूप जलस्रोतों की गुणवत्ता में विघटन तथा प्राकृतिक वायु संरचना में असंतुलन ही प्रद ूषण है। प्राकृतिक स्रोतों क े साथ अनावश्यक प्रयोगों क े कारण विभि
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