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Journal articles on the topic 'कफन'

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चहोराज, सुमिता. "प्रेमचंद की कहानियाँ : आदर्श से मोहभंग और अपने समय के यथार्थ की अभिव्यक्ति है". Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika 11, № 9 (2024): H1—H9. https://doi.org/10.5281/zenodo.12648677.

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Abstract:
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika"                      URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=9203 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)  Abstract : प्रेमचंद की कहानियों में जीता जागता पराधीन भारतवर्ष है जिसमें 20 वी सदी का जीवन यथार्थ दिखता है। उनकी कहानियॉं  जीवन के सच से जुड़ी हुई हैं। प्रेमचंद एक ऐसे बदलते समय के
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Dr., Akhilesh Kumar Sharma Shastri. "Vanchiton shoshiton ka Dukh Dard Bayan Karati Premchand Ki Kahaniyan." Aksharwarta XIII, no. VIII (2017): 48–50. https://doi.org/10.5281/zenodo.15605406.

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Abstract:
प्रेमचन्द जी की कहानियों में सामाजिक जड़ता, जातिवादी व्यवस्था, असमानता और उत्पीड़न के विरुद्ध विद्रोह का मुखर स्वर सुनाई दिखाई ही नहीं पड़ता, बल्कि पाठक की आत्मा को झकझोकर रख देता है। कहानियाँ चिरकाल से मनुष्य को आकर्षित करती रही हैं। इनमें वह स्वयं को सहज महसूस करता है। मनुष्य के सुख-दुख, आशा-निराशाएं, अन्तर्भाव एवं आकांक्षाएं उसे स्वाभाविक रूप से इसे स्पर्श करती हैं। प्रेमचन्द जी की कहानियों में दलितों के सभी पक्षों को अभिव्यक्त किया गया है। वे दलित समस्या पर साहित्य सृजन करने वाले सशक्त कहानीकार रहे हैं। 'ठाकुर का कुंआ, 'पूस की रात', 'कफन', 'सद्गति', 'सवा सेर गहूँ', 'मन्दिर', 'दूध का दाम' आ
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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वज्राचार्य Bajracharya, वज्रमुनि Bajramuni. "नेवाः संस्कारमा चित्रकलाको प्रयोग". DMC Journal 7, № 6 (2022): 75–84. http://dx.doi.org/10.3126/dmcj.v7i6.57692.

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Abstract:
नेपालमण्डलका बासिन्दा नेवारहरुले जीवनलाई आलंकारिक बनाउन जीवनमा अपनाउँदै आइरहेको हरेक संस्कृति र संस्कारका कर्महरुमा मूर्तिकला, वास्तुकला, संगितकला, चित्रकलाको प्रयोग भइरहेको छ। चित्रकला सौन्दर्यको प्रतीक मात्र नभै मानवको अन्तरहृदयको भाव पोख्ने माध्यम पनि हो । त्यसैले कलाको माध्यमबाट मानव सभ्यताको पहिचान हुन्छ । कलाको माध्यमबाट संस्कृतिको जन्म हुन्छ । संस्कृतिले कलालाई जीवन्त बनाउँछ । कला र संस्कृति शरीर र प्राण जस्तै अन्योन्याश्रित सम्बन्ध छ । संस्कृतिको विस्तृत रुप संस्कार हो । यस लेखमा नेवारहरुले जन्मदेखि मृत्युसम्मका संस्कार कर्महरुमा के कस्ता चित्रहरु प्रयोग गरेका छन् ? ती चित्रहरु किन कुन
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तिवारी, प्रकाश. "पाणिनीयव्याकरणका अनुदात्त धातुहरूको अध्ययन {A Study of the Anudatta Dhatas of the Paninya Grammar}". NUTA Journal 8, № 1-2 (2021): 157–72. http://dx.doi.org/10.3126/nutaj.v8i1-2.44118.

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Abstract:
अन्य वर्णको सहयोगविना पूर्ण उच्चरित हुने वर्णलाई स्वरवर्ण भनिन्छ । स्वरवर्णलाई स्वर, काल, स्थान, प्रयत्न र अनुप्रदान यी पाँच प्रकारमा विभाजन गरी अध्ययन गर्न सकिन्छ । स्वरका आधारमा उदात्तस्वर, अनुदात्तस्वर र स्वरितस्वर गरी तीन भागमा विभाजन गरिएको छ । पाणिनीय अष्टाध्यायी परम्पराका भाष्यग्रन्थहरूमा अनुदात्त धातुलाई सजिलोसँग पहिचान होस् भन्ने हेतुले गणना गरिएको पाइन्छ । ती धातु कुन–कुन हुन् ? किन गणना गरिएका हुन् ? गणना गर्नुको प्रयोजन के हो ? भन्ने जस्ता जिज्ञासाहरूलाई समाधान गर्न र जिज्ञासु पाठक एवं अध्ययनरत विद्यार्थीहरूलाई व्याकरणको यो जटिल विषय सहजरूपमा बोधगम्य होस् भन्नका लागि यो लेख तयार पा
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पूजा, कुमारी. "ग़रीब कौन....?" Academic 2, № 10 (2024): 455–61. https://doi.org/10.5281/zenodo.14104066.

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प्रज्ञा, पाण्ड ेय गरिमा यादव. "स्वच्छताः भारत की चुनौती". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883539.

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Abstract:
किसी भी द ेश की उन्नति का आधार स्वच्छता व स्वास्थ्य है। स्वच्छ पर्यावरण ही किसी भी समुदाय की स्वास्थ्य स्थिति को ऊंचा उठान े में सहायक है। स्वच्छ पर्यावरण सम ुदाय क े लोगा ें के जीवन स्तर को सुधारन े में सहायक हो सकता है। साथ ही वह समुदाय मं े रोगों के चक्र को तोड ़न े में भी सक्षम ह ै। सरकार व आम जनता के प्रयास व सहभागिता द्वारा विभिन्न संसाधनों का प्रया ेग किया जा रहा ह ै आ ैर ब ेहतर परिणाम हेत ु प्रयासरत हंै। इसके द्वारा समुदाय का सामाजिक-आर्थिक विकास, स्वच्छ पर्यावरण हेत ु संब ंधित सांस्कृतिक कारक, समुदाय की क्षमता, व्यवहार, कान ून आदि का उपया ेग ब ेहतर तरीके से हा े रहा है। भारत द ेश सम्प
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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चन्द, ्रकांता सराफ. "मानव स्वास्थ्य एवं प्रदूषण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.803448.

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Abstract:
मानव स्वास्थ्य एक प ूर्ण शारीरिक, मानसिक आ ैर सामाजिक खुषहाली की स्थिति है। अच्छे स्वास्थ्य में शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, बा ैद्धिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य और सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है। एक व्यक्ति का े स्वस्थ तब कहां जाता है जब उसका शरीर स्वस्थ और मन साफ और शांत हो। प्रद ूषण एक प्रकार का जहर ह ै जो वायु, जल, धूल आदि के माध्यम से न केवल मन ुष्य के शरीर में प्रव ेष कर उसे रूग्ण बना द ेता है वरन ् जीव जन्त ुओं, पशुपक्षियों, प ेड ़पौधे आ ेर वनस्पतियों को भी नष्ट कर द ेता है। प्रद ूषण अन ेक भयानक बिमारिया ें को जन्म द ेता ह ै। जैसे - कैंसर, तप ेदिक, रक्तचाप, दमा, हैजा, मलेरिय
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Dhakal, Wenkatesh. "सङ्गीतमा घराना सम्बन्धी अवधारणा : एक विश्लेषण (The Concept of Gharana in Music: An Analysis)". Journal of Fine Arts Campus 3, № 2 (2021): 75–84. http://dx.doi.org/10.3126/jfac.v3i2.48238.

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Abstract:
घराना वा घरानेदार भन्ने शब्दले शास्त्रीय सङ्गीतको क्षेत्रमा विशेष स्थान वा विशिष्टता बुझिने गर्दछ । दक्षिण एसियाली शास्त्रीय सङ्गीत अन्तर्गत घरानेदार एवं संस्थागत दुई प्रकारबाट सङ्गीत सिक्ने प्रचलन रहीआएको छ । घरानेदार शिक्षा विशेष गुण एवं प्रतिभा भएका विद्यार्थीहरूलाई मात्र प्रदान गरिने प्रचलन रहेको छ । परम्परा एवं घरानामा तात्विक भिन्नता हुने हुँदा कुनै विशेष परम्परालाई घरानाको मान्यता प्राप्त हुनका लागि नितान्त आवश्यकता पर्ने अवयव के के हुन् ? भारत वर्षीय शास्त्रीय सङ्गीतमा कुन–कुन घराना हाल विद्यमान रहेका छन् ? शास्त्रीय सङ्गीत सिक्ने सिकाउने प्रक्रियामा गण्डा बन्धन के हो र यसको महत्व किन
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ममता, गौड ़. "पर्यावरण एवं भारत म ें विधिक प्रावधान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882533.

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Abstract:
पर्यावरण शब्द परि$आवरण शब्दों से मिलकर बना है, इसका शाब्दिक अर्थ हमार े चारा ें ओर के उस वातावरण से है, जिसमें जीवधारी रहत े है ं। इस प्रकार पर्या वरण भौतिक तथा जैविक अवयव या कारक का वह सम्मिश्रण है, जो चंह ु ओर से जीवधारिया ें को प्रभावित करता है। इस प्रकार पर्या वरण जीवा ें को प्रभावित करन े वाल े समस्त भौतिक एव ं जैविक कारकों का योग होता ह ै। यह कहा जा सकता है कि हमारी प ृथ्वी का पर्या वरण वह बाहरी शक्ति है जिसका जीवन पर स्पष्ट प्रभाव द ेखा जा सकता है। य े शक्तियाँ परस्पर सम्बद्ध हैं, परिवर्तनशील हैं तथा सम्पूर्ण एव ं संय ुक्त रूप मे ं जीवन पर प ्रभाव डालती हैं। इनमें भौतिक कारक के रूप म ें
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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Mishra, Vijaya Prasad. "Historical Analysis of the Term Terai Madhesh तराई मधेस शब्दको ऐतिहासिक विश्लेषण". Historical Journal 13, № 1 (2022): 57–64. http://dx.doi.org/10.3126/hj.v13i1.46225.

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Abstract:
नेपालको चुरे श्रृंखलाको दक्षिण भागमा रहेको समथर भू–भागलाई मधेस वा तराई भनिन्छ । मधेस वा तराई शब्दमध्ये कुन उपयुक्त हो भन्ने विषयमा मानिस पिच्छे फरक फरक धारणा पाइन्छ । नेपाली बृहत शब्दकोशमा तराईको अर्थ पहाडमुनिको फराकिलो समतल भूभाग, मधेस भनिएको छ । त्यसैगरी सोही शब्दकोशमा मधेस भन्नाले मध्यदेश भनेर पहिलो बुँदामा ‘अग्लो होचो र डाँडाकाँडा नभएको एक्दम समथर भूमि, तराई, मधेश’ र दोस्रो बुँदामा ‘हिमालदेखि दक्षिण, विन्ध्य पर्वतदेखि उत्तर, कुरुक्षेत्रदेखि पूर्व प्रयागदेखि पश्चिमपट्टी पर्ने समथर भूभागको पुरानो नाउँ, मध्यप्रदेश ।’ नेपाली संक्षिप्त शव्दकोशमा हिमालदेखि दक्षिण विन्ध्याञ्चल पर्वतदेखि उत्तर कुर
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अनिल, कुमार सिंह. "रोहतास जिला में कृषि विकास की समस्याएं एवं समाधान का सिंहावलोकन". 'Journal of Research & Development' 14, № 18 (2022): 13–17. https://doi.org/10.5281/zenodo.7431455.

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Abstract:
हमारा भारत देश कृषि प्रधान देश है जहां की लगभग 80% आबादी गांव में निवास करती हैं एवं कृषि कार्यों से ही अपने जीविकोपार्जन का साधन तैयार करती है बिहार राज्य का रोहतास जिला कृषि के युग में चावल के कटोरे से संबोधित किया जाता बिहार कृषि विश्वविद्यालय में पराली प्रबंधन के रोहतास मॉडल को पूरे राज्य में लागू करने का निर्णय लिया कृषि विज्ञान केंद्र रोहतास के इस पराली प्रबंधन मॉडल को मई 2021 में एग्रीकल्चर अवार्ड 2021 से सम्मानित किया गया है वैसे जिले में भी कृषि के विकास में समस्याएं उत्पन्न होना कहीं न कहीं हमारे राज्य व्यवस्था की लापरवाही को इंगित करता है जिसकी प्रभावी नीतियों का अभाव दृष्टिगोचर होत
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शालिकराम पौड्याल та प्रेमप्रसाद तिवारी. "कोही किन बरबाद होस् नाटकमा मनोविज्ञान". Butwal Campus Journal 7, № 1 (2024): 12–24. http://dx.doi.org/10.3126/bcj.v7i1.71706.

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Abstract:
प्रस्तुत लेखमा विजय मल्लद्वारा लिखित केही किन बरबाद होस् नाटकमा प्रयुक्त मनोविज्ञानको विश्लेषण गरिएको छ । यस लेखमा केही किन बरबाद होस् नाटकलाई प्राथमिक स्रोतको सामग्रीका रूपमा उपयोग गरिएको छ भने सिद्धान्त निर्माणका व्रmममा उपयोग गरिएका कृतिलाई द्वितीयक स्रोतका सामग्री मानिएको छ । यस लेखका लागि आवश्यक सामग्रीको सङ्कलन पुस्तकालयीय कार्यबाट गरिएको छ । यस लेखमा पात्रको मानसिक अवस्थालाई हीनताबोध र परपीडन, मातृरति ग्रन्थि र अतृप्त मनोविकार, वात्सल्य मनोविज्ञान, अभिघात मनोविज्ञान तथा समाज मनोविज्ञान जस्ता मनोवैज्ञानिक आधारमा विश्लेषण गरिएको छ । यस लेखमा कोही किन बरबाद होस् नाटकमा आएको प्रमुख पात्र ध्
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राकेश, कवच े. किरण बड ेरिया आलोक गोयल. "''रेडिया ेधर्मी प्रदूषण का बढ ़ता दायरा'' मानव क े लिए अभिषाप". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883000.

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Abstract:
पर्यावरण प्रद ूषण एक ए ेसी सामयिक समस्या है जिसमें मानव सहित जैव जगत ् क े लिए जीवन की कठिनाईया ँ बढ ़ती जा रही हैं। पर्यावरण के तत्त्वो ं में गुणात्मक ह ्रास के कारण जीवनदायी तत्त्व यथा वायु, जल, मृदा, वनस्पति आदि के न ैसर्गिक गुण ह्रसमान होत े जा रहे हैं जिससे प्रकृति और जीवों का आपसी सम्बन्ध बिगड ़ता जा रहा ह ै। यह सर्व ज्ञात है कि पर्यावरण प्रद ूषण आध ुनिकता की द ेन है। वैसे प्रद ूषण की घटना प्राचीनकाल में भी हा ेती रही ह ै लेकिन प्रकृति इसका निवारण करन े में सक्षम थी, जिससे इसका प्रकोप उतना भयंकर नहीं था, जितना आज है। च ूँकि आज प ्रद ूषण की मात्रा प ्रकृति की सहनसीमा को लाँघ गई ह ै फलतः इ
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Gautam, Deepak Prasad. "प्रतिध्वनिहरू विस्मृतिका उपन्यासमा अनुभूतिको संरचना". Historical Journal 16, № 1 (2025): 142–57. https://doi.org/10.3126/hj.v16i1.76379.

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Abstract:
प्रस्तुत लेखमा लीलबहादुर क्षत्रीद्वारा लेखिएको प्रतिध्वनिहरू विस्मृतिका उपन्यासलाई मूल आधार बनाएर भारतका आसाम, गोहाटी र सिलाङका विभिन्न भूभागमा बसोबास गर्ने नेपाली र नेपालीतर समाजका व्यक्तिका मनभित्र रहेका संवेदनालाई प्रमुख आधार बनाइएको छ । यसमा साहित्यको समाजशास्त्रीय सिद्धान्तका निम्ति महत्त्वपूर्ण तत्त्व मानिएको अनुभूतिको संरचनाको मान्यतामा चर्चा गर्ने क्रममा कस्ता खाले भावनालाई मूर्त र अमूर्त वस्तु मान्ने बारे खोजी गरिएको छ । यस लेखमा भारतको गोहाटी र आसाममा बस्ने नेपाली र नेपालीतर समाजमा बस्ने व्यक्तिका मनभित्र अनुभूतिको संरचना के कस्ता रहेका छन् तथा उनीहरूको सामाजिक, आर्थिक र मनोवैज्ञानिक
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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भट्टराई Bhattarai, ध्रुवप्रसाद Dhurbaprasad. "वक्रोक्तिका प्रकार र नेपाली लोककविता Bakroktika Prakar a Nepali Lokkabita". Curriculum Development Journal, № 42 (6 грудня 2020): 99–114. http://dx.doi.org/10.3126/cdj.v0i42.33237.

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Abstract:
वक्रोक्ति सिद्धान्त पूर्वीय साहित्यको एक प्रसिद्ध सिद्धान्त हो । काव्यमा वक्रोक्तिको आवश्यकता रहेको धारणा भरतमुनिदेखिका सबै मनीषीले राखेको देखिए पनि वक्रोक्तिलाई काव्यविश्लेषणको सैद्धान्तिक आधार दिने चिन्तक दसौँ शताब्दीको उत्तरार्धका कुन्तक हुन् । कुन्तकका अनुसार वक्रोक्ति भनेको विशिष्ट प्रकारको कथन हो र विशिष्ट कथन भनेको कविको विदग्धतापूर्ण अर्थात् चतुरतापूर्वकको कथन हो । यस प्रकारको विशेष कथनबाट सहृदयीहरूको हृदय आह्लादित हुने भएकाले वक्रोक्तिलाई काव्यको आत्मा मानिन्छ । विशेष प्रकारको कथनका लागि वर्ण, पद, वाक्य, प्रकरण तथा समग्र प्रबन्धमा विदग्धतापूर्ण कथनको आवश्यकता पर्दछ । यीमध्ये कुनैमा त्
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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अभय, ज. ैन. "जलवायु परिवर्तन आ ैर मध्यप्रदेश". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.881829.

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Abstract:
विकास आ ैर पर्यावरण के बीच स ंत ुलन की बात लम्ब े समय से चली आ रही है, लेकिन विकास चक्र के चलत े कहीं न कहीं पर्या वरण की अनद ेखी होती आ रही है आ ैर ए ेसी स्थितियाँ आज हमार े सामन े चुना ैती एव ं सकंट के रूप म ें है। अन ेक स ंकल्प, वाद े, नीतियाँ आ ैर कार्यक्रम आदि के क्रियान्वयन के बावजूद भी पर्यावरण चुनौतियाँ हमार े सामन े ह ै। मौसम म ें बहुत अधिक उतार-चढ ़ाव हो रहे है, अधिक बरसात या सूखा पड ़ना संया ेग नहीं बल्कि पर्या वरण परिस्थितियों में आ रहे खतरनाक बदलाव के सूचक और परिणाम ह ै। जलवायु परिवर्त न से निपटना न केवल हमार े स्वास्थ्य के लिये बल्कि आन े वाली पीढि ़या ें के स्वास्थ्य को लाभ पहुँ
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र, ंजना शर्मा (व्यास). "्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक, औषधीय मूल्य". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883545.

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Abstract:
विश्व प्रकृति निधि भारत का हमेशा ही यह उद ्द ेश्य रहा है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण क े साथ दीर्घकालिक तथा न्याय संगत विकास करन े में सहभागी बन ें।1 जब तक हमार े पर्यावरण में बाह्य पदार्थ आकर मिलत े ह ैं संद ृषण होता ह ै। प ्रारम्भ में यह अल्प मात्रा में हा ेता है, जिससे एक स्तर तक मन ुष्य को कोई हानि नहीं पहुँचती तब तक यह संद ूषण की श्रेणी मे ं, ल ेकिन जैस े ही इस सीमा का उल्ल ंघन होता है तो यह द ूषण संद ूषण न रहकर प ्रद ूषण बन जाता है। हिन्द ू धर्म ग्रन्थ ‘‘वाराह पुराण’’ में लिखा है कि वृक्षो ं के उपकार पाँच महायज्ञ है ं। व े ग्रहस्थों को ईंधन पथिका ें को छाया तथा विश्राम, पक्षिया ें
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Adhikari, S. R. "सामाजिक समस्या र अनुसन्धानको समस्याबीचको अन्तर". Shweta Shardul 19, № 1 (2024): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.12770858.

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Abstract:
सामाजिक अनुसन्धान सामाजिक ज्ञान निर्माण प्रकृयाको मेरुदण्ड मानिन्छ । सामाजिक अनुसन्धान कार्यलाई अगाडि बढाउन सामाजिक समस्या र अनुसन्धानको समस्याको अवधारणा बारे स्पष्ट शुन आवश्यक हुन्छ । यस आलेखको  मूल उद्देश्य सामाजिक समस्या र सामाजिक अनुसन्धानको समस्याको अवधारणा पहिल्याउनुका साथै सामाजिक अनुसन्धानको समस्या पहिचान गर्दा अपनाउने प्रक्रियासँगै पूर्व साहित्य समीक्षाको अवधारणा, प्रकार र तरिका पनि उजागर गर्ने रहेको छ । यस उद्येश्य प्राप्त गर्नको लागि अन्तरवस्तु विश्लेषण विधिको प्रयोग गरी तथ्यहरुको संकलन तथा विश्लेषण गरिएको छ । सामाजिक समस्या र सामाजिक अनुसन्धानको समस्या फरक फरक अवधारणा रहेछन् ।
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SAKSHI, GUPTA (JRF). "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवम् रंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.889290.

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Abstract:
सरंाश- संसार में प ्रत्येक व्यक्ति अन्तर्मन क े भावा ें का े व्यक्त करने क े लिय े किसी न किसी माध्यम का े अपनाता ह ै। किसी के लिये स्वर माध्यम ह ैं तो किसी क े लिये शब्द परन्तु एक चित्रकार के लिये उसक े भावा ें को अभिव्यक्त करने का माध्यम या साधन रंग ह ै। रंगा ें की विभिन्न ताना ें क े द्वारा मन म ें उद्व ेलित भावों का े अभिव्यक्त करता ह ै। वह चित्रा ें में संया ेजन विधियों का प ूर्ण ध्यान रखते हुये कहीं गहरे या तीख े रंगा ें का प ्रया ेग करता है तो कहीं हल्के व का ेमल रंगा ें का। इस विधि से अपने भावों की अभिव्यक्ति करके उसे आत्म-संता ेष मिलता ह ै। एक कृति अपने भीतर छुपे ह ुये अनेक आयामों का
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मिश्रा, सीमा. "पुरूषों की कार्यरत व अकार्यरत पत्नियों से जीवन की सम्पूर्ण संतुष्टि का तुलनात्मक अध्ययन". Anthology The Research 8, № 10 (2024): H 81— H 88. https://doi.org/10.5281/zenodo.10821818.

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Abstract:
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research"                URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=8205 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)                  Abstract :  यह अध्ययन भारत में वे पुरुष जिनकी पत्नियां नौकरी या किसी भी तरह के व्यवसाय में संलग्न है तथा वे पुरुष जिनकी पत्नियां किसी नौकरी या व्यवसाय में संलग
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सुवेदी Subedi, सखिशरण sakhi Saran. "नेपाली भाषाको उत्पत्ति र विकास". Kaladarpan कलादर्पण 5, № 1 (2025): 56–63. https://doi.org/10.3126/kaladarpan.v5i1.74733.

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Abstract:
एक हजार वर्षको इतिहास बोकेको नेपाली भाषाको उत्पत्ति कुन मूल भाषाबाट विकास भएको हो भन्ने विषयमा मत भिन्नता रहेको छ । भारोपेली भाषा परिवारको कुन शाखाबाट विकास भएको हो भन्नेमा भाषाविद्हरूका बिच मत भिन्नता देखिएको छ । अधिकांश विद्वानहरू भारोपेली परिवारको शतम् वर्गमा पर्ने आर्य इरानेली शाखाको आर्य भाषाबाट नेपाली भाषाको जन्म भएको कुरामा सहमत छन् । हाल नेपाली भाषा ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, आदि क्षेत्रमा प्रयोग भएर समृद्ध बनिसकेको छ । दुल्लु अभिलेखदेखि थालनी भएको यस भाषाको विकास अभिलेखकालपछि आख्यानग्रन्थ एवम् साहित्यिक रचनाहरूबाट परिष्कृत हुँर्दै आएको हो । थालनीदेखि हालसम्मको नेपाली भाषाको
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डा, ॅ. मीनाक्षी स्वामी. "भारतीय सामाजिक परम्परा म ें प्राकृतिक रंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890343.

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Abstract:
रामधारी सिंह दिनकर का कथन ह ै “भारतीय सामाजिक जीवन परम्पराओं स े सम्प ृक्त ह ै। सिंधु सभ्यता में बर्तनों पर हुई रंग-बिरंगी चित्रकारी हमारी परम्परा में चित्रकला के महत्व का प्रमाण ह ै। लाल आ ैर पीले रंगा ें से रंगी आकृतियाँ भारतीय सामाजिक परम्पराओं का प्रतीक ह ै। समाज के भीतर धड़कती सज ृन की चेतना रंगा ें क े माध्यम से अनुप्रमाणित उद्वेगा ें की अभिव्यक्ति ह ै। प्रकृति से प्राप्त रंगा ें से चित्रा ंकन का प ्रागेतिहासिक काल में ह ुए। जैसे काले, लाल, सफ ेद, पीले, नीले आदि। लोक कला का संब ंध भावनाओं आ ैर परम्पराओं पर आधारित ह ै। यह जन सामान्य की अनुभूतिया ें की अभिव्यक्ति ह ै। देवीय संक ेता े व परम
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देवकोटा Devkota, कमप्रसाद Kamal Prasad. "पूर्वीय अर्थ चिन्तन र नेपाली भाषा शिक्षण Purviya Artha Chintan ra Nepali Bhasha Shikshan". Scholars' Journal 3 (28 травня 2021): 190–202. http://dx.doi.org/10.3126/scholars.v3i0.37296.

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Abstract:
प्रस्तुत आलेख पूर्वीय अर्थ चिन्तन र नेपाली भाषा शिक्षण शीर्षकमा केन्द्रित रहेको छ । पूर्वीय अर्थ चिन्तनको प्रारम्भ कसरी भयो ? कुन कुन पक्षहरूले पूर्वीय अर्थ चिन्तनलाई समृद्ध तुल्याएका छन् ? ती चिन्तनहरूका मुख्य मान्यताहरू के के हुन् ? यसको चिन्तन परम्परा कसरी विकास भएको छ ?जस्ता प्राज्ञिक जिज्ञासाहरूको समाधानमा यस आलेखको औचित्यता प्रकट भएको छ । प्रस्तुत आलेखकोउद्देश्य परिपूर्ति गर्नका लागि गुणात्मक अनुसन्धान विधिको अवलम्बन गरिएको छ । सामग्री सङ्कलन गर्न द्वितीयक स्रोतअन्तर्गत पुस्तकालय कार्यबाट यस अध्ययनसँग सम्बन्धित पूर्ववर्ती विद्वान्हरूले अध्ययन विश्लेषण गरेका सामग्रीहरूको उपयोग गरिएको छ ।
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शर्मा Sharma, बिन्दु Bindu. "शून्यको मूल्यमा प्रतिबिम्बित समकालीन नेपाली समाजको चरित्र". Samaj Anweshan समाज अन्वेषण 1, № 2 (2023): 129–40. http://dx.doi.org/10.3126/anweshan.v1i2.65504.

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Abstract:
प्रस्तुत लेखमा नवराज केसीको आख्यानात्मक निबन्ध कृति शून्यको मूल्यमा प्रतिबिम्बित समकालीन नेपाली समाजको चरित्रको विशिष्टता खोजी गरिएको छ । यो अध्ययन गुणात्मक प्रकृतिको छ र यसमा समकालीन नेपाली समाजका कुन कुन वास्तविक शून्यको मूल्यमा अभिव्यञ्जित छन् र समाजको मूल्याङ्कनका निम्ति तिनको सान्दर्भिकता र प्रभावकारिता कसरी पुष्टि हुन्छ भन्ने प्रश्न समाधान गर्ने उद्देश्य रहेका छन् । यसका निम्ति कृतिमा प्रतिबिम्बित समकालीन नेपाली समाजको विश्लेषण गर्न पूर्व अध्ययनबाट एउटा अवधारणात्मक ढाँचा तयार पारिएको छ; जस अन्तर्गत गुजारामुखी मिश्रित अर्थतन्त्र, असमान विकास, शोषण, उत्पीडन र दमन, तथा माक्र्सवादको प्रभावका
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के. सी. K. C., तेजबहादुर Tej Bahadur. "नेपालको औपचारिक शिक्षामा राणा प्रधानमन्त्रीहरूको भूमिका". Bikasko Nimti Shiksha (विकासको निम्ति शिक्षा) 24, № 1 (2020): 146–64. http://dx.doi.org/10.3126/bns.v24i1.62522.

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Abstract:
प्रस्तुत लेख नेपालमा औपचारिक शिक्षाको विकासमा राणा प्रधानमन्त्रीहरूले खेलेको भूमिकाको विषयमा केन्द्रित छ । नेपालमा औपचारिक शिक्षाको सुरुवात प्रथम राणा प्रधानमान्त्री जङ्गबहादुरको शासनकालदेखि भएको थियो । उनले राणा परिवारका सदस्यहरूलाई अंग्रेजी भाषा सिकाउने मनसायले सुरु गरेको अंग्रेजीभाषा कक्षा कालान्तरमा औपचारिक शिक्षाको आरम्भ बनेको थियो । प्रारम्भमा राणा परिवारमा केन्द्रित औपचारिक शिक्षा विस्तारै नेपाली जनसमुदायमा पनि विस्तारित हुँदै गयो । जङ्गबहादुरदेखि मोहनशमशेरको प्रधानमन्त्रीत्वकालसम्म यसको विकासक्रमले तीव्रता पाउँदै गयो । झण्डै ९७ वर्षको समयावधिमा औपचारिक शिक्षामा कुनकुन राणा प्रधानमन्त्र
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Singh, Dr Deep Shikha. "Ancient and New Playing Style of the Punjab Gharana of Tabla: A Brief Discussion." International Journal of Multidisciplinary Research Configuration 1, no. 3 (2021): 67–79. http://dx.doi.org/10.52984/ijomrc1312.

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Abstract:
प्रस्तुत शोध पत्र के अन्तर्गत तबले के पंजाब घराने में प्रचलित वादन शैली व वर्तमान में विशेष रूप से उस्ताद अल्लारखा खां जी द्वारा किये गये विभिन्न बंदिशों जैसे-पेशकार, कायदे, क्लिष्ट तिहाईया, संगत हेतु कठिन रचनाओं द्वारा विकसित नवीन वादन शैली पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। इसके अन्तर्गत पंजाब घराने की वादन शैली में किन-किन वंदिशों का समावेश था विशेष रूप से दीपचंदी अंग की बंदिशें, लमक्षण, कायदें, बढैया की गते, रेले, गते इत्यादि का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया गया है व निष्कर्ष रूप में तबले की पंजाब घराने की प्राचीन व नवीन वादन शैली के संयोग से विकसित वादन शैली को दर्शाने का प्रयास किया
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Pramod, Ranjan. "स्वर कोकिला लता मंगेशकर के सामाजिक सरोकार". Dalit Dastak 10, № 10 (2022): 27–29. https://doi.org/10.5281/zenodo.6570332.

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Abstract:
लता मंगेशकर की वैचारिक बुनावट प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी थी। मुझे नहीं पता कि उन्होंने अपने-अपने प्रतिगामी समाजिक सरोकारों का उस प्रकार सचेत चुनाव किया था या नहीं, जिस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े उच्च वर्णीय लोग करते हैं।  लेकिन, इस लेख में उल्लिखित प्रसंगों से इतना  स्पष्ट है कि दुनिया कैसी होनी चाहिए, कौन-सी ताकतें दुनिया के सुर को बिगाड़ती हैं और कौन इसे संवारने के लिए संघर्षरत हैं, इस बारे में उनका कोई विचार ही नहीं था। किसी विचारहीन कलाकार का इतिहास में स्थान नहीं बना पाना कठिन है, चाहे वह अपने जीवन-काल में कितना भी महान क्यों न ल
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शर्मा Sharma, मुकुन्द Mukunda. "मुस्ताङ जिल्लाका ‘थकाली’ र ‘ल्होवा’ समुदायमा प्रचलित लोकनृत्यहरू {Popular folk dances in 'Thakali' and 'Lhowa' communities of Mustang district}". Prajna प्रज्ञा 123, № 1 (2022): 140–53. http://dx.doi.org/10.3126/prajna.v123i1.62644.

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Abstract:
प्रस्तुत आलेखमा मुस्ताङ जिल्लामा बसोवास गर्ने थकाली र ल्होवा समुदायमा प्रचलित लोकनृत्यहरूलाई अध्ययनको विषय बनाइएको छ । यस्ता नृत्यहरू आख्यानबद्ध र आख्यानमुक्त तथा पार्विक, संस्कार र सार्वजनिक उत्सव वा समारोहका अवसरमा गरिने रामरमितासँग सम्बन्धित रहेका पाइन्छन् । अध्ययनीय नृत्यमध्ये कतिपय गीतरहित वाद्यवादनका तालमा र कतिपय गेय, वाद्य र नृत्यसहितका तथा निर्धारित वेशभूषायुक्त र मुक्त वेशभूषामा तथा महिला र पुरुषको समान सहभागितामा प्रस्तुत गर्ने गरेको पाइन्छ । यिनै विशेषता नै यहाँका नृत्यगत वर्गीकरण र शैलीगत विशेषता पनि हुन् । नृत्यसम्बन्धी सैद्धान्तिक अवधारणाबाहेक मुस्ताङ जिल्ला र यहाँका थकाली र ल्ह
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शुभांगी, एस. शिंदे. "मुंशी प्रेमचंद: जीवन और साहित्यिक योगदान". International Journal of Arts, Social Sciences and Humanities 03, № 01 (2025): 01–04. https://doi.org/10.5281/zenodo.14899046.

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Abstract:
मुंशी प्रेमचंद हिंदी और उर्दू साहित्य के महान उपन्यासकार और कहानीकार थे। वे सामाजिक यथार्थवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं और उनकी रचनाएँ समाज के दर्पण के रूप में कार्य करती हैं। उनका साहित्यिक योगदान भारतीय समाज, संस्कृति और राजनीति को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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Baidhya Tamang, Santosh. "सीताबडामहारानीको परसंस्कृतिग्रहण र प्रभाव". Sahayaatra सहयात्रा 8 (10 липня 2025): 59–67. https://doi.org/10.3126/sahayaatra.v8i1.80934.

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Abstract:
राणा शासनको समयमा राष्ट्र र राज्यको प्रमुख राजा भए तापनि राजाहरू आलङ्कारिक अवस्थामा मात्र सीमित रहेको तथ्य विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेज तथा पुस्तकहरूबाट प्रष्ट हुन्छ । उक्त आलङ्कारिक शासन प्रणालीमा पहिलो कानुन मुलुकी ऐन १९१० मार्फत तहगत जातीय ब्यवस्था लागू गरी कुन कुन जाति कुन वर्ग तथा के कस्तो सामाजिक हैसियतमा रहने र उक्त वर्ग र हैसियत अनुसार के कस्ता कार्यहरू गर्ने नगर्ने तथा जातीय वर्ग अनुसार छुट्टा छुट्टै दण्ड सजायको भागिदार रहने कुरा उल्लेख गरेको पाइन्छ । यद्यपि यस लेखमा उक्त कानुनी व्यवस्थामा पनि कथित तल्लो सामाजिक वर्गका जातिहरूमध्ये केहीले के कसरी आफ्नो सामाजिक हैसियत र वर्ग उच्च जाति तथा
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पोख्रेल Pokhrel, माधव प्रसाद Madhav Prasad. "सिकारुलाई नेपाली पढाइ किन अप्ठ्यारो हुन्छ ? {Why is learning Nepali difficult for students?}". Gipan 3, № 2 (2017): 219–27. http://dx.doi.org/10.3126/gipan.v3i2.50366.

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शर्मा, विश्वम्भर कुमार. "सङ्कथन विश्लेषणको सैद्धान्तिक आधार र यसका प्रकार". Academic Voices: A Multidisciplinary Journal 9 (31 грудня 2019): 125–28. https://doi.org/10.3126/av.v9i1.74130.

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Abstract:
सङ्कथन विश्लेषण प्रायोगिक भाषा विज्ञानको नविन शाखा हो । विचारका आधारमा जोडेर अर्थ लगाउन सकिने वाक्यहरुबाट बनेको भाषिक विधा नै सङ्कथन हो । कुनै पनि भाषिक उच्चारण सन्दर्भवद्ध भएर आउँने हुनाले सङ्कथन विश्लेषणमा सन्दर्भको खोजी गर्नुपर्ने हुन्छ । सङ्कथनमा कथ्य भेद, लेख्य भेद, सङ्कथनका युक्ति, सङ्कथनका तत्वहरु वाक्य विश्लेषणका लागि महत्व राख्दछन भने वाक्यभन्दा माथिल्लो तहमा अन्तर्वाक्कीय सम्बन्ध कायम गर्न आउँने भाषिक पक्षको रुपमा सम्बद्धकको भूमिका रहन्छ । सङ्कथनले भाषाको कथ्य र लेख्य दुबै अभिव्यक्तिलाई जनाउँ छ । सङ्कथन शब्दले अभिव्यक्तिको समग्र कथन वा सिङ्गो भनाइलाई बुझाउँने हुँदा खास परिवेश सम्बद्ध
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लामिछाने, शारदा. "‘चिताको ज्वाला’ कथामा समाख्यानशास्त्र". Cognition 3, № 1 (2021): 221–31. http://dx.doi.org/10.3126/cognition.v3i1.55690.

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Abstract:
प्रस्तुत आलेख गुरुप्रसाद मैनालीद्वारा लिखित ‘चिताको ज्वाला’ कथामा समाख्यानशास्त्रीय सैद्धान्तिक अवधारणाको विश्लेषणसँग सम्बद्ध छ । यसमा समाख्याताको पहिचान कसरी गरिएको छ, समाख्यानात्मक वाच्यत्व कुन रुपमा प्रकट भएको छ । समाख्यानात्मक केन्द्रणलाई कस्तो रुपमा प्रस्तुत गरिएको छ भन्ने जिज्ञासाको समाधान खोज्न प्रयत्न गरिएको छ । यसमा समाख्यानशास्त्रसम्बन्धी सैद्धान्तिक मान्यताका आधारमा कथाको विश्लेषण गरिएको हुँदा निगमनात्मक विधिको उपयोग गरिएको छ । यसमा के भनिएको छ र कसले भनेको हो भन्ने विषयको पहिचान गरिएको छ । समाख्याता पाठभित्र छ कि बाहिर छ वा आफै पात्रको रूपमा उपस्थित छ वा अरुलाई उपस्थित गराएको छ भन्
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Gyawali, Khopendra, та Sudhir Kumar Adhikari. "देउखुरी बहुमुखी क्याम्पसद्वारा उत्पादित जनशक्ति खपतको अवस्था". Journal of Deukhuri Multiple Campus 3, № 4 (2025): 82–89. https://doi.org/10.3126/jdmc.v3i4.80564.

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Abstract:
प्रस्तुत अध्ययन देउखुरी बहुमुखी क्याम्पसको उत्पादित जनशक्तिसँग सम्बन्धित छ । देउखुरी बहुमुखी क्याम्पसबाट आफ्नो औपचारिक अध्ययन पूरा गरी स्नातक तथा स्नातकोत्तर तह उत्तीर्ण शैक्षिक जनशक्तिमध्ये कति संख्यामा खपत भएका छन् र खपत भएका जनशक्तिको लैङ्गिक वितरण के–कस्तो रहेको छ, कुन–कुन तह र निकायमा कार्यरत रहँदै आएका छन् भन्ने बारेमा यस लेखमा खोजी गरिएको छ । समुदायप्रति क्याम्पसको योगदान के कति रह्यो भनी विश्लेषणात्मक अध्ययन गर्ने उद्देश्यका साथ अगाडि बढाइएको प्रस्तुत अनुसन्धनात्मक लेखमा मूलतः परिमाणात्मक अनुसन्धानका साथै गुणात्मक पद्धति अवलम्बन गरिएकोले मिश्रित ढाँचा अपनाइएको छ । प्राप्त तथ्याङ्कका आध
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तिमल्सेना Timalsena, शिवप्रसाद Shivaprasad. "व्याकरणिक र कोशीय संसक्ति र सम्बद्धन Byakaranik ra Koshiya samsakti ra Sambadhwan". Curriculum Development Journal, № 42 (6 грудня 2020): 134–44. http://dx.doi.org/10.3126/cdj.v0i42.33242.

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Abstract:
सङ्कथन अभिव्यक्तिको सिङ्गो कथन हो । यसमा भाषाका सम्पूर्ण एकाइहरू समाविष्ट भएका हुन्छन् । सम्पे्रषणमूलक हुनु सङ्कथनको प्रमुख विशेषता हो । यसमा गफ, कुराकानी, संवाद, छलफल, अन्तर्वार्ता आदि अन्तक्र्रियात्मक कथन अभिव्यक्तिका साथै एकालापीय अभिव्यक्तिहरू भाषण, प्रवचन, वाचन आदि पनि पर्दछन् । त्यस्तै गरी लेख्य रूपका निबन्ध, चिठी, संस्मरण, जीवनी, विज्ञापन, प्रतिवेदन, सूचना आदि पनि सङ्कथनकै विषय मानिन्छन् । सङ्कथनका भाषिक एकाइलाई अन्वितिपूर्ण बनाउन सम्बद्धक (ऋयजभकष्यल) र सम्बद्धन (ऋयजभचभलअभ) को बढी आवश्यकता पर्दछ । सम्बद्धकलाई संसक्ति पनि भनिन्छ । आपसमा जुटेर रहनु वा टाँसिएर रहनु नै संसक्ति हो । शब्द, पद
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लामिछाने Lamichhane, शारदा देवी Sharada Devi. "ऋषिराज बरालका उपन्यासमा वर्गीय चेतना {Class Consciousness in Rishiraj Baral's Novels}". Cognition 6, № 1 (2024): 269–80. http://dx.doi.org/10.3126/cognition.v6i1.64480.

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Abstract:
प्रस्तुत लेख ऋषिराज बरालका उपन्यासमा वर्गीय चेतनाको अध्ययनमा आधारित छ । नेपाली समाजको वर्गीय विषमताको विरुद्धमा सङ्घर्षरत जनताले देखाएको साहस र वलिदान तथा सामाजिक, राजनीतिक विकृति र विसङ्गतिको अभिव्यक्ति उनका उपन्यासमा पाइन्छ । माक्र्सवादी दर्शनबाट प्रभावित बराल प्रगतिवादी साहित्यिक मान्यताअनुसार तत्कालीन आर्थिक तथा सामाजिक असमानताले सिर्जना गरेको वर्ग सङ्घर्षको उद्घाटन गर्नमा केन्द्रित भएको देखिन्छ । बरालका उपन्यासमा निम्न वर्गप्रति सामन्त वर्गको अन्याय, अत्याचार र शोषणको स्थिति कुन रूपमा छ, त्यसका विरुद्धको चेतना शोषित वर्गमा कसरी प्रकट भएको छ र लेखकीय पक्षधरता कुन वर्गप्रति देखिन्छ भन्ने जि
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सचिन, पाटीदार, та रश्मि जैन डॉ. "सतत विकास के दृष्टिकोण से सामुदायिक विकास में ग्राम सभा की भूमिका का अध्ययन". 'Journal of Research & Development' 15, № 18 (2022): 21–23. https://doi.org/10.5281/zenodo.7431664.

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Abstract:
यह अनुसंधान पत्र ग्राम सभा के माध्यम से सामुदायिक स्तर पर होने वाले विकास कार्यों पर आधारित वर्णनात्मक अनुसंधान पद्धति पर आधारित है। इस अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य इस बात की चर्चा करना है कि सतत विकास के दृष्टिकोण से सामुदायिक स्तर पर ग्राम सभा के माध्यम से स्थानीय स्तर पर लोग किस प्रकार से योगदान दे रहे है। सतत सामुदायिक विकास में कौन-कौन सी बाधाये है और उनका समाधान किस प्रकार से किया जा सकता है। अध्ययन में ग्रामीण सामुदायिक विकास में स्थानीय स्तर पर सक्रियता, सहभागिता, समन्वय और सशक्तिकरण के संदर्भ में ग्राम सभा की भूमिका का वर्णन किया गया है। यह अनुसंधान स्थानीय स्वशासी की इकाई और सतत ग्रामी
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ओमपाल, सिंह, та हेम ेन्द्र सिंह डा॰. "बौद्धिक सम्पदा और बच्चा ें की शिक्षा से सम्बन्धित समस्याएँ". International Journal of Research - Granthaalayah 6, № 9 (2018): 332–39. https://doi.org/10.5281/zenodo.1443513.

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Abstract:
शिक्षा मानव जीवन का श्रं ृगार है । शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति एक विशिष्ट व्यक्तित्व को प्राप्त करन े में सक्षम हो सकता है । अन ेक बार अशिक्षित व्यक्ति भी प्रभावशील होता है; परन्त ु, शिक्षा क े अभाव म ें वह मुख्य रूप से अपन े परिवेश से ही अधिकतम ज ुड़ा हुआ रहता है जिस क े कारण वह अपनी उन विशिष्टताओं का े व्यापक रूप प्रदान करन े में प्रायः अक्षम रहता है जिन से कि वह सम्पूर्ण भारतीय और विदेशी नागरिकों को लाभ पहुँचा सक े । वर्तमान वैश्विक परिदृश्य यह संकेत करता है कि वह देश वैश्विक धरातल पर टिका नहीं रह सकता जिस के नागरिक शिक्षा से वंचित हैं । भारतीय परिप्रेक्ष्य में बच्चों की शिक्षा से सम्बन्
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सीमा, शमा, та तिवारी आभा. "पर्यावरण संरक्षण एव ं मानवीय स ंवेदना आज के संदर्भ म ंे". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883549.

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Abstract:
मानव एव ं प्रकृति एक द ूसर े के प ूरक हैं। मन ुष्य का जीवन प्रकृति अर्थात ् पर्यावरण संरक्षण के बिना संभव नही ं है। मन ुष्य की आत्मके ंदि ्रत सोच के कारण प ्रकृति का दोहन करत े हुए उसन े संरक्षण का विचार त्याग दिया। कटत े हुए व ृक्ष, प ्रद ूषित होती हुई नदियाँ, सूखत े ह ुए कुँए, धुँए और धूलका ग ुबार बनती हुई हवा, कीटनाशका ें के जहर से भरी हुई खाद्य सामग ्री, मन ुष्य की सूखती हुई संव ेदना की कहानी कह रहे है ं। हम सब प्रक ृति की संतान ह ै। पँचतत्वों स े निर्मित है, हमारा शरीर: भूमि, वायु, जल, आकाश एव ं अग्नि। ये पाँच तत्व ही पर्यावरण है ं। इनमंे से एक भी यदि प ्रद ूषित होता ह ै तो मानव जीवन भी प
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Shakya, Sudha. "CURRENT ENVIRONMENTAL PROBLEMS AND SUGGESTIONS." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 3, no. 9SE (2015): 1–3. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v3.i9se.2015.3256.

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Abstract:
Today, every person, life and flora is getting life from the environment itself, but the situation of the environment has become such that it has become very difficult to handle. The present research article is presented with the objective of solving the problems of the environment and how to solve them. Today environmental problems are causing problems like population growth, pollution, global warming, sea pollution, damage to ozone layer, waste decomposition, reduction in biodiversity etc., which has become very important to solve and solve them.
 आज पर्यावरण से ही हर व्यक्ति जीवजंतु एं
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Raghubanshi, Swojan. "कार्तिक नाँचमा सङ्गीत अन्तर्गत ताल र वाद्य विश्लेषण". Journal of Fine Arts Campus 5, № 1 (2023): 55–64. http://dx.doi.org/10.3126/jfac.v5i1.60304.

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Abstract:
प्रस्तुत अनुसन्धान लेखमा कार्तिक नाँचमा सङ्गीत अन्तर्गत ताल र वाद्यको विश्लेषण रहेको छ । गायन, वादन र नृत्य सङ्गीतको तीन विधा जसमा ताल पक्षले महवपूर्ण भूमिका खेलेको हुन्छ । ताल लयमा केन्द्रित रहेको हुन्छ । ताल र लय अनुसार बजाईएको वाद्यबाट आएको (सुर वा स्वर) ध्वनीले साङ्गीतिक माहोलको सृजना गर्दछ । सङ्गीत प्रस्तुतिको उद्देस्य विभिन्न किसिमको हुनसक्दछ । ताललाई वाद्य एवं गानाका साथमा सम्पादन गरिन्छ भने सोही अनुरूपको नृत्य हुने गर्दछ । मल्लकालमा सुरुवात भएको कार्तिक नाँच एक अद्वितीय एवं विभिन्न विशेषताले भरिएको एक मौलिक नाँच जुन आजको दिनसम्म पनि अटूट रूपले चलिआएको छ जसमा नेवाः समुदायमा प्रचलित विभि
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Poudyal, Eknarayan. "टुवरा उपन्यासमा सीमान्तीयता". Bharatpur Pragya: Journal of Multidisciplinary Studies 3 (11 березня 2025): 52–62. https://doi.org/10.3126/bpjms.v3i01.76242.

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Abstract:
प्रस्तुत लेखमा मनोज थारूद्वारा लिखित टुवरा उपन्यासको सीमान्तीय समालोचनाका आधारमा अध्ययन गरिएको छ । सीमान्तीय समालोचना भन्नाले देशको मूलधारदेखि बाहिर रहेका विभिन्न जाति, वर्ग, वर्ण, क्षेत्र आदिको आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, राजनीतिक आदि पक्ष अध्ययन गर्ने समालोचनाको सिद्धान्त भन्ने बुझिन्छ । प्रस्तुत उपन्यासमा थारूजातिसँग सम्बन्धित विभिन्न किसिमका समस्याको चित्रण गरिएको छ । त्यसैले यो अध्ययन थारूजाति के कस्ता कारणले कुन कुन क्षेत्रमा पछि परेको छ भन्ने मुख्य समस्या र यसको समाधान खोज्नमा केन्द्रित छ । यसमा टुवरा उपन्यास प्राथमिक सामग्रीका रूपमा रहेको छ भने सीमान्तीय समालोचनाका बारेमा उल्लेख गरिएका प
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सन्तोष, कुमार सिंह. "राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020ः प्रारम्भिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 12, № 1 (2025): 137–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.15290583.

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Abstract:
शिक्षा एवं समाज का घनिष्ठ सम्बन्ध है। षिक्षा समाज अनुकूल एवं समाज पोषित होनी चाहिए। समाज व्यवस्था की मूल इकाई कुटुंब ही वह सस्था है जो स्वायत्त समाज एवं सुखी समाज का निर्माण करता है। कुटुम्ब के इस रचनात्मक स्वभाव को चिंरजीविता प्रदान करती है। षिक्षा जीवन से सम्बन्धित है, भारतीय दृष्टि से जीवन मे षिक्षा निरंतर चलने वाली प्रकिया है। इस दृष्टि से यह माना जाता है कि बच्चों की प्रथम पाठषाला कुटुम्ब ही है। बच्चों की षिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण है कि यदि जीवन के शुरूआती वर्षाें में बच्चों को बेहतर परिवरिष मिले तो वे अपने जीवन में एक बेहतर ईसान और बेहतर नागरिक बनते हैं। परवरिष और परिवेष उपलब्ध
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डॉ., अवनता केरकेट्टा, लखविंदर सिंह डॉ., वतिारी चैतन्य та चंद्रिंशी रामप्रकाश. "जैविक बनाम पारंपररक बागिानी: आपके विए क्या बेहतर है?" एग्री मैगज़ीन 2, № 2 (2025): 39–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.15335948.

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Abstract:
बागवानी का शौक रखने वाले लोग अकसर इस उलझन में पड़ जाते हैं कक जैकवक बागवानी करें या पारंपररक। यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकक दोनों कवकियों के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। इस लेख में हम जैकवक और पारंपररक बागवानी की तुलना करेंगे और जानेंगे कक आपके कलए कौन सी कवकि बेहतर हो सकती है।
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निमर्लकर, कामिन, та एन क ुज ूर. "ग ्रामीण महिलाआ ें क े आथि र्क विकास म ें बिहान या ेजना की भ ूमिका". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 72–78. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201912.

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Abstract:
भारत गांवो के द ेश है जहां के 79 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती है। इस बड ़ी आबादी का आजीविका का प्रमुख साधन कृशि अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहा है। इनमें विशेशकर महिलाओं के प्रत्यक्ष रोजगार की चर्चा कर े तो यहां महिलायें कृशि कार्य करती तो है किन्तु इन्हें कृषक की दर्जा भी प्राप्त नहीं रहा है। स्वत ंत्र भारत में इन आधी आबादी को रोजगार एव ं इन्हें आर्थिक रूप से समक्ष बनाना किसी चुनौति से कम नहीं रहा है। द ेश की यह आबादी अधिकांश आबादी गरीबी र ेखा से नीचे आजीविका करता रहा है। ऐसे में इस आबादी को आर्थिक रूप से संपन्न किए बगैर द ेश को विकास को गति प्रदान करना संभव नहीं होगा। परिणाम स्वरूप भारत सर
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