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वन्दना, अग्निहोत्री. "नदिया ें म ें प्रद ूषण और हम". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883519.

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Abstract:
जल को बचाए रखना सभी की चिन्ता का विषय ह ै, व ैज्ञानिक राजन ेता, ब ुद्धिजीवी, रचनाकार सभी की चिन्ता है, जल कैस े बचे ? द ुनियाँ को अर्थात पृथ्वी को वृक्षों को, जंगलो को, पहाड ़ों को, हवा को, पानी को बचाना है। पानी का े बचाया जाना बह ुत जरूरी ह ै। पृथ्वी बच सकती ह ै, वृक्ष ज ंगल, पहाड ़ और मन ुष्य, पषु, पक्षी सब बच सकत े ह ै, यदि पानी को बचा लिया गया और पानी प ृथ्वी पर है ही कितना? पृथ्वी पर उपलब्ध सार े पानी का 97ण्4ः पानी सम ुद ्र का खारा जल है, जो पीन े लायक नही ह ै, 1ण्8ः जल ध ु्रवा ें पर बर्फ के रूप म ें विद्यमान है और पीन े लायक मीठा पानी क ेवल 0ण्8ः ह ै जो निर ंतर प्रद ूषित हा ेता जा रहा
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क ुमारी, स. ुषमा. "सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका : बिहार के विशेष संदर्भ म". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 53–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20199.

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Abstract:
1914 इ र्. में गाँधीजी क े भारत आगमन क े समय प ूव र् में समाज सुधारकों द्वारा किये गये सुधारों क े परिणाम स्वरूप शिक्षित परिवारों में स्त्रियों की स्थिति सुधरन े लगी थी और महिलाओं क े प ्रति सामाजिक एव ं शैक्षणिक मान्यताओं में परिवत र्न की प ्रक्रिया चल रही थी ल ेकिन उसे स्वराज आंदोलन क े कार्यक्रमों द्वारा साव र्जानिक सेवा क े लिए घर से बाहर लान े तथा कुरीतियों से सावधान कर उसक े सद ्गुणों को व्यापक बनान े और आर्थिक स्वावल ंबन, साहस एव ं उत्तरदायित्व क े साथ ऊँचा उठान े का सतत ् प ्रयास वास्तव में गाँधीजी न े ही किया। स्वत ंत्रता आंदोलन में ‘भारतीय नारी’ का योगदान मुख्यतया 1920 क े बाद से अधि
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डा, ॅ. स्मिता खानवलकर. "भारतीय फिल्म संगीत म ें रसानुक ूल रंग-स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889265.

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Abstract:
मानव-सभ्यता क े साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ। चा ैसठ कलाओं में संगीत-कला, चित्र-कला आ ैर काव्य-कला विषेष महत्व रखती हैं। इनमें भी संगीत-कला अधिक प ्रभाव डालने वाली कला है। मनुष्य के हृदय में सुप्त भावा ें को जागृत करने में संगीत जितना सक्षम ह ै, उतनी आ ैर कोई विद्या नहीं। जो भाव चित्र क े माध्यम से व्यक्त नहीं किये जा सकते, उन्ह ें काव्य या भाषा क े माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता ह ैं आ ैर जिन भावों का े व्यक्त करने में भाषा भी असमर्थ रहती ह ै, उन्ह ें संगीत सहज ही व्यक्त कर देता ह ै।।शाॅप ेन हाॅवर का कहना है - ’’क ेवल संगीत ही ऐसी कला है, जो श्रोताआ ें से सीधा संबंध रखती ह ै। इसे किसी भी माध्
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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डा, ॅ. नीरज राव. "स ंगीत क े प्रचार-प्रसार म ें स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.886994.

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Abstract:
मनुष्य को आदिकाल से ही संगीत मना ेरंजन एव ं आमोद-प्रमोद का साधन रहा ह ै। आदिकाल से ही मानव ने अपने मना ेरंजन क े साधन क े लिये विभिन्न प्रकार क े प ्रया ेग किये जैसे-जैसे मानव अपनी सभ्यता का विकास करता गया व ैसे-व ैसे उसकी समझ आ ैर सूझ-बूझ ने नृत्य, गायन आ ैर वादन की ओर आकर्षि त किया। मानव ने सभ्यता और संस्कृति को समझकर अपने का े प ्रकृति क े साथ तालमेल करते ह ुए संगीत का े सीखा। हमारे पा ैराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख ह ै कि माँ पार्वती की गायन मुद्रा को देखकर भगवान षंकर ने क्रमषः पाँच राग हिंडा ेल, दीपक, श्री, मेघ, का ैषिक आदि रागों की रचना की एवं संगीत की उत्पत्ति भगवान षिव क े ताण्
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श्रीमती, भारती पहाड़िया. "प्रकृति एव ं र ंग (पर्यावरण के सन्दर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890583.

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Abstract:
असंख्य पहाड़, प ेड़, नदिया ं, झीलें, फ ूल-पत्तियां, पश ु-पक्षी अथवा मानव मात्र इस प्रकृति के अ ंग ह ै। मानव ने अपनी सा ैन्दर्या नुभूति का े कला के माध्यम से व्यक्त किया ह ै। रवीन्द्रनाथ टैगा ेर क े अनुसार - “ कलाकार प्रकृति प े्रमी ह ै। अतः उसका दास भी ह ै आ ैर प ्रेमी भी। ” कलाकार प ्रकृति में व्याप्त रंगतों का े एव ं उनक े प ्रभाव को फलक पर उतारते ह ैं, अमूर्त अभिव्यंजनावादी वस्तु का सूक्ष्म अध्ययन का उसक े प ्रभावों का तूलिकाघातों क े व ैविध्य से प ्रभावपूर्ण बनाते ह ै ं। इस प्रकार रंगा ें क े आकर्ष ण से चित्र आ ैर जीवन सजीव हो उठते ह ै ं। मानव जीवन में रंग का महत्वप ूर्ण स्थान है। रंगा े ं
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प, ्रो. सुनीता जैन. "महान संगीतज्ञ तानस ेन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886067.

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Abstract:
तानस ेन एक महान संगीतज्ञ थे। अब ुल फजल बादशाह अकबर क े उदार संरक्षण में विभिन्न संगीतज्ञा ें क े हा ेने का वर्ण न करता ह ै, उनमें वह पहला स्थान संगीत सम्राट तानस ेन का े प ्रदान करता ह ै।। तानसेन उस युग क े सर्व श्र ेष्ठ प ्रतिभावान संगीतज्ञ थ े। तानस ेन की प्रशंसा करते ह ुए अब ुल फजल ने लिखा ह ै ’’ भारत में उसक े समान गायक एक सहस्त्र वर्षो से नहीं ह ुआ’’ तानस ेन का जन्म 1531-32 में ग्वालियर से लगभग 43 किला ेमीटर दूर ब ेहट ग्राम में एक गा ैड़ ब ्राम्हण परिवार में ह ुआ था। इनका प ्रारंभिक नाम त्रिलोचन पांडे था, बाल्यकाल से ही उन्ह ें संगीत में विशेष अभिरूचि थी। ग्वालियर के नरेश मानसिंह तोमर ने
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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डा, ॅ0 अभिलाशा चैधरी. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889276.

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Abstract:
आ ैर मन का घनिश्ठ सम्बन्ध ह ै, ये तो हम सभी जानते ह ै। स्वस्थ मन स्वथ्य षरीर शरीर आ ैर स्वस्थ्य षरीर ही निर्वि कार मन का वरण करता ह ै। रंग, मन आ ैर आत्मा की आ ैशधि है और इसीलिये वह विभिन्न षारीरिक मानसिक रोगा ें का प ्रतिरोध करने की क्षमता रखती है। मनुष्य के जीवन में रंगा ें का महत्वपूर्ण स्थान ह ै। वर्ण पूर्ण तः प्रकाष व दृश्टि पर निर्भर तत्व ह ै। एक की भी अनुपस्थिति रंग क े ज्ञान में बाधक सिद्ध हा ेती है। प ्रत्येक वस्तु का कोई न कोई रंग अवष्य होता ह ै आ ैर मूलतः वस्तुओं की पहचान उनके धरातलीय रंग क े कारण ही होती ह ै तथा प्रकाष की मात्रा क े कम या अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तु अलग-अलग दि
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सृष्टि, जैन. "सचित्र जैन पाण्डुलिपियों म ें र ंग की भ ूमिका (आदिपुराण क े सन्दर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890551.

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Abstract:
्रथम- पिचुमंद नामक झाड़ी का गा ेंद आ ैर ब ेल को तिल के तेल में जलाकर काजल बनाया जाय तत्पश्चात् उसे लाख के जल के साथ लोहे क े बर्तन में भली भाँति भृ ंगराज तथा भल्लात्तक के रस क े साथ घोंटने पर स्याही बनती ह ै। द्वितीय- काजल की आधी मात्रा में गा ेंद तथा गोंद की आधी मात्रा में बेल लेकर ताँब े के बर्तन में लाख के रस क े साथ घा ेंटें। तृतीय- ब ेल तथा उसस े दा े गुना गा ेंद से दा े गुना काजल लेकर (लगभग) 6 घण्टा ें तक घा ेंटन े पर व ्रज के समान पक्की स्याही बन जाती है इसप ्रकार आदिपुराण में लिखने के लिये स्याही का प्रया ेग ह ुआ है। आदिपुराण के चित्रा ें में से कुछ चित्रा ें के माध्यम से मैने रंगा ें
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उसर ेठ, राम क. ुमार. "बैगा जनजाति की वनोपज संग्रह की स्थिति का अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 44–46. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20216.

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Abstract:
ैगा जनजाति एक आदिम जनजाति ह ै। जा े सदा स े ही वना ें क े मध्य निवास करती आयी ह ै। वन ही इनक े जीवन का प ्रम ुख आधार रह े ह ै। इस जनजाति क े सामाजिक, सा ंस्कृतिक, धार्मि क एव ं आर्थि क पक्ष वना ें पर ही निर्भ र रह े ह ै। वर्त मान म ें वना ें क े राष्ट ªीय उद्यान एव ं वन विभाग क े निय ंत्रण म ें आ जान े स े इस जनजाति क े र्कइ परिवारा ें का े वन क्ष ेत्र स े बाहर विस्थापित किया गया ह ै। र्कइ क्ष ेत्रा ें म ें वना ें क े अधिक कटाव एव ं द ूसर े क्ष ेत्रा ें क े ला ेगा ें का लगातार इन क्ष ेत्रा ें म ें आकर बसन े स े ब ैगा जनजाति की वना ें पर निर्भ रता प ्रभावित र्ह ुइ ह ै। ब ैगा जनजाति क े आर्थि क
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मंज, ू. गा ैतम. "र ंग आ ैर राग का समन्वयः काँगड़ा चित्रा ें क े संदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889215.

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Abstract:
काँगड़ा चित्रकला में संगीत व चित्रकला का अद्भूत समन्वय संसार भर की कलाआंे मंे एक अद्वितीय उपलब्धि ह ै यही कारण ह ै कि काँगड़ा चित्रकला का े कला विद्वाना ें ने समस्त पहाड़ी चित्रकला का पर्याय भी माना है। काँगड़ा चित्रश ैली में निर्मित चित्रो की रंग या ेजना अनूठी ह ै ए ेसा प्रतीत होता ह ै कि काँगड़ा का समस्त प ्रकृति सा ैन्दर्य कलाकार ने रंग व रेखाओं क े माध्यम स े चित्रा ें में भर दिया। विषया ें की विविधता इस श ैली का गुण ह ै। यहाँ क े कलाकार ने साहित्य एव ं काव्य के साथ संगीत की अमूर्त, तथा ध्वन्यात्मक विषय वस्तु का े भी रंग एव ं रेखाओं द्वारा साकार रूप प ्रदान किया जो कि विश्व की किसी अन्य कल
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आभा, दीक्षित. "'अक्षय उर्जा' का उपयोग आर्थिक विकास और पर्यावरण विकास दोना ें क े लिए आवष्यक". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.580642.

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Abstract:
आधारभ ूत संरचना क े बिना र्कोइ भी अर्थव्यवस्था विकसित नही हो सकती ह ै। उर्जा एक महत्वप ूर्ण आधारभूत संरचना ह ै, जा े विकास का े गति प्रदान करता है, क्योकि सभी क्षेत्रों कृषि, उद्या ेग, परिवहन आदि में उर्जा संसाधनों की आवष्यकता पड ़ती ह ै। यहाॅ तक कि किसी द ेश क े आर्थिक विकास का अन ुमान उस द ेश में उर्जा-संसाधनों की प ्रति व्यक्ति खपत से लगाया जाता ह ै आ ैर माना जाता ह ै कि जिस द ेष में उर्जा की प्रति व्यक्ति खपत जितनी अधिक होगी उस द ेष म ें प ्रति व्यक्ति आय भी उतनी ही अधिक होगी । भारत में विश्व की 16 प ्रतिषत जनसंख्या निवास करती है। ल ेकिन यहाॅ पर कुल विश्व खपत की 1.5 प ्रतिशत उर्जा ही खर्च
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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पाण्ड ेय, ऋषिराज. "रायप ुर जिल े म ें जन च ेतना का विकास". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 50–53. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20198.

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Abstract:
भारत म ें अ ंग ्रेजा ें क े विरूद्ध स्वत ंत्रता स ंग ्राम क े रूप म ें सन ् 1857 म ें सव र्प ्रथम प ्रबल क्रा ंति ह ुइ र्। छत्तीसगढ ़ अ ंचल क े रायप ुर जिल े क े सा ेनाखान जमीदारा ें क े जमी ंदार नारायण सि ंह द्वारा क्रा ंति का बिग ुल फ ूंका गया, उनकी फा ंसी क े बाद स ैन्य विद ्रा ेह का न ेतष्त्व हन ुमान सि ंह द्वारा किया गया। सन ् 1885 म ें का ंग ्रेस की स्थापना ह ुइ र्, अ ंचल म ें राष्ट ्रीय च ेतना क े विकास म ें इसका भरप ूर या ेगदान रहा। साथ ही आय र् समाज, मालिनी रीडस र् क्लब, छत्तीसगढ ़ बाल समाज, कवि समाज की स्थापना जनच ेतना क े विकास की दष्ष्टि स े उल्ल ेखनीय ह ै। प ं. स ुन्दरलाल शमा र् न
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या, ेगेन्द्र सिंह नरूका फ. ूलैता. "वशेष बालका ें की कला म ें र ंग संया ेजनः- एक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889271.

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Abstract:
वषेष बालका ें (मानसिक,विकलंाग,मूक-बधिर,अंध) से कला सृजनकार्य करवाना अपने आप में एक चुनौती प ूर्ण कार्य है। उनमें रंगा ें की समझ प ैदा करना, उनक े सार्थ क उपयोग का े समझाना आ ैर फिर उसे सृजनात्मकता की ओर अग्रसर करना श्रम साध्य कार्य है। विषेष बालकों क े रंग संया ेजन का े समझने क े लिए सर्व प्रथम उन्ह े ं रंग, कैनवास आ ैर ब्रष क े साथ कुछ चित्रित करने क े लिए अक ेले छा ेड़ देना चाहिए। क ुछ समय बाद उनके रंग-संया ेजन का े दृष्टिगत करना चाहिए। रंगा ें से विष ेष बालकों की मानसिक भावनाओं आ ैर संवेगा ें का े समझा जा सकता है। पीले व ब ैंगनी रंग का अधिक उपयोग करन े वाले बालकों में प ्रफ ुल्लता और ख ुषी
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तिवारी, रोली, та चित्रल ेखा वमा. "व्हाट्सएप पर साझा की जाने वाली शैक्षणिक जानकारियो की प्रकृति का अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 23–30. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20213.

Full text
Abstract:
प्रस्त ुत अध्ययन म ें ”व्हाट ्सएप पर साझा की जान े वाली श ैक्षणिक जानकारिया े ं की प्रक ृति का अध्ययन छात्राध्यापका ें क े विश ेष स ंदर्भ म ें” किया गया। क ुल 200 छात्राध्यापकों (100 प ुरूष छात्राध्यापक ए ंव 100 महिला छात्राध्यापिकाआ े ं) का चयन सा ेद्द ेश्य न्यादश र् विधि द्वारा किया गया। शा ेध उपकरण क े रूप में आकड ़ें संग ्रहण करने क े लिय े स्मा र्टफोन म ें प्रय ुक्त व्हाट ्सएप म ैस े ंजर क े माध्यम स े स्क्रीनशा ॅट, छवि (इम ेज) प्रक्रिया का े लिया गया। सा ंख्यिकी विश्ल ेषण ह ेत ु प्रतिशत द्वारा परिकल्पनाओ ं की साथ र्कता की जा ंच की गयी। निष्कष र् म े ं यह पाया गया कि छात्राध्यापका े ं द्व
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मुक, ुन्द कुमार. "वस्त्र अलंकरण म ें र ंगा ें की पुरातन भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888816.

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Abstract:
रंग वस्त्र आकल्पन (अलंकरण) का मूलाधार है। वस्त्र्ा के अनुरूप रंग द्रव्य¨ ं ;कलमेद्ध का चयन आ ैर उनक े प्रय¨ग की तकनीक, कलाकार अथवा रंगरेज के निजी दृष्टिक¨ण एवं उनक े अनुभव पर आधारित ह¨ती है। रंग¨ ं का, व्यक्ति की मन¨भावनाअ¨ ं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं पहल ुअ¨ं का अध्ययन करके वस्त्र्ा¨ं क े विविध प्रकार क े अनुसार रंगद्रव्य का सफलताप ूर्वक प्रय¨ग किया जाता ह ै। वस्त्र्ा रंर्गाइ की कला अतिप्राचीन ह ै। भारतवर्ष में र्कइ ऐसे प्रमाण मिलते ह ैं जिनमें वस्त्र्ा ब ुर्नाइ एवं वस्त्र्ा-रंर्गाइ के विषय र्में इ सा प ूर्व एवं उत्तरार्ध में मनुष्य¨ ं क¨ ज्ञान था। वस्त्र्ा ब ुनाई अ©र रंर्गाइ के इतिहास
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विजय, कुमार. "मध्यप्रद ेश के जनजातियों क े जीवन में र ंगा ें का महत्त्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889310.

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Abstract:
रंग सदैव उत्साहवर्धन करते हैं, रंगा ें का प ्राकृतिक गुण ही प्रकाश की किरण ें होती ह ैं, जो अपनी तरंगदैध्र्य से प ्रकृति में व्याप्त जीवा ें और प्राणिया ें क े अन्तर्मन क े क ंपन का े ऊर्जा में परिवर्तित करती है। रंग-स्वाद हीन होते ह ै ं, फिर भी प्राणी अपने अनुभव से रंग-स्वाद की अनुभूति करता है। जिसका प्रभाव उसके जीवन में महत्त्वप ूर्ण भूमिका निभाते ह ैं। जीवन, मनुष्य को अपने कर्म क े अनुसार जीने की कला भी प ्रदान करता है, कर्म का सीधा सम्पर्क कला से है। कला का े मनुष्य क े जीवन क े रूप में परिभाषित करें ता े यह तथ्य आता है, जो गतिमान हो आ ैर मानसिक रूप से उद्वेलित करें। मनुष्य शारीरिक रूप से
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डा, ॅ. अनुराधा अवस्थी. "तनाव प्रब ंधन म ें स ंगीत की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886839.

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Abstract:
तनाव का अर्थ मनुष्य के मन आ ैर मस्तिष्क की उस दशा से ह ैं जिसमें वह अपने विचारों में किसी दबाव और बेचैनी का अनुभव करता ह ै यह ब ेचैनी उसक े शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डालती ह ै तनाव की स्थिति ऐसे हार्मोन का स्तर बढ़ा देती है जिससे धड़कन तेज हो जाती ह ै, रक्तचाप बढ़ने लगता ह ै और विभिन्न व्यक्तिया ें में विभिन्न लक्षण देख े जाते है। तनाव प ्रबंधन का अर्थ कुछ ऐसी मनेाव ैज्ञानिक आ ैर शारीरिक क्रियाआंे की प ्रणाली विकसित करने से ह ै जिन्ह े ं सीख कर मनुष्य क े शरीर आ ैर मन पर पडने वाले दुष्प ्रभावा ें को कम किया जा सकता ह ै। रिचर्ड लज़ारस तथा सुसैन फोक मेन के अनुसार जब मनुष्य के पास किसी लक्ष्य तक पह
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प, ्रो. सुनीता जैन. "चित्रकला म ें र ंग - प्रागैतिहासिक काल मध्यप्रद ेश के विश ेष संदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889223.

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Abstract:
चित्रकला का े अभिव्यक्तिगत सार्म थ्य प ्रदान करने वाले तत्वों में रंग प ्रमुख ह ै। चित्रकला में रंग की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका है। चित्रकार जिस आधारभूत सतह पर चित्रा ंकन करता है उसमें रंग उसकी पर्या प्त सहायता करते हैं इन्हीं क े आधार पर कलाकृति मानसिक सन्तुष्टि प्रदान करती ह ै। रंग का आधार पाकर बर्नाइ र्गइ रचना अपने अभिष्ट को पाने में समर्थ हा ेती है। रंग के माध्यम से चित्रकार अपनी कृति का े कोमल बनाता ह ै। चित्रकार का बिम्ब-विधान चित्र सुलभ संव ेदनशीलता बह ुत कुछ रंग पर निर्भर करती है। रंग का प ्रया ेग जितना संगीत पूर्ण , उचित आ ैर सन्तुलित होगा मानव के मानस पटल पर उसका प ्रभाव उतना ही गहर
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वीणा, अत्र े. "पर्यावरण प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता दुष्प्रभाव: एक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.803454.

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Abstract:
पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य का अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध है। आज औद्योगीकरण के दौर मे ं पर्यावरण ही द ूषित है तो स्वच्छ भोजन पानी एव ं वायु की कल्पना क ैसे ही जा सकती है। इसके फलस्वरूप मन ुष्य में अन ेक रोगा े ं का जन्म होता है। पर्यावरण क े म ुख्य तत्व भूमि, जल, वायु, वनस्पति एवं प्राणी सम ूह है। जल एव ं स्वास्थ्य: कल कारखाना ें का द ूषित जल नदी नालों म ें मिलकर अत्यधिक जल प्रद ूषित करता ह ै। प्रद ूषित जल पीन े से त्वचा रा ेग, पोलियो, पीलिया, टाईफाईड, बुखार, प ेचिस, अतिसार, कृमि ल ेप्टा ेस्पाईस, कंेसर, द ंतक्षय, फ्लूओरोसिस, गर्भपात, मंद विकास जैसी बीमारियों का े जन्म द ेत े हैं। प ेयजल में क्लोराइड
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एडलिन, अब ्राहम. "अला ैकिक अनुभवों का चित ेरा - साजन कुरियन मैथ्यू". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.893178.

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Abstract:
रंगा ें से ख ेलने वाले कलाकार साजन कुरियन मैथ्यू क¨ रंगा ें की कला यात्रा लिखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।साजन कुरियन मैथ्यू क े प्रारम्भिक दौर के चित्रा ें में राजा रवि वर्मा, पाश्चात्य कलाकार डेलाक्रा, माइकल कैरीव ैग्या े ए ंजेला े, सल्वाडा ेर डाली, विस्टलर, आदि यूरा ेपीय चित्रकारों की श ैली से प्रभावित होकर यर्था थवादी आ ैर अतियर्थाथवादी चित्रण हुआर्। इ सा क े जीवन पर आधारित उनक े तैल चित्र (जा े वर्तमान में जबलपुर, केरल, सिहोरा, शहडा ेल,आ ैर दिल्ली, के गिरजाघरो ं में शा ेभायमान हंै,) मंे मानवीय अ ंग विन्यास, प ृष्ठ भूमि, वातावरण आदि में अत्यधिक बारीकी से रंगा े का प्रया ेग कर वास्तविकता का साक
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सन्ता, ेष कुमार यादव. "मुगल कालीन चित्रकला (रेखा, र ंग आ ैर अलंकरण के सन्दर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889286.

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Abstract:
मुगल कालीन कला मे भारतीय कला के प्रभाव का जो पहला गुण दिर्खाइ देता ह ै वह ह ै रेखा। किसी भी चित्र का वाहय शरीर रेखा होती है। वह चित्र को वाहरी आकार प ्रदान करने मे अपनी महत्वप ूर्ण भूमिका निभाती है। साधारणतया दो बिन्दुओं को मिलाने से रेखा का निर्माण होता ह ै परन्तु चित्रकला मे का ेमल, लोचदार, लयबद्ध आ ैर लचीली रेखाओं की आवश्यकता पर जा ेर दिया जाता ह ै। जिसके अलग अलग प ्रयोगा ें से चित्राधार पर अनेक प्रकार के आकार उभरते ह ै। इन रेखाओं क े विभिन्न तरह क े प ्रयोगा ें से मुगल कलाकारों ने पर्व त, बृ क्ष, पुष्प और मानव आकृतियों की रचना की ह ै। रेखा से आकृति मे गति व प ्रवाह दिखता है। ये रेखाए ं गा
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डा, ॅ. सुचित्रा हरमलकर. "न ृत्य संया ेजन की कला - का ेरियोग्राफी". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.887018.

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Abstract:
का ेरिया ेग्राफी का शाब्दिक अर्थ ह ै क्ंदबम ूतपजपदह यह ग्रीक भाषा के शब्द गवचमपं से लिया गया ह ै। कोरिया ेग्राफी का सामान्य अर्थ है- समूह स ंरचना, आ ैर जा े व्यक्ति, नर्तक या कलाकार इस कार्य को करता ह ै, उसे का ेरिया ेग्राफर कहा जाता है का ेरिया ेग्राफी के विषय मंे का ेई शास्त्र सम्मत विधान या जानकारी हमें प ्राप्त नहीं हा ेती किन्तु आज नृत्य क े संदर्भ में यह शब्द बह ुप ्रचलित ह ै। नृत्य का इतिहास उतना ही प्राचीन ह ै जितना मानव जीवन का इतिहास। मानव जीवन की दैनंदिन क्रियाकलापो ं में ख ुशी के अवसरों ने लोक नृत्यांे का े जन्म दिया। ये लोक नृत्य हमेशा समूहा ें में ही किये जाते थे। इन नृत्यों क े
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डिम्पल, गुप्ता. "विज्ञापन क े र ंगा े ं का समाज पर प ्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888847.

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Abstract:
वस्तुआ ें क े धरातल में रंग हा ेने क े कारण ही वह हमें दिखाई देती है। धरातलों पर प्रकाश की मात्रा कम व अधिक होने से एक ही रंग की वस्तुएँ अलग-अलग दिर्खाइ देती है। यह विविध रंग हमें सूर्य के द्वारा ही सब वस्तुओं को प ्राप्त होता है। स ूर्य की किरणों में सात प ्रकार के रंग हा ेते है। और उन्हीं के द्वारा ही आकश में इन्द्रधनुष बनता है। रंग एक शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक आ ैजार है। हर रंग अलग-अलग प ्रभाव छा ेड़ता ह ै। रंगा ें का समाज पर बह ुत प्रभाव पड़ता ह ै यदि मानवीय जीवन आ ैर प्रकृति से रंग निकाल दिया जाय तो इस धरती पर सब सूना-सूना नीरस सा लगने लगेगा रंगा ें के प्रति हर व्यक्ति की भावनाएँ अलग-अलग हा
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डा, ॅं. नरेन्द्र कुमार ओझा. "र ंगा ें का सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन पर प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.891778.

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Abstract:
रंगा ें का मानवीय जीवन क े साथ निकट का सम्बन्ध ह ै। रंगा ें क े बिना मानवीय जीवन अध ुरा है, रंगा ें का मानव के सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक, जीवन पर प ्रभाव पड़ता ह ै, रंग र्कइ प्रकार क े हा ेते ह ै जैसे पीला, लाल, हरा, ब ैंगनी, नीला, काला, श्वेत आदि हर प्रकार के रंग का अपना विशिष्ट महत्व है आ ैर इसकी अपनी विशिष्ट पहचान ह ै, जैसे लाल रंग उत्तेजक एवं आकर्षक होता ह ै, यह अत्यन्त ही सक्रिय एवं आक्रामक हा ेता है, इसक े द्वारा क्रोध, साहस, वीरता, श्रृ ंगारिकता प ्रकट हा ेती ह ै, महिलाओं में यह अत्यंत ही लोकप्रिय होता ह ै, महिलायें त्या ैहारा ें पर ईश्वर की आराधना के समय लाल रंग की साड़ियाॅं पहनना ही ज्
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प, ्रो. किन्श ुक श्रीवास्तव, та ड्योंडी रश्मि. "ला ेक संगीत में झलकता समाज का प्रतिबिम्ब". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886960.

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Abstract:
मानव समाज में संस्कृति पायी जाती ह ै। यह संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती ह ै। इसी कारण प ्रत्येक समाज की संस्कृति जीवित रहती ह ै। प ्रत्येक समाज की स ंस्कृति भाषा, प्रथा, ज्ञान, परम्पराएँ, धर्म, कानून, संगीत, लोक कला, लोक-संगीत, लोक-कथाएँ, साहित्य आदि में निहित होती ह ैं। समाज में मनुष्य की पारस्परिक अन्तः क्रियाएँ एक-दूसरे का े प ्रभावित करती है तथा इन्हीं क्रियाआ ें क े आधार पर ही सांस्कृतिक समाज बनता ह ै। अतः समाज का दर्प ण ला ेक संस्कृति में ही निहित ह ै। ‘‘संस्कृति की परम्परा में संगीत सबसे अधिक लोकप्रिय ह ै। लोक संगीत संस्कृति की विशाल विभूति ह ै। समाज के जनसाधा
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र, ंजना शर्मा (व्यास). "्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक, औषधीय मूल्य". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883545.

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Abstract:
विश्व प्रकृति निधि भारत का हमेशा ही यह उद ्द ेश्य रहा है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण क े साथ दीर्घकालिक तथा न्याय संगत विकास करन े में सहभागी बन ें।1 जब तक हमार े पर्यावरण में बाह्य पदार्थ आकर मिलत े ह ैं संद ृषण होता ह ै। प ्रारम्भ में यह अल्प मात्रा में हा ेता है, जिससे एक स्तर तक मन ुष्य को कोई हानि नहीं पहुँचती तब तक यह संद ूषण की श्रेणी मे ं, ल ेकिन जैस े ही इस सीमा का उल्ल ंघन होता है तो यह द ूषण संद ूषण न रहकर प ्रद ूषण बन जाता है। हिन्द ू धर्म ग्रन्थ ‘‘वाराह पुराण’’ में लिखा है कि वृक्षो ं के उपकार पाँच महायज्ञ है ं। व े ग्रहस्थों को ईंधन पथिका ें को छाया तथा विश्राम, पक्षिया ें
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रान, ू. उपाध्याय. "प्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883012.

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Abstract:
भारतवर्ष में प ्राचीन शास्त्रों, व ेद-पुराणों मे ं, धर्म ग्रन्थो में तथा ऋषि-मुनियों न े पर्या वरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया है । व ेदों में प ्रकृति प ्रदत्त पर्या वरण को द ेवता मानकर कहा गया है कि- ‘‘या े द ेवा ेग्नों या े प्सु चो विष्वं भ ुव नमा विव ेष, यो औषधिष ु, या े वनस्पतिषु तस्म ें द ेवाय नमो नमः’’ अर्था त जा े स ृष्टि, अग्नि, जल, आकाष, प ृथ्वी, और वाय ु से आच्छादित ह ै तथा जो औषधियों एव ं वनस्पतिया ें में विद्यमान ह ै । उस पर्यावरण द ेव को हम नमस्कार करत े है । प्रकृति मानव पर अत्यंत उदार रही ह ै । पृथ्वी पर अपन े उद्वव के बाद से ही मानव अपन े अस्तित्व के लिय े प्रकृति पर निर्भर रहा
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डा, ॅ. पि ्रयंका व. ैद्य. "न ृत्यकला में र ंगा ें का समन्वय". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889278.

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Abstract:
सृष्टि में सभी पदार्थ चर, अचर, प ्रकृति पा ैध े, पुष्प सभी रंगा ें से सराबोर ह ैं। यह सारी सृष्टि रंगा ें में डूबी र्ह ुइ है। प्रत्येक वस्तु का अपना अलग रंग ह ै। हर फूल, पा ैधा पल्लवित होने से लेकर मुरझााने तक र्कइ रंग व आकार में दिखाई देता ह ै। हर वस्तु का स्वरूप, रंग व आकार हमें रंगा ें का हमारे जीवन में महत्व को दर्षा ता ह ै। कहते ह ै ं ”नृत्यमयं जगत्“ अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् नृत्यमय ह ै। इस प ्रकृति व रंगा ें से मनुष्य ने अपना जीवन को संवारा व इसके माध्यम से अपनी मना ेभावनायें व्यक्त की। पंछी से उड़ता, नाचता व गाना सीखा तो प्रकृति के रंगा ें से स्वयं का े सवांरना सीखा। कहते ह ैं एक पेड़ ज
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डाॅ., डाॅ.संगीता अग्रवाल. "चित्रक ृतियों म ें र ंगो का संयोजन (चित्रकार ''राजा रवि वर्मा'' के विश ेष संदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890533.

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Abstract:
चित्रण में रंगा े की ‘‘ स्प ्र ेस क्रिएटिंग प ्रापर्टी ’’ का े रचने वाले चित्रकार राजारविवर्मा का जन्म 29 अप ्रैल 184र्8 इ . में किलीमन्न ूर म ें ह ुआ। उनकी चित्रकला रूचि का े उनकी चित्रांकन रूचि उनके मामा राजवर्मा ने बढावा दिया। चित्रकला रूचि को देखकर उनके मामा अत्यंत प्रसन्नचित्त हुये आ ैर कहा कि ‘‘मनुष्य को केवल सिखा देने से कुछ नहीं आता। कुछ गुण उसमें प ैदाइशी हा ेते ह ैं। मैं तुझ े रंग बनाना सिखाऊॅंगा, पत्ते, फ ूल, रासायनिक दृव्य अनेक जाति और रंग की मिट्टी आदि से रंग तैयार हा ेते ह ै ं, लेकिन अपनी मर्जी का रंग ता े कलाकार का े ही खा ेजना पड़ता ह ै।’’1 विश ेषताय ें:-विशेष रूप से उन्हा ेने
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डा, ॅ0 नाजिमा इरफान. "भारतीय चित्रकला में र ंगा ें का या ेगदान (अब्दुर्रहमान चुगताई के विष ेष संदर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889177.

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Abstract:
मानव जीवन में वर्ण का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। प्रत्येक वस्तु का ेई न कोई रंग लिये हुए ह ै। रंगा ें क े प ्रति मानव का आकर्ष ण कभी घटा नही ह ै। इसीलिये आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य क े विकास में वर्ण का सहारा लिया ह ै। कमरे की रंग व्यवस्था से लेकर बाग बगीचा ें में फ ूल पौधों की रंगया ेजना तक में कलाकार ने अपना हस्तक्ष ेप किया ह ै क्योंकि रंगा ें का अपना एक प्रभाव हा ेता ह ै जो मानव की मानसिक भावनाओं का े उद्वेलित करने की शक्ति रखता ह ै। वर्ण सार्वभौमिक ह ै तथा चित्रकला में सबसे अधिक महत्व रंग का े दिया जाता है। रंगा ें क े विविध रुपों मे ं मन की भावनायें जुड़ी ह ै ं जैसे बसन्त क
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डा, ॅ. अनीता भाना. "भा ेजन क े प्राकृतिक रंगा े का मानव जीवन में महत्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890603.

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Abstract:
रंगा े क े बिना जीवन की कल्पना असंभव ह ै। जीवन को जीवन्त बनाने में रंगा े का अपना योगदान ह ै । नीला आसमान, धूसर धरती, रंग बिरंगे फल-फ ूल, पशु पक्षिया ें व हरे भरे पेडा ें द्वार्रा इ श्वर ने प्रकृति मे जा े रंग संया ेजन किया ह ै इसकी सुंदरता के आगे विज्ञान की प ्रगति व तकनीक की चकाचा ैंध फीकी ही ह ै। भा ेजन हर प्राणी की प्राथमिक आवश्यकता ह ै इसे भी प्रकृति नें लाल पीले नारंगी, नीले जामुनी हरे, काले जैसे विविध रंगा े से नवाजा ह ै आ ैर उसे अधिक सुंदर, ग्राहय तथा मनमोहक बनाया ह ै। पपीते व आम का पीला रंग,तरब ूज, चेरी का लाल रंग, पालक गिलकी का हरा रंग हा े या जामुन का जामुनी रंग ये न क ेवल भोजन को आ
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आलोक, गोयल किरण बड े़रिया राकेश कवच े. "विकास के लिए पर्या वरण क े क्षेत्र म ें मनुष्य की नैतिक भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574866.

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Abstract:
मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्त ुलन विकास मार्ग का सन्त ुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्त ुलन व्यक्ति ही नहीं समूच े समाज और मानव स ंसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण ह ै। स ुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मन ुष्य प्रक ृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रक ृति से उसका रिष्ता अहिंसक आ ैर आत्मीयता का था। स्वार्थ आ ैर भोग संस्क ृति के कारण अब यह न क ेवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’ मन ुष्य क े अन ैतिक आचरण से जहां पर्यावरण सहित लगभग सभी क्षेत्रों मंे पतन हुआ ह ै वहीं अच्छ े आचरण और सामाजिक स्वीकृति से किया जान े वाले व
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स, ुधा शाक्य. "वर्तमान पर्यावरणीय समस्याएं एव ं सुझाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883040.

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Abstract:
भारत में प ्राचीन काल से ही प्रकृति एव ं पर्यावरण का अट ूट संब ंध रहा है, और धार्मिक ग ्रंथा ें में प्रकृति को जा े स्थान प्राप्त है वह अत ुलनीय है। प्रक ृति की सुरक्षा के लिये हमारी संस्कृति में अन ेक प्रयास किये गये, सामान्य जन को प्रकृति से जोड ़े रखन े के लिये उसकी रक्षा, प ूजन, विधान, संस्कार आदि को धर्म से जोड ़ा गया। गा ै एव ं अन्य जानवरो ं का प ूजन व ंश रक्षा के लिये तथा विभिन्न नदियों, प ेड ़ों, पर्व तों का प ूजन उसकी सुरक्षा और अस्तित्व को बनान े क े लिये अति आवश्यक हा े गया था। पर ंत ु जैसे समय व्यतीत होता गया व्यक्तियों की विचारधारा, सोच, अभिव ृत्ति, आस्था, भावों में परिवर्त न होता
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क, े. राजलक्ष्मी. "चित्रकला म े र ंगा ें का सौन्दर्य". International Journal of Research – Granthaalayah Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890599.

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Abstract:
नीला आकाश, चारा ें तरफ फैली हरियाली रंग-बिरंगे फ ूल एवं सु ंदर-सु ंदर पश ु-पक्षी। ईश्वर की अद्भुत कृति एवं सु ंदर रंग संया ेजन। ऐसा प्रतीत होता ह ै कि मानो भगवान चित्रकार क े रूप में इस संसार रूपी कैनवास पर अपने रंगा ें एव ं रेखाओं क े माध्यम से एक सु ंदर चित्रण कर दिया ह ैं। अगर चित्रण में यदि रंगा ें का समावेश न हा े तो क्या तब भी तब भी यह संसार इतना ही सुंदर दिख ेगा? संभवतः नहीं। मनुष्य अपने नेत्रा ें क े माध्यम से जो कुछ भी देखता उनमें रंगा ें का समावेश होता ही ह ै, अतः यह कहना सर्व था गलत नही ं होगा कि जीवन में रंगा ें का स्थान सर्वोपरि है आ ैर यही रंग हमें अपने सा ैन्दर्य व आकर्ष ण के मा
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अ, ंजना जैन. "भारत म ें प ेयजल प्रद ुषण - मानव स्वास्थ्य के लिए एक चुना ैति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.883525.

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Abstract:
पृथ्वी का 2/3 भू-भाग जल स े घिरा ह ुआ है। पृथ्वी पर जल की मात्रा 1.4 मिलियन क्यूबिक मीटर आंकी गई है। जिसका 97.57ः भाग महासागरों में होन े के कारण खारा जल है। लगभग 36 क्यूबिक मीटर स्वच्छ जल जा े पीन े व उपयोग म ें ल ेन े योग्य है उसम ें स े लगभग 28 मिलियन क्यूबिक मीटर जल बर्फ के रूप म ें ध्रुवों पर जमा ह ै। हमार े वास्तविक उपया ेग के लिये उपलब्ध लगभग 8 मिलियन क्यूबिक मीटर जल पर द ूनिया के लगभग 6 अरब से ज्यादा की आबादी निर्भर है।’1 पीन े योग्य जल के स्त्रोत के रूप में नदियाँ, तालाब, कुए व नलकुप उपलब्ध है। और इनके जल का उपयोग भी हम उसी स्थिति म ें कर सकत े है। जब यह जल प्रद ुषण से मुक्त हो। शुध्द
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डा, ॅ. वसंुधरा पवार. "स ंगीत म ें नवाचार का इतिहास". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886069.

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Abstract:
भारतीय संगीत का इतिहास उतना ही प्राचीन आ ैर अनादि ह ैं, जितनी मानव जाति। इसका सभारंच व ैदिक माना जाता ह ै। जितनी प्राचीन हमारे देश की सभ्यता आ ैर संस्कृति है उतना ही विस्तृत एव ं विषाल यहाँ के संगीत का अतीत ह ै। भारतीय संगीत का उद्भव सामदेव की ऋचाओं से ह ुआ है तथा इसका शैषव काल ऋषि मुनियों की तपोभूमि तथा यज्ञवेदिया ें क े पावन घ्र ुम क े सान्निध्य में सुवासित हा ेकर व्यतीत ह ुआ। यही कारण है कि भारतीय मनीषियों ने नाद का े ईश्वर के समान कहा गया ह ै, तथा नाद ब्रह्य की सदैव उपासना की ह ै। “ न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरः। न नृŸां तस्मान्नादात्मकं जगत्।। ” न ता े नाद के बिना गीत है, न नाद क े
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उषा, कुमठ. "जलवायु परिवर्तन आ ैर भारतीय क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883553.

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Abstract:
भारतीय अर्थ व्यवस्था की आधारशिला कृषि है। कृषि एव ं जलवाय ु परिवर्त न का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प ्रभाव कमजा ेर कृषक पर पड ़ रहा है। वर्षा की मात्रा में परिवर्त न होन े से फसलो ं की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड ़ा है। जलवायु म ें होन े वाला परिवर्त न हमारी राष्ट ªीय आय का े भी प्रभावित कर रहा ह ै। द ेश के बहुत से भागो ं में अल्प वर्षा से फसलें सूख जाती है या अति-वृष्टि से बह जाती है जिसस े न केवल खाद्यानों का उत्पादन कम हुआ बल्कि उनकी कीमत े भी त ेजी से बढ ़ गई। जलवायु परिवर्त न से फसला ें की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं ह ुई बल्कि उसकी ग ुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड ़ा है। तापमान के बढ
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डाॅं, सीमा शर्मा एम. एल. बी. का ॅलेज इन्दौर. "चित्रकला म ें र ंग (विशेष स ंदर्भ अजन्ता)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890545.

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Abstract:
मानव जीवन में रंग का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वस्तु र्कोइ न का ेई रंग लिए ह ै। वस्तुआ ें के धरातल मे रंग हा ेने के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती ह ै। धरातला ें पर प ्रकाश की मात्रा कम अथवा अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तुयें अलग-अलग दिर्खाइ देती ह ैं। एक ही वस्तु बन्द कमरे में, धूप में तथा विभन्न ऋतुओं में अथवा विभिन्न स्थाना ें पर प ्रकाश की मात्रा तथा वातावरण के कारण रंग व्यवस्था की एक रंगत हा ेते ह ुये भी भिन्न दिखाई देगी। रंगा ें के प ्रति मानव का आकर्ष क कभी नहीं घटा ह ै क्या ेंकि रंग आकर्षक का एक माध्यम ह ै। इसलिये ता े आदिवासियों से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य के विकास में रं
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भारती, खर े., та कुमार अंजलि. "वानिकी एवं पर्या वरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574868.

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Abstract:
एक अरब स े ज्यादा जन सैलाब के साथ भारतीय पर्या वरण का े स ुरक्षित रखना एक कठिन कार्य ह ै वह भी जबकि हर व्यक्ति की आवश्यकताएॅ ं, साधन, शिक्षा एव ं जागरूकता के स्तर में असमान्य अंतर परिलक्षित होता है। संत ुलित पर्या वरण के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना करना मात्र एक कल्पना ही है। पर्यावरण स े खिलवाड ़ के परिणाम हम र्कइ रूप में वर्त मान में द ेख रहे हैं एव ं भोग रहे ह ैं। पर्यावरण विज्ञान आज के समय क े अन ुसार एक अनिवार्य विषय ह ै। यह सिर्फ हमारी ही नहीं अपित ु व ैश्विक समस्या ह ै। वर्त मान पर्यावरणीय अस ंत ुलन का े द ेखत े हुए इस विषय स े हर व्यक्ति का े जुड ़ना चाहिए एव ं जोड ़ना चाहिए। वानिकी एव
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अर्च, ना मेहरा. "बदलता पर्या वरण और मानव-व्यवहार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.838912.

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Abstract:
मानव और पर्या वरण के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रायः हम किसी बुर े कार्य के लिए व्यक्ति को दोष द ेत े ह ै किन्त ु सच्चाई यह है कि उसम ें पर्या वरण भी उतना ही दोषी होता ह ै, अतः पर्या वरण की क्षति के कारण आज मानव का अस्तित्व संकट में पड ़ गया है। अब पर्या वरण चेतना को जगाना अतिआवष्यक हा े गया ह ै क्योंकि पर्यावरण भौतिक रूप मे ं नहीं सामाजिक रूप मंे भी मानव समाज का े घेर े हुए है। किसी व्यक्ति के व्यवहार को द ेखकर उसके पर्या वरण का सहज अन ुमान लगाया जा सकता है। इसमें प्राकृतिक द ृष्य, वन उपवन, नदी, पर्वत, जीव जन्त ु के साथ-साथ जलवाय ु और जनसंख्या इन सबकी महत्वप ूर्ण भूमिका होती ह ै। इनमें जब भी अस
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