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Journal articles on the topic 'दर्शन'

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सोनी, राकेश. "शैवदर्शन भारतीय मेधा की चरमाभिव्यक्ति". Indiana Journal of Multidisciplinary Research 4, № 4 (2024): 4–14. https://doi.org/10.5281/zenodo.13348110.

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Abstract:
यदि विश्व में किसी ऐसे एक दर्शनशास्त्र की खोज की जाये जिसके आधार पर न केवल भारत के अपितु विश्व के समस्त दर्शनों की या तो तार्किक व्याख्या की जा सके या उन सभी दर्शनों का अपने भीतर अंतर्भाव कर सके। इतना ही नहीं उस दर्शन में ऐसी क्षमता हो की उसको आधार बनाकर भविष्य के नये दर्शनों को विकसित किए जाने की भरपूर संभावना हो तो निश्चित रूप से वह दर्शन शैवदर्शन ही हो सकता है। शैव दर्शन कई नामों से भी जाना जाता है जैसे - त्रिकदर्शन, कश्मीर शैवदर्शन, शैवाद्वैत दर्शन, प्रतिभिज्ञा दर्शन, आगम दर्शन, स्पंदन दर्शन, कुल दर्शन, क्रम दर्शन, त्रिपुर दर्शन, शाक्त दर्शन  आदि। वस्तुत: ये सभी नाम शैव दर्शन के ही वि
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Kumar Verma, Vijay. "शिक्षा व दर्शन: रविंद्रनाथ टैगोर के शिक्षा संबंधी विचारों की समकालीन प्रासंगिकता". RESEARCH EXPRESSION 6, № 9 (2023): 81–87. https://doi.org/10.61703/re10.

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Abstract:
शिक्षा व दर्शनः रविंद्रनाथ टैगोर के शिक्षा संबंधी विचारों की समकालीन प्रासंगिकता शैक्षिक दर्शन शिक्षा की एक व्यापक प्रणाली निमित्त करने में मदद करती है। समय के साथ शिक्षा पद्धति में विभिन्न परिवर्तन आए हैं। जहां एक ओर वर्तमान शिक्षा पद्धति नैतिक मूल्यों के संकट का सामना कर रही है, वहीं दूसरी ओर हम शैक्षिक संस्थान और उनके दैनिक कामकाज में शिक्षा द्वारा प्रस्तावित दार्शनिक आदर्शों के बीच के अंतराल को देख सकते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए हमें भारतीय राजनीतिक चिंतन के इतिहास में जाना होगा जहां विभिन्न विचारक जैसे महात्मा गांधी, रविंद्रनाथ टैगोर, श्री अरबिंदो, स्वामी विवेकानंद और जवाहरलाल नेहरू
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3

डाॅ0, श्रीमती हीना परवीन. "गाँधी-दर्शन की प्रासंगिकता". International Journal of Research - Granthaalayah 6, № 5 (2018): 73–77. https://doi.org/10.5281/zenodo.1255233.

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Abstract:
गाँधी-दर्शन के आधार तत्व सत्य, अहिंसा और प्र ेम हैं और इसी आधार पर राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक विचारों की बेल फल-फूल रही है। यही तीन तत्व प्रकाश, जल और वायु की भँाति सम्पूर्ण  गाँधी-दर्शन को पोषित व पल्लवित कर रहे हैं। प्रस्तुत आलेख द्वारा हम वर्तमान समाज में गाँधी-दर्शन की अनिवार्यता तथा प्रासंगिकता अवलोकन करेंगे।
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सुजन, मण्डल शोधार्थी मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र (संस्कृत) कश्मीर विश्वविद्यालय हजरतबल श्रीनगर जम्मू और कश्मीर. "सांख्यसम्मत कैवल्य में बुद्धि तत्त्व का भूमिका". Siddhanta's International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities 2, № 2 (2024): 1–14. https://doi.org/10.5281/zenodo.14062554.

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Abstract:
भारतीय दर्शन सम्प्रदायों में महर्षि कपिल प्रणीत सांख्य दर्शन को आदि दर्शन माना गया है। इस दर्शन को भारतीय शोध समाज के साथ-साथ पाश्चात्य शोध समाज में भी अभूतपूर्ण समादर मिला है। भारतीय सभी आस्तिक और नास्तिक दर्शनों का परम लक्ष्य ही है मोक्ष प्राप्त करना। सांख्य दर्शन के अनुसार त्रिविध दुःखों से ऐकान्तिक व आत्यन्तिक परित्राण पाना ही मोक्ष तथा कैवल्य है। अतः भारतीय अन्य दर्शनों की न्याय यह दर्शन भी तत्त्वज्ञान से कैवल्य प्राप्त करने का वर्णन करता है। क्या बुद्धि किसी व्यक्ति को कैवल्य प्राप्त करने में मदद कर सकती है? अगर यह उसे कैवल्य प्राप्त करने में मदद कर सकती है, तो कैसे? इस शोध पत्र का उद्दे
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Yadav, Jayant Kumar. "Study of Sāṅkhya Philosophy in the Eleventh Canto of Śrīmad Bhāgavatam". RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 10, № 1 (2025): 281–84. https://doi.org/10.31305/rrijm.2025.v10.n1.033.

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Abstract:
Sāṅkhya philosophy is an āstika (orthodox) school of Indian philosophy. It is believed to have been founded by Kapila Muni and is considered one of the most ancient philosophical systems. References to Sāṅkhya philosophy are clearly visible in India's oldest religious scriptures. Another name for Sāṅkhya philosophy is "Sāṅkhya Pravachana." It is also known as Niriśvara Sāṅkhya (atheistic Sāṅkhya) since Maharshi Kapila did not establish the concept of God in his teachings. The most authentic and ancient text of Sāṅkhya philosophy is Īśvarakṛta’s "Sāṅkhya Kārika." Additionally, works such as "Sā
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लम्साल, तिलकप्रसाद. "भाषिक दर्शनका आधारभूत पक्ष र निहित अन्तरवस्तु {Fundamental aspects and inherent content of language philosophy}". Triyuga Academic Journal 3, № 1 (2024): 243–59. https://doi.org/10.3126/taj.v3i1.71985.

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Abstract:
जीवन, जगत्​सम्बन्धी मान्छेका कौतूहल, आश्चर्य, जिज्ञासा र तर्कका आधारमा निराकरणका उपायसमेत पत्ता लगाउने चिन्तन वा दृष्टिकोणका रूपमा दर्शनलाई लिइन्छ । दर्शनका विविध प्रकारमध्ये भाषिक दर्शनमा आधारित प्रस्तुत अनुसन्धानको उद्देश्य भाषिक दर्शनको अवधारणा स्पष्ट पार्दै तिनका विविध पक्ष र अन्तर्वस्तुको निरूपण गर्नु रहेको छ । भाषिक दर्शनका विविध पक्ष र विशेषता छन् भन्नु प्रस्तुत अनुसन्धानको दाबी हो । प्रस्तुत अनुसन्धान गुणात्मक ढाँचा, उत्तरआधुनिक दर्शन र व्याख्यावादी पद्धतिमा आधारित छ । यसका लागि पुस्तकालयीय कार्यमा आधारित भई द्वितीयक स्रोतका सामग्री सङ्कलन गरी तिनको वर्णनात्मक र तुलनात्मक अध्ययन विधिका
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अञ्जु та सुभाष चन्द्र. "सांख्य-योग दर्शन परिभाषा डेटाबेस एवं ऑनलाइन खोज". RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 03, № 11 (2018): 890–94. https://doi.org/10.5281/zenodo.1934632.

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Abstract:
ऑनलाइन सांख्य-योग दर्शन परिभाषा डेटाबेस विकास एक शोध के रूप में प्रारम्भ किया गया जिसका उद्देश्य हिंदी माध्यम से सांख्य-योग दर्शन परिभाषा डेटाबेस एवं खोज सिस्टम का विकास करना है । क्योंकि सांख्य-योग दर्शन परिभाषा के लिये कोई भी ऑनलाइन डेटाबेस अभी तक उपलब्ध नही है । जिससे प्रयोगकर्ता ऑनलाइन पारिभाषिक शब्दों को खोज सकें । अभी तक इस डेटाबेस में सांख्य दर्शन के कुल 100 तथा योग के कुल 295 तकनीकी शब्दों को शामिल किया गया हैं । इनमें वृद्धि भी की जा रही है । इनका संकलन सांख्य एवं योग दर्शन के मूल एवं भाष्य ग्रन्थों के आधार पर किया गया है । यह सिस्टम http://cl.sanskrit.du.ac.in/SankhyaYoga पर ऑनलाइन उ
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Bi. Ka., Janak. "पूर्वीय दर्शनमा भौतिकवाद". Journal of Rapti Babai Campus 5, № 1 (2025): 187–98. https://doi.org/10.3126/jrbc.v5i1.78478.

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Abstract:
पूर्वीय दर्शन भनेर खास गरेर भारतीय दर्शनहरूलाई नै प्रचारमा लिने गरिएको पाइन्छ । तर त्यसो नभएर एसिया र अरब क्षेत्रमा हुर्किएका समग्र दर्शनहरू नै पूर्वीय दर्शनभित्र पर्दछन् । पूर्वीय दर्शनअन्तर्गत पर्ने भौतिकवादी र द्वन्द्ववादी दृष्टिकोण राख्ने दर्शनहरू नै पूर्वीय दर्शन भित्रका भौतिकवादी दर्शनहरू हुन् । यो शोधलेख पूर्वीयदर्शनमा भौतिकवादसँग सम्बन्धित रहेको छ । खास गरेर पूर्वीय दर्शनहरूभित्र पर्ने दर्शनहरूमा भौतिकवादी दृष्टिकोणहरू कहाँ कहाँ छन् भनी खोजी गर्नु प्रस्तुत लेखको उद्देश्य रहेको छ । यो शोधलेख निगमन विधिमाआधारित छ । यसमा पूर्वीय दर्शनभित्र भौतिकवादको विषयमा प्रस्तुत गरिएको सन्दर्भसामग्रीक
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Abhishek. "सांख्य दर्शन के द्वैतवाद का दार्शनिक परीक्षण". Original source 19 (14 лютого 2018): 15–18. https://doi.org/10.5281/zenodo.10427137.

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Abstract:
मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है। जब से भी सृष्टि क्रम में इसका प्रादुर्भाव हुआ है तब से निरन्तर चिन्तन के माध्यम से विकास को प्राप्त कर रहा है। प्राचीन समय में मनुष्य जगत के सभी कार्यों से विस्मृत था चाहे वो तारे का टूट के गिरना, नदी का बहना, हवा का चलना, आग का जलना, वृक्षों का होना इत्यादि। समस्त विश्व में अपनी चिन्तन प्रणाली के अनुसार जगत के मूल भूत तत्वों की खोज करने का प्रयास किया गया। भारतीय दर्शन ने भी अपने वैदिक व अवैदिक दर्शन प्रणाली के माध्यम से इसका समाधान प्रस्तुत किया। वैदिक दर्शन में सांख्य दर्शन का प्रकृति विकास एक ऐसा ही प्राचीनतम् उत्तर है। जो प्राचीन आचार्यों के गम्भीरता का बोध क
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उपाध्याय, धनकृष्ण. "पौरस्त्य चिन्तनमा न्याय दर्शन". Journal of Tikapur Multiple Campus 3, № 3 (2017): 88–95. http://dx.doi.org/10.3126/jotmc.v3i3.70104.

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Abstract:
पौरस्त्य चिन्तन परम्परामा दार्शनिक पक्षको पउल रहको छ । दशर्न भनेको संसारबारे प्रस्तुत दृष्टिकोण हो । बह्माण्डको उत्पत्ति ईश्वर, जीव, आत्मा आदिबारे दर्शनमा गहन रूपमा विश्लेषण गरिएको हुन्छ । पौरस्त्य दर्शन भन्नाले आर्यवर्तअन्तर्गत तपोवन र ऋषिमुनिको चिन्तन मननलाई बुझिन्छ । खास गरेर पौर स्त्य दार्शि नक चिन्तन मूलतः आध्यात्मिक नैतिक तथा धार्मिक पक्षमा आधारित रहको छ । यो आस्तिक रहे पनि चार्वाक दर्शन जस्तो पूणर्तः भौतिकवादी, अनीश्वरवादी र नास्तिक दर्शनको पनि उच्च स्थान रहेको पाइन्छ । खास गरेर षडदर्शनलाई पौरस्त्य वा पर्वूीय दशर्न मा महत्त्वपूर्ण स्थान रहको छ । यिनै षड्दर्शन अन्तर्गत पहिलो दर्शनका रूपम
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कुमारी, डाॅ प्रतिमा. "सर्वोदय दर्शन: एक समीक्षा". International Journal of Advanced Academic Studies 1, № 1 (2019): 181–85. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2019.v1.i1a.381.

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Sharma, Balkrishna. "वीरहरू निबन्धमा पौरस्त्य दर्शन". Journal of Development Review 8, № 1 (2023): 85–98. http://dx.doi.org/10.3126/jdr.v8i1.57144.

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Abstract:
प्रस्तुत आलेख पौरस्त्य दर्शनको प्रभावका दृष्टिले वीरहरू निबन्ध शीर्षकमा केन्द्रित भई तयार पारिएको छ । यस आलेखमा पूर्वीय दर्शनमा स्थापित षड्दर्शनका मूलभूत मान्यताहरूको ‘वीरहरू’ निबन्धमा परेको प्रभाव र त्यसले प्राप्त गरेको सौन्दर्यात्मक स्वरूपको अध्ययन गरिएको छ । यसमा ‘वीरहरू’ निबन्धबाट आवश्यक साक्ष्यहरू लिई तिनका आधारमा पूर्वीय दर्शनको प्रभावलाई विश्लेषण गरिएको छ । देवकोटाको अध्ययन, पारिवारिक वातावरण र संस्कारवश यस निबन्धमा पूर्वीय दर्शनका आधारभूत प्रस्थापनाहरू प्रकट भएका छन्। उनले पूर्वीय दर्शनलाई युग, समाज र जीवनसापेक्ष ग्रहण गरी त्यसलाई मानवजीवन, धर्तीेको कल्याणको सहकारकका रूपमा प्रस्तुत गरे
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गुरागाईँ, राधिका. "ध्रुव नाटकमा त्यागसम्बन्धी दर्शन". Prajna प्रज्ञा 124, № 2 (2023): 195–204. http://dx.doi.org/10.3126/prajna.v124i2.60601.

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Abstract:
प्रस्तुत अध्ययनमा वैदिक दर्शनका त्यागसम्बन्धी मान्यताका आधारमा ‘ध्रुव’ नाटकको विवेचना गरिएको छ । बालकृष्ण समको ‘ध्रुव’ पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विषयवस्तुलाई दार्शनिक ढङ्गले चित्रण गरिएको पौराणिक कथामा आधारित नाटक हो । वैदिक दर्शनका अनुसार मनुष्यले आफूलाई मूलतः भौतिक सुख, इन्द्रिय वासना र अङ्कारबाट मुक्त राख्नु त्याग हो । ‘ध्रुव’ नाटकको सारवस्तु, पात्र र संवादमा भोग एवं त्याग वृत्तिको प्रस्तुति छ । भौतिक वस्तु, इन्द्रिय वासना, दैहिक अहङ्कारले मनुष्यलाई पतनतिर लैजान्छ भने यसको त्यागले सुख, शान्ति र परम आनन्द प्राप्त हुन्छ, मानवताको कल्याण हुन्छ र जीवन धन्य बन्छ भन्ने दार्शनिक मान्यताका आध
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महेश, आमेटा, पालीवाल नारायण, कुरेशी शोयब та मोहन ठाकुर गिरिन्द्र. "भारतीय दर्शन में कर्मवाद". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 10, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 46–48. https://doi.org/10.5281/zenodo.7944533.

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Abstract:
कर्मवाद की प्रासंगिकता आधुनिक समय में भी ज्वलंत विषय है। हर व्यक्ति स्वार्थवश नैतिक-अनैतिक कर्म करता है फिर उसे तर्क द्वारा अपने हिसाब से सही परिभाषित करता है। भारतीय दर्शन में कर्म व कर्मफल पर विस्तृत विमर्श है, जो संसार को राह दिखाता है और जगत की उत्पत्ति एवं स्थिति, लय को व्यवस्थित रीति से संचालन के लिए तथा सुव्यवस्थित रूप से चलने के लिए-कर्म का सिद्धांत है।
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Talekar, P. R. "लोकगीतांतील स्त्रीचे मनोज्ञ दर्शन". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 13 (2024): 129–33. https://doi.org/10.5281/zenodo.11260813.

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Abstract:
लोकगीतांच्या रूपाने स्त्रीयांनी आपल्या मनातील भावभावना शब्दांत गुंफल्या आहेत. लोकसाहित्याला कर्ता नसतो. त्याप्रमाणे या विविध स्त्री-कर्त्यांचीही नावे आपणास माहिती नाहीत पण त्यांची प्रतिभा आजही आपणापर्यंत पोहचत आहे. त्यांच्या या जात्यावरच्या ओव्या, लग्नगीते, तरवागीते, फुगडी गीते, पाळणा गीते या गीतांच्या माध्यमातून त्या आपल्या आप्तजनांविषयी सभोवताला विषयी जो विचार करतात; त्याचे प्रतिबिंब उमटताना दिसते. स्त्रिया आपली संस्कृती दुसऱ्या पिढीकडे सुपूर्त करणाऱ्या असतात. संस्कृतीसोबत इतिहास, धर्म व अनुभव यांचा मेळ बसावा लागतो. या सोबतच कला, तत्वज्ञान, साहित्य, ज्ञान आणि विज्ञान यांची बैठक असते. या साऱ्
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महेन्द्र, कुमार. "जैन दर्शन एवं और बौद्ध दर्शन का शिक्षा परिप्रेक्ष्य: एक तुलनात्मक विश्लेषण". Indian Journal of Modern Research and Reviews 3, № 1 (2025): 03–09. https://doi.org/10.5281/zenodo.14632652.

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Abstract:
भारत के प्राचीन दर्शनों ने शिक्षा को जीवन के प्रमुख उद्देश्यों में स्थान दिया है। जैन और बौद्ध दर्शन, जो दोनों ही श्रमण परंपरा से जुड़े हुए हैं, शिक्षा के माध्यम से आत्मिक और सामाजिक उन्नति की बात करते हैं। ये दोनों दर्शन समान रूप से नैतिकता, ध्यान और आत्म-अनुशासन पर जोर देते हैं, लेकिन उनके दृष्टिकोण और शिक्षा पद्धतियों में कुछ मौलिक भेद भी विद्यमान है। जैन और बौद्ध दोनों दर्शनों ने आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है और इन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति को गहरे रूप में प्रभावित किया है। दोनों दर्शनों की शिक्षा पद्धति में अनेक समानता होने के साथ-साथ विभिन्नताएं भी पायी जाती हैं।
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महेन्द्र, कुमार. "जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन की सामाजिक एवं शैक्षिक उपयोगिता: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में". International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary 4, № 1 (2025): 06–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.14623810.

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Abstract:
दर्शनशास्त्र की शुरुआत अस्तित्व के प्रति जिज्ञासा से होती है। भारतीय दर्शन प्राचीनकाल से ही जीवन के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करता रहा है और अपने अंदर कई धाराओं को समाहित किये हुए है। इन दर्शनों में जैन दर्शन और बौद्ध दर्शन का विशेष महत्व है। इन सभी का भारतीय समाज, संस्कृति और शिक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ा है। प्रस्तुत शोध पत्र इन्हीं बातों को रेखांकित करते हुए जैन और बौद्ध दर्शन की सामाजिक एवं शैक्षिक उपयोगिता का अध्ययन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में करने का प्रयास करता है। साथ ही, इसमें दोनों दर्शनों के शिक्षा के उद्देश्यों, शिक्षण पद्धतियों, नैतिक मूल्यों और उनकी सामाजिक उपयोगिता के संदर्भ में समान
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वर्मा, रमेश चन्द. "चेतना (कोन्शियसनेस) एक चिन्तन". Anthology The Research 8, № 11 (2024): H 27 — H 33. https://doi.org/10.5281/zenodo.10829987.

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Abstract:
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research"                URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=8214 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)                  Abstract :  कॉन्शसनेस चेतन chetna अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका संबंध दर्शनशास्त्र से है दर्शनशास्त्र को विश्व में दो विमर्शों में विभक्त कर समझ गया
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Ankita, Shambhawi Verma. "बंगाल के निरक्षर सहज साधक बाउल". Aadhunik Sahitya 40, Oct. -Dec., 2021 (2021): 134–38. https://doi.org/10.5281/zenodo.8126915.

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Abstract:
बाउलों के संबंध में कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं मिलता। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि वैष्णव-सहजिया पंथ के ही ग्रंथ, तत्व और दर्शन ही बाउलों के भी तत्व और दर्शन कहलाएंगे। उपेंद्रनाथ भट्टाचार्य के अनुसार लोचनदास के 'वृहत् निगम' और पंचानन दास के संग्रह ग्रंथ बाउल संप्रदाय के संबंध में विशेष मूल्यवान सिद्ध होते हैं। इसके अलावा बाउल गीतों में इनका दर्शन और विशेष रूप से इनकी साधना पद्धति की जानकारी हमें मिलती है।
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Yadav, Jayant Kumar. "Self-Realization in Sanskrit Literary Philosophy: A Study." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 12, no. 1 (2025): 88–90. https://doi.org/10.53573/rhimrj.2025.v12n1.012.

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Abstract:
Philosophical contemplation is inherent to civilized humanity. However, the development of critical philosophy or systematic philosophical thought has occurred in only a few civilizations, with ancient Greece and India holding a prominent place. The Rigveda contains scattered philosophical inquiries, but in India, the systematic foundation of philosophy began during the Upanishadic era. At that time, philosophy emerged as the starting point for religious and spiritual inquiry. Abstract in Hindi Language: दार्शनिक चिन्तन सभ्य मानव का स्वभाव है, किन्तु सभ्यता के इतिहास में समीक्षात्मक दर्शन अथवा
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पांडे, उर्मिला. "योग दर्षन के परिप्रेक्ष्य में पुरूष, पुरूषार्थ एवं पुरूषार्थषून्यता". Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal 4 (31 липня 2014): 58–61. http://dx.doi.org/10.36018/dsiij.v4i0.45.

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Abstract:
योग दर्शन में पुरूष तत्व केन्दीय विषय के रूप में प्रस्तुत हुआ है। यद्यपि पुरूष और प्रकृति दोनों की स्वतंत्र सत्ता मानी गयी है; परन्तु तात्विक रूप में पुरूष की सत्ता ही सर्वोच्च है। पुरूष के दो भेद कहे गये है, एक पुरूष विशेष पुरूष एक है- ईश्वर किन्तु सामान्य पुरूष की संख्या असंख्य कही गयी है। पुरूष को चैतन्य एवं अपरिणामी कहा गया है, किन्तु अविद्या के कारण पुरूष जड़ एवं परिणामी चित्त में स्वयं को आरोपित कर लेता है। पुरूष और चित्त के संयुक्त हो जाने पर विवके जाता रहता है और पुरूष स्वयं को चित्त रूप में अनुभव करने लगता है। यह अज्ञान ही पुरूष के समस्त दुःखों, क्लेशों का कारण हैं। योग दर्शन का उद्देश
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Tomar, Nitya. "गीता दर्शन का शैक्षिक वैशिष्ट्य". SDES-International Journal of Interdisciplinary Research 1, № 2 (2020): 29. http://dx.doi.org/10.47997/sdes-ijir/1.2.2020.29-34.

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पुन Pun, डम्बर बहादुर Dambar Bahadur, та दावा Dawa शेर्पा Sherpa. "पूर्वीय दार्शनिक धरातलमा जैन दर्शन". Sotang, Yearly Peer Reviewed Journal 6, № 1 (2024): 15–25. https://doi.org/10.3126/sotang.v6i1.72176.

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Abstract:
जैन दर्शन प्राचीन दर्शनमध्ये एक हो । यो मानवीय मूल्यमा आधारित दर्शन हो । यस दर्शनले व्यक्तिको जन्म र मृत्युको क्रमबाट मुक्त हुनुपर्ने धारणा राखेको पाइन्छ । सांसारिक विषयबाट व्यक्ति बन्धनमा रहने भएकाले यसबाट मुक्त हुनुपर्ने धारणा यसमा भेटिन्छ । सांसारिक विषयलाई जित्न सक्ने व्यक्ति जिन वा तीर्थङ्करलाई यस दर्शनमा भगवानको स्थान दिएको देखिन्छ । वेदमा उल्लिखत विषय अत्यन्त कर्मकाण्डी मात्र भएको र तीर्थङ्करले दिएको उपदेश नियमसम्मत मान्ने परम्परा यस दर्शनमा पाइन्छ । जैन दर्शनका चौबिस तीर्थङ्करमध्ये पहिलो तीर्थङ्कर ऋषभदेव र अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर स्वामीलाई मानेको भेटिन्छ । यस अध्ययनका लागि पुस्तकालयीय
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राम, राजन. "डाॅ अम्बेडकर का संवैधानिक दर्शन". International Journal of Political Science and Governance 2, № 2 (2020): 20–21. http://dx.doi.org/10.33545/26646021.2020.v2.i2a.49.

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मिश्र, ब्रम्हा नंद, та दिवाकर सिंह. "गिजुभाई का बाल शिक्षा दर्शन". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR HUMANITY SCIENCE AND ENGLISH LANGUAGE 10, № 49 (2021): 12148–52. http://dx.doi.org/10.21922/srjhsel.v10i49.9757.

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Abstract:
प्रस्तुत शोध पत्र में गिजुभाई बधेका के शैक्षिक दर्शन का विस्तृत वर्णन किया गया है। उन्होंने आजीवन बच्चों के मनोभावों को समझने व भयमुक्त वातावरण में शिक्षा देने का समर्थन किया। वे वर्तमान शिक्षा प्रणाली से अत्यंत दुखी थे। उनका अनुभव बहुत ही कटु था, बचपन में मिली अनेक यातनाओं का उनके जीवन पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि वह वकालत छोड़कर पूरी तरह से बाल शिक्षा में ही रम गए। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि “मेरे छात्रों को मेरा आदेश है कि घोड़ों के अस्तबल जैसी धूल भरी इन शालाओं को जमींदोह कर दो। मार-पीट और भय दिखाने वाले कत्लखाने की नींव को बारूद से उड़ा दो, इन्हें नेस्तनाबूत कर दो”। इस प्रकार गिजुभाई बालक
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डॉ निशा द्विवेदी. "स्वामी विवेकानंद का शिक्षा दर्शन". International Journal of Multidisciplinary Research in Arts, Science and Technology 2, № 6 (2024): 18–22. http://dx.doi.org/10.61778/ijmrast.v2i6.62.

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Abstract:
स्वामी विवेकानंद जी इस युग के ऐसे सच्चे भारतीय एवं दार्शनिक है, जिन्होंने अपने विचारों से केवल भारतीयों को ही नहीं अपितु पूरे विश्व को प्रभावित किया है। विवेकानन्द जी ने हमारे देश की आध्यात्मिक श्रेष्ठता और पाश्चात्य देशों की भौतिक श्रेष्ठता से परिचित कराया। उन्होंने मानव जीवन की विभिन्न समस्याओं पर गहन चिंतन किया। उनके चिंतन का क्षेत्र धर्म, दर्शन, सामाणिक और राजनीतिक व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली राष्ट्र का सम्मान और कई अन्य क्षेत्र थे। विभिन्न समस्याओं पर उनके विचारों ने राष्ट्र को एक कई दिशा दी । स्वामी जी का मानना था कि “ शिक्षा मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।“ वह शिक्षा के माध
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चन्द्रिका, डॉ कीर्ति. "वेदान्त दर्शन का समीक्षात्मक अध्ययन". ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities 2, № 4 (2025): 57–61. https://doi.org/10.70558/spijsh.2025.v2.i4.45167.

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., रितु, नितिन . та नितिन . "स्वामी विवेकानन्द का शैक्षिक दर्शन". SDES-International Journal of Interdisciplinary Research 4, № 6 (2024): 732–41. https://doi.org/10.47997/sdes-ijir/4.6.2023:737-741.

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कोइराला Koirala, परशुराम Parashuram. "पौरस्त्य परम्पराका केही दार्शनिक पद्धति {Some Philosophical Approaches of the Western Tradition}". Shikshya Sandesh 6, № 1 (2023): 14–18. http://dx.doi.org/10.3126/ss.v6i1.63111.

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Abstract:
दर्शनलाई नवउल्लास, नवआकाङ्क्षा र नयाँ प्राप्ति साधनाको नियमित अविरल प्रक्रिया मानिन्छ । प्रशस्त विदृत विमर्शबाटै सजीव परम्परा र चिन्तनको विकास सम्भव छ । हिन्दु, बौद्ध, जैन, लोकायत सन्दर्भादि पौरस्त्य दर्शन परम्पराका निरन्तरता मानिन्छन् । आस्तिक र नास्तिक गरी दुई धाराका दर्शन पौरस्त्य परम्परामा देखिन्छ । यिनैचिन्तनमा आधारित भएर यो लेख तयार गरिएको छ ।
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दाहाल Dahal, गिरधारी Girdhari. "मार्क्सवादी दर्शन र नेपालमा यसको अभ्यास". Pargatishil Darpan 8, № 1 (2024): 61–79. http://dx.doi.org/10.3126/pd.v8i1.70356.

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Abstract:
पृथ्वीनाराण क्याम्पस, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, पोखराजीवन र जगतका बारेमा अध्ययन अनुसन्धान र विश्लेषण गरी सत्यको खोजी गर्ने शास्त्रलाई दर्शनशास्त्र भनिन्छ । यसको विश्लेषणको आधार तार्किक, वस्तुनिष्ठ, यथार्थ र वैज्ञानिक हुन्छ । दर्शनलाई पूर्वीय र पश्चिमा, आध्यात्मवादी र भौतिकवादी तथा विभिन्न विधाका आधारमा अध्ययन विश्लेषण गरिन्छ । दर्शन व्यक्ति केन्द्रित, समाज केन्द्रित, वर्गीय र विश्वव्यापी हुन्छ । भौतिकवादी दर्शनको उदय प्राचीनकालदेखि भएको मानिन्छ । आधुनिक युगमा माक्र्सवादी दर्शन द्वन्द्वात्मक भौतिकवादमा आधारित वैज्ञानिक विश्व दर्शन हो । यस दर्शनको जीवन र जगतलाई हेर्ने दृष्टिकोण वैज्ञानिक समाजवाद ह
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प्रा.डॉ.भारत, बाबुराव उपाध्य. ""हिन्दी राजनीतिक उपन्यासो में गांधी दर्शन'". 'Journal of Research & Development' 15, № 14 (2023): 12–13. https://doi.org/10.5281/zenodo.8242295.

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Abstract:
"हिन्दी साहित्य का इतिहास' चार कालो में विभाजित है। 'आ. रामचंद्र शुक्ल' के अनुसार आधुनिक काल का समय सं. १९०० वि. से आगे माना जाता है। मोहन करमचंद गांधीजी का राजनीतिक समय १९२० से १९४८ इ.स. तक रहा है। इस दौरान राजनीतिक परिवर्तन, क्रांतिकारी विचार धारा, सविनय अवज्ञा, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, चले जाव, भारत-पाक विभाजन, अंग्रेजों का अत्याचार एवं परतंत्र भारत का चित्र था, ऐसे समय मे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक परिस्थितियों में भारत चूस रहा था, आवश्यकता थी, गांधी दर्शन कि, जो गांधी के माध्यम से पूरी हुई। जिसका परिणाम यह हुआ कि हिन्दी साहित्य का इतिहास में खास तौर से '
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रानी, सरिता. "गाँधी के पर्यावरणीय चिन्तन की दार्शनिक विवेचना". Humanities and Development 17, № 2 (2022): 51–55. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i2.69.

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Abstract:
पर्यावरण पृथ्वी पर उपस्थित सभी जैविक एवं अजैविक तत्वों का योग है। जल, वायु, भूमि, पेड़-पौधें एवं जीव जन्तु सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते है। इनमें से किसी एक घटक की अनदेखी करने से गम्भीर पर्यावरणीय संकट उपस्थित होता है। जो पर्यावरण प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट के रूप में मानव के समक्ष चुनौती प्रस्तुत करता है।
 प्राचीन काल से ही भारतीय चिन्तन में पर्यावरण को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। वेद, पुराण तथा अनेक वैदिक साहित्य पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए मानव को सन्देश देते है। महात्मा गाँधी वो महापुरूष थे जिन्होंने वेदों, उपनिषदों में कही गयी बातों को ही अपने जीवन में अपनाया। वर्त
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Parveen, Heena. "Relevance of Gandhi philosophy." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 6, no. 5 (2018): 73–77. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v6.i5.2018.1428.

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Abstract:
The basic elements of Gandhi philosophy are truth, non-violence and love and on this basis, the bells of political, religious and economic ideas are flourishing. These three elements are nurturing and fostering the entire Gandhi-darshan like light, water and air. Through the article presented, we will see the essentiality and relevance of Gandhi philosophy in the present society.
 गाँधी-दर्शन के आधार तत्व सत्य, अहिंसा और प्रेम हैं और इसी आधार पर राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक विचारों की बेल फल-फूल रही है। यही तीन तत्व प्रकाश, जल और वायु की भँाति सम्पूर्ण गाँधी-दर्शन को पोषित व पल्लवित कर रहे
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शुक्ल, पुनीत, та इफ्तिखार अहमद अंसारी. "महात्मा गांधी के चिंतन में मानववादी तत्व". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR HUMANITY SCIENCE AND ENGLISH LANGUAGE 9, № 48 (2021): 11872–76. http://dx.doi.org/10.21922/srjhsel.v9i48.8253.

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Abstract:
विश्व के सभी चिंतक विश्व को अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। महात्मा गांधी विश्व को एक वृहद और मानववादी दृष्टिकोण से देखते हैं। गांधी के दर्शन की व्यापकता और स्वीकार्यता विश्वव्यापी है। गांधी को दुनिया के सभी देशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है और आधुनिक विश्व की समस्याओं के समाधान में गांधी दर्शन की उपयोगिता पर विचार होता है। अनेक युद्धों की विभीषिका झेल चुकी दुनिया में आज गांधी दर्शन के मानववादी विचार बहुत प्रासंगिक हैं। गांधी द्वारा दिये गए विचार सत्य और अहिंसा का सिद्धांत, सत्याग्रह, सर्वाेदय, न्यासिता का सिद्धांत मानवता के पथ प्रदर्शक के रूप में दुनिया के लिये उपयोगी हैं। इस बात
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ढकाल Dhakal, बोधराज Bodhraj. "कालीगण्डकी कवितामा व्यक्त समाधिस्थभित्रको अन्तर्य". Prithvi wangmaya 14 (12 вересня 2024): 94–103. http://dx.doi.org/10.3126/pw.v14i01.69761.

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Abstract:
प्रस्तुत अनुसन्धानात्मक लेख ‘कालीगण्डकी’ कवितामा व्यक्त समाधिस्थभित्रको अन्तर्यको विश्लेषणमा आधारित छ । यस लेखमा कविताको अन्तर्यमा कविले व्यक्त गरेको आध्यात्मिक दर्शनका तत्वचिन्तनको विवेचन गरी तथ्य निरूपण गरिएको छ । धर्तीकै दिव्यस्थल मोक्षधामबाट उत्पन्न भई दिव्यशिला शालिग्राम सृजना गर्ने कालीगण्डकीको किनारैकिनार मुहानमा पुगी ध्यानस्थ भएर कविले परमानन्द लिन खोजेको अन्तर्य विषयलाई यहाँ विश्लेषण गरिएको छ । गुणात्मक अध्ययन पद्धतिमा आधारित यस अध्ययनमा पुस्तकालयीय कार्यका माध्यमबाट प्राथमिक र द्वितीयक स्रोतका सामग्रीहरूको सङकलन गरी उद्देश्यमूलक नमुना छनोट पद्धतिका माध्यमबाट ‘कालीगण्डकी’ कवितालाई छनो
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., निवेदिता. "बौद्ध दर्शन में वर्णित साधना पद्धति". Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal 6 (31 липня 2015): 44–48. http://dx.doi.org/10.36018/dsiij.v6i0.67.

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Abstract:
साधना आत्मिक प्रगति का आधार है। साधना की तीन प्रणालियाँ मानी गई है- कर्म, ज्ञान और भक्ति। बुद्ध के अनुसार शरीर को दण्ड देने की अपेक्षा ज्ञान प्राप्ति से और ध्यान साधना के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त हो सकता है। बौद्ध साधनाएँ ‘शील, प्रज्ञा और समाधि के रूप में ‘त्रिरत्न’ के नाम से भी जानी जाती हैं। बौद्ध साधनाभ्यास का आधार ‘शील’ है। क्योंकि बौद्ध साधना में शील सम्पन्न साधक ही समाधि का अधिकारी होता है। बौद्ध साधना ‘हीनयान’ व ‘महायान’ के रूप में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों को प्रदर्शित करती है। हीनयान केवल ‘निवृत्तिमार्ग’ है। उसकी सारी शिक्षा, समग्र साधना केवल एक आत्मा के निर्वाण को ही लक्ष्य बनाती है त
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पाण्डेय, अभिनन्दन. "भारतीय दर्शन में प्रमाण का स्वरूप". International Journal of Advanced Academic Studies 3, № 3 (2021): 294–96. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2021.v3.i3d.635.

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पाण्डेय, अभिनन्दन. "भारतीय दर्शन में मोक्ष की अवधारणा". International Journal of Advanced Academic Studies 3, № 3 (2021): 291–93. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2021.v3.i3d.634.

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Dhakal, Bodhraj. "‘सूर्य–महिमा’ कवितामा अद्वैत वेदान्त दर्शन". Kanya Journal 4, № 1 (2023): 89–97. http://dx.doi.org/10.3126/kanyaj.v4i1.57070.

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Abstract:
प्रस्तुत अनुसन्धानात्मक लेखमा लेखनाथ पौड्यालको ‘सूर्य–महिमा’ कवितामा प्रस्तुत अद्वैत वेदान्त दर्शनका मान्यताहरूको विश्लेषण गरिएको छ । यस कवितामा प्रस्तुत अद्वैत वेदान्त दर्शनका मान्यताहरूलाई दृष्टान्तमार्फत विश्लेषण गरी तथ्य निरुपण गर्नु यस अध्ययनको उद्देश्य रहेको छ । ब्रह्मसूत्रका भाष्यकारहरूमध्ये सर्वश्रेष्ठ मानिने शङ्कराचार्यको अद्वैत वेदान्त दर्शनको ब्रह्म सत्य होे र ब्रह्मबाट भिन्न केही छैन भन्ने मान्यतालाई यस कवितामा कविले प्रस्तुत गरेका छन् भन्ने निष्कर्ष दिइएको छ । यस कवितामा सूर्यलाई ब्रह्मजस्तै सत्य, नित्य, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी, स्वप्रकाश, अमर र सार्वभौमशक्तिका रूपमा प्रस्तुत गर
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पोखरेल Pokhrel, मोहनमणि Mohanmani. "वैदिक दर्शन र यसको शैक्षिक उपयोगिता". Bikasko Nimti Shiksha (विकासको निम्ति शिक्षा) 24, № 1 (2020): 1–21. http://dx.doi.org/10.3126/bns.v24i1.62289.

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Abstract:
वेदको अर्थ ज्ञान हुन्छ । हिन्दू दर्शन वा वैदिक दर्शनको मुख्य आधार र स्रोत वेद हो । वेदमा आधारित दर्शनलाई नै वैदिक दर्शन भनिन्छ । वेदमा मुख्य गरेर ब्रह्मको व्याख्या गरिएको छ । यसका चार भाग छन् । आर्यन संस्कृतिको मुख्य आधार र हिन्दू दर्शनको आधारसमेत रहेको यसको मुख्य उद्देश्य वैदिक दर्शनको विकासक्रम र षडदर्शनको परिचय दिनु हो । त्यस्तै दार्शनिक आधारको परिचय गराउनु र यसको नेपालको सन्दर्भमा उपयोगिताको विश्लेषण गराउनु हो । विभिन्न सम्बन्धित विषयका विज्ञहरूसँगको छलफल, अन्र्तवार्ता, पुस्तकालय विधि र इन्टरनेट विधि प्रयोग गरी अध्ययन गरिएको छ । यसभित्र वेदको परिचय, वेदको दार्शनिक आधार ब्रह्म अथवा ईश्वरको
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., शिवरानी. "भारतीय दर्शन, धर्म और ज्ञान परंपरा". International Journal of Arts, Humanities and Social Studies 7, № 1 (2025): 501–5. https://doi.org/10.33545/26648652.2025.v7.i1g.213.

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अन्जू रानी. "अहिंसा का गाँधी दर्शन: एक आलोचना". Innovative Research Thoughts 11, № 1 (2025): 87–102. https://doi.org/10.36676/irt.v11.i1.1593.

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Abstract:
जो यह समझता है कि बर्फ के ऊपर कम्बल लपेट कर उसे गरमाया जा सकता है वह कुछ देर बाद देखेगा कि बर्फ का ठंडापन कम्बल से और भी सुरक्षित हो गया है।यह दर्शन जो सभी कर्मों पर एक ही मशीनी नियम लागू करता है अथवा एक शब्द लेता है और उसमें सारे मानव जीवन को बैठाने का प्रयाय करता है, वह निरर्थक है। एक योद्धा की तलवार न्याय और सदाचार की पूर्ति के लिए उतनी ही आवश्यक है जितनी कि एक संत की धार्मिकता। शिवाजी के बिना रामदास पूर्ण नहीं है। न्याय की रक्षा करने तथा उसे छीनने और निर्बल को दबाने से बलवान को रोकने के लिए ही क्षेत्रिय बनाया गया।
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VARSHA, RANI. "भारतीय दर्शन में ईशावास्योपनिषद् का स्थान". शोध समालोचन 12, № 1 (2025): 187–90. https://doi.org/10.5281/zenodo.15270674.

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सोनटक्केनटक्के, डॉ. राजाराम. "मराठी लोकगीत व भारतीय संस्‍कृतीचे दर्शन". International Journal of Advance and Applied Research 6, № 33 (2025): 71–74. https://doi.org/10.5281/zenodo.15574730.

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Abstract:
लोकगीते म्हणजे लोकांनी सण-उत्सव विविध समारंभ प्रसंगी गांभीर्याने गायिलेली गाणी असे म्हणता येईल. देवतांसाठी कष्टाची कामे करता करता, कष्टाचे डोंगर उपसतांना जी श्रमपरिहार्य स्वयंस्फुर्तीने ओठातून बाहेर पडली त्या सर्व गीतांना 'लोकगीते' असे म्हणता येईल. मानवी जीवनातील भावभावनेला लोकवाड्मयात महत्त्वाचे स्थान आहे. लोकवाङ्मयात ही भावभावना महत्त्वाची असते. वाड्मयामध्ये माणसाच्या मनाला आवाहन असते. आणि भावनांची कंपने, स्पंदने, मनात संवेदना जागृत करुन एक प्रकारे भावानुभवाच्या अनुभवातून मानवी मनाला एक प्रकारे आनंद होत असतो. भावानुभव आणि जीवनातील सुख-दुःख यांचा घनिष्ट असा संबंध आहे. मानवी जीवनाची उभारणी अने
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Chandra, Kishor. "भारतीय दर्शन में रस की अवधारणा". IJMER 9, № 12(2) (2020): 25. https://doi.org/10.5281/zenodo.15583217.

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चौरसिया, प्रभा, та संजय कुमार. "गिजुभाई बधेका के शिक्षा दर्शन के उद्गम स्रोतों का अध्ययन: उनके शैक्षिक चिंतन की दिशा के निर्धारण में तत्वों का विश्लेषण". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 5 (2024): 908–16. https://doi.org/10.29070/y3tjpg44.

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Abstract:
यह शोध पत्र गिजुभाई बधेका के शिक्षा दर्शन के उद्गम स्रोतों का विश्लेषण करता है और उनके शैक्षिक चिंतन की दिशा को निर्धारित करने वाले प्रमुख तत्वों की पहचान करता है। गिजुभाई बधेका ने शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक सुधार और मानवीय विकास का महत्वपूर्ण अंग माना। इस अध्ययन में उनके शिक्षा दर्शन के सामाजिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक स्रोतों की खोज की गई है, जो उनके विचारों और शिक्षण पद्धतियों को प्रभावित करते हैं। साथ ही, इस शोध में उनके शिक्षण सिद्धांतों के समकालीन शिक्षा प्रणाली, नीति निर्माण और शिक्षक प्रशिक्षण पर प्रभावों का भी विवेचन किया गया है। यह शोध बधेका के
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Husain, Shakeel. "माओवाद की असफलता साम्यवाद से पूंजीवाद तक". RESEARCH EXPRESSION 6, № 9 (2023): 19–28. https://doi.org/10.61703/re5.

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Abstract:
माओवाद बीसवीं शताब्दी में सर्वाधिक उथल-पुथल मचाने वाला दर्शन है । लैटिन अमेरिका अफ्रीका एशिया के अनेक विकासशील देशों में माओवादी दर्शन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया है , हिंसा को महिमा मण्डित किया है । तीसरी दुनिया के अनेक देशों में माओवादी हिंसा राज्य के विरुद्ध एक गंभीर खतरे के रूप में उपस्थित हुई है । प्रस्तुत शोधपत्र यह विश्लेषण करने का प्रयत्न करता है कि माओवादी दर्शन में वे कौन से तत्व हैं जो राजनीतिक हिंसा के प्रति लोगों को आकर्षित करते हैं । चीन में साम्यवादी क्रांति के बाद से माओ की मृत्यु तक माओवाद की क्या सफलताएं और असफलताएं रहीं है । माओवाद क्या चीन का कोई हित कर सका है ? इ
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Poonam and Pintu Kumar. "Buddhist Philosophy and Its Relevance in the Present Times." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 12, no. 5 (2025): 102–5. https://doi.org/10.53573/rhimrj.2025.v12n5.012.

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Abstract:
Gautama Buddha’s philosophy, rooted in the Four Noble Truths, the Eightfold Path, impermanence, non-self, karma, compassion, and non-violence, offers a rational and experiential framework for addressing human suffering. This paper explores the relevance of Buddhist philosophy in tackling modern challenges such as mental health crises, environmental degradation, and social inequalities. The Four Noble Truths provide insights into the nature of suffering and its cessation, while the Eightfold Path offers practical ethical guidance. Concepts like impermanence and interconnectedness resonate with
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चौरसिया, प्रभा, та संजय कुमार. "गिजुभाई के जीवन-दर्शन का अध्ययन: एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 20, № 3 (2023): 635–41. https://doi.org/10.29070/jgm6p436.

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Abstract:
गिजुभाई बधेका भारतीय शिक्षा प्रणाली में बालकेंद्रित दृष्टिकोण और रचनात्मक शिक्षण के अग्रदूत माने जाते हैं। उनका जीवन-दर्शन केवल एक शिक्षण पद्धति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह एक समग्र और मानवीय दृष्टिकोण था, जो शिक्षा को जीवन का अभिन्न अंग मानता था। उन्होंने शिक्षा को केवल औपचारिक ज्ञान प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक नैतिक, सामाजिक और रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा। उनके जीवन-दर्शन में बालकों की स्वतंत्रता, स्वाभाविक जिज्ञासा, रचनात्मकता, आत्म-अनुशासन और नैतिक मूल्यों को प्रमुखता दी गई। गिजुभाई का मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालकों के स्वाभाविक विकास में सहायक हो, न कि उनके ऊपर थो
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Jayswal, Anurag. "श्रीमद्भगवद्गीता का यज्ञ दर्शन – एक विवेचनात्मक अध्ययन". Interdisciplinary Journal of Yagya Research 3, № 1 (2020): 23–29. http://dx.doi.org/10.36018/ijyr.v3i1.48.

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Abstract:
यज्ञ वैदिक काल से एक प्रचलित अवधारणा रही है। यह अग्निहोत्र जैसी कर्मकांड परक क्रिया से लेकर आत्म परिष्कार की प्रखर आध्यात्मिक साधना को समाहित करता है। अन्य पुरातन विधाओं के समान यज्ञ की स्थूल मान्यता भी आज लोक प्रतिष्ठित है। यज्ञ के तीन अर्थ- दान, संगतिकरण व देवपूजन हैं। जिन के व्यापक अर्थ भगवद्गीता में मिलते हैं। भगवद्गीता में यज्ञ एक ‘जीवनदर्शन’ है। कर्म सम्पादन की शुभ्र व सप्राण प्रेरणा के रूप में यज्ञ की प्रतिष्ठा है; ‘यज्ञार्थ कर्म’ से कर्त्ता के कर्म ही आहुति रूप होकर परमार्थ के विराट कुण्ड में अर्पित किए जाते हैं। कामना, लोभ व निष्क्रियता से रहित जीवन क्रम यज्ञमय बनता है, जो संकीर्णता ज
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