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1

क ुमारी, स. ुषमा. "सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका : बिहार के विशेष संदर्भ म". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 53–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20199.

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Abstract:
1914 इ र्. में गाँधीजी क े भारत आगमन क े समय प ूव र् में समाज सुधारकों द्वारा किये गये सुधारों क े परिणाम स्वरूप शिक्षित परिवारों में स्त्रियों की स्थिति सुधरन े लगी थी और महिलाओं क े प ्रति सामाजिक एव ं शैक्षणिक मान्यताओं में परिवत र्न की प ्रक्रिया चल रही थी ल ेकिन उसे स्वराज आंदोलन क े कार्यक्रमों द्वारा साव र्जानिक सेवा क े लिए घर से बाहर लान े तथा कुरीतियों से सावधान कर उसक े सद ्गुणों को व्यापक बनान े और आर्थिक स्वावल ंबन, साहस एव ं उत्तरदायित्व क े साथ ऊँचा उठान े का सतत ् प ्रयास वास्तव में गाँधीजी न े ही किया। स्वत ंत्रता आंदोलन में ‘भारतीय नारी’ का योगदान मुख्यतया 1920 क े बाद से अधि
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2

चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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3

प, ्रो. सुनीता जैन. "महान संगीतज्ञ तानस ेन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886067.

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Abstract:
तानस ेन एक महान संगीतज्ञ थे। अब ुल फजल बादशाह अकबर क े उदार संरक्षण में विभिन्न संगीतज्ञा ें क े हा ेने का वर्ण न करता ह ै, उनमें वह पहला स्थान संगीत सम्राट तानस ेन का े प ्रदान करता ह ै।। तानसेन उस युग क े सर्व श्र ेष्ठ प ्रतिभावान संगीतज्ञ थ े। तानस ेन की प्रशंसा करते ह ुए अब ुल फजल ने लिखा ह ै ’’ भारत में उसक े समान गायक एक सहस्त्र वर्षो से नहीं ह ुआ’’ तानस ेन का जन्म 1531-32 में ग्वालियर से लगभग 43 किला ेमीटर दूर ब ेहट ग्राम में एक गा ैड़ ब ्राम्हण परिवार में ह ुआ था। इनका प ्रारंभिक नाम त्रिलोचन पांडे था, बाल्यकाल से ही उन्ह ें संगीत में विशेष अभिरूचि थी। ग्वालियर के नरेश मानसिंह तोमर ने
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4

मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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डा, ॅ. पि ्रयंका व. ैद्य. "न ृत्यकला में र ंगा ें का समन्वय". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889278.

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Abstract:
सृष्टि में सभी पदार्थ चर, अचर, प ्रकृति पा ैध े, पुष्प सभी रंगा ें से सराबोर ह ैं। यह सारी सृष्टि रंगा ें में डूबी र्ह ुइ है। प्रत्येक वस्तु का अपना अलग रंग ह ै। हर फूल, पा ैधा पल्लवित होने से लेकर मुरझााने तक र्कइ रंग व आकार में दिखाई देता ह ै। हर वस्तु का स्वरूप, रंग व आकार हमें रंगा ें का हमारे जीवन में महत्व को दर्षा ता ह ै। कहते ह ै ं ”नृत्यमयं जगत्“ अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् नृत्यमय ह ै। इस प ्रकृति व रंगा ें से मनुष्य ने अपना जीवन को संवारा व इसके माध्यम से अपनी मना ेभावनायें व्यक्त की। पंछी से उड़ता, नाचता व गाना सीखा तो प्रकृति के रंगा ें से स्वयं का े सवांरना सीखा। कहते ह ैं एक पेड़ ज
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पाण्ड ेय, ऋषिराज. "रायप ुर जिल े म ें जन च ेतना का विकास". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 50–53. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20198.

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Abstract:
भारत म ें अ ंग ्रेजा ें क े विरूद्ध स्वत ंत्रता स ंग ्राम क े रूप म ें सन ् 1857 म ें सव र्प ्रथम प ्रबल क्रा ंति ह ुइ र्। छत्तीसगढ ़ अ ंचल क े रायप ुर जिल े क े सा ेनाखान जमीदारा ें क े जमी ंदार नारायण सि ंह द्वारा क्रा ंति का बिग ुल फ ूंका गया, उनकी फा ंसी क े बाद स ैन्य विद ्रा ेह का न ेतष्त्व हन ुमान सि ंह द्वारा किया गया। सन ् 1885 म ें का ंग ्रेस की स्थापना ह ुइ र्, अ ंचल म ें राष्ट ्रीय च ेतना क े विकास म ें इसका भरप ूर या ेगदान रहा। साथ ही आय र् समाज, मालिनी रीडस र् क्लब, छत्तीसगढ ़ बाल समाज, कवि समाज की स्थापना जनच ेतना क े विकास की दष्ष्टि स े उल्ल ेखनीय ह ै। प ं. स ुन्दरलाल शमा र् न
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श्रीमती, भारती पहाड़िया. "प्रकृति एव ं र ंग (पर्यावरण के सन्दर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890583.

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Abstract:
असंख्य पहाड़, प ेड़, नदिया ं, झीलें, फ ूल-पत्तियां, पश ु-पक्षी अथवा मानव मात्र इस प्रकृति के अ ंग ह ै। मानव ने अपनी सा ैन्दर्या नुभूति का े कला के माध्यम से व्यक्त किया ह ै। रवीन्द्रनाथ टैगा ेर क े अनुसार - “ कलाकार प्रकृति प े्रमी ह ै। अतः उसका दास भी ह ै आ ैर प ्रेमी भी। ” कलाकार प ्रकृति में व्याप्त रंगतों का े एव ं उनक े प ्रभाव को फलक पर उतारते ह ैं, अमूर्त अभिव्यंजनावादी वस्तु का सूक्ष्म अध्ययन का उसक े प ्रभावों का तूलिकाघातों क े व ैविध्य से प ्रभावपूर्ण बनाते ह ै ं। इस प्रकार रंगा ें क े आकर्ष ण से चित्र आ ैर जीवन सजीव हो उठते ह ै ं। मानव जीवन में रंग का महत्वप ूर्ण स्थान है। रंगा े ं
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डा, ॅ. सुचित्रा हरमलकर. "न ृत्य संया ेजन की कला - का ेरियोग्राफी". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.887018.

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Abstract:
का ेरिया ेग्राफी का शाब्दिक अर्थ ह ै क्ंदबम ूतपजपदह यह ग्रीक भाषा के शब्द गवचमपं से लिया गया ह ै। कोरिया ेग्राफी का सामान्य अर्थ है- समूह स ंरचना, आ ैर जा े व्यक्ति, नर्तक या कलाकार इस कार्य को करता ह ै, उसे का ेरिया ेग्राफर कहा जाता है का ेरिया ेग्राफी के विषय मंे का ेई शास्त्र सम्मत विधान या जानकारी हमें प ्राप्त नहीं हा ेती किन्तु आज नृत्य क े संदर्भ में यह शब्द बह ुप ्रचलित ह ै। नृत्य का इतिहास उतना ही प्राचीन ह ै जितना मानव जीवन का इतिहास। मानव जीवन की दैनंदिन क्रियाकलापो ं में ख ुशी के अवसरों ने लोक नृत्यांे का े जन्म दिया। ये लोक नृत्य हमेशा समूहा ें में ही किये जाते थे। इन नृत्यों क े
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डा, ॅ. स्मिता खानवलकर. "भारतीय फिल्म संगीत म ें रसानुक ूल रंग-स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889265.

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Abstract:
मानव-सभ्यता क े साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ। चा ैसठ कलाओं में संगीत-कला, चित्र-कला आ ैर काव्य-कला विषेष महत्व रखती हैं। इनमें भी संगीत-कला अधिक प ्रभाव डालने वाली कला है। मनुष्य के हृदय में सुप्त भावा ें को जागृत करने में संगीत जितना सक्षम ह ै, उतनी आ ैर कोई विद्या नहीं। जो भाव चित्र क े माध्यम से व्यक्त नहीं किये जा सकते, उन्ह ें काव्य या भाषा क े माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता ह ैं आ ैर जिन भावों का े व्यक्त करने में भाषा भी असमर्थ रहती ह ै, उन्ह ें संगीत सहज ही व्यक्त कर देता ह ै।।शाॅप ेन हाॅवर का कहना है - ’’क ेवल संगीत ही ऐसी कला है, जो श्रोताआ ें से सीधा संबंध रखती ह ै। इसे किसी भी माध्
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अ, ंजना जैन. "भारत म ें प ेयजल प्रद ुषण - मानव स्वास्थ्य के लिए एक चुना ैति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.883525.

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Abstract:
पृथ्वी का 2/3 भू-भाग जल स े घिरा ह ुआ है। पृथ्वी पर जल की मात्रा 1.4 मिलियन क्यूबिक मीटर आंकी गई है। जिसका 97.57ः भाग महासागरों में होन े के कारण खारा जल है। लगभग 36 क्यूबिक मीटर स्वच्छ जल जा े पीन े व उपयोग म ें ल ेन े योग्य है उसम ें स े लगभग 28 मिलियन क्यूबिक मीटर जल बर्फ के रूप म ें ध्रुवों पर जमा ह ै। हमार े वास्तविक उपया ेग के लिये उपलब्ध लगभग 8 मिलियन क्यूबिक मीटर जल पर द ूनिया के लगभग 6 अरब से ज्यादा की आबादी निर्भर है।’1 पीन े योग्य जल के स्त्रोत के रूप में नदियाँ, तालाब, कुए व नलकुप उपलब्ध है। और इनके जल का उपयोग भी हम उसी स्थिति म ें कर सकत े है। जब यह जल प्रद ुषण से मुक्त हो। शुध्द
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डा, ॅ0 अभिलाशा चैधरी. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889276.

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Abstract:
आ ैर मन का घनिश्ठ सम्बन्ध ह ै, ये तो हम सभी जानते ह ै। स्वस्थ मन स्वथ्य षरीर शरीर आ ैर स्वस्थ्य षरीर ही निर्वि कार मन का वरण करता ह ै। रंग, मन आ ैर आत्मा की आ ैशधि है और इसीलिये वह विभिन्न षारीरिक मानसिक रोगा ें का प ्रतिरोध करने की क्षमता रखती है। मनुष्य के जीवन में रंगा ें का महत्वपूर्ण स्थान ह ै। वर्ण पूर्ण तः प्रकाष व दृश्टि पर निर्भर तत्व ह ै। एक की भी अनुपस्थिति रंग क े ज्ञान में बाधक सिद्ध हा ेती है। प ्रत्येक वस्तु का कोई न कोई रंग अवष्य होता ह ै आ ैर मूलतः वस्तुओं की पहचान उनके धरातलीय रंग क े कारण ही होती ह ै तथा प्रकाष की मात्रा क े कम या अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तु अलग-अलग दि
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आलोक, गोयल किरण बड े़रिया राकेश कवच े. "विकास के लिए पर्या वरण क े क्षेत्र म ें मनुष्य की नैतिक भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574866.

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Abstract:
मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्त ुलन विकास मार्ग का सन्त ुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्त ुलन व्यक्ति ही नहीं समूच े समाज और मानव स ंसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण ह ै। स ुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मन ुष्य प्रक ृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रक ृति से उसका रिष्ता अहिंसक आ ैर आत्मीयता का था। स्वार्थ आ ैर भोग संस्क ृति के कारण अब यह न क ेवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’ मन ुष्य क े अन ैतिक आचरण से जहां पर्यावरण सहित लगभग सभी क्षेत्रों मंे पतन हुआ ह ै वहीं अच्छ े आचरण और सामाजिक स्वीकृति से किया जान े वाले व
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रान, ू. उपाध्याय. "प्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883012.

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Abstract:
भारतवर्ष में प ्राचीन शास्त्रों, व ेद-पुराणों मे ं, धर्म ग्रन्थो में तथा ऋषि-मुनियों न े पर्या वरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया है । व ेदों में प ्रकृति प ्रदत्त पर्या वरण को द ेवता मानकर कहा गया है कि- ‘‘या े द ेवा ेग्नों या े प्सु चो विष्वं भ ुव नमा विव ेष, यो औषधिष ु, या े वनस्पतिषु तस्म ें द ेवाय नमो नमः’’ अर्था त जा े स ृष्टि, अग्नि, जल, आकाष, प ृथ्वी, और वाय ु से आच्छादित ह ै तथा जो औषधियों एव ं वनस्पतिया ें में विद्यमान ह ै । उस पर्यावरण द ेव को हम नमस्कार करत े है । प्रकृति मानव पर अत्यंत उदार रही ह ै । पृथ्वी पर अपन े उद्वव के बाद से ही मानव अपन े अस्तित्व के लिय े प्रकृति पर निर्भर रहा
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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स, ुधा शाक्य. "वर्तमान पर्यावरणीय समस्याएं एव ं सुझाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883040.

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Abstract:
भारत में प ्राचीन काल से ही प्रकृति एव ं पर्यावरण का अट ूट संब ंध रहा है, और धार्मिक ग ्रंथा ें में प्रकृति को जा े स्थान प्राप्त है वह अत ुलनीय है। प्रक ृति की सुरक्षा के लिये हमारी संस्कृति में अन ेक प्रयास किये गये, सामान्य जन को प्रकृति से जोड ़े रखन े के लिये उसकी रक्षा, प ूजन, विधान, संस्कार आदि को धर्म से जोड ़ा गया। गा ै एव ं अन्य जानवरो ं का प ूजन व ंश रक्षा के लिये तथा विभिन्न नदियों, प ेड ़ों, पर्व तों का प ूजन उसकी सुरक्षा और अस्तित्व को बनान े क े लिये अति आवश्यक हा े गया था। पर ंत ु जैसे समय व्यतीत होता गया व्यक्तियों की विचारधारा, सोच, अभिव ृत्ति, आस्था, भावों में परिवर्त न होता
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वीणा, अत्र े. "पर्यावरण प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर बढ़ता दुष्प्रभाव: एक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.803454.

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Abstract:
पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य का अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध है। आज औद्योगीकरण के दौर मे ं पर्यावरण ही द ूषित है तो स्वच्छ भोजन पानी एव ं वायु की कल्पना क ैसे ही जा सकती है। इसके फलस्वरूप मन ुष्य में अन ेक रोगा े ं का जन्म होता है। पर्यावरण क े म ुख्य तत्व भूमि, जल, वायु, वनस्पति एवं प्राणी सम ूह है। जल एव ं स्वास्थ्य: कल कारखाना ें का द ूषित जल नदी नालों म ें मिलकर अत्यधिक जल प्रद ूषित करता ह ै। प्रद ूषित जल पीन े से त्वचा रा ेग, पोलियो, पीलिया, टाईफाईड, बुखार, प ेचिस, अतिसार, कृमि ल ेप्टा ेस्पाईस, कंेसर, द ंतक्षय, फ्लूओरोसिस, गर्भपात, मंद विकास जैसी बीमारियों का े जन्म द ेत े हैं। प ेयजल में क्लोराइड
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ममता, गौड ़. "पर्यावरण एवं भारत म ें विधिक प्रावधान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882533.

Full text
Abstract:
पर्यावरण शब्द परि$आवरण शब्दों से मिलकर बना है, इसका शाब्दिक अर्थ हमार े चारा ें ओर के उस वातावरण से है, जिसमें जीवधारी रहत े है ं। इस प्रकार पर्या वरण भौतिक तथा जैविक अवयव या कारक का वह सम्मिश्रण है, जो चंह ु ओर से जीवधारिया ें को प्रभावित करता है। इस प्रकार पर्या वरण जीवा ें को प्रभावित करन े वाल े समस्त भौतिक एव ं जैविक कारकों का योग होता ह ै। यह कहा जा सकता है कि हमारी प ृथ्वी का पर्या वरण वह बाहरी शक्ति है जिसका जीवन पर स्पष्ट प्रभाव द ेखा जा सकता है। य े शक्तियाँ परस्पर सम्बद्ध हैं, परिवर्तनशील हैं तथा सम्पूर्ण एव ं संय ुक्त रूप मे ं जीवन पर प ्रभाव डालती हैं। इनमें भौतिक कारक के रूप म ें
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भारती, खर े., та कुमार अंजलि. "वानिकी एवं पर्या वरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574868.

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Abstract:
एक अरब स े ज्यादा जन सैलाब के साथ भारतीय पर्या वरण का े स ुरक्षित रखना एक कठिन कार्य ह ै वह भी जबकि हर व्यक्ति की आवश्यकताएॅ ं, साधन, शिक्षा एव ं जागरूकता के स्तर में असमान्य अंतर परिलक्षित होता है। संत ुलित पर्या वरण के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना करना मात्र एक कल्पना ही है। पर्यावरण स े खिलवाड ़ के परिणाम हम र्कइ रूप में वर्त मान में द ेख रहे हैं एव ं भोग रहे ह ैं। पर्यावरण विज्ञान आज के समय क े अन ुसार एक अनिवार्य विषय ह ै। यह सिर्फ हमारी ही नहीं अपित ु व ैश्विक समस्या ह ै। वर्त मान पर्यावरणीय अस ंत ुलन का े द ेखत े हुए इस विषय स े हर व्यक्ति का े जुड ़ना चाहिए एव ं जोड ़ना चाहिए। वानिकी एव
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एडलिन, अब ्राहम. "अला ैकिक अनुभवों का चित ेरा - साजन कुरियन मैथ्यू". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.893178.

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Abstract:
रंगा ें से ख ेलने वाले कलाकार साजन कुरियन मैथ्यू क¨ रंगा ें की कला यात्रा लिखने का सुअवसर प्राप्त हुआ।साजन कुरियन मैथ्यू क े प्रारम्भिक दौर के चित्रा ें में राजा रवि वर्मा, पाश्चात्य कलाकार डेलाक्रा, माइकल कैरीव ैग्या े ए ंजेला े, सल्वाडा ेर डाली, विस्टलर, आदि यूरा ेपीय चित्रकारों की श ैली से प्रभावित होकर यर्था थवादी आ ैर अतियर्थाथवादी चित्रण हुआर्। इ सा क े जीवन पर आधारित उनक े तैल चित्र (जा े वर्तमान में जबलपुर, केरल, सिहोरा, शहडा ेल,आ ैर दिल्ली, के गिरजाघरो ं में शा ेभायमान हंै,) मंे मानवीय अ ंग विन्यास, प ृष्ठ भूमि, वातावरण आदि में अत्यधिक बारीकी से रंगा े का प्रया ेग कर वास्तविकता का साक
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उषा, कुमठ. "जलवायु परिवर्तन आ ैर भारतीय क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883553.

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Abstract:
भारतीय अर्थ व्यवस्था की आधारशिला कृषि है। कृषि एव ं जलवाय ु परिवर्त न का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प ्रभाव कमजा ेर कृषक पर पड ़ रहा है। वर्षा की मात्रा में परिवर्त न होन े से फसलो ं की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड ़ा है। जलवायु म ें होन े वाला परिवर्त न हमारी राष्ट ªीय आय का े भी प्रभावित कर रहा ह ै। द ेश के बहुत से भागो ं में अल्प वर्षा से फसलें सूख जाती है या अति-वृष्टि से बह जाती है जिसस े न केवल खाद्यानों का उत्पादन कम हुआ बल्कि उनकी कीमत े भी त ेजी से बढ ़ गई। जलवायु परिवर्त न से फसला ें की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं ह ुई बल्कि उसकी ग ुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड ़ा है। तापमान के बढ
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र, ंजना शर्मा (व्यास). "्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक, औषधीय मूल्य". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883545.

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Abstract:
विश्व प्रकृति निधि भारत का हमेशा ही यह उद ्द ेश्य रहा है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण क े साथ दीर्घकालिक तथा न्याय संगत विकास करन े में सहभागी बन ें।1 जब तक हमार े पर्यावरण में बाह्य पदार्थ आकर मिलत े ह ैं संद ृषण होता ह ै। प ्रारम्भ में यह अल्प मात्रा में हा ेता है, जिससे एक स्तर तक मन ुष्य को कोई हानि नहीं पहुँचती तब तक यह संद ूषण की श्रेणी मे ं, ल ेकिन जैस े ही इस सीमा का उल्ल ंघन होता है तो यह द ूषण संद ूषण न रहकर प ्रद ूषण बन जाता है। हिन्द ू धर्म ग्रन्थ ‘‘वाराह पुराण’’ में लिखा है कि वृक्षो ं के उपकार पाँच महायज्ञ है ं। व े ग्रहस्थों को ईंधन पथिका ें को छाया तथा विश्राम, पक्षिया ें
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डाॅं, सीमा शर्मा एम. एल. बी. का ॅलेज इन्दौर. "चित्रकला म ें र ंग (विशेष स ंदर्भ अजन्ता)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890545.

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Abstract:
मानव जीवन में रंग का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वस्तु र्कोइ न का ेई रंग लिए ह ै। वस्तुआ ें के धरातल मे रंग हा ेने के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती ह ै। धरातला ें पर प ्रकाश की मात्रा कम अथवा अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तुयें अलग-अलग दिर्खाइ देती ह ैं। एक ही वस्तु बन्द कमरे में, धूप में तथा विभन्न ऋतुओं में अथवा विभिन्न स्थाना ें पर प ्रकाश की मात्रा तथा वातावरण के कारण रंग व्यवस्था की एक रंगत हा ेते ह ुये भी भिन्न दिखाई देगी। रंगा ें के प ्रति मानव का आकर्ष क कभी नहीं घटा ह ै क्या ेंकि रंग आकर्षक का एक माध्यम ह ै। इसलिये ता े आदिवासियों से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य के विकास में रं
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डा, ॅं. नरेन्द्र कुमार ओझा. "र ंगा ें का सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन पर प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.891778.

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Abstract:
रंगा ें का मानवीय जीवन क े साथ निकट का सम्बन्ध ह ै। रंगा ें क े बिना मानवीय जीवन अध ुरा है, रंगा ें का मानव के सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक, जीवन पर प ्रभाव पड़ता ह ै, रंग र्कइ प्रकार क े हा ेते ह ै जैसे पीला, लाल, हरा, ब ैंगनी, नीला, काला, श्वेत आदि हर प्रकार के रंग का अपना विशिष्ट महत्व है आ ैर इसकी अपनी विशिष्ट पहचान ह ै, जैसे लाल रंग उत्तेजक एवं आकर्षक होता ह ै, यह अत्यन्त ही सक्रिय एवं आक्रामक हा ेता है, इसक े द्वारा क्रोध, साहस, वीरता, श्रृ ंगारिकता प ्रकट हा ेती ह ै, महिलाओं में यह अत्यंत ही लोकप्रिय होता ह ै, महिलायें त्या ैहारा ें पर ईश्वर की आराधना के समय लाल रंग की साड़ियाॅं पहनना ही ज्
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अर्च, ना मेहरा. "बदलता पर्या वरण और मानव-व्यवहार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.838912.

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Abstract:
मानव और पर्या वरण के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रायः हम किसी बुर े कार्य के लिए व्यक्ति को दोष द ेत े ह ै किन्त ु सच्चाई यह है कि उसम ें पर्या वरण भी उतना ही दोषी होता ह ै, अतः पर्या वरण की क्षति के कारण आज मानव का अस्तित्व संकट में पड ़ गया है। अब पर्या वरण चेतना को जगाना अतिआवष्यक हा े गया ह ै क्योंकि पर्यावरण भौतिक रूप मे ं नहीं सामाजिक रूप मंे भी मानव समाज का े घेर े हुए है। किसी व्यक्ति के व्यवहार को द ेखकर उसके पर्या वरण का सहज अन ुमान लगाया जा सकता है। इसमें प्राकृतिक द ृष्य, वन उपवन, नदी, पर्वत, जीव जन्त ु के साथ-साथ जलवाय ु और जनसंख्या इन सबकी महत्वप ूर्ण भूमिका होती ह ै। इनमें जब भी अस
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डा, ॅ. वसंुधरा पवार. "स ंगीत म ें नवाचार का इतिहास". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886069.

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Abstract:
भारतीय संगीत का इतिहास उतना ही प्राचीन आ ैर अनादि ह ैं, जितनी मानव जाति। इसका सभारंच व ैदिक माना जाता ह ै। जितनी प्राचीन हमारे देश की सभ्यता आ ैर संस्कृति है उतना ही विस्तृत एव ं विषाल यहाँ के संगीत का अतीत ह ै। भारतीय संगीत का उद्भव सामदेव की ऋचाओं से ह ुआ है तथा इसका शैषव काल ऋषि मुनियों की तपोभूमि तथा यज्ञवेदिया ें क े पावन घ्र ुम क े सान्निध्य में सुवासित हा ेकर व्यतीत ह ुआ। यही कारण है कि भारतीय मनीषियों ने नाद का े ईश्वर के समान कहा गया ह ै, तथा नाद ब्रह्य की सदैव उपासना की ह ै। “ न नादेन बिना गीतं न नादेन बिना स्वरः। न नृŸां तस्मान्नादात्मकं जगत्।। ” न ता े नाद के बिना गीत है, न नाद क े
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डा, ॅ. अनीता भाना. "भा ेजन क े प्राकृतिक रंगा े का मानव जीवन में महत्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890603.

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Abstract:
रंगा े क े बिना जीवन की कल्पना असंभव ह ै। जीवन को जीवन्त बनाने में रंगा े का अपना योगदान ह ै । नीला आसमान, धूसर धरती, रंग बिरंगे फल-फ ूल, पशु पक्षिया ें व हरे भरे पेडा ें द्वार्रा इ श्वर ने प्रकृति मे जा े रंग संया ेजन किया ह ै इसकी सुंदरता के आगे विज्ञान की प ्रगति व तकनीक की चकाचा ैंध फीकी ही ह ै। भा ेजन हर प्राणी की प्राथमिक आवश्यकता ह ै इसे भी प्रकृति नें लाल पीले नारंगी, नीले जामुनी हरे, काले जैसे विविध रंगा े से नवाजा ह ै आ ैर उसे अधिक सुंदर, ग्राहय तथा मनमोहक बनाया ह ै। पपीते व आम का पीला रंग,तरब ूज, चेरी का लाल रंग, पालक गिलकी का हरा रंग हा े या जामुन का जामुनी रंग ये न क ेवल भोजन को आ
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डा, ॅ0 नाजिमा इरफान. "भारतीय चित्रकला में र ंगा ें का या ेगदान (अब्दुर्रहमान चुगताई के विष ेष संदर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889177.

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Abstract:
मानव जीवन में वर्ण का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। प्रत्येक वस्तु का ेई न कोई रंग लिये हुए ह ै। रंगा ें क े प ्रति मानव का आकर्ष ण कभी घटा नही ह ै। इसीलिये आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य क े विकास में वर्ण का सहारा लिया ह ै। कमरे की रंग व्यवस्था से लेकर बाग बगीचा ें में फ ूल पौधों की रंगया ेजना तक में कलाकार ने अपना हस्तक्ष ेप किया ह ै क्योंकि रंगा ें का अपना एक प्रभाव हा ेता ह ै जो मानव की मानसिक भावनाओं का े उद्वेलित करने की शक्ति रखता ह ै। वर्ण सार्वभौमिक ह ै तथा चित्रकला में सबसे अधिक महत्व रंग का े दिया जाता है। रंगा ें क े विविध रुपों मे ं मन की भावनायें जुड़ी ह ै ं जैसे बसन्त क
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क, े. राजलक्ष्मी. "चित्रकला म े र ंगा ें का सौन्दर्य". International Journal of Research – Granthaalayah Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890599.

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Abstract:
नीला आकाश, चारा ें तरफ फैली हरियाली रंग-बिरंगे फ ूल एवं सु ंदर-सु ंदर पश ु-पक्षी। ईश्वर की अद्भुत कृति एवं सु ंदर रंग संया ेजन। ऐसा प्रतीत होता ह ै कि मानो भगवान चित्रकार क े रूप में इस संसार रूपी कैनवास पर अपने रंगा ें एव ं रेखाओं क े माध्यम से एक सु ंदर चित्रण कर दिया ह ैं। अगर चित्रण में यदि रंगा ें का समावेश न हा े तो क्या तब भी तब भी यह संसार इतना ही सुंदर दिख ेगा? संभवतः नहीं। मनुष्य अपने नेत्रा ें क े माध्यम से जो कुछ भी देखता उनमें रंगा ें का समावेश होता ही ह ै, अतः यह कहना सर्व था गलत नही ं होगा कि जीवन में रंगा ें का स्थान सर्वोपरि है आ ैर यही रंग हमें अपने सा ैन्दर्य व आकर्ष ण के मा
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