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Journal articles on the topic 'परंपरा'

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पोखरेल Pokharel, निर्मला Nirmala. "दशमहाविद्या एक परिचय Dashamhabiddhya Ek Parichaya". Nepalese Culture 13 (2 грудня 2019): 43–56. http://dx.doi.org/10.3126/nc.v13i0.27500.

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Abstract:
नेपाली समाजको धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपरामा वैदिक मूल्य, मान्यता र आदर्शको जति नै प्रभाव तान्त्रिक मूल्य मान्यता र आदर्शको पनि रहेको छ । यहाँ नैगमिक(वैदिक) र आगमिक(तान्त्रिक) दुवै परंपराको समन्वय भेटिन्छ । सुक्ष्मरुपमा विचार गर्दा नेपाली समाजमा तन्त्र एवं तन्त्रवादको अझ वढि प्रभाव रहेको पाईन्छ । यहाँका धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा र रीतिरिवाजहरु आगम वा तन्त्रबाट नै बढि निर्देशित रहेका छन् । यसै परिप्रेक्षमा शाक्ततन्त्र परंपरा यहाँको प्रमुख तन्त्र परंपरामा पर्दछ । सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्डको परमकारणका रुपमा शक्ति अर्थात मातृदेवीलाई मानी तदनुरुप उपासना पद्धतिहरु प्रतिपादन गरिएका तन्त्रहर
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पोखरेल Pokharel, निर्मला Nirmala. "दशमहाविद्या एक परिचय Dashamhabiddhya Ek Parichaya". Nepalese Culture 8 (2 грудня 2019): 43–56. http://dx.doi.org/10.3126/nc.v8i0.27500.

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Abstract:
नेपाली समाजको धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपरामा वैदिक मूल्य, मान्यता र आदर्शको जति नै प्रभाव तान्त्रिक मूल्य मान्यता र आदर्शको पनि रहेको छ । यहाँ नैगमिक(वैदिक) र आगमिक(तान्त्रिक) दुवै परंपराको समन्वय भेटिन्छ । सुक्ष्मरुपमा विचार गर्दा नेपाली समाजमा तन्त्र एवं तन्त्रवादको अझ वढि प्रभाव रहेको पाईन्छ । यहाँका धार्मिक एवं सामाजिक परंपरा र रीतिरिवाजहरु आगम वा तन्त्रबाट नै बढि निर्देशित रहेका छन् । यसै परिप्रेक्षमा शाक्ततन्त्र परंपरा यहाँको प्रमुख तन्त्र परंपरामा पर्दछ । सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्डको परमकारणका रुपमा शक्ति अर्थात मातृदेवीलाई मानी तदनुरुप उपासना पद्धतिहरु प्रतिपादन गरिएका तन्त्रहर
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Kumar, Ashok, та Arun Vaghela. "नक्की झील : गरासिया हरिद्वार". VIDYA - A JOURNAL OF GUJARAT UNIVERSITY 2, № 1 (2023): 224–29. http://dx.doi.org/10.47413/vidya.v2i1.174.

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Abstract:
हमारा देश भारत सांस्कृतिक विविधताओं एवं विशेषताओं का देश है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में रंग बिरंगी सभ्यता एवं संस्कृति की विशिष्टता का दर्शन होता है। यहां का प्रत्येक स्थान स्वंय की विशिष्ट संस्कृति, तीज त्यौहार एवं रीति-रिवाजों तथा परंपरा आदि को लेकर अपनी एक अलग ही पहचान रखते हैं। ऐसे ही राजस्थान राज्य भी अपनी सांस्कृतिक विविधता एवं विशेषताओं की मंत्रमुग्ध तथा जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली इंद्रधनुषी छटा चारों ओर बिखरता है। राजस्थान राज्य का माउंट आबू क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य के साथ कई प्रकार की संस्कृतिक विविधताओं एवं परंपराओं को संजोए हुए हैं। इनमें से एक सांस्कृतिक परंपरा इस क्षेत्र की सर्
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सिंह, गीता. "भारतीय ज्ञान परंपरा एवं स्वदेशी ज्ञान की वैश्विक परिदृश्य में प्रासंगिकता एवं महत्व". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR INTERDISCIPLINARY STUDIES 9, № 68 (2021): 16312–19. http://dx.doi.org/10.21922/srjis.v9i68.10029.

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Abstract:
किसी भी देश की ज्ञान प्रणाली का मूल घटक उसका स्वदेशी ज्ञान होता है। यह शोध पत्र भारतीय ज्ञान परंपरा एवं स्वदेशी ज्ञान की वैश्विक परिदृश्य में प्रासंगिकता एवं महत्व को परिभाषित करके एक सिंहावलोकन प्रस्तुत करता है जो किसी संस्कृति या समाज के लिए अद्वितीय है और स्थानीय स्तर के निर्णय के लिए आधार बनाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं स्वदेशी ज्ञान की विशेषताएं और प्रकार अन्य देशों में सफल स्वदेशी ज्ञान के पहलुओं के साथ सामाजिक विकास पर इसका प्रभाव डालता है। यह ज्ञान एक सांस्कृतिक परिसर का अभिन्न अंग है जिसमें भाषाए सामाजिक प्रणाली का वर्गीकरणए संसाधनों का उपयोगए प्रथाओंए सामाजिक संपर्कए अनुष्ठान और आध
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मित्र, धीरज प्रताप. "वज्रयान तंत्र साधना तथा सिद्ध परंपरा: भारतीय तांत्रिक परंपरा में योगदान". International Journal of Advanced Academic Studies 7, № 4 (2025): 11–14. https://doi.org/10.33545/27068919.2025.v7.i4a.1411.

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सुरेश, चंद पचौरी, та शर्मा विशाल. "वर्तमान भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन". RECENT EDUCATIONAL & PSYCHOLOGICAL RESEARCHES 14, № 1 (2025): 42–46. https://doi.org/10.5281/zenodo.15283081.

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Abstract:
भारतीय समाज अपनी प्राचीन परंपराओं और तेजी से विकसित हो रही आधुनिकता से बुना हुआ एक समृद्ध चित्रपट है। यह शोधपत्र समकालीन भारत में परंपरा और आधुनिकता के बीच गतिशील अंतर्संबंध की खोज करता है, जिसमें सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक आयामों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह जांचता है कि इन शक्तियों का सह-अस्तित्व राष्ट्र की पहचान और प्रगति को कैसे आकार देता है। शोधपत्र चुनौतियों और अवसरों पर भी चर्चा करता है, सामंजस्यपूर्ण संश्लेषण के मार्गों पर प्रकाश डालता है। भारत, समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विविध परंपराओं का देश है, जो एक ऐसे चौराहे पर है जहाँ प्राचीन प्रथाएँ सह-अस्तित्व में हैं और कभी-कभी आधुनि
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AWASTHI, SUDHIR KUMAR. "भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में महायोगी गोरक्षनाथ का अवदान". शोध धारा SPECIAL (1 квітня 2024): 90–94. https://doi.org/10.5281/zenodo.15347497.

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Abstract:
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम् संस्कृति है और उतना ही पुराना है भारतीय ज्ञान-परंपरा का इतिहास। कल्याणकारी होने के कारण सदियों तक संघर्षों से जूझते हुए भी प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवमयी परंपरा समस्त जगत् को आज भी आलोकित कर रही है। हमारी भारतीय चिंतन परंपरा विश्व की एकमात्र ऐसी चिंतन परंपरा है जिसके मूल्य आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। आध्यात्मिक मूल्यों से सुसज्जित भारतीय ज्ञान-परंपरा के विकास में ऐसे विभिन्न उन्नायकों का योगदान निहित है जिन्होंने विपरीत समय में इसकी मूल चेतना को अक्षुण्ण बनाये रखने के स्तुत्य प्रयास किये है। इतिहास में महायोगी गोरक्षनाथ ऐसे ही महाउन्नायक हुए जिन्हो
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डॉ., राजू शिवाजी कोंडेकर. "मराठवाड्यातील भक्तीपंथ आणि सूफी परंपरा". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका (Udayagiri Bahubhashik Itihas Sanshodhan Patrika - A Bimonthly, Refereed, & Peer Reviewed Journal of History) 01, № 04 (2023): 07–14. https://doi.org/10.5281/zenodo.8328901.

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Abstract:
<strong>मराठवाड्यातील भक्तीपंथ आणि सूफी परंपरा</strong> डॉ. राजू शिवाजी कोंडेकर संशोधन मार्गदर्शक व विभाग प्रमुख, इतिहास विभाग, राजीव गांधी महाविद्यालय, मुदखेड, जि. नांदेड ४३१८०६ महाराष्ट्र, भारत <em>Corresponding author E-mail:</em> drkondekar9@yahoo.com Received: 06 September, 2023 | Accepted: 09 September, 2023 | Published: 11 September, 2023 ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- <strong>प्रस्तावना</strong> आतापर्यंत हिंदू आणि मुस्लिम धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक आणि सांस्कृतिक बाजूने बराच अभ्य
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उमाकािंत, आनेप्पा त्रिरादार. "भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य: ज्ञान परंपरा". AAKHAR HINDI JOURNAL 5, № 1 (2025): 8–12. https://doi.org/10.5281/zenodo.15081349.

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VARSHA, RANI. "ऋषि परंपरा में स्त्री शिक्षा". वेदवाणी 70, № 11 (2025): 15–18. https://doi.org/10.5281/zenodo.15267654.

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प्रताप, दान. "तिब्बत लामा परंपरा और इसका राजनीतिक परिप्रेक्ष्य". Indian Journal of Modern Research and Reviews 3, № 2 (2025): 51–58. https://doi.org/10.5281/zenodo.14912105.

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Abstract:
तिब्बत में बौद्ध धर्म की स्थापना 7 वीं सदी में राजा सोंग्त्सेन गम्पो के शासनकाल में हुई। 8वीं सदी में गुरु पद्मसंभव ने तांत्रिक बौद्ध धर्म की नींव रखी<em>, </em>जिससे लामा परंपरा का विकास हुआ। 15वीं सदी में जे चोंखापा द्वारा स्थापित गेलुग पंथ ने दलाई लामा की संस्था को मजबूत किया।<em> </em>तिब्बत की लामा परंपरा न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है<em>, </em>बल्कि यह तिब्बत की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में भी गहरा प्रभाव रखती है। इस शोध पत्र का उद्देश्य लामा परंपरा के उद्भव<em>, </em>विकास<em>, </em>धार्मिक-सामाजिक प्रभाव<em>, </em>और तिब्बत-चीन संघर्ष में इसकी भूमिका का वि
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घेवर राठौड़ та डॉ.रेणुका. "भारतीय ज्ञान परंपरा में संत साहित्य का योगदान". International Journal of Scientific Research in Humanities and Social Sciences 2, № 2 (2025): 157–61. https://doi.org/10.32628/ijsrhss25228.

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Abstract:
भारतीय ज्ञान परंपरा एक व्यापक और समृद्ध परंपरा है, जो वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों, शास्त्रों और लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुई है। यह परंपरा केवल दार्शनिक और आध्यात्मिक चिंतन तक सीमित नहीं रही अपितु समाज को नैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध करने में भी सहायक रही है। इस ज्ञान परंपरा को संत साहित्य ने जनसामान्य तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन के दौरान संत कवियों ने ज्ञान, भक्ति और सामाजिक सुधार को केंद्र में रखकर साहित्य की रचना की। कबीर, तुलसीदास, मीराबाई, रैदास, गुरु नानक, नामदेव, सेना, पिपा, धन्ना जैसे संतों ने लोकभाषा में अपनी रचनाएँ लिखि,
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खटके, श्री. विनोद अशोक. "बारामती व इंदापूर परिसरातील काही गावांशी निगडीत वैचित्र्यपूर्ण दंतकथा आणि मौखिक परंपरा : एक सर्वेक्षण". International Journal of Advance and Applied Research 6, № 1 (2025): 33–34. https://doi.org/10.5281/zenodo.14638270.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना: &nbsp;</strong> ग्रामीण भागात परंपरा, रितीरिवाज, चालीरीती, रूढी , श्रद्धा- अंधश्रद्धा या गोष्टींशी तेथील लोकांची नाळ जुळलेली असते. दररोजच्या जीवनात घडणाऱ्या चांगल्या वाईट वैचित्र्यपूर्ण गोष्टी, घटना या काही दिवसांनी दंतकथा आख्यायिका बनतात. घडणाऱ्या वेगवेगळ्या घटनांतून त्यांना गुढतेचे व अनाकलनीय वलय प्राप्त होते यातूनच विविध दंतकथा मौखिक परंपरा सुरू होतात व लोकजीवनाचा भाग बनतात.
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डॉ., योगेश्वरी फिरोजिया. "भारतीय चित्रों में नारी अंकन परंपरा". International Journal of Research - Granthaalayah 7, № 11(SE) (2019): 301–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.3592695.

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Abstract:
हमारे प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथों में समस्त कलाओं में चित्रकला को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह धर्म, अर्थ, काम और मौक्ष को देने वाली है यथा &nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; कलानां प्रवरं चित्रं धर्मकामार्थमोक्षदम्&zwnj;। &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; मंगल्य प्रथमं ह्येतद्&zwnj; ग्रहे यत्र प्रतिष्ठितम्&zwnj;॥ &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;
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., शिवरानी. "भारतीय दर्शन, धर्म और ज्ञान परंपरा". International Journal of Arts, Humanities and Social Studies 7, № 1 (2025): 501–5. https://doi.org/10.33545/26648652.2025.v7.i1g.213.

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प्रा., डॉ मीनाक्षी पुंडलिक पाटील. "संत एकनाथांचा धर्म भक्ती संयोग". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 4–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.7694836.

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Abstract:
मराठी वांगमयाचा इतिहासाचा अभ्यास करताना असे लक्षात येते की संत साहित्य हा मराठी वांगमय इतिहासाचा एक अविभाज्य भाग आहे इतकेच नव्हे तर एकूणच मराठी वांगमयाचा प्रवाहात मध्ययुगीन&nbsp; वांग्मय&nbsp; इसवीसन1050&nbsp; ते इसवी सन1820&nbsp; हा कालखंड मानला जातो. या काळात मोठी संत परंपरा निर्माण झालेली दिसते. भक्तीचा मळा फुलविणारा, वेदप्रामाण्य परंपरा जतन करणारा, सांस्कृतिकचे संवर्धन करून भेदाभेद विसर वयास लावणारा&nbsp; वारकरी संप्रदाय व ज्ञानेश्वरांनी चैतन्यमय बनविला त्यानंतर अनेक संतांनी ही परंपरा जोपासण्याचे कार्य सुरू ठेवले. महाराष्ट्रातील वारकरी संप्रदाय यांचे वर्णन करताना ज्ञानदेवे रचिला पाया तुका
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प्रा., डॉ मीनाक्षी पुंडलिक पाटील. "संत एकनाथांचा धर्म भक्ती संयोग". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 4–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.7694838.

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Abstract:
मराठी वांगमयाचा इतिहासाचा अभ्यास करताना असे लक्षात येते की संत साहित्य हा मराठी वांगमय इतिहासाचा एक अविभाज्य भाग आहे इतकेच नव्हे तर एकूणच मराठी वांगमयाचा प्रवाहात मध्ययुगीन&nbsp; वांग्मय&nbsp; इसवीसन1050&nbsp; ते इसवी सन1820&nbsp; हा कालखंड मानला जातो. या काळात मोठी संत परंपरा निर्माण झालेली दिसते. भक्तीचा मळा फुलविणारा, वेदप्रामाण्य परंपरा जतन करणारा, सांस्कृतिकचे संवर्धन करून भेदाभेद विसर वयास लावणारा&nbsp; वारकरी संप्रदाय व ज्ञानेश्वरांनी चैतन्यमय बनविला त्यानंतर अनेक संतांनी ही परंपरा जोपासण्याचे कार्य सुरू ठेवले. महाराष्ट्रातील वारकरी संप्रदाय यांचे वर्णन करताना ज्ञानदेवे रचिला पाया तुका
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मिश्रा, शालिनी, та डॉ ऋचा पाठक. "अयोध्या के परिप्रेक्ष्य में “श्री सम्प्रदाय". Humanities and Development 18, № 1 (2018): 21–26. http://dx.doi.org/10.61410/had.v18i1.102.

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Abstract:
हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय है-वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते है), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते है), शाक्त1 (जो देवी को परमशक्ति मानते है) और स्मार्त2 (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। परंपरा से चला आया हुआ सिद्धान्त या मत सम्प्रदाय को एक परंपरा ’’आध्यात्मिक वंश या ’’धार्मिक क्रम’’ के रूप में समझा जा सकता है।
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डॉ., रवींद्र कोंडीराम काळे, та मोरे संजय दिनकर डॉ. "स्वामी दयानंद सरस्वती यांचे राजकीय विचार". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 7 (2025): 290–92. https://doi.org/10.5281/zenodo.14792720.

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Abstract:
भारतीय समाज व्यवस्थेमध्ये प्राचीन काळापासून राजकीय विचार मांडण्याची दीर्घ परंपरा आढळून येते. वैदिक वाङ्मयातून राजकीय विचारांची सुरुवात झालेली दिसून येते. वेदकाळापासून ते इंग्रजांच्या आगमनापर्यंत म्हणजेच जवळपास तीन हजार वर्षापासून भारतात राजकीय विचार मांडण्याची परंपरा सुरू होती. पुढील काळात राजकीय विचारसरणीमध्ये विविध विचारसरणीची आखणी केलेली दिसून येते. यामध्ये ब्रिटिशांच्या सुरुवातीच्या काळात स्वामी दयानंद सरस्वती यांनी हिंदू धर्माच्या प्रभावात असताना देखील राजकीय विचारांमध्ये राष्ट्रवादी याबाबत विचार मांडले दिसून येतात. व आर्य समाजाच्या माध्यमातून त्यांनी राजकीय विचारांची परंपरा जोपासली आहे.&
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सुमन, पाल, та गोपाल कृष्ण ठाकुर डॉ. "शिक्षा और संस्कृति: भारतीय ज्ञान परंपरा और मुसहर समुदाय". Indian Journal of Modern Research and Reviews 2, № 10 (2024): 36–42. https://doi.org/10.5281/zenodo.14011201.

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Abstract:
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः वैश्विक पहचान दिलाने हेतु कृत संकल्पित है। भारतीय ज्ञान परंपरा प्राचीनकाल से ही सम्पूर्ण विश्व को रास्ता दिखाया है। भारतवर्ष के विश्वगुरु कहलाने का आधार इसकी आर्ष-परम्परा रही है। हमारे देश के ऋषि<strong>,</strong> मुनि एवं आचार्यों ने भारत सहित पूरे विश्व को ज्ञान रूपी प्रकाश से हमेशा आलोकित किया है। भारतीय लोक परंपरा और संस्कृति के मूल तत्त्व भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर अद्वितीय बनाते हैं। भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में कई संस्कृतियाँ माला में मोती की तरह गुथी हुई हैं। एक अद्वितीय भौगोलिक अवसंरचना में भी अपनी सामाजिक-सांस
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प्रा.अजित, जयराम जाधव. "मराठी बालकथा : एक अभ्यास (१९६० ते १९८० )". Journal of Research & Development' 14, № 12 (2022): 21–24. https://doi.org/10.5281/zenodo.7053496.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना </strong> &nbsp;बालसाहित्य हे मुलांच्या मनोरंजनाचे&nbsp; व ज्ञानसंवर्धनाचे एक महत्त्वाचे साधन&nbsp; आहे. प्राचीन काळापासून पिढ्यानपिढ्या मौखिक परंपरेने चालत आलेल्या आजीच्या गोष्टी, कहाण्या, अंगाई गीते तर लिखित स्वरूपातील &lsquo;बालबोध मुक्तावली&rsquo;, &lsquo;पंचतंत्र&rsquo;, &lsquo; बृहत्कथामंजिरी&rsquo;, &lsquo;जातक कथा&rsquo;, &lsquo;वेताळ पंचविशी&rsquo;, &lsquo;लोककथा&rsquo; या सर्व परंपरागत चालत आलेल्या प्रकारातून&nbsp; बालसाहित्य समृद्ध झाले आहे. &nbsp;मराठी बालसाहित्याची परंपरा समृद्ध आहे. साने गुरुजी, ना. धो. ताम्हणकर, भा. रा. भागवत, राजा मंगळवेढकर, यदुनाथ थत्ते हे य
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श्रीमती., कुमिदिनी जोशी रामचंद्र याडाराम. "पारंपारिक ज्ञान आणि आदिवासी वारसा पेटंट केल्याने निर्माण होणारी आव्हाने". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 12A (2025): 181–82. https://doi.org/10.5281/zenodo.14905330.

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Abstract:
पारंपारिक ज्ञान आणि आदिवासी वारसा हे दोन अत्यंत महत्त्वाचे घटक आहेत, जे आपल्या समाजाच्या सांस्कृतिक आणि भौगोलिक परंपरेचा एक महत्त्वपूर्ण भाग आहेत. पारंपारिक ज्ञान म्हणजे हे ज्ञान, कौशल्य, कल्पना आणि विश्वासांचा संच आहे, जो पिढ्यानपिढ्या पुढे जातो आणि समाजात रुळलेला असतो. आदिवासी वारसा हे म्हणजे त्या आदिवासी लोकांच्या विशिष्ट परंपरा, संस्कृती, आणि जीवनशैलीचे सांस्कृतिक धरोहर. पारंपारिक ज्ञान आणि आदिवासी वारसा पेटंट केल्याने अनेक आव्हाने आणि समस्यांचा सामना करावा लागतो. पारंपारिक ज्ञान हे अनेक पिढ्यांपासून एकत्रित केलेले आणि सामाजिक समुदायांमध्ये सामायिक केलेले असते. याला पेटंट केल्याने काही गंभ
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Verma, Jitendra, та Alok Pandey. "भारतीय ज्ञान परम्परा एवं संस्कृति: परम्परा और धरोहर का गौरव". Divyayatan - A Journal of Lakulish Yoga University 1, № 1 (2024): 18–21. http://dx.doi.org/10.69919/7ermvf60.

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Abstract:
हम अक्सर शिकायत करते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति और परम्पराओं का ह्रास हो रहा है। लेकिन ये ह्रास क्यों हो रहा है, इस बारे में हम कुछ सोचते नहीं और ना ही अपने प्रयासों को लेकर अपने भीतर झांकते है। हमारा इतिहास भी इस बारे में हमें कुछ ज्यादा जानकारी नहीं देता और जो जानकारी हमें इतिहास से मिलती है वह उस समय के शासनकर्ताओं तथा उनके इतिहासकारों द्वारा तोड़ी मरोड़ी हुई होती है। इसलिए हमें अपने इतिहास का पुनर्विश्लेषण करने की आवश्यकता है। कंबोडिया का अंगकोर वाट मंदिर जो कि विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक इमारत मानी जाती है, का निर्माण तमिल राजा और उसके तमिल कलाकारों द्वारा किया गया था। वैसे ये तो केवल झा
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कुमार, डॉ अनिल. "भारतीय ज्ञान परंपरा में मन की संकल्पना". International Journal of Advanced Academic Studies 5, № 8 (2023): 58–63. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2023.v5.i8a.1074.

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मधुकर, खंडू पवार. "ब्रिटिश इतिहासकारांचा साम्राज्यवादी लेखन परंपरा : एक अभ्यास". International Journal of Arts, Social Sciences and Humanities ०१, № ०१ (2023): १०—१३. https://doi.org/10.5281/zenodo.8210927.

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Abstract:
अठराव्या शतकाच्या शेवटी शेवटी भारताच्या बहुतांश भागांमध्ये ईस्ट इंडिया कंपनीची सत्ता प्रस्थापित झाली होती. त्यामुळे संपूर्ण भारतावर आपले वर्चस्व प्रस्थापित करून ते दृढमूल करण्याच्या दृष्टीने इंग्रजांच्या साम्राज्यवादी आकांक्षा वाढली वाढीस लागल्या. आपली सत्ता दीर्घकाळ राहावी यासाठी भारतीय लोक इंग्रजांची सत्ता बिनविरोध मान्य करतील अशी उपाययोजना करणे इंग्रजांना आवश्यक वाटत होते. केवळ शस्त्राच्या बळावर अशाप्रकारचे वर्चस्व दीर्घकालिक राहू शकत नाही याची जाणीव इंग्रजांना झाली. त्यामुळे भारतीय वरील इंग्रजांच्या सत्तेला तार्किक आधार देणे गरजेचे होते. हा तात्विक आधार इंग्रजांना भारतीयांच्या तुलनेत श्रेष
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कु., सीता दत्तराव शिंदे, та कल्पना मेहरे प्रा.डॉ. "लोक संस्कृतीमध्ये जत्रा यात्रांचे महत्त्व". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 345–48. https://doi.org/10.5281/zenodo.15250985.

Full text
Abstract:
<em>आर्य आणि अनार्य या दोन संस्कृतीच्या संघर्षातून लोकसंस्कृती आकाराला आली. या लोकसंस्कृतीची पाळेमुळे समाजात फार खोलवर रुजलेली आहेत. लोक संस्कृती आणि निसर्ग यांचा घनिष्ठ संबंध आहे. लोक संस्कृतीत निसर्गावर आधारित किंवा निसर्गाशी संबंधित अनेक सण आणि उत्सव साजरे करण्याची परंपरा आहे. जत्रा आणि यात्रा यांचा लोकसंस्कृतीशी अतुलनीय संबंध आहे &zwnj;. जत्रा आणि यात्रा या लोकसंस्कृतीच्या जीवन पद्धतीचा एक भाग आहेत. अनेक दिवस कष्ट करणाऱ्या जीवाला थोडा विसावा म्हणून लोकजीवनात उत्सव साजरे करण्याची परंपरा रूढ झाली. याच उत्सवांना पुढे जत्रा आणि यात्रा चे स्वरूप प्राप्त झाले.</em>
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मण्डल, अरुंधति. "डॉ. नरेन्द्र कोहली रामकथा आधारित उपन्यासों के पात्रों का चरित्र-चित्रण". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 6 (2024): 113–19. https://doi.org/10.29070/jxa6pn84.

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Abstract:
डॉ. नरेन्द्र कोहली ने भारतीय साहित्य में रामकथा को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है, जिसमें उन्होंने इसके पात्रों का गहन और मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण किया है। उनके उपन्यासों में राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, और रावण जैसे पात्र पारंपरिक धार्मिक कथाओं के सीमित दायरे से बाहर आकर मानवता, नैतिकता, और समाज की जटिलताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। कोहली ने इन पात्रों के मानसिक संघर्ष, उनके आदर्शों, और उनके निर्णयों की जटिलता को अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई से प्रस्तुत किया है। राम का आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में, सीता का साहस और स्वाभिमान, लक्ष्मण का भाई के प्रति अटूट समर्पण, हनुमान की भक्ति, और
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अनुजा, रोहिला. "वर्तमान समय में अजराड़ा घराने की परंपरा और योगदान का वर्णन". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 8, № 5 (Special Issue) (2021): 51–54. https://doi.org/10.5281/zenodo.6586895.

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Abstract:
अजराड़ा घराने में सब अपने बुजुर्गों की तरह तो वह नहीं बन पाए मगर वह अपनी विरासत को अच्छे से कायम रख रहें है। पुरानी&nbsp;पुस्तकों के आधार पर शम्मू खाँ और बब्बू खाँ की परंपरा में अजराड़ा घराने के लोगों की परंपरा चली मगर हमें बब्बू खाँ के बेटे&nbsp;अज़ीजुद्दीन उर्फ मुल्ला जी के तीन बेटे थे; रमजान खाँ, आशि़फ हुसैन खाँ, शमशाद खाँ, इससे आगे की परंपरा नहीं मिलती, तबला पूर्णतः&nbsp;एक भारतीय तालवाय है। उ. हबीबुद्दीन खाँ के वादन में गतिमानता सौंदर्य साकार हुआ करता था। वह &lsquo;धिन-धिन नागिन&nbsp;घेतग घेतग तिनति नाकिना&rsquo; जैसे कायदे के विस्तार शब्द प्रयोग व प्रचंड तैयारी में और कर्ण मधुर नादों, ध्
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डॉ., सुरेश वसंत शिखरे. "मौखिक इतिहासलेखन पद्धती". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 5 (2022): 1–13. https://doi.org/10.5281/zenodo.7397304.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना:</strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; इतिहासलेखन व आधुनिक संदर्भ साधनांचे क्षेत्र अधिक विस्तारत आहे. इतिहासलेखनात नवनविन विचार प्रवाहांचा अंर्तभाव झालेला आहे. वंचितांचा इतिहास, अॅनल्स, संरचनावादी, स्थानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, खाद्य संस्कृतीचा इतिहास इत्यादी नवनवीन प्रकारचे &nbsp;इतिहासलेखन प्रवाह एकाच घटनेचे विविध अंगानी इतिहास लेखन करताना दिसतात. या नविन विचारप्रवाहांनीनव्याने ऐतिहासिक साधनांचे महत्व, चिकित्सा, विश्लेषण अथवा प्रचलित साधनांचा नव्या पध्दतीने वापर करण्यास सुरुवात केलेली आहे. यामध्ये मौखीक परंपरा आणि साधनां अनन्यसाधारण महत्व प्राप्त
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प्रा., शिवाजी सुभाष खिराडे. "महात्मा गांधी यांचे विचार : काल, आज आणि उद्या "महात्मा गांधीची सत्य व अहिंसा संकल्पना"". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 04 (2023): 351–54. https://doi.org/10.5281/zenodo.10128687.

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Abstract:
भारताला प्राचीन समृद्ध वारसा लाभलेला आहे. साहित्य, कला, संगीत, तत्वज्ञान, राजकीय, सामाजिक इ. क्षेत्रात भारतीय लोकांनी आपली एक वैशिष्ट्यपूर्ण परंपरा जतन केलेली आहे. भारतात विविध जातपंथ, रूढी, परंपरा, भाषा, धर्म यांचे वैविध्य आहे. अनेक सत्ताबद्द्ल भारतात झालेत आणि त्यामध्ये प्राचीन काळापासून ते आजच्या आधुनिक काळापर्यंत विविध परिवर्तन घडून आलेत. ब्रिटीशांचे भारतातील वर्चस्व काढून टाकण्यासाठी अनेक देशभक्तांनी महत्त्वपूर्ण योगदान दिले. भारतीय स्वातंत्र्य संग्रामातील एक प्रमुख नेते आणि तत्वज्ञ म्हणून महात्मा गांधी यांचे अलौकिक स्थान आहे. आपल्या सत्य, अहिंसा या तत्वांवर आधारित अहिंसात्मकरित्या भारतभू
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BHATIA, LAYEKA. "सितार वादन परंपरा में मैहर घराने का योगदान". Swar Sindhu 6, № 2 (2018): 36–40. http://dx.doi.org/10.33913/ss.v06i02a06.

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Ghritlahare, Shiva. "सुआ गीत : एक मौन् परंपरा की मुखर क्रांति". INTERNATIONAL JOURNAL OF SCIENTIFIC RESEARCH IN ENGINEERING AND MANAGEMENT 09, № 06 (2025): 1–9. https://doi.org/10.55041/ijsrem49830.

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Abstract:
सारांश :- छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश है। वर्ष के बारह महिनों तक कोई- न -कोई तीज् त्योहार मनाए जाते है। इसका संबंध देवी ,देवताओं व प्रकृति की पूजा से होता है , ताकि लोगों के जीवन में सुख-शांति बनी रहे । ऐसे ही मौलिक सुख की प्राप्ति यदि समूह में हो तो अत्यन्त सुखदायी होती है। “सर्वहिताय सर्व् सुखाय” कि भावना व्यक्त होती है। हमारे छत्तीसगढ़ के लोकगीतों की विशेष बात यह है की यहां पर ज्यादातर लोकगीत एकल ना होकर सामूहिक रूप से होते हैं। इसमे एक गायक दल के साथ वादक् दल या सामूहिक दल का विशेष योगदान होता है। छत्तीसगढ़ की लोकगीतों में न केवल भावनावो की अभिव्यक्ति होती है, बल्कि समाज क
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Srivastava, Poonam. "यज्ञ और शिक्षा: वैदिक परंपरा में समग्र विकास". Interdisciplinary Journal of Yagya Research 8, № 1 (2025): 19–22. https://doi.org/10.36018/ijyr.v8i1.134.

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Abstract:
भारतीय संस्कृति की नींव वेदों में रखी गई है, और यज्ञ को इसका सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। “यज्ञ” शब्द का अर्थ है—देवपूजन, दान और संगतिकरण। यज्ञ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक उद्देश्य भी रखता है; यह त्याग, समर्पण और परमार्थ की भावना को जाग्रत करता है। जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण संस्कार और अवसर पर यज्ञ का आयोजन, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का माध्यम रहा है। वैदिक शिक्षा प्रणाली में यज्ञ का केंद्रीय स्थान था; शिक्षा का आरंभ उपनयन संस्कार से होता था और गुरुकुल में दैनिक यज्ञ, स्वाध्याय और सेवा का अभ्यास कराया जाता था। यज्ञ की प्रेरणाएँ जैसे त्याग, सेवा, और परमार्थ, विद्य
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प्रो., डॉ. संतोषकुमार गाजले. "भारतीय ज्ञान परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का योगदान". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 155–59. https://doi.org/10.5281/zenodo.15245270.

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Abstract:
हिंदुओं के आराध्य एवं हिन्दू संस्कृति के मुख्य आधार कहे जाते हैं राम मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों से सराबोर है राम और उनका चरित्र मानवीय संवेदना, करुणा, दया, सहानुभूति आदि गुणों के प्रतीक और सबका हित चाहने वाले व्यक्तित्व के रूप में प्रसिद्ध है राम का आदर्श चरित्र हिंदी साहित्य की सगुण भक्ति धारा में काव्य रचना दो तरह की मिलती है- एक कृष्ण पर आधारित काव्य रचना दूसरी राम पर आधारित । राम पर आधारित काव्य रचना करने वाले कवियों ने राम को आराध्य मानकर उनके माध्यम से अपनी काव्य साधना का परिचय दिया । राम को विष्णु अवतार एवं दशरथ पुत्र के रूप में जाना जाता है, अतः राम भक्ति के रूप में वैष्णव भक्त
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डॉ.कविता, राजेंद्र तातेड. "ऐतिहासिक अध्ययन मे भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्व". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 225–32. https://doi.org/10.5281/zenodo.15245407.

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Abstract:
<em>ज्ञानराशी</em><em> के संचित कोश का नाम साहित्य हे</em><em>, जिसके चिंतन, मनन, परिशिलन से बौद्धिक विकास होता है.भारतीय इतिहास के संदर्भ मे कहा जाता है की इतिहास लेखन के प्रति भारतीयो की विमुखता भारतीय संस्कृती का भारी दोष है. अलबेरूनी तथा अन्य युरोपीय इतिहासकारोने भारत के इतिहास लेखन के संदर्भ मे, प्रश्नचिन्ह उपस्थित किये है. किंतु प्राचीन भारत से प्राप्त साधनोसे ज्ञात होता है कि भारतीयो ने इतिहास लेखन को&nbsp; अपने जीवन मे स्थान दिया था. प्रस्तुत लेखमे प्राचीन भारतीय इतिहास प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ मे साहित्य के विविध प्रकार की जानकारी के साथ ऐतिहासिक साधन के रूप में अध्ययन किया गया
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KUMAR, LAVLESH. "तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा का स्वरूप तथा उपयोगिता". Research highlights XII, № 1 (2025): 118–21. https://doi.org/10.5281/zenodo.15461349.

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Abstract:
तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा का स्वरूप तथा उपयोगिता लवलेश कुमार * तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा तथा स्वरूप की गस्थगत कै सी थी ? यह आधगुनक काल की देन हैअथवा पहलेभी इस प्रकार के काययहोतेरहेहैं? इन सब केउत्तर पानेकेगलए हमेंतुलनात्मक अध्ययन केइगतहास पर प्रकाश डालना होिा। प्रारंगभक गस्थगत मेंजब एक शैक्षगिक रूप केसागहत्य मेंतुलनात्मक अध्ययन आया,तो इसेलेकर गवद्वानों मेंकई प्रकार की आशंकाएं थी तथा उसेअपयायप्त भी घोगित गकया िया क्योंगक गनगित प्रगतमानों के आधार पर सागहत्य का गववेचन,गवश्लेिि मगुककल हो जाता है। भारत मेंजहां गमगित संस्कृगत है, कई जागतयााँ,कई भािाएाँहै,कई प्रान्त हैं, वहााँसब तुलनात्मक अध्ययन मे
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KUMAR, LAVLESH. "तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा का स्वरूप तथा उपयोगिता". Research highlights XII, № 1 (2025): 118–21. https://doi.org/10.5281/zenodo.15462847.

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Abstract:
तुलतुलनात्मक अध्ययन की परंपरा का स्वरूप तथा उपयोगिता लवलेश कुमार * &nbsp; तुलनात्मक अध्ययन की परंपरा तथा स्वरूप की गस्थगत कै सी थी ? यह आधगुनक काल की देन हैअथवा पहलेभी इस प्रकार के काययहोतेरहेहैं? इन सब केउत्तर पानेकेगलए हमेंतुलनात्मक अध्ययन केइगतहास पर प्रकाश डालना होिा। प्रारंगभक गस्थगत मेंजब एक शैक्षगिक रूप केसागहत्य मेंतुलनात्मक अध्ययन आया,तो इसेलेकर गवद्वानों मेंकई प्रकार की आशंकाएं थी तथा उसेअपयायप्त भी घोगित गकया िया क्योंगक गनगित प्रगतमानों के आधार पर सागहत्य का गववेचन,गवश्लेिि मगुककल हो जाता है। भारत मेंजहां गमगित संस्कृगत है, कई जागतयााँ,कई भािाएाँहै,कई प्रान्त हैं, वहााँसब तुलनात्मक
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KUMAR, LAVLESH. "हिन्दी की स्वच्छंद काव्य परंपरा और रीतिमुक्त काव्य". Global thought 5, № 20 (2021): 200. https://doi.org/10.5281/zenodo.15463168.

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Abstract:
हिन्दी की स्वच्छंद काव्य परंपरा और रीतिमुक्त काव्य लवलेश कुमार स्वच्छंदतावाद रोमैटिसिज्य का हिन्दी अनुवार है। हिन्दी इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग संभवतः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास में पं. श्री धर पाठक को स्वच्चांदतावाद का प्रवर्तक मानते हुए किया है। स्वच्छंदतावाद का अर्थ है 'प्राचीन रूढ़ियों से मुक्ति की आकांक्षा। वस्तुतः स्वच्छंदतावाद एक विश्वव्यापी आंदोलन रहा है। कुछ विद्वान् स्वच्छंदतावाद को शाश्वत सत्य के रूप में ग्रहण करते हैं। उनकी धारणा है कि स्वच्छंदतावादी तत्व संसार के प्रत्येक साहित्य में आदिकाल से अब तक बराबर विद्यमान रहे हैं। यदि भारतीय साहित्य को
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देशमुख, प्रा. वंदना मधुकरराव. "मराठी संस्कृतीतील सामाजिक उत्सव रुजविण्यामध्ये संगीताची भूमिका". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 36 (2023): 255–57. https://doi.org/10.5281/zenodo.10427044.

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Abstract:
<strong>सारांश</strong><strong> :-</strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; मराठी संस्कृती ही प्राचीन काळापासून अव्याहतपणे चालू असलेली प्रक्रिया आहे. संस्कृती ही मानवी जीवनाला व्यापकत्व प्रदान करणारी असते. मानवी जीवनाच्या पद्धती, राहणीमान, धार्मिक- सामाजिक समजूती, चालेल ती रूढी परंपरा सण उत्सव यासारख्या अनेक गोष्टींचा संचय हा संस्कृतीमध्ये होत असतो. प्रस्तुत शोध निबंधाचा विषय हा मराठी संस्कृतीतील सामाजिक उत्सवाशी संबंधित असून या उत्सवांना संगीतकलेने मागील पिढीपासून संक्रमित करून संवर्धित केले आहे. संस्कृतीचा तरी गुणधर्म असला की प्रथा परंपरा यांना एका पिढीकडून
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प्रा., कु. सुप्रिया विद्याधर कांबळे. "आदिवासी लोकसाहित्य एक अमूल्य ठेवा". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 02 (2024): 06–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.11076590.

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Abstract:
साहित्य हे समाजाच्या संस्कृतीचा आचार विचारांचे एक प्रतिबिंब आहे. यामध्ये चालीरीती रूढी परंपरा सामाजिक बांधिलकी या घटकांचा समावेश होतो. प्राचीन काळापासून समाजात अनेक स्थित्यंतरे झाली आहे. यामध्ये सामाजिक स्थित्यंतरात साहित्याने फार मोठी भूमिका निभावली आहे. समाजामध्ये परिवर्तन घडवून आणण्याचे काम साहित्य नेहमीच करत आले आहे. साहित्याच्या विशाल प्रवाहातील एक उगवता प्रवाह म्हणजे लोकसाहित्य होय. लोकसहित्याचे प्रचलन हे एका पिढीकडून दुसऱ्या पिढीकडे&nbsp; परंपरेने जात असते. आदीम काळापासून चालत आलेल्या या चालीरीती रूढी-परंपरा, लोककथा, लोकगीते, निरनिराळे खेळ, जादूटोणा, ज्योतिष इत्यादींचा समावेश लोकसाहित्य
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Chouhan, Bindu. "Kirtilata ka punarpath." HARIDRA 1, no. 04 (2020): 07–12. http://dx.doi.org/10.54903/haridra.v1i04.7760.

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Abstract:
भारतीय वाङ्ग्मय में राजप्रशस्ति काव्यों की अविछिन्न परंपरा रही है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में पाणिनी के ‘पातालविजय’ और ‘जम्बावतीविजय’ से लेकर वामन, उदभट्ट, धनंजय के ‘दसरूपक’ से होते हुए तेरहवी शताब्दी में विद्याधर, सत्रहवी शताब्दी में पंडित जगन्नाथ कृत ‘रसगंगाधर’ तक अपने आश्रयदाता की प्रशस्ति में रचित काव्यों की समृद्ध परंपरा मौजूद है। भारतवर्ष में राजप्रशस्ति काव्य की परंपरा और उसकी निर्मिति के कारकों की पड़ताल शोध का दिलचस्प विषय रहा है। आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी ने आदिकालीन साहित्य की सामग्रियों के परिरक्षण में जिन तीन सूत्रों का उल्लेख किया उनमे ‘राजाश्रय’ को सबसे प्रबल और प्रमुख कारक माना
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Joshi, Abhijeet. "The Place of Peace and Non-Violence in the Vedic Tradition." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 10, no. 3 (2025): 227–32. https://doi.org/10.31305/rrijm.2025.v10.n3.025.

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Abstract:
The modern world draws its inspiration for peace and non-violence from an Indian personality – Mahatma Gandhi. And Gandhi, in turn, drew his inspiration from ancient traditions. It is commonly believed that Gandhi adopted the concept of non-violence from Jainism, and this argument appears logically sound. Today, Jainism is largely confined to certain parts of Rajasthan and Gujarat. As Jain followers traveled for trade and commerce, they carried Jainism with them wherever they went. However, Gandhi himself preferred to identify as a Hindu. Therefore, it is more likely that the inspiration for G
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प्रा.डॉ., गंगणे अमोल. "आर्य समाजाच्या क्रांतिकारकांचे हैदराबाद (मराठवाडा) मुक्तीसंग्रामातील योगदान". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 7 (2025): 125–29. https://doi.org/10.5281/zenodo.14784732.

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Abstract:
अध्यात्मवादी, पुरोगामी विचारवंत आणि आर्य समाजाचे संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती यांचा जन्म गुजरात मधील काटेवाड प्रांतातील टंकरा गावात 12 फेब्रुवारी 1824 रोजी ब्राह्मण कुटुंबात झाला. त्यांनी अध्यात्म आणि वेदांचे शिक्षण घेतले. त्यांच्या काळात समाजात मोठ्या प्रमाणात अनिष्ट प्रथा, परंपरा प्रचलित होत्या. या अनिष्ट प्रथा, परंपरा मानवतेला काळीमा फासणाऱ्या असूनही समाजात त्यांचे अनुकरण केले जात होते. समाजात जातीभेदाचे स्तोम निर्माण झाले होते. स्त्रिया आणि अस्पृश्यांना पशुप्रमाणे जीवन जगावे लागत होते. धार्मिक कर्मकांडांचे स्तोम वाढले होते. समाजात शैक्षणिक सुविधा नव्हत्या. राजकारणात एक अधिकार शाही होती.
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करवते, प्रा.रघुनाथ विश्राम. ""विदर्भातील आदिवासी आंध जमात आणि त्यांच्या विधी, प्रथा, परंपरा"". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 23 (2024): 559–64. https://doi.org/10.5281/zenodo.13683011.

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Abstract:
प्रस्तावना :-आदिवासी आंध जमात हि अति प्राचीन जमात आहे. म्हणूनच या जमातीला आदिम जमात सुद्धा म्हणतात. संपूर्ण भारतामध्ये ४९ आदिवासी जमाती आहेत. त्यापैकी महराष्ट्रात ४७ जमाती आढळतात. त्यापैकीच आंध हि महत्वपूर्ण जमात मानली जाते. १ &nbsp;आंध जमतीचे वास्तव्य महाराष्ट्रात विदर्भ आणि मराठवाडयातील काही जिल्ह्यामध्ये दिसून येते.त्यामध्ये विदर्भात अकोला, वाशिम, बुलढाणा,यवतमाळ व मराठवाडयात हिंगोली, नांदेड, परभणी या भागात आंध जमात अगदी डोंगर, दऱ्यात, माळावर, नदीकाठी वस्त्या करून राहते. त्यामुळेच हि जमात २१ व्या शतकात वावरतांनासुद्धा अतिशय मागास मानली जाते. त्याची विविध कारणे आहेत. त्यामध्ये प्रामुख्याने शि
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विनिता, वर्मा. "'शास्त्रीय नृत्य में नवीन प्रयोग': कथक एव ं हवेली स ंगीत के पद". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.885865.

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Abstract:
संगीत ंअर्थात् गायन, वादन और नृत्य अतिप्राचीन आ ैर ब्रह्मस्वरूप होने क े कारण अलौकिक ह ै । आद्यात्मिक संगीत जीवन का े पवित्र बनाकर आत्मोन्नति द्वारा मोक्ष की आ ेर ले जानेवाला मार्ग ह ै । नृत्य का आरंभ धर्म क े मूल भाव से ह ुआ है । मनीषियों ने इसे परमानंद का आधार निरूपित किया है । नृत्य आ ैर गान को हमारे यहांॅ, मोक्ष प्राप्ति का श्रेष्ठतम साधन बताया गया है । कथक नृत्य जिसका अन्य नाम ही ‘नटवरी नृत्य’ ह ै, इसका द्या ेतक ह ै कि कथक नृत्य अपनी अभिव्यक्ति क े लिए अधिकांशतः कृष्णचरित्र पर ही निर्भ र ह ै । यू ंता े कथक में परंपरागत अनेका ें पद, ठुमरी, भजन इत्यादि पर भाव प्रदर्शन किया ही जाता रहा ह ै क
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अर्शिया, रसूल. "सामासिक संस्कृति के नज़ीर: नज़ीर अकबराबादी". RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 05, № 02 (2020): 57–59. https://doi.org/10.5281/zenodo.3801384.

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Abstract:
हिंदुस्तान में विभिन्न जातियों और संस्कृतियों के मेल-जोल की परंपरा सदियों से चली आ रही है। विश्व के कोने-कोने से लोग यहाँ रहने एवं व्यापार करने के कारण आते रहे हैं। उन लोगों के आगमन के साथ-साथ उनकी भाषा, उनका सामाजिक, राजनीतिक दृष्टिकोण, धार्मिक रीति-रिवाज और साहित्यिक रूझान का प्रभाव हिंदुस्तानी संस्कृति में आत्मसात् होता गया। इसके अतिरिक्त यहाँ आने वाली जातियों ने इस मुल्क के रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेश-भूषा का ढ़ंग, व्यापार का तरीका, जीवन-शैली को स्वीकार किया। इस तरह शुरू से ही हिंदुस्तान विभिन्न संस्कृतियों का संगम बन गया और इसी मेल-जोल के प्रभाव को सामासिक संस्कृति का नाम दिया जाता है। लेखक
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Yadav, Dharmendra. "मानवीय गरिमा और मानवाधिकार : भारतीय दृष्टिकोण". RESEARCH EXPRESSION 6, № 8 (2023): 78–86. https://doi.org/10.61703/vol-6vyt8_9.

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Abstract:
नैतिक रूप मे मानवाधिकारो का इतिहास बहुत प्राचीनहै एक अवधारणा के रूप में मानवाधिकार दुनिया की लगभग सभी महान संस्कृतियों में विद्यमानरहा है । यहां तक कि विश्व के लगभग समस्त धार्मिक ग्रंथों में भी मानवाधिकारों की उपलब्धताकिसी न किसी रूप में हमें दिखाई देती है किंतु एक कानूनी अवधारणा के रूप में मानवाधिकारआधुनिक युग की देन है और इस रूप में इसका स्वरूप हमें पश्चिमी अवधारणा के रूप में दिखाई देता है । भारतीय परंपरा में मानवाधिकारमानवाधिकारों की यात्रा लंबी रही है सनातन काल के नैतिक अवधारणा से लेकर आधुनिक कालकी कानूनी अवधारणा तक भारतीय परंपरा में मानवाधिकारों की उपलब्धता हमेशा से रही है । सनातन काल से
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Mishra, Shyam Mohan. "Comparative analysis of Ram-Rajya and Gandhiji's concept of Ram-Rajya as a concept of ideal state in Indian thought." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 8, no. 9 (2023): 38–45. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2023.v08.n09.006.

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Abstract:
The concept of Ram Rajya has always been presented as an ideal state in Indian political thinking. Ram Rajya is such a system in which not only individuals but all living beings, whether movable or immovable or the entire creation, get a life of happiness and peace. Ramrajya as an ideal state has been accepted in the Indian tradition as a better ideal than Plato's ideal political system. It is not without reason that Mahatma Gandhi also calls his Swaraj as Ram Rajya and explains the nature of Ram Rajya. Regarding the nature of Ram Rajya, it is believed in the Indian public mind, especially in
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Paliwal, Ruchi. "समकालीन हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका". Naveen Shodh Sansar 1, № 49 (2025): 605–9. https://doi.org/10.63574/nss.9120.

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सोनाली, सुरेश पेकम. "महात्मा गांधीजींचे सामाजिक विचार". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 04 (2023): 238–40. https://doi.org/10.5281/zenodo.10115561.

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Abstract:
एक संपूर्ण समतावादी समाज निर्माण करावा असे गांधीजींचे स्वप्न होते. समाजावर एकुणच धर्मभावनेचा अपेक्षित बदल होत नाही तोपर्यंत समाजही बदलणार नाही, असे त्यांना वाटे. गांधीजींनी एकाच वेळी दोघांमध्येही परिवर्तन घडविण्याचा प्रयत्न केला. गांधीजी समाज परिवर्तनवादी होते. परंपरा आणि प्रगतिशीलता यांचा एक अद्भुत संगम त्यांच्या विचारसरणीत होता. गांधीजीचे सारे जीवन धर्मभावनेने अणुप्रणित होते. त्यांनी इशोपनिषदातून समानता व बंधुत्व, बौध्द व जैन तत्वज्ञानातून साधनांची पवित्रता, इस्लाममधून बंधुभाव, गीतेतून कर्म, थारूपासून सत्याग्रह व रस्कि पासून शेवटच्या माणसाच्या उध्दाराचा विचार घेतला. या धार्मिक विचारसरणीनेच त
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