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Journal articles on the topic 'वैदिक परंपराओं'

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निर्मला, शाह. "पर्यावरण प्रबन्धन एव ं समाज". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883555.

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Abstract:
मानव और पर्या वरण का निकट का सम्बन्ध है। पर्यावरण मानव का े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। स्वावलम्बी विकास की अवधारणा पर्यावरण एव ं विकास नीतियों के एकीकृत नजरिये पर आधारित है जिनका अभिप्राय किसी पारिस्थितिक क्षेत्र से अधिकाधिक आर्थिक लाभ लेना एव ं पर्यावरण के संकट एव ं जोखिम को न्यूनतम करना ह ै। इसम ें अन्तर्नि हित है, वर्त मान की आवश्यकताओं एव ं अप ेक्षाओं को भविष्य की क्षमताओं स े समझौता किय े बिना प ूरा करना। इसको प्राप्त करन े के लिये हमें विकास का पारिस्थितिक समन्वय करना होगा जिसमें हमें अपनी प्राथमिकताओं का प ुनर्नि न्यास करना चाहिये तथा एक आयामी प ्रतिमान छा ेड ़ द े
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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रामवीर, सिंह. "समाजिक समस्याऐं व पर्यावरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883543.

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Abstract:
सामाजिक पर्या वरण ;ठपव ैवबपंस म्दअपतवदउमदजद्ध में परिवर्ति त हो रहा है फलस्वरूप पर्या वरण संघटों क े मौलिक गुणा ें म ें परिर्वतन हो रहा है। स्वस्थ जीवन के लिए पर्यावरणीय परीक्षण आवश्यक ह ै, विकास क े संचालन के लिए नत्य व अनत्य संसाधनों का े उपयोग द ुर्लभ एव ं अमूल्य संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता न े पर्यावरण प ्रबन्धन को अव्यन्त महत्वप ूर्ण बना दिया है। 1 पर्यावरण के प ्रति सचेत संवद ेनशील तथा जागरूक बनाया जाना भी ब ेहद जरूरी है, लोगो को यह समझाया जाना आवश्यक है कि आखिर हमारा पर्या वरण या परिस्थितिक त ंत्र क ैसे प्राकृतिक आपदाआ ें से हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करता है तथा पर्यावरण का संरक्षण व
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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डा, ॅ. श्रीमती प्रतिभा श्रीवास्तव. "र ंग, स ेहत, सब्जियाँ - एक दृष्टिका ेण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.890493.

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Abstract:
रंगा ें का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इनके द्वारा हमें अपने चारों ओर की स्थितिया ें का ज्ञान होता ह ै आ ैर रंगा ें का प्रभाव ज्ञात हा ेता है। रंग मनुष्य की आँख में वर्णक्रम से मिलने पर छाया संब ंधी गतिविधियों से उत्पन्न होते ह ै। मूलरूप से इन्द्रधनुष क े सात रंगा ें का े ही रंगा ें का जनक माना जाता है। ये सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला व ब ैंगनी ह ै। मानवीय गुण धर्म में आभासी बोध के अनुसार लाल, नीला व हरा रंग हा ेता है। रंगा ें स े विभिन्न प ्रकार से वस्तु प ्रकाष स्त्रोत एवं श्रेणियां इत्यादि आती ह ै। प ्रकाष स्त्रोता ें के भा ैतिक, गुणधर्म जैसे प्रकाष विलियन, समावेषन, परावर्
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रान, ू. उपाध्याय. "प्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883012.

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Abstract:
भारतवर्ष में प ्राचीन शास्त्रों, व ेद-पुराणों मे ं, धर्म ग्रन्थो में तथा ऋषि-मुनियों न े पर्या वरण की शुद्धता पर अधिक बल दिया है । व ेदों में प ्रकृति प ्रदत्त पर्या वरण को द ेवता मानकर कहा गया है कि- ‘‘या े द ेवा ेग्नों या े प्सु चो विष्वं भ ुव नमा विव ेष, यो औषधिष ु, या े वनस्पतिषु तस्म ें द ेवाय नमो नमः’’ अर्था त जा े स ृष्टि, अग्नि, जल, आकाष, प ृथ्वी, और वाय ु से आच्छादित ह ै तथा जो औषधियों एव ं वनस्पतिया ें में विद्यमान ह ै । उस पर्यावरण द ेव को हम नमस्कार करत े है । प्रकृति मानव पर अत्यंत उदार रही ह ै । पृथ्वी पर अपन े उद्वव के बाद से ही मानव अपन े अस्तित्व के लिय े प्रकृति पर निर्भर रहा
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प्रज्ञा, पाण्ड ेय गरिमा यादव. "स्वच्छताः भारत की चुनौती". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883539.

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Abstract:
किसी भी द ेश की उन्नति का आधार स्वच्छता व स्वास्थ्य है। स्वच्छ पर्यावरण ही किसी भी समुदाय की स्वास्थ्य स्थिति को ऊंचा उठान े में सहायक है। स्वच्छ पर्यावरण सम ुदाय क े लोगा ें के जीवन स्तर को सुधारन े में सहायक हो सकता है। साथ ही वह समुदाय मं े रोगों के चक्र को तोड ़न े में भी सक्षम ह ै। सरकार व आम जनता के प्रयास व सहभागिता द्वारा विभिन्न संसाधनों का प्रया ेग किया जा रहा ह ै आ ैर ब ेहतर परिणाम हेत ु प्रयासरत हंै। इसके द्वारा समुदाय का सामाजिक-आर्थिक विकास, स्वच्छ पर्यावरण हेत ु संब ंधित सांस्कृतिक कारक, समुदाय की क्षमता, व्यवहार, कान ून आदि का उपया ेग ब ेहतर तरीके से हा े रहा है। भारत द ेश सम्प
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उषा, कुमठ. "जलवायु परिवर्तन आ ैर भारतीय क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883553.

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Abstract:
भारतीय अर्थ व्यवस्था की आधारशिला कृषि है। कृषि एव ं जलवाय ु परिवर्त न का सबसे ज्यादा प्रतिकूल प ्रभाव कमजा ेर कृषक पर पड ़ रहा है। वर्षा की मात्रा में परिवर्त न होन े से फसलो ं की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड ़ा है। जलवायु म ें होन े वाला परिवर्त न हमारी राष्ट ªीय आय का े भी प्रभावित कर रहा ह ै। द ेश के बहुत से भागो ं में अल्प वर्षा से फसलें सूख जाती है या अति-वृष्टि से बह जाती है जिसस े न केवल खाद्यानों का उत्पादन कम हुआ बल्कि उनकी कीमत े भी त ेजी से बढ ़ गई। जलवायु परिवर्त न से फसला ें की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं ह ुई बल्कि उसकी ग ुणवत्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड ़ा है। तापमान के बढ
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सृष्टि, जैन. "सचित्र जैन पाण्डुलिपियों म ें र ंग की भ ूमिका (आदिपुराण क े सन्दर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890551.

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Abstract:
्रथम- पिचुमंद नामक झाड़ी का गा ेंद आ ैर ब ेल को तिल के तेल में जलाकर काजल बनाया जाय तत्पश्चात् उसे लाख के जल के साथ लोहे क े बर्तन में भली भाँति भृ ंगराज तथा भल्लात्तक के रस क े साथ घोंटने पर स्याही बनती ह ै। द्वितीय- काजल की आधी मात्रा में गा ेंद तथा गोंद की आधी मात्रा में बेल लेकर ताँब े के बर्तन में लाख के रस क े साथ घा ेंटें। तृतीय- ब ेल तथा उसस े दा े गुना गा ेंद से दा े गुना काजल लेकर (लगभग) 6 घण्टा ें तक घा ेंटन े पर व ्रज के समान पक्की स्याही बन जाती है इसप ्रकार आदिपुराण में लिखने के लिये स्याही का प्रया ेग ह ुआ है। आदिपुराण के चित्रा ें में से कुछ चित्रा ें के माध्यम से मैने रंगा ें
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स, ंध्या जैन. "वैदिक काल म ें पर्यावरणीय संरक्षण क े प ्रति च ेतना पर एक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883020.

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Abstract:
हिन्द ू धर्म के सबसे प्राचीन ग ्रंथ व ेद आ ैर उपनिषद ् है इनमें जगह जगह प्रक ृति से विरासत में मिली सभी वस्त ुओं का जीवन स े गहरा जुड ़ाव मिलता है आ ैर इन सभी को अत्य ंत पवित्र मानकर लोग इनकी प ूजा अर्चना करत े है। व ेद वैदिक युग की शिक्षा के पाठ ्यक्रम की पाठ ्यपुस्तकें रही है शिक्षार्थी व ेद मंत्रों तथा सूक्तियों को कंठस्थ करत े और जीवन का अंग बनात े। वैदिक काल म ें पर्यावरण शिक्षा, प्रद ूषण के कारणा ें और निवारण के विषय में चिंतन किया जाता रहा ह ै। वैदिक युग के सिद्ध ग्रंथों न े पर्यावरण शिक्षा का े सर्वो परि माना। उनकी सीख आज और अधिक प ्रांसगिक व हितसाधक है।
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वर्षा, अग ्रवाल. "राग रागिनी और पर्यावरण का परस्पर सम्बन्ध". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883521.

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Abstract:
मन आ ैर उससे जुड ़ा मस्तिष्क जिस प्रकार हमार े भौगोलिक पर्यावरण को द ेखकर उस पर आसक्त होता ह ै और शरीर को अच्छे स्वच्छ पर्या वरण का साथ मानव मन को सुख शान्ति की ओर ले जाता है। भारतीय संगीत में विभिन्न राग-रागनिया ें का ध्यान पर्या वरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। ए ेसा सर्वविदित है कि एक अच्छा सा ेच, अच्छ े विचार, अच्छा स ंगीत आदि सभी अच्छे पर्या वरण का निर्मा ण करत े हैं। नदी का बहना, वायु का प ्रवाहमान होना, व ृक्षों की सांय-सांय सभी एक स ुखद संगीत ध्वनि का निर्माण करत े हैं जा े अला ैकिक है, सार्वभा ैमिक ह ै। परन्त ु हमारे सामव ेद में ऊँ का उच्चारण, मंत्रा ें का उच्चारण उद ्दात, अन ुद ्दात, स्
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किरण, बड ेरिया आलोक गा ेयल राकेश कवचे. "ज ैव विविधता और जलवायु परिवर्तन एक दृष्टिकोण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882063.

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Abstract:
जैव विविधता हमार े लिए बहुत महत्त्वप ूर्ण ह ै। ये हमार े जीवन के अभिन्न अ ंग है ं। अभी तक लगभग 1.75 मिलियन प्रजातिया ें की पहचान हो चुकी है। हालाँकि वैज्ञानिकों का मानना ह ै कि हमार े ग्रह पर लगभग 13 मिलियन प्रजातियाँ हैं। विभिन्न प्रजातियों की उपस्थिति न े मानव क े लिए इस ग्रह को आवास योग्य बनान े म ें मदद की ह ै। इनके बिना हम अपन े जीवन की कल्पना नहंी कर सकत े। जैव विविधता हमार े जीवन के लिए आवश्यक र्कइ वस्त ुएँ एव ं सेवाएँ उपलब्ध कराता ह ै। ये वो स्तम्भ ह ैं जिन पर हमन े अपनी सभ्यता बसायी ह ै। आर्थिक समृद्धि के लिए उत्तरदायी र्कइ उद्या ेगों का आधार ये जैव विविधता ह ै। इनको खतरा पहुँचान े का
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डा, ॅ. सन्ता ेष कुमार पाठक, та चिटकारिया निधि. "गढ़वाल की रामलीला का समाज पर प्रभावः एक सांगीतिक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886826.

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Abstract:
भारतीय स ंस्कृति अपने में विभिन्न सा ंस्कृतिक धाराओं का े समेटे ह ुये है, इन्हीं सा ंस्कृतिक धाराओं में एक धारा मर्या दा पुरूषोत्तम भगवान राम की लीला भी समाहित ह ै। इसका अपना एक अलग प ्रवाह स्पष्ट रूप से दृष्टिगा ेचर हा ेता है, जो भारतीय संस्कृति के साहित्य में तथा समाज में अपनी सांस्कृतिक व संस्कारित प्रभाव में विद्यमान ह ै। श्री राम के चरित्र का व ैषिष्ट्य यही है कि उन्होंने मानव जीवन की यात्रा क े मार्ग पर सम्पूर्ण विष्व को समान पथ-यात्री का संदेष देकर नई चेतना-शक्ति का े जाग्रत किया और समस्त विष्व ने उन्ह े व ंदनीय बना दिया। रामलीला मंचन इसी प ्रकार के जीवन दर्ष न का सरोवर ह ै, जिसमें एक द
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डॉ., टीना तांब े. "शास्त्रीय नृत्या ें में नवीन प्रयोग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.884962.

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Abstract:
परिवर्तन प्रकृति का नियम ह ै। प्रकृति में विद्यमान का ेई भी तत्व इस प्रक्रिया से अछूता नहीं रह पाया है। रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, मान्यताए, मानसिकता, नैतिक मूल्य आदि तथा सामाजिक व सांस्कृतिक परिदृश्य क े प्रत्येक क्षेत्र म े ं परिवर्तन दृश्यमान ह ै। प्राकृतिक परिवर्तन तो नैसर्गिक रूप से होते रहते ह ै परंतु अन्य र्कइ क्षेत्रा ें में यह परिवर्तन मानव की सृजनात्मक प्रव ृत्ति के फलस्वरूप उत्पन्न होते ह ै जिसमें प्रमुख ह ै “कला” क्षेत्र। सृजन करना मानव का नैसर्गिक गुण ह ै तथा नवीनता की खोज उसकी मूल प्रव ृत्ति। यही प्रवृत्ति जब निपुणता, कार्य का ैशल, प्रतिभा व सा ैन्दर्यबोध से प्रयुक्त हा ेकर सृ
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प, ्रदीप राजा ैरिया(शा ेधार्थी). "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव व रंग चिकित्सा". International Journal of Research – Granthaalayah Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891956.

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Abstract:
रंग मना ेवैज्ञानिक ़रुप से हमारे जीवन के पथ क े साथ गहर्राइ से जुड़ा ह ुआ ह ै या दुसरे शब्दों में कह ें तो यह हमारे जीवन का एक सच्चा साहचर्य है। एक ए ेसा साहचर्य जिसक े बगैर जीवन अधूरा सा प्रतीत हा ेता ह ै। इसका हमारे मना ेमस्तिष्क पर नित्य विविध प ्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव कभी-कभी साकारात्मक होता है तो कभी-कभी नाकारात्मक भी। इसलिए रंगा ें के चयन व इसके संसर्ग क े प्रति हमें सचेत व सजग रहना चाहिए। रंग हमारे मना ेमस्तिष्क पर अच्छा प ्रभाव डाल सके इसक े लिए हमें रंगा ें क े प ्रति अपनी समझ व संवेदनशीलता को विकसित व परिपक्व करना होगा। हमें यह निश्चित रुप से जानना होगा कि किन रंगा ें का प ्रयोग कि
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लाल, बहादुर कुमार. "मधुबनी ल¨क चित्र्ाकला की विश्¨षताएँ एव ं रंग¨ ं की अद्भ ुत संय¨जन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888812.

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Abstract:
मिथिलांचल की मध ुबनी ल¨क चित्र्ाकला के माध्यम से ल¨कचित्र्ा परम्परा का निर्वाह आज भी किया जा रहा ह ै। यहाँ की ल¨क कला श्©ली वंश परम्परा क े आधार पर आज भी गतिशील ह ै। मध ुबनी ल¨क चित्र्ाकला की विदेश¨ं में काफी मांग ह ै ल्¨किन वह अपने ही देश में उप ेक्षित ह ै। दुर्भाग्य की बात है कि जिनके हाथ में ह ुनर है, वे ग्रामीण कलाकार आमत©र पर गरीब है ं। देश के कला-जगत् की नजर इस पर नहीं गई, जबकि ‘‘जापान के हासेभावा ने राजधानी ट¨किय¨ से उत्तर-पश्चिम में स्थित निगाता में एक पहाड़ी पर मिथिला म्यूजियम की स्थापना की ह ै। जापान क े कला के मर्मज्ञ एव ं कला पारखी ‘‘हासेगावा’’ पच्चीस से अधिक बार भारत आ चुक े है ं।
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ऋचा, उपाध्याय. "विभिन्न कालान्तर्गत तत् वाद्या ें म ें अधुनातन प्रयोग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884966.

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Abstract:
भारतीय संगीत में अनेक प्रकार क े तत् वाद्यों की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है । आदि मानव ने अपनी रुचि एवं ब ुद्धि क े आधार पर कलात्मक विविध तत् वाद्यों की नी ंव ही नहीं डाली वरन् उनका उपयोग कर मानव जीवन का े भौतिक धरातल से ऊँचा उठाकर कला को दिव्य तथा आलौकिक धरा पर लाकर प्रतिष्ठित कर दिया । तत् वाद्यों की श्रेणी में किये गये प ्रया ेगा ें क े माध्यम से ही संगीत क े सिद्धान्तों ,श्र ुति, स्वर, सप्तक, एक स्वर से दूसरे स्वर की दूरी, मूछ्र्र च्ना पद्धति आदि का े प ्रमाणित व निष्चित किया जा सका । आज भी इसमें निरंतर अधुनातन प ्रयोग किये जा रह े ह ंै, जिस प्रकार स े प ्र त्येक वस्तु में समयंातराल क े
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मध, ुलिका वर्मा. "नवीं कक्षा क े विद्यार्थियों का क ुक्षी म ें चल रहे समग्र स्वच्छता अभियान क े प्रति जागरूकता का विकास". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882323.

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Abstract:
बाप ू के जीवन का संद ेष था ’’वह जो सचमुच म ें भीतर से स्वच्छ है। वह अस्वच्छ बनकर नही रह सकता‘‘ बाप ू जी सफाई पर बहुत जोर द ेत े थे। बाप ू का विष्वास था कि स्वच्छता समग ्र होनी चाहिये। और इसमें सब सामिल हा ें। ग ंद े और द ूषित दिमाग में स्वच्छ विचार उत्पन्न नही हा े सकत े है और एक निर्मल स्वच्छ व्यक्ति अपन े आसपास गंदगी मंे नही रह सकत े ह ै।प ्रस्त ुत शोध समग्र स्वच्छता अभियान के प्रति जागरूकता का विकास करन े एक प ्रयास है । प ्रस्त ुत शा ेध में धार जिले के कुक्षी क्षेत्र मे ं स्थित विद्यालय में कक्षा 9वीं क े 35 विद्यार्थिया ें को प ्रायोगिक समूह के रूप में चयनित किया गया। समग्र स्वच्छता अभिया
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डा0, (श्रीमती) बिन्दु अवस्थी. "र ंगा ें का मानव जीवन पर मना ेवैज्ञानिक प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889237.

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Abstract:
इस संसार में जा े कुछ भी अस्तित्व में ह ै जा े दृष्टव्य ह ै सबका अपना-अपना रंग ह ै। चाहे बात अ ंतरिक्ष, ग्रह, नक्षत्रा ें, प ृथ्वी पर पाये जाने वाले पश ु, पक्षियों व ृक्षों, नदिया ें, मानवों, मानव निर्मित वस्तुआ ें आदि किसी की भी हो, सभी वस्तुएँ अनेकानेक रंगा ें की होने क े कारण अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है। व े लोग भाग्यशाली ह ै जिन्हें वर्णा े का बोध ह ै। वर्ण बा ेध का कारण ही हमें इस संसार के सा ैन्दर्य का आभास होता ह ैं। वर्ण बोध हमें प ्रकाश की उपस्थिति में ही होता ह ै वर्ण प ्रकाश का ही गुण है ं। ‘‘शरीर विज्ञान क े विशारदों का कथन है कि प ुतलियों क े द्वारा प ्रकाश नेत्रा ें में प ्रव
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मुक, ुन्द कुमार. "वस्त्र अलंकरण म ें र ंगा ें की पुरातन भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888816.

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Abstract:
रंग वस्त्र आकल्पन (अलंकरण) का मूलाधार है। वस्त्र्ा के अनुरूप रंग द्रव्य¨ ं ;कलमेद्ध का चयन आ ैर उनक े प्रय¨ग की तकनीक, कलाकार अथवा रंगरेज के निजी दृष्टिक¨ण एवं उनक े अनुभव पर आधारित ह¨ती है। रंग¨ ं का, व्यक्ति की मन¨भावनाअ¨ ं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं पहल ुअ¨ं का अध्ययन करके वस्त्र्ा¨ं क े विविध प्रकार क े अनुसार रंगद्रव्य का सफलताप ूर्वक प्रय¨ग किया जाता ह ै। वस्त्र्ा रंर्गाइ की कला अतिप्राचीन ह ै। भारतवर्ष में र्कइ ऐसे प्रमाण मिलते ह ैं जिनमें वस्त्र्ा ब ुर्नाइ एवं वस्त्र्ा-रंर्गाइ के विषय र्में इ सा प ूर्व एवं उत्तरार्ध में मनुष्य¨ ं क¨ ज्ञान था। वस्त्र्ा ब ुनाई अ©र रंर्गाइ के इतिहास
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हरीश, केशरवानी. "खेती के नये आयामः समझा ैता क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883533.

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Abstract:
बढ ़ती जनसंख्या, बदलती जीवन शैली, कृषिगत उत्पादों का व्यवासायीकरण क े साथ साथ मौसमी परिवर्तनशीलता, उत्पादन प्रवृत्ति मे बदलाव और कृषिगत विषमता के परिणाम स्वरूप सबस े प्रमुख म ुददा कृषि के सुधार और विकास का ह ै। मानव अपन े विकास की चाहे जो सीमा निर्धारित कर ले पर ंत ु उसकी उदरप ूर्ति जमीन से उगे आनाज या उसके प्रसंस्करण स े ही होगी। कृषि के संदर्भ मे तमाम प्रकार के बदलावों क े परिणाम स्वरूप कृषि प ्रणाली मे भी बदलाव द ेखे जा सकत े हैं। साथ ही विश्व की जनसंख्या त ेजी के साथ बढ ़ रही ह ै तथा भारत के संदर्भ मे यह तथ्य है कि यह विश्व की द ूसरी सर्वाधिक जन ंख्या वाला द ेश है जा े 2030 तक यह चीन का े
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श्रीमती, मनीषा शर्मा. "स ंगीत म ें नवाचार का माध्यम स ंस्कृत भाषा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885863.

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Abstract:
मानव सभ्यता के साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ है । व ैदिक युग क े अ ंतिम कालखण्ड तक संगीत संब ंधी का ेई स्वतंत्र ग्र ंथ उपलब्ध नही ं ह ै तथापि संगीत कला के संबंध में उल्लेख स्थान पर अवश्य प ्राप्त होते ह ैं । ऋग्वेद में गीत, वाद्य आ ैर नृत्य तीना ें क े संब ंध में अन ेक उल्लेख पाये जाते ह ै ं। ऋग्वेद में गीत क े लिए गीर, गातु, गाथा, गायत्र तथा गीति जैसे शब्दों का प ्रयोग किया जाता था । यह सभी तत्कालीन गीत प्रकार थ े और इनका आधार छन्द आ ैर गायन श ैली थी । गीत तथा उसकी धुन के लिए ‘साम‘ संज्ञा भी रही । साम धुन या स्वरावली क े लिए पर्या यवाची शब्द रहा ह ै। यह तत्कालीन जनसंगीत क े अ ंतर्गत गायी जाने वा
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डा, ॅ. मीनाक्षी स्वामी. "भारतीय सामाजिक परम्परा म ें प्राकृतिक रंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890343.

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Abstract:
रामधारी सिंह दिनकर का कथन ह ै “भारतीय सामाजिक जीवन परम्पराओं स े सम्प ृक्त ह ै। सिंधु सभ्यता में बर्तनों पर हुई रंग-बिरंगी चित्रकारी हमारी परम्परा में चित्रकला के महत्व का प्रमाण ह ै। लाल आ ैर पीले रंगा ें से रंगी आकृतियाँ भारतीय सामाजिक परम्पराओं का प्रतीक ह ै। समाज के भीतर धड़कती सज ृन की चेतना रंगा ें क े माध्यम से अनुप्रमाणित उद्वेगा ें की अभिव्यक्ति ह ै। प्रकृति से प्राप्त रंगा ें से चित्रा ंकन का प ्रागेतिहासिक काल में ह ुए। जैसे काले, लाल, सफ ेद, पीले, नीले आदि। लोक कला का संब ंध भावनाओं आ ैर परम्पराओं पर आधारित ह ै। यह जन सामान्य की अनुभूतिया ें की अभिव्यक्ति ह ै। देवीय संक ेता े व परम
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अर्च, ना परमार. "पर्यावरण संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883529.

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Abstract:
मानव शरीर प ंच तत्वों- प ्रथ्वी, जल, वाय ु, अग्नि आ ैर आकाश स े ही बना ह ै। य े सभी तत्व पर्या वरण के धोतक है। प ्रकृति मे मानव को अन ेक महत्वप ूर्ण प्राकृतिक सम्पदायें भी ह ै। जिसका उपयोग मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में करता आया है ज ैसे- नदियाँ, पहाड ़, मैदान, सम ुद ्र, प ेड ़-पौधे, वनस्पति इत्यादि। प्रथ्वी पर प्राकृतिक संसाथनों का दोहन करन े से प्राकृतिक संसाथनो के भण्डार तीव्र गति से घटत े जा रह े है, जिससे पर्यावरण में असन्त ुलन बढ ़ रहा है। उसके परिणाम स्वरूप जल की कमी, आ ेजा ेन परत में छेद का पाया जाना, वना ें की अत्यधिक कर्टाइ से वना ें की कमी आना, सम ुद ्रों का जल स्तर बढना, ग्लेशियरों
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ख ुट, डिश्वर नाथ. "बस्तर का नलवंश एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 47–52. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20217.

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Abstract:
सभ्यता का विकास पाषाण काल स े प ्रार ंभ हा ेता ह ै। इस काल म ें बस्तर म े रहन े वाल े मानव भी पत्थर क े न ुकील े आ ैजार बनाकर नदी नाल े आ ैर ग ुफाआ ें म ें रहत े थ े। इसका प ्रमाण इन्द ्रावती आ ैर नार ंगी नदी के किनार े उपलब्ध उपकरणों स े हा ेता है। व ैदिक युग म ें बस्तर दक्षिणापथ म ें शामिल था। रामायण काल म ें दण्डकारण्य का े उल्ल ेख मिलता ह ै। मा ैर्य व ंश क े महान शासक अशा ेक न े कलि ंग (उड ़ीसा) पर आक्रमण किया था, इस य ुद्ध म ें दण्डकारण्य क े स ैनिका ें न े कलि ंग का साथ दिया था। कलि ंग विजय क े बाद भी दण्डकारण्य का राज्य अशा ेक प ्राप्त नही ं कर सका। वाकाटक शासक रूद ्रस ेन प ्रथम क े समय
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श्रीमती, संध्या देव. "रंगा े का सामाजिक परिप्रेक्ष्य". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889219.

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Abstract:
रंग आनंद एव ं उत्साह का प ्रतीक ह ै। रंगा ें का मानव मस्तिष्क पर विश ेष प्रभाव पड़ता ह ै। रंग किसी भी वस्तु में आकर्ष कता एवं वोधगम्यता उत्पन्न करते ह ै। रंग की प्राप्ति का स्त्रोत प ्रकाश ह ै। विभिन्न रंगा े की पहचान इसीलिए संभव होती ह ै क्या ेंकि वस्तुए ं प ्रकाश का े परावर्तित यो अभिशोषित करती है। प्रकाश आंखो में प ्रव ेश करता ह ै। हमारी दृष्टि संव ेदना पर क्रिया करता है। इसके कारण प ्रकाश की संव ेदना उत्पन्न होती ह ै आ ैर मस्तिष्क को रंग की अनुभ ूति हा ेती है। सामान्यतः वस्तुएं प ्रकाश का कुछ भाग परावर्तित एवं कुछ भाग अभिशोषित करती ह ै। उदा0 यदि वस्तुएॅ हरे रंग की ह ै। तो वह हरे क े अलावा
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वन्दना, अग्निहोत्री. "नदिया ें म ें प्रद ूषण और हम". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883519.

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Abstract:
जल को बचाए रखना सभी की चिन्ता का विषय ह ै, व ैज्ञानिक राजन ेता, ब ुद्धिजीवी, रचनाकार सभी की चिन्ता है, जल कैस े बचे ? द ुनियाँ को अर्थात पृथ्वी को वृक्षों को, जंगलो को, पहाड ़ों को, हवा को, पानी को बचाना है। पानी का े बचाया जाना बह ुत जरूरी ह ै। पृथ्वी बच सकती ह ै, वृक्ष ज ंगल, पहाड ़ और मन ुष्य, पषु, पक्षी सब बच सकत े ह ै, यदि पानी को बचा लिया गया और पानी प ृथ्वी पर है ही कितना? पृथ्वी पर उपलब्ध सार े पानी का 97ण्4ः पानी सम ुद ्र का खारा जल है, जो पीन े लायक नही ह ै, 1ण्8ः जल ध ु्रवा ें पर बर्फ के रूप म ें विद्यमान है और पीन े लायक मीठा पानी क ेवल 0ण्8ः ह ै जो निर ंतर प्रद ूषित हा ेता जा रहा
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निखिल, जोषी. "आर्थि क विकास एव ं जल प्रदूषण तथा जल संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882895.

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Abstract:
आर्थिक विकास करना मन ुष्य न े सदा से चाहा ह ै। यह भी तथ्य है कि स्वच्छ पर्यावरण के बिना मन ुष्य का जीवन अकल्पनीय ह ै। मन ुष्य और पर्यावरण क े इस रिष्त े में किसी भी हिस्से को बड ़ी चोट न केवल इस रिष्ते को खतर े म ें डाल द ेती ह ै बल्कि दोनों के अस्तित्व भी खतर े में पड ़ जात े हैं। पर्यावरण बिगड ़ेगा ता े मानव जीवन प्रभावित हा ेगा। इसका यह अर्थ नहीं ह ै कि आर्थिक विकास की कीमत पर पर्या वरण बचायें या पर्यावरण की कीमत पर आर्थिक विकास हासिल कर ें। दोनों के बीच एक संत ुलन की आवष्यकता ह ै ताकि मानव जीवन सुरक्षित बना रहे आ ैर लाभांवित भी हो। दोनों का केन्द ्र मानव ही है। प ्रकृति आ ैर मानव पृथ्वी पर
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स, ुधा शाक्य. "वर्तमान पर्यावरणीय समस्याएं एव ं सुझाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883040.

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Abstract:
भारत में प ्राचीन काल से ही प्रकृति एव ं पर्यावरण का अट ूट संब ंध रहा है, और धार्मिक ग ्रंथा ें में प्रकृति को जा े स्थान प्राप्त है वह अत ुलनीय है। प्रक ृति की सुरक्षा के लिये हमारी संस्कृति में अन ेक प्रयास किये गये, सामान्य जन को प्रकृति से जोड ़े रखन े के लिये उसकी रक्षा, प ूजन, विधान, संस्कार आदि को धर्म से जोड ़ा गया। गा ै एव ं अन्य जानवरो ं का प ूजन व ंश रक्षा के लिये तथा विभिन्न नदियों, प ेड ़ों, पर्व तों का प ूजन उसकी सुरक्षा और अस्तित्व को बनान े क े लिये अति आवश्यक हा े गया था। पर ंत ु जैसे समय व्यतीत होता गया व्यक्तियों की विचारधारा, सोच, अभिव ृत्ति, आस्था, भावों में परिवर्त न होता
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षषि, जोषी. "विस्थापन, पुनर्वा स एव ं पर्या वरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883036.

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Abstract:
मन ुष्य अपनी सुख समृद्धि, भोग एव ं महत्वकांक्षाओं की प ूर्ति हेत ु जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों एव ं पर्या वरणीय तत्वों का अनियोजित एव ं अनियन्त्रित प्रयोग कर रहा ह ै, इस कारण पयावरणीय विघटन एव ं असंत ुलन की स्थिति उत्पन्न हो र्गइ है। जल, वायु, भूमि, वन एव ं खनिज संजीवनी का निरन्तर विघटन हो रहा है, जल स्त्रोत स ूख रहे है, वातावरण विषाक्त हा े रहा है आ ैर भूमि का क्षरण भी हो रहा है। वनो ं के विनाष से पर्यावरण ह्ास में वृद्धि ह ुई है। इन सबके के साथ ही एक अमानवीय सामाजिक समस्या उत्पन्न हुई है और वह ह ै विस्थापन और पुनर्वास की समस्या। प ्रकृति के नजदीक निवास कर रहे लोगों की व्यथा, आदिवासी जनजातिया
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भाग्यश्री, सहस्त्रब ुद्धे. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय राग यमन का प्रय¨ग - एक विचार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886051.

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Abstract:
हिन्दुस्तानी संगीत राग पर आधारित ह ै। राग की परिभाषा अलग-अलग विद्वान¨ं ने अपनी-अपनी पद्धति से दी ह ै परन्तु सबका आशय ”य¨ऽयं ध्वनिविषेषस्तु स्वर वर्ण विभूषितः रंजक¨जन चित्तानां सः रागः कथित¨ बु ेधैः“ से ही संदर्भित रहा है। अतः यह कहा जा सकता ह ै कि भारतीय संगीत की आत्मा स्वर, वर्ण से युक्त रंजकता प ैदा करने वाली राग रचना में ही बसती ह ै। स्वर¨ं क ¢ बिल्ंिडग बाॅक्स पर राग का ढाँचा खड़ा ह¨ता है। मोटे त©र पर ये माना गया है कि एक सप्तक क¢ मूल 12 स्वर सा रे रे ग ग म म प ध ध नि नि राग क ¢ निर्माण में वही काम करते ह ैं ज¨ किसी बिल्डिंग क ¢ ढाँचे क¨ तैयार करने में नींव का कार्य ह¨ता ह ै। शास्त्रकार¨ं न
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सिन्हा, पद ्मनी, та आभा रूप ेन्द ्र पाल. "द ुग र् जिल े म ें सि ंचाइ र् स ंसाधन एव ं तान्द ुला परिया ेजनाए". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 64–71. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201911.

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Abstract:
विश्व के हर क्षेत्र में रहन े वाले लोगों के जीवन का आधार स्तम्भ जल ही हैं। जल ही जीवन हैं। जल भूतल पर पाये जाने वाले समस्त प्राणियों एव ं वनस्पतियों के जीवन का आधार हैं। जल के अभाव में पौधे , वृक्ष , प्राणी , जीव एव ं वातावरण की अन ेक क्रियाएॅं संभव नहीं हैं। जल प्रकृति का अमूल्य संसाधन हैं। सजीवों में जीवन की सम्पूर्ण जैविक क्रियाएॅ ं जल की उपस्थिति में ही होती हैं। जल समस्त पशुओं वनस्पतियों व मानव जीवन का मुख्य आधार हैं। जल का उपयोग कृषि , उद्योग तथा घरेलू उपयोग के संसाधन के रूप में किया जाता हैं। भौगोलिक संरचना के अनुसार प्रदेश की प्रमुख नदी, महानदी की सहायक नदियां - खारून , ताद ुला , शिवना
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डा0, अजय क. ुमार गुप्ता. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890587.

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Abstract:
आस्ट वाल्ड (जर्मन वैज्ञानिक) के अनुसार जिसने रंगा ें क े बारे में अपने मौलिक विचार संसार को दिये ह ै- आदर्श रंग आठ ह ै। व े है पीला, लाल, बैगनी, नीला, नारंगी, हरा, आसमानी, आ ैर धानी या हल्का हरा । रंगा ें क े विषय में अनेक मत प ्रचलित ह ै पर आजकल के अधिकांश कलाकार आस्ट वाल्ड के मत का े ही मानते ह ै इनके मतानुसार मुख्य रंग पीला, लाल, नीला आ ैर हरा ये चार हा ेते ह ै आ ैर आदर्श रंग आठ हा ेते ह ै। प ्रथम चार रंगा ें का े मौलिक (व्तपहदंस) रंग कहते ह ै आ ैर दूसरे चार अर्थात ब ैगनी, आसमानी, नारंगी आ ैर धानी का े द्वितीय रंग (ैमबवदकंतल) कहते ह ै। इनके अतिरिक्त तीन रंग आ ैर ह ै काला, सफेद, खाकी (ळतंल)
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सुरभि, त्रिपाठी. "''चित्रकला म ें र ंग'' (प्रागैतिहासिक काल स े वर्तमान काल तक के परिपेक्ष्य में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890519.

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Abstract:
सुख-दुःख, उत्तेजना, भय, विश्राम, उल्लास आदि का पर्या य ही रंग ह ै। रंग प्रकृति के कण-कण में व्याप्त ह ै। घरा क े प ्रत्येक रंग का अपना एक सौदंर्य व नैसर्गिक गुण होता ह ै, परन्तु उसे किस प ्रकार प ्रयुक्त किया जाय यह कलाकार की क ुशलता एवं दक्षता पर निर्भर करता ह ै, एक प ्रकार से रंग ही मनुष्य की प ्रव ृत्ति की अभिव्यक्ति हैं, जिसे कलाकार अपने अनुभव के साथ प ्रस्तुत करता है। रंगा ें क े प ्रति मनुष्य का आकर्ष ण स्वाभाविक ही नहीं वरन् जन्मजात ह ै, इस प ्रकार रंग व्यक्ति विशेष की कलाक ृति का सबसे महत्वपूर्ण व सार्थ क तत्व ह ै। रंग व्यक्ति विश ेष की अभिव्यक्ति भी ह ै। हिन्दू धर्म में वर्ण (रंग) का
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चरनजीत, कौर. "आधुनिक परिवारो म ें रसोई उघान क े प ्रति अभिव ृत्तिया ं ज्ञान एवं व्यवहार का अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.574867.

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Abstract:
भारत द ेश में वर्त मान म ें पर्या वरण प ्रद ूषण एक विकट समस्या हैं। जिसके स ुधार में गृह वाटिका का महत्वप ूर्ण योगदान हो सकता हैं। घनी वस्तियों तथा औद्योगिक क्षेत्रों म ें भी ग ृहवाटिका की विश् ेाष भ ूमिका ह ैं। यदि घर के सामन े पेड पौधे लग े हों तो घर के अंदर धूलमिट ्टी नहीं आती तथा स्वच्छ हवा का आवागमन बना रहता है। इसमें घर की रसोई से निकलन े वाले व्यर्थ पदार्थो का उपयोग खाद के रूप में किया जा सकता ह ै। यह एक छोटी उत्पादन इकाई के रूप में भी हो सकती ह ै। इन्ही तत्थ्यों का े ध्यान में रखकर गृहवाटिका एक प्रयोगशाला प्रतीत होती है, जहां व्यक्ति उद्यानषास्त्री न होत े हुए भी राष्ट ृ्र् ीय विकास एव
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डॉ., व. ंदना चराटे. "र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889267.

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Abstract:
रंग मानवीय जीवन में विविध अनुभूतिय¨ ं एव ं संव ेदनाअ¨ं का पर्याय ह ै। मनुष्य की दुनिया भी विविध रंग¨ ं से बनी है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में भी विविध संस्कार¨ं का स्वरूप रंग¨ ं क¢ इर्दगिर्द ही समाया हुआ ह ै। ज¨ उत्साह, निराशा, सुख और दुख की अनुभूति करवाते है ं। इसी तरह मनुष्य का शरीर भी विविध रंग¨ ं से निर्मित है, ज¨ उसकी मानसिक आ ैर शारीरिक स्थिति का द्य¨तक है, रंग¨ ं का यह संतुलन प्रकृति अर्थात् ईश्वर प्रदŸा ह¨ता ह ै। इसमें गडबडी या असंतुलन ह¨ने पर मनुष्य अस्वस्थ ह¨ जाता ह ै, तब विविध उपचार या चिकित्सा पद्धति क¢ माध्यम से इन रंग¨ ं क¨ संतुलित कर मनुष्य क¨ स्वस्थ बनाने का प्रयास किया जाता है
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दिवाकर, सिंह ता ेमर. "कार्बन टेªडिंग एंव कार्बन क्रेडिट जलवायु परिवर्तन समस्या समाधान म ें सहायक". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.803452.

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Abstract:
जलवायु परिवर्त न की समस्या के लिए न तो विकसित द ेष आ ैर न ही विकासषील द ेष जिम्मेदारी लेन े का े त ैयार ह ैं। क्या ेंकि र्कोइ विकास से समझौता नहीं करना चाहता है। इसी कारण यह समस्या ओर द्यातक बनती जा रही ह ै। अभी हाल ही में ग ्रीन हाऊस ग ैसा ें के कारण विष्व के समक्ष समस्याएॅ उभकर सामन े आई हैं। 1) ओजोन परत म ें छिद ्र:- धरती के वातावरण में मौजूद ओजोन की परत हमें सूर्य से निकलन े वाली पराबैंगनी किरणों से बचाती हैं। परन्त ु हवाई ईधन और र ेफ्रिजर ेषन उद्योग स े उत्सर्जित होन े वाली क्लोरा े फ्लोरो कार्बन गैस से धरती के वातावरण में विद्यमान ओजोन की सुरक्षा छतरी में छिद ्र हा े गए हैं। 2) समुद ्र स
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अ, ंजना जैन. "भारत म ें प ेयजल प्रद ुषण - मानव स्वास्थ्य के लिए एक चुना ैति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.883525.

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Abstract:
पृथ्वी का 2/3 भू-भाग जल स े घिरा ह ुआ है। पृथ्वी पर जल की मात्रा 1.4 मिलियन क्यूबिक मीटर आंकी गई है। जिसका 97.57ः भाग महासागरों में होन े के कारण खारा जल है। लगभग 36 क्यूबिक मीटर स्वच्छ जल जा े पीन े व उपयोग म ें ल ेन े योग्य है उसम ें स े लगभग 28 मिलियन क्यूबिक मीटर जल बर्फ के रूप म ें ध्रुवों पर जमा ह ै। हमार े वास्तविक उपया ेग के लिये उपलब्ध लगभग 8 मिलियन क्यूबिक मीटर जल पर द ूनिया के लगभग 6 अरब से ज्यादा की आबादी निर्भर है।’1 पीन े योग्य जल के स्त्रोत के रूप में नदियाँ, तालाब, कुए व नलकुप उपलब्ध है। और इनके जल का उपयोग भी हम उसी स्थिति म ें कर सकत े है। जब यह जल प्रद ुषण से मुक्त हो। शुध्द
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डा0, इन्दु शमा, та अंजुली बिसारिया डा0. "र ंगा ें का मनौवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889225.

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Abstract:
सोशिएट प ्रोफेसर चित्रकला विभ्सृष्टि की प ्रत्येक वस्तु में रंग ह ै। मानव जीवन से रंग का नैसर्गिक सम्बन्ध है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन रंगा ें क े मध्य ही दृष्टिगोचर हा ेता ह ै। प्रकृति की प ्रत्येक रचना चाहे वह सूर्य हो धरणी हो, आकाश हा े या व ृक्ष हो का ेई न कोई रंग लिय े ह ुये ह ैं। वस्तुआ ें क े धरातल में रंग हा ेने के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती है। रंग क े अनुभव का माध्यम प ्रकाश ह ै, जो वस्तु से प ्रतिबिम्बित हा ेकर हमारे अक्षपटल तक पह ुॅंचता ह ै। अतः प ्रकाश क े परिवर्तित हा ेने से अथवा प ्रकाश की मात्रा कम या अधिक होने से एक ही रंग की वस्तुएॅं अलग-अलग दिर्खाइ पड़ती ह ैं। तेज
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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मिश्रा, आन ंद म. ुति र्, та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति क े पर ंपरागत चिकित्सा पद्धति एव ं स्वास्थ्य का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 79–86. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201913.

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Abstract:
परम्परागत चिकित्सा प्रणाली मानव के ज्ञान द्वारा अर्जित चिकित्सा की ऐसी विधि है जो कई पीढि ़यों से चली आ रही है। जिसके प्रयोग से मन ुष्य कई प्रकार के असाध्य रोगों का उपचार करन े में समर्थ रहा है। आदिवासियों का जीवन मुख्यतः जंगलों पर आश्रित रहा है। मन ुष्य शुरूआत से ही अपन े भोजन, आश्रय और चिकित्सा के लिए प्रकृति पर ही निर्भर रहा है। वत र्मान में चिकित्सा प्रणाली में अंतर होने के उपरांत भी चिकित्सा पद्धंतियो का आधारभूत उद ेश्य मन ुष्य के स्वास्थ्य तथा कल्याण की कामना ही हैं। समाज में स्वास्थ्य व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है, तथा रोग मुक्ति की लालसा करता है । जनजातीय समापन में आज भी चिक
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म, ुकेश दीक्षित. "सामाजिक समस्याएं व पर्या वरण: उच्चतम न्यायालय की भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882783.

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Abstract:
पर्यावरण से मानव का गहरा संब ंध ह ै। मन ुष्य जब से इस पृथ्वी पर आया, उसन े पर्या वरण को अपन े साथ जोड ़े रखा है। सूर्य, चन्द ्रमा, पृथ्वी, पर्वत, वन, नदियां, महासागर, जल इत्यादि का प्रयोग मन ुष्य मानव विकास के आर ंभ से करता आ रहा है। मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में लकड ़ी, भोजन, वस्त्र, दवायें इत्यादि प्राप्त करन े हेत ु प्राकृतिक सम्पदा का शुरू से उपयोग किया है और वर्त मान मे निर ंतर जारी है। सामाजिक परिवर्त न क े साथ औद्योगिक विकास एव ं जनसंख्या वृद्धि म ें पर्यावरण को प्रभावित किया है। औद्योगीकरण के कारण व्यक्ति आज अपनी आवश्यकता क े अन ुरूप पर्यावरण को बदलन े के लिये सक्रिय कारक बन गया है। वन
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मोनीषा, वीरवानी. "स ेहत का मीत - स ंगीत". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.885867.

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Abstract:
संगीत लोगा ें का े संव ेदना क े स्तर पर एक गहरी समझ देकर उन्ह ें ब ेहतर बनने की दिशा में प्र ेरित करता ह ै आ ैर यही तत्व जब निज से व्यापक हा ेता ह ै ता े दुनिया भी बदल सकती ह ै. ये संगीत ही है जो आदि का े अ ंत से जा ेडकर हमारे हृदय का साहित्य बन जाता ह ै। आत्मा का े स्नेह से भर देता ह ै मन का े गहन अन्धकार से लेकर अनन्त ऊंचाइया ें तक ले जाता ह ै । संगीत क® ईश्वर का दर्जा प्राप्त ह ै, इसीलिए इस विधा में शुध्दता का विश ेष महत्व है। सात ष ुघ्द अ©र पा ंच क®मल स्वर®ं क े माध्यम से मन क® साधने का उपाय ह ै संगीत। अतः कहा जा सकता ह ै कि शरीर तथा मन क® स्वस्थ््ा, प्रफुल्लित रखने क े लिए संगीत आवश््यक ह
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प, ्रो. किशोर एरंडे. "र ंगा ें का समाज पर प्रभाव - "हा ेली समता का उत्सव"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.889179.

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Abstract:
होली भले ही साल-दर-साल आती रहे, पर उसके इ ंतजार की बेकरारी दिलों में कभी कम नहीं होती। रंगा ें में सराबोर हो उठने का यह त्या ैहार प्राचीन काल से ही हमारा गा ैरव पर्व ह ै। होली की रंगत ही कुछ ऐसी ह ै कि इसने प ंथों, संप ्रदाया ें क े बाड़ भी प ्रेम की बा ैछार करते हुए बड़े खिलंदड़पन के साथ ता ेड़े ह ै। यायावर अलबरूनी पर होली के रंग ए ेसे चढ़े कि उसने अपनी ऐतिहासिक यात्रा क े संस्मरण में होलिका ेत्सव का खास जिक्र किया। मुस्लिम कविया ें का होली वर्णन दिलचस्प ह ै। सूफी संत हजरत निजामुद्दीन आ ैलिया, अमीर ख ुसरो व नजीर अकबराबादी ने हा ेली के नाम उम्दा रचनाएँ समर्पित की ह ै। मुगल बादशाहा ें ने भी होल
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डा, ॅ. ईश्वर चन्द गुप्ता. "''रंगा ें की अभिव्यक्ति वाराणसी के भित्ति चित्रा ें म ें''". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889221.

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Abstract:
रंग चित्र की आत्मा ह ै, रंगा ें क े प ्रति मनुष्य आसक्ति आदिम समय से ही रहा ह ै। भारतीय सभ्यता एव ं संस्कृति में रंगा ें का प ्रचलन बहुत पुराना ह ै रंग हमारे जीवन के साथी, ये हमारे सुखों को इंगित करते ह ैं। सामाजिक उत्सवा ंे-पर्वों पर इनकी छठा चारों ओर बिखरी होती ह ै। शुभ कार्य हो या अतिथि आगमन पर प ्रवेश द्वार पर रंगा ेली बर्नाइ जाती है रंग हमारे जीवन में ख ुशी एवं ऊर्जा भर देते ह ै ं भारतीय आध्यात्म भी विभिन्न रंगा ें से सराबा ेर ह ै। सृष्टि में अनेक रंग मौज ूद ह ै ं भारतीय रंग मना ेविज्ञान का आधार प ्रकृति है प ्रकृति में अनेक रंगा ें को आकाश में देखते ह ै ं जिनमें से कुछ विरा ेधी प ्रकृति
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शशिकला, दुबे. "भारतीय आ ैर पाश्चात्य स ंगीत म ें नवाचार विषयक पारस्परिकता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886105.

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Abstract:
वर्तमान समय में व ैश्विक स्तर पर प ्रायः हर क्षेत्र म ें नवाचार क े बढ़ते कदम परिलक्षित हा े रह े ह ैं। संगीत क े क्षेत्र म ें नवाचार का े लेकर नवीन प्रयोग हा े रह े हैं, जिससे संगीत विषयक विभिन्न धारणाओं का े जीवन्त गति मिल रही है। एक समय ए ेसा भी था कि जब भारतीय आ ैर पाश्चात्य संगीत क े मध्य भ ेद का े लेकर कहा जाता था कि भारतीय संगीत को सुनने वाले श्रोताओं क े सिर हिला करते ह ै ं जबकि पाश्चात्य संगीत का े सुनने वालों क े प ैर हिला करते ह ै ं। संगीत क े पारखी सुधीजनों क े बीच आज भी यही मान्यता स्थिर है। लेकिन प ्रयोग की दृष्टि से संयुक्त सृजनात्मकता अपनी बात का े मनवा ही लेती ह ै। संगीत में आ
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मंज, ू. गा ैतम. "र ंग आ ैर राग का समन्वयः काँगड़ा चित्रा ें क े संदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889215.

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Abstract:
काँगड़ा चित्रकला में संगीत व चित्रकला का अद्भूत समन्वय संसार भर की कलाआंे मंे एक अद्वितीय उपलब्धि ह ै यही कारण ह ै कि काँगड़ा चित्रकला का े कला विद्वाना ें ने समस्त पहाड़ी चित्रकला का पर्याय भी माना है। काँगड़ा चित्रश ैली में निर्मित चित्रो की रंग या ेजना अनूठी ह ै ए ेसा प्रतीत होता ह ै कि काँगड़ा का समस्त प ्रकृति सा ैन्दर्य कलाकार ने रंग व रेखाओं क े माध्यम स े चित्रा ें में भर दिया। विषया ें की विविधता इस श ैली का गुण ह ै। यहाँ क े कलाकार ने साहित्य एव ं काव्य के साथ संगीत की अमूर्त, तथा ध्वन्यात्मक विषय वस्तु का े भी रंग एव ं रेखाओं द्वारा साकार रूप प ्रदान किया जो कि विश्व की किसी अन्य कल
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डा, ॅ. पि ्रयंका व. ैद्य. "गुरू-शिष्य परम्परा बनाम द ूरस्थ शिक्षा कथक नृत्य के स ंदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886109.

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Abstract:
यह ष्लोक भारतीय दर्ष न, संस्कृति व परम्परा में गुरू क े स्थान का े दर्षा ता है। हमारी प्रत्येक यज्ञ आह ुति में, हर पूजा में इस ष्लोक को बा ेला जाता ह ै। क्या यह हमारे जीवन में गुरू क े स्थान को नही ं दर्षा ता? भारतीय दर्ष न में मनुष्य का े कर्म और ज्ञान के समन्वित रूप से ही स्वीकार किया गया है। उसके ये दो रूप ही उसे समाज में पहचान एवं प ्रतिष्ठा प ्राप्त करने में मार्ग प ्रषस्त करते ह ै ं। माता-पिता मनुष्य का े जन्म देन े क े कारक ह ैं, परन्तु ब ुद्धि, ज्ञान व कर्म का प ्रकाष गुरू के द्वारा ही मनुष्य को प ्राप्त होता है। आज की पीढ़ी नये ज्ञान के प्रकाष में जो कि व ैज्ञानिक ज्ञान है, कम्प्यूटर
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भारती, खर े., та कुमार अंजलि. "वानिकी एवं पर्या वरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574868.

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Abstract:
एक अरब स े ज्यादा जन सैलाब के साथ भारतीय पर्या वरण का े स ुरक्षित रखना एक कठिन कार्य ह ै वह भी जबकि हर व्यक्ति की आवश्यकताएॅ ं, साधन, शिक्षा एव ं जागरूकता के स्तर में असमान्य अंतर परिलक्षित होता है। संत ुलित पर्या वरण के बिना स्वस्थ जीवन की कल्पना करना मात्र एक कल्पना ही है। पर्यावरण स े खिलवाड ़ के परिणाम हम र्कइ रूप में वर्त मान में द ेख रहे हैं एव ं भोग रहे ह ैं। पर्यावरण विज्ञान आज के समय क े अन ुसार एक अनिवार्य विषय ह ै। यह सिर्फ हमारी ही नहीं अपित ु व ैश्विक समस्या ह ै। वर्त मान पर्यावरणीय अस ंत ुलन का े द ेखत े हुए इस विषय स े हर व्यक्ति का े जुड ़ना चाहिए एव ं जोड ़ना चाहिए। वानिकी एव
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गीताली, सेनग ुप्ता. "मानव स्वास्थ्य एवं प्रदूषण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.803458.

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Abstract:
‘‘स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मन का निवास होता ह ै।’’ उत्तम स्वास्थ्य प ्रत्येक मन ुष्य के लिए अम ूल्य निधि है, दीर्घ आयु एव ं उत्तम स्वास्थ्य का अट ूट ब ंधन है। इस संदर्भ में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा दी र्गइ परिभाषा सर्वमान्य है -’’ स्वास्थ्य संप ूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक निरोगता की अवस्था हैं तथा मात्र बीमारी या द ुर्बलता की अन ुपस्थिति को स्वास्थ्य नही माना जा सकता है।’’ अर्था त स्वास्थ्य एक सामान्य व्यक्ति क े लिए स्वस्थ्य वातावरण में, स्वस्थ्य परिवार मे ं, स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य दिमाग का वास है। प्राकृतिक वातावरण की संुदरता प ेड ़ - पौधे, जीव - जंत ुआ े, नदी - तालाब, पर्वत
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