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ख ुट, डिश्वर नाथ. "बस्तर का नलवंश एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 47–52. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20217.

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Abstract:
सभ्यता का विकास पाषाण काल स े प ्रार ंभ हा ेता ह ै। इस काल म ें बस्तर म े रहन े वाल े मानव भी पत्थर क े न ुकील े आ ैजार बनाकर नदी नाल े आ ैर ग ुफाआ ें म ें रहत े थ े। इसका प ्रमाण इन्द ्रावती आ ैर नार ंगी नदी के किनार े उपलब्ध उपकरणों स े हा ेता है। व ैदिक युग म ें बस्तर दक्षिणापथ म ें शामिल था। रामायण काल म ें दण्डकारण्य का े उल्ल ेख मिलता ह ै। मा ैर्य व ंश क े महान शासक अशा ेक न े कलि ंग (उड ़ीसा) पर आक्रमण किया था, इस य ुद्ध म ें दण्डकारण्य क े स ैनिका ें न े कलि ंग का साथ दिया था। कलि ंग विजय क े बाद भी दण्डकारण्य का राज्य अशा ेक प ्राप्त नही ं कर सका। वाकाटक शासक रूद ्रस ेन प ्रथम क े समय
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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मंज, ू. गा ैतम. "र ंग आ ैर राग का समन्वयः काँगड़ा चित्रा ें क े संदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889215.

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Abstract:
काँगड़ा चित्रकला में संगीत व चित्रकला का अद्भूत समन्वय संसार भर की कलाआंे मंे एक अद्वितीय उपलब्धि ह ै यही कारण ह ै कि काँगड़ा चित्रकला का े कला विद्वाना ें ने समस्त पहाड़ी चित्रकला का पर्याय भी माना है। काँगड़ा चित्रश ैली में निर्मित चित्रो की रंग या ेजना अनूठी ह ै ए ेसा प्रतीत होता ह ै कि काँगड़ा का समस्त प ्रकृति सा ैन्दर्य कलाकार ने रंग व रेखाओं क े माध्यम स े चित्रा ें में भर दिया। विषया ें की विविधता इस श ैली का गुण ह ै। यहाँ क े कलाकार ने साहित्य एव ं काव्य के साथ संगीत की अमूर्त, तथा ध्वन्यात्मक विषय वस्तु का े भी रंग एव ं रेखाओं द्वारा साकार रूप प ्रदान किया जो कि विश्व की किसी अन्य कल
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डाॅ., भावना ग. ्रोवर. "कत्थक नृत्य में नवीन प्रया ेगः विश्ल ेष्णात्मक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886073.

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Abstract:
भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक की आरंभ से ही एक विशाल व समृद्ध परम्परा रही ह ै। प्रारंभ से ही समय परिवर्तन के साथ-साथ कथक नृत्य में नवीन प ्रयोग हा ेते रह े आ ैर नृत्य परिवर्तित भी होता गया। सोलहवीं शताब्दी जिसे हम रीति-काल क े नाम से पहचानते ह ै उस समय तक कथक नृत्य पर राम व कृष्ण भक्ति का प्रभाव था तथा राम व कृष्ण लीलाआ ें ही कत्थक नृत्य का मुख्य आधार थी। सत्र्ाहवीं व अठारहवीं शताब्दी में जब कथक नर्तको को नवाबा े व राज्या े ं का संरक्षण प ्राप्त ह ुआ आ ैर कथक नृत्य में नये प ्रया ेग ह ुए फलतः अनेक परिवर्तन आये। हिन्दु राजाओं क े यहाँ कथक नृत्य का सात्विक रूप रहा आ ैर मुस्लिम नवाबों जा े स्वभावतः
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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Dr., Vasundhara Pawar. "राजास्थानी चित्रकला म ें र ंग स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891808.

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Abstract:
‘‘पर्व ता ें में सुमेरु, पक्षियों में गरुण, व्यक्तिया ें में राजा श्र ेष्ठ ह ै, व ैसे ही कलाओं में ‘‘चित्रकला‘‘ श्र ेष्ठ मानी गई है।‘‘ मानव की अनुभूतिया ें की अभिभक्ति का नाम कला ह ै। कुमार स्वामी ने काहा ह ै कि कला केवल भावों का प ्रदर्शन ही नही करती अपितु अध्यात्मिक सन्देश की वाहक भी ह ै। कला‘ शब्द का उल्लेख ऋग्व ेद के आठवें मण्डल मे मिलता ह ै। महाजनपद काल तक 64 कलाओं की गणना प्रारम्भ हो चुकी थी। भारतीय चित्रकला का स्वरूप जितना प्रशस्त ह ै, उतना ही इसका इतिहास प ुरातन है। भारत मे चित्रकला क े प्राचिन्तम नमूने प ्रागैतिहासिक शैल चित्रा े मे मिलते ह ै। जिनमें मिर्जा पुर, भीमव ेटिका तथा बाघ की
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श्रीमती, मनीषा शर्मा. "स ंगीत म ें नवाचार का माध्यम स ंस्कृत भाषा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885863.

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Abstract:
मानव सभ्यता के साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ है । व ैदिक युग क े अ ंतिम कालखण्ड तक संगीत संब ंधी का ेई स्वतंत्र ग्र ंथ उपलब्ध नही ं ह ै तथापि संगीत कला के संबंध में उल्लेख स्थान पर अवश्य प ्राप्त होते ह ैं । ऋग्वेद में गीत, वाद्य आ ैर नृत्य तीना ें क े संब ंध में अन ेक उल्लेख पाये जाते ह ै ं। ऋग्वेद में गीत क े लिए गीर, गातु, गाथा, गायत्र तथा गीति जैसे शब्दों का प ्रयोग किया जाता था । यह सभी तत्कालीन गीत प्रकार थ े और इनका आधार छन्द आ ैर गायन श ैली थी । गीत तथा उसकी धुन के लिए ‘साम‘ संज्ञा भी रही । साम धुन या स्वरावली क े लिए पर्या यवाची शब्द रहा ह ै। यह तत्कालीन जनसंगीत क े अ ंतर्गत गायी जाने वा
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डा, ॅ. अल्पनारानी गाँधी. "चिकित्सा क े क्ष ेत्र म ें स ंगीत का प्रया ेग: एक स ंक्षिप्तावलोकन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.887025.

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Abstract:
संगीत एक ऐसी कला ह ै जिससे न क ेवल चेतन अपितु जड़ भी प्रभावित होता ह ै। संगीत क ेवल आनंदानुभूति ही नहीं देता वरन् मनुष्य या प ्राणी की मानसिक स्थितिया ें की भी सूचक होता ह ै आ ैर हमारे मना ेभावों का े भी प ्रभावित करता ह ै। संगीत म ें स्वर व गति (लय) का समाव ेश हमारी आत्मा को प ्रभावित करता ह ै। मानवीय क्रियाए ं भी गत्यात्मक होती ह ैं दोनों म ें सादृश्यता होने क े कारण ही राग रागनियाँ हमारी आत्मा और शरीर को प ्रभावित करती ह ैं। राग और लय की शक्ति इनकी नियमितता क े कारण ही आती ह ै। यह मनुष्य का स्वभावगत व्यवहार ह ै कि असंतुलन में संतुलन, अव्यवस्था में व्यवस्था आ ैर असामंजस्य में सामंजस्य लाने क
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उषा, महोबिया. "मुगल चित्रकला म ें र ंग स ंया ेजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.891884.

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Abstract:
प ्राचीन समय से ही भारतीय चित्रकला का इतिहास बह ुत समृद्ध विषाल एवं विस्तृत रहा है। मुस्लिम आक्र्रमण से प ूर्व जैन, बौद्ध एवं हिन्दुओ ने चित्रकला के क्षंेत्र में अपना योग दान दिया। अज ंता चित्रकला विष्व में प ्रसिद्ध ह ै, आ ैर इन चित्रो का निर्माण गुप्त काल मे ह ुआ जिन पर प्राकृतिक रूप से बने रंगा े का प ्रयोग किया गया ह ै। मध्यकाल मे चित्रकला मै महात्वप ूर्ण परिवर्तन आये, सल्तनत काल की चित्रकला र्मै इ रानी प ्रभाव देखने को मिलता ह ै। दरबारी चित्र, वीणा, सितार, वेषभूषा, आभ ूषण आदि के चित्रा े में सजीव रंगा े का प ्रया ेग किया गया । जिनसे चित्र सजीव, जीव ंत प्रतीत होते है । आ ैर इन चित्रो में न
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डॉ., गा ेमती च. ेलानी. "स ंगीत आ ैर समाज". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.884620.

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Abstract:
जीवन में कला का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। मानव की अनुकरण व ृत्ति आ ैर सा ैंदर्य-प्रियता का े कला की जननी माना जाता है। कला का सृजन करना तथा उसका उपभा ेग करना, यह मनुष्य जाति की अपनी विशिष्ट शक्ति है। अपनी इसी विशिष्टठ शक्ति क े कारण वह अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ कहलाता ह ै। कला आत्मा का े समृद्ध बनाती ह ै अतः कहा जाता ह ै कि आत्म तृप्ति की क्षुधा से ही कलाओं की उत्पत्ति होती ह ै। कलाओं क े मुख्य दो प्रकार बताए गए ह ैं . 1. ललित कलाएं आ ैर 2. ललित ेर कलाए ं। जा े कलाए ं मुख्यतः मानव की भौतिक आवश्यकताओं को प ूर्ण करती हैं, उन्ह ें ललितेर कलाए ं कहते ह ैं। जैसे शिल्प कार्य बर्ढ़इ का कार्य, ब ुनाई का
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डा0, अजय क. ुमार गुप्ता. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890587.

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Abstract:
आस्ट वाल्ड (जर्मन वैज्ञानिक) के अनुसार जिसने रंगा ें क े बारे में अपने मौलिक विचार संसार को दिये ह ै- आदर्श रंग आठ ह ै। व े है पीला, लाल, बैगनी, नीला, नारंगी, हरा, आसमानी, आ ैर धानी या हल्का हरा । रंगा ें क े विषय में अनेक मत प ्रचलित ह ै पर आजकल के अधिकांश कलाकार आस्ट वाल्ड के मत का े ही मानते ह ै इनके मतानुसार मुख्य रंग पीला, लाल, नीला आ ैर हरा ये चार हा ेते ह ै आ ैर आदर्श रंग आठ हा ेते ह ै। प ्रथम चार रंगा ें का े मौलिक (व्तपहदंस) रंग कहते ह ै आ ैर दूसरे चार अर्थात ब ैगनी, आसमानी, नारंगी आ ैर धानी का े द्वितीय रंग (ैमबवदकंतल) कहते ह ै। इनके अतिरिक्त तीन रंग आ ैर ह ै काला, सफेद, खाकी (ळतंल)
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विपिन, कुमार. "विभिन्न शैली गत वर्ण विधान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889314.

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Abstract:
चित्र बनाते समय कलाकार इस बात का ध्यान रखता है कि विषयानुरूप कौन से रंग लगाने चाहिये। लघ ु चित्रों में प ्रयुक्त रंग अधिकांशतः चटकीले ह ै। राजस्थानी, जैन तथा पाल शैली क े चित्रा ें में अधिकांश खनिज रंगा े का प ्रयोग किया गया है। इसका कारण तत्कालीन रंगा े की अपलब्धि भी है । गहरे नीले, लाल आ ैर पीले रंगा े का प ्रयोग चित्रा ें में बह ुतायत से मिलता ह ै। राजस्थानी चित्रों की वर्णिका शा ेख आ ैर चटकीले रंगा े की ह ै। क्योंकि आवागमन क े साधन कम होने की वजह से ये चित्र वाह ्य प ्रभाव स े मुक्त है। मुगल शैली क े चित्रा ें में फारस की कोमल रंगा े वाली पद्वति दिखाई देती ह ै। राजस्थानी की आपेक्षा रंगा े
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डा, ॅ. श्वेता पाण्डेय. "जामिनी राय की कला म ें र ंग योजना की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888821.

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Abstract:
जामिनी राय ने अपनी कला यात्रा के दौरान असंख्य चित्रा ें का निर्माण किया। इस निर्मा ण कार्य में शायद ही ऐसा कोई विषय हो जो जामिनी राय की तूलिका क े माध्यम से प्रकट ना हो सका हो। कला के प ्रति उनका समर्पण व उनकी निरन्तरता क े कारण ही उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में चित्रा ें का निर्माण किया। जामिनी राय ने अपने ही चित्रा ें को र्कइ बार दोहराया है, इसलिये यह कह पाना बड़ा कठिन ह ै कि का ैन सा चित्र पहले का ह ै, कौन सा बाद का, सिर्फ श ैली को देखकर ही निर्मा ण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इसक े अतिरिक्त जामिनी राय ने अपने चित्रा ें में कभी भी तिथि का उल्लेख नही किया है, इस कारण यह समस्या और भी जटिल
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डा, ॅ. सुवर्णा वाड. "स ंगीत क े पाठ्यक्रम में परिवर्तन की स ंभावित दिशाएं". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.887000.

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Abstract:
प्रस्तुत विषय की प्रस्तावना करते समय विषय के प्रत्येक बिन्दु का विश्लेषण करना आवश्यक ह ै जैसे संगीत के पाठ्यक्रम में परिवर्तन क्या ें? तथा देवी अहिल्या विश्व विद्यालय का विशेष संदर्भ क्या ें? मेरी सम्पूर्ण शिक्षा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में होने , मैं गत 36 वर्षों से क ंठ संगीत के पाठ्यक्रम क े सम्पर्क में ह ूँ। दे.अ.वि.वि का कंठ संगीत का पाठ्यक्रम र्कइ वर्षा ें तक एक समान ही रहा परन्तु कम्प्यूटर एव ं कॉमर्स जैसे विषयों क े कन्या महाविद्यालयों मे ं पदार्प ण होने से छात्राओं की सा ेच म ें परिवर्तन आया। प ूर्व में कला संकाय में छात्राओं की संख्या काफी सराहनीय होती थी परन्तु धीरे धीरे छात्राओं
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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प, ्रो. श्रद्धा दुब े. प्राध्यापक इतिहास. "अजन्ता के चित्र एवं र ंग स ंयोजन (गुप्तकालीन कला क े परिप्रेक्ष्य म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.892002.

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Abstract:
गुप्तकाल भारत के इतिहास का स्वर्ण -युग कहा जाता ह ै। सुख समृद्धि आ ैर व ैभव के इस काल में सभी कलाओं का समान रूप से उन्नयन ह ुआ। इस युग की सबसे बड ़ी देन ह ै अजंता के भित्तिचित्र। चित्रकारों ने गहन अधंकरामयी गुफाओं में ब ैठकर जिन अपार्थिव कृत्तियों का सृजन किया वे अप्रतिम है। इनमें कथावस्तु और विषय तो भगवान तथागत के जीवन आ ैर जातक कथाआ ें से ही लिए किन्तु उन्ह े ं किसी सीमा में बांध कर नहीं रखा। उनमें सैकड ़ों वर्षों का लोकजीव दर्पण की भाँति प ्रतिबिम्बित है।अजंता में अर्ध-चन्द्राकार पर्व त का े काटकर 29 गुफाएँ बनाई गई ह ै। यह समूहा ें में ब ंटी हुई ह ै। इनमें दसवी ं आ ैर नवीं गुफाएँ बीच के समू
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श्रीमती, सुधा शाक्य. "र ंग दृष्टि दा ेष: र ंग अ ंधता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889298.

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Abstract:
्रस्तावना:- मानव में र्कइ प्रकार की संव ेदनाएं होती हैं जैसे दृष्टि, श्रवण, स्पर्श , गंध, स्वाद आदि। इनकी उत्पत्ति उद्दीपका ें से होती ह ै, जिसे व्यक्ति अपने बाह ्य पर्यावरण से ग्रहण करता ह ै, यह उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिया ें अर्था त आंख, कान, त्वचा, नाक आ ैर जिव्हा को उद्दीप्त करते ह ैं, आ ैर विभिन्न संव ेदना को उत्पन्न करते ह ै ं। आइजनेक (1972) क े अनुसार ‘‘ संव ेदना एक मानसिक प ्रक्रम ह ै जा े आगे विभाजन या ेग्य नहीं होता। यह ज्ञानेन्द्रिया ें को प ्रभावित करने वाली बाह ्य उत्तेजना द्वारा उत्पादित हा ेता ह ै, तथा इसकी तीव ्रता उत्तेजना पर निर्भ र करती ह ै, आ ैर इसके गुण ज्ञानेन्द्रिय की प ्रकृत
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विजय, कुमार. "मध्यप्रद ेश के जनजातियों क े जीवन में र ंगा ें का महत्त्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889310.

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Abstract:
रंग सदैव उत्साहवर्धन करते हैं, रंगा ें का प ्राकृतिक गुण ही प्रकाश की किरण ें होती ह ैं, जो अपनी तरंगदैध्र्य से प ्रकृति में व्याप्त जीवा ें और प्राणिया ें क े अन्तर्मन क े क ंपन का े ऊर्जा में परिवर्तित करती है। रंग-स्वाद हीन होते ह ै ं, फिर भी प्राणी अपने अनुभव से रंग-स्वाद की अनुभूति करता है। जिसका प्रभाव उसके जीवन में महत्त्वप ूर्ण भूमिका निभाते ह ैं। जीवन, मनुष्य को अपने कर्म क े अनुसार जीने की कला भी प ्रदान करता है, कर्म का सीधा सम्पर्क कला से है। कला का े मनुष्य क े जीवन क े रूप में परिभाषित करें ता े यह तथ्य आता है, जो गतिमान हो आ ैर मानसिक रूप से उद्वेलित करें। मनुष्य शारीरिक रूप से
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पवनेन्द्र, कुमार तिवारी. "मध्यकालीन पुस्तक चित्रा े तथा लघु चित्रा े म ें र ंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891930.

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Abstract:
मध्यकालीन भारत में चित्रण क े लिए रंग र्कइ प ्रकार के पदार्थो जैसे खनिजों या ेगिका े अथवा प्राकृतिक लवणा ें से प ्राप्त किये जाते थे। कुछ रंग प ्राकृतिक वस्तुओं जैसे वनस्पति जैव पदार्था े स े प ्राप्त किये जाते थे। उदाहरण क े लिए नीम तथा कृमिदाना आदि काजल का प्रयोग न क ेवल चित्रा े में बल्कि लेखन कार्य में भी बडे प ैमाने पर हुआ। इसी प ्रकार लाल स्याही चाँदी तथा सा ेने में लिखा होने क े कारण स्वणाक्षरी शेत्याक्षरी नाम दिया गया । लाल स्याही का प्रयोग अहमाया े क े अन्त में हाशिये खीचने में व ृन्तों रेखाओं यंत्रा ें आदि में हुआ। स्वर्ण रजत चूर्ण से लिखी जाने वाली प ुस्तके अधिक व्यय-साध्य थी उनमें
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प, ्रो. अर्चना भट्ट सक्सेना. "मालवी लोकगीता ें में स ंगीत". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886958.

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Abstract:
भारतीय लोक जीवन सदैव संगीत मय रहा ह ै। भारत वर्ष का का ेई अंचल का ेई जाति ए ेसी नही ं जिसके जीवन पर संगीत का प ्रभाव न पड़ा हो। भारतीय स ंगीत के लिए कहा जाता ह ै कि साहित्य से ब्रह्म का ज्ञान और संगीत से ब ्रह्न की प्राप्ति होती है। भारत में प ुरातन काल से विभिन्न पर्वो एवं अवसरा ें पर गायन, वादन व नृत्य की परंपरा रही है। लोकगीत प ्राचीन संस्कृति एव ं सम्पदा के अमिट वरदान ह ै जिसमें अनेकानेक संस्कृतिया ें की आत्माआ ें का एकीकरण हुआ है। लोक संगीत जन-जीवन की उल्लासमय अभिव्यक्ति ह ै। पद्म श्री ओंकारनाथ क े मतानुसार- ‘‘देवी संगीत क े विकास की प ृष्ठभूमि लोक संगीत ह ै। जिस देष या जाति का सम्व ेदनषी
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गा, ैरव यादव. "स ंगीत क े प्रचार प्रसार में स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886968.

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Abstract:
बीसवीं शताब्दी क े पूर्वा द्र्ध को व ैज्ञानिक क्रांति क े अभ्युदय का समय कहा जा सकता है, जहाँ व ैज्ञानिक अविष्कारों क े अ ंतर्गत कुछ ऐसे उपकरणों का अविष्कार ह ुआ जिन्होंने संगीत क े प्रचार-प्रसार का े तीव्रता प्रदान की। संचार साधनों क े प्रारंभिक दौर में संगीत क े क्षेत्र में एक वैज्ञानिक अविष्कार का विश ेष महत्व ह ै ,जिसने भारतीय संगीत के क्षेत्र में ही नहीं वरन् विश्व में क्रांति ला दी यह था रेडिया े का आगमन। भारत में इसकी स्थापना सन् १९२७ ई. में र्ह ुइ । सन् १९३६ ई. में इ ंडियन स्टेट ब ्रॉडकास्टिंग स ेवा का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया। उस समय आकाशवाणी एक सशक्त माध्यम था शास्त्रीय संगीत क
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डा, ॅ. भारती जोशी विभागाध्यक्ष. "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888766.

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Abstract:
रंग हमारे दिमाग और शरीर पर अत्यधिक प्रभाव डालता ह ै।सूर्य से प ्राप्त उर्जा रंगा ें में समाहित हा ेती ह ै।प ्रकृति का सा ैन्दर्य हर घण्टे, हर दिन, हर वर्ष परिवर्तित होता रहता ह ै। प ्रकृति का हर रंग प ्राणी का मित्र ह ै बस आवश्यकता ह ै धैर्यपूर्वक प्रकृति की मूक भाषा का े सीखने, समझने, आ ैर आत्मसात करने की । ख ुली जगह में देख ें, प ्रकृति ने कैसे रंगा ें का ताना बाना बुना ह ै रंगा ें क े एक शेड का े दूसरे श ेड से कितनी सुन्दरता क े साथ मिलाया ह ै । आसमान का नीलापन कितना शान्तिदायक है आ ैर कितने प ्रशस्त होने की भावना से ओत प ्रोत ह ै। प ृथ्वी की हरीतिमा कैसी शीतल और तुष्टि प ्रदायनी ह ै। सुर्य
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डा, ॅ. प. ्रेमलता तिवारी. "स ंगीत चिकित्सा -एक नवाचार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886095.

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Abstract:
यह संगीत स्वर लहरियांे क े मध्यम से कानो ं में उतरकर दिल में जगह बनाता ह ै। बूंदांे का टपकना, पत्ता े ं का सरसराना, लहरांे का लहराना, प ंछियांे का कलरव करना संगीत ही तो ह ै इस बात से इ ंकार नहीं किया जा सकता कि जब कोई कर्ण पि ्रय संगीत की लहरियाँ गूंजती ह ै तो हदय में न क ेवल कंपन हा ेता है,बल्कि स ंगीत रंगा े ं में घ ुलमिलकर मन का े अमृतमय कर देता ह ै। आ ेशो ने कहा था कि जीवन में एक ही चीज बचानी चाहिए और वह ह ै आत्मा और उसका संगीत क्या ेकि मस्तिष्क आ ैर हृदय संगीत की धरातल पर ही खडे़ हा ेकर एक दूसरे मे लीन हो जाते ह ै ं। कितने तर्क ,कितने विश्वास,कितनी परिभाषाएँ, कितने मत,कितने सिद्धांत लेकिन
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डा, ॅ. अतुल क. ुमार गुप्ता. "स ंगीत चिकित्सा म ें नवाचार "मना ेरा ेगा े क े स ंदर्भ म ें"". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.884614.

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Abstract:
गायन वादन एव ं नृत्य तीनों कलाओं क े समाव ेश का े संगीत कहा गया ह ै। जिसमें गायन एव ं वादन को क ेवल कर्ण के द्वारा अर्था त् बिना देखे ह ुए भी समझा एव ं रससिक्त हुआ जा सकता ह ै। नृत्य को समझने में दोनों ज्ञानेन्द्रिया कार्य करती ह ै, अर्था त् एक दृष्टिहीन व्यक्ति भी संगीत का रसास्वादन कर सकता ह ै। संगीत का मूलभूत कारक ह ै- ध्वनि। वायु द्वारा ध्वनि तरंगा ें का े जब कर्ण क े माध्यम से मस्तिष्क को सूचना प्राप्त हा ेती ह ै, तब हमें यह समझ में आता ह ै, कि सामने वाला कोई बोल रहा ह ै अथवा गा रहा ह ै अथवा वादन कर रहा ह ै। अनुसंधान एवं या ंत्रिकीय प ्रया ेगा ें द्वारा ध्वनि तरंगा ें का े व ैज्ञानिका ें
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अर्च, ना परमार. "पर्यावरण संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883529.

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Abstract:
मानव शरीर प ंच तत्वों- प ्रथ्वी, जल, वाय ु, अग्नि आ ैर आकाश स े ही बना ह ै। य े सभी तत्व पर्या वरण के धोतक है। प ्रकृति मे मानव को अन ेक महत्वप ूर्ण प्राकृतिक सम्पदायें भी ह ै। जिसका उपयोग मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में करता आया है ज ैसे- नदियाँ, पहाड ़, मैदान, सम ुद ्र, प ेड ़-पौधे, वनस्पति इत्यादि। प्रथ्वी पर प्राकृतिक संसाथनों का दोहन करन े से प्राकृतिक संसाथनो के भण्डार तीव्र गति से घटत े जा रह े है, जिससे पर्यावरण में असन्त ुलन बढ ़ रहा है। उसके परिणाम स्वरूप जल की कमी, आ ेजा ेन परत में छेद का पाया जाना, वना ें की अत्यधिक कर्टाइ से वना ें की कमी आना, सम ुद ्रों का जल स्तर बढना, ग्लेशियरों
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डा, ॅ. अर्चना रानी. "वर्ण-सौन्दर्य द्वारा दर्शक स े संवाद करती भारतीय कला". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.888762.

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Abstract:
कला और सौन्दर्य-ये दा े शब्द कला जगत में एक ज ैसे होते हुए भी बह ुत विस्तृत ह ैं। स्थूल तैार पर हम कला आ ैर सा ैन्दर्य में का ेई अन्तर नहीं कर पाते। सा ैन्दर्य एक मानसिक अवस्था ह ै आ ैर वह देश-काल से मर्या दित है। इस सा ैन्दर्य रूपी व ृक्ष की दो शाखायें ह ैं-एक प्रकृति तथा दूसरी कला। कलागत सौन्दर्य पर दा े दृष्टियों से विचार किया जा सकता है। पहली दृष्टि यह है जिसमें हम कलाकार को क ेन्द्र में रखकर विचार करते ह ै ं अर्थात् कलाकार की कल्पना में किस प ्रकार कोई कलाकृति आकार ग्रहण करती ह ै आ ैर वह किस रूप में दर्श कों क े सम्मुख प्रकट हा ेती ह ै। दूसरी दृष्टि में दर्श क का े क ेन्द्र में रखा जाता ह
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स, ुधा शाक्य. "वर्तमान पर्यावरणीय समस्याएं एव ं सुझाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883040.

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Abstract:
भारत में प ्राचीन काल से ही प्रकृति एव ं पर्यावरण का अट ूट संब ंध रहा है, और धार्मिक ग ्रंथा ें में प्रकृति को जा े स्थान प्राप्त है वह अत ुलनीय है। प्रक ृति की सुरक्षा के लिये हमारी संस्कृति में अन ेक प्रयास किये गये, सामान्य जन को प्रकृति से जोड ़े रखन े के लिये उसकी रक्षा, प ूजन, विधान, संस्कार आदि को धर्म से जोड ़ा गया। गा ै एव ं अन्य जानवरो ं का प ूजन व ंश रक्षा के लिये तथा विभिन्न नदियों, प ेड ़ों, पर्व तों का प ूजन उसकी सुरक्षा और अस्तित्व को बनान े क े लिये अति आवश्यक हा े गया था। पर ंत ु जैसे समय व्यतीत होता गया व्यक्तियों की विचारधारा, सोच, अभिव ृत्ति, आस्था, भावों में परिवर्त न होता
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डा, ॅ0 नाजिमा इरफान. "भारतीय चित्रकला में र ंगा ें का या ेगदान (अब्दुर्रहमान चुगताई के विष ेष संदर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889177.

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Abstract:
मानव जीवन में वर्ण का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। प्रत्येक वस्तु का ेई न कोई रंग लिये हुए ह ै। रंगा ें क े प ्रति मानव का आकर्ष ण कभी घटा नही ह ै। इसीलिये आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य क े विकास में वर्ण का सहारा लिया ह ै। कमरे की रंग व्यवस्था से लेकर बाग बगीचा ें में फ ूल पौधों की रंगया ेजना तक में कलाकार ने अपना हस्तक्ष ेप किया ह ै क्योंकि रंगा ें का अपना एक प्रभाव हा ेता ह ै जो मानव की मानसिक भावनाओं का े उद्वेलित करने की शक्ति रखता ह ै। वर्ण सार्वभौमिक ह ै तथा चित्रकला में सबसे अधिक महत्व रंग का े दिया जाता है। रंगा ें क े विविध रुपों मे ं मन की भावनायें जुड़ी ह ै ं जैसे बसन्त क
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डा, ॅ. सुषमा श्रीवास्तव. "विज्ञापन की सृष्टि: स ंगीत की दृष्टि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886102.

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Abstract:
संचार को जीवन का पर्या य कहा जा सकता है हमारे शरीर की लाखों का ेशिकाएँ आपस में लगातार संचार करती रहती ह ैं। जिस क्षण यह प्रक्रिया बंद हो जाती ह ै उसी क्षण हम मृत्यु को प ्राप्त हा े जाते ह ैं। जीवन का दूसरा नाम संचार संलग्नता है, संचार-श ून्यता मृत्यु का द्योतक ह ै। वर्तमान परिवेश में संचार का व्यापक स्तर ह ै ‘जनसंचार‘ अर्थात जब हम किसी भाव या जानकारी को दूसरा ें तक पहुँचाते ह ै ं आ ैर यह प ्रक्रिया सामूहिक पैमाने पर होती है ता े इसे ‘जनसंचार‘ कहते ह ैं। जनसंचार में प्रेषक तथा बड़ी संख्या में ग्रहणकर्ता क े बीच एक साथ संपर्क स्थापित हा ेता ह ै एवं इस बात की संभावना बनी रहती ह ै कि सूचना या जान
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डा, ॅ. संगीता शर्मा. "गुरू शिष्य परम्परा म ें स ेंध लगाती दूरस्थ शिक्षा"". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.884964.

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Abstract:
प ्रकृति अपने हजारा ें रंगा ें में हमारे सामने ख ुशियों का खजाना लाती ह ैं, किंतु संगीत क े इस चटकीले रंग ने मानव मन और मस्तिष्क पर अपना जा े असर छोड़ा हैं, वह कल्पना से परे ह ै। संगीत गायन, वादन तथा नृत्य तीनों कलाआ ें का समन्वय रूप ह ै। इन तीनों अ ंगा ें को अलग-अलग प ्रस्तुत करना संगीत की सजीवता को नष्ट करना ह ैं। इन तीनों अ ंगा ें क े समन्वित प्रदर्शन से ही व्यक्ति समस्त बाह्यय परिस्थितिया ें स े कटकर आत्मकेन्द्रित हो जाता है। संगीत विभिन्न ध्वनियों का े समन्वित करने वाली वह कला ह ै, जिसक े द्वारा मना ेभावों क े प ्रदर्श न में रोचकता, माधुर्य एवं सुन्दरता आती ह ै। संगीत का संब ंध स्वर तथा भ
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हरीश, केशरवानी. "खेती के नये आयामः समझा ैता क ृषि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883533.

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Abstract:
बढ ़ती जनसंख्या, बदलती जीवन शैली, कृषिगत उत्पादों का व्यवासायीकरण क े साथ साथ मौसमी परिवर्तनशीलता, उत्पादन प्रवृत्ति मे बदलाव और कृषिगत विषमता के परिणाम स्वरूप सबस े प्रमुख म ुददा कृषि के सुधार और विकास का ह ै। मानव अपन े विकास की चाहे जो सीमा निर्धारित कर ले पर ंत ु उसकी उदरप ूर्ति जमीन से उगे आनाज या उसके प्रसंस्करण स े ही होगी। कृषि के संदर्भ मे तमाम प्रकार के बदलावों क े परिणाम स्वरूप कृषि प ्रणाली मे भी बदलाव द ेखे जा सकत े हैं। साथ ही विश्व की जनसंख्या त ेजी के साथ बढ ़ रही ह ै तथा भारत के संदर्भ मे यह तथ्य है कि यह विश्व की द ूसरी सर्वाधिक जन ंख्या वाला द ेश है जा े 2030 तक यह चीन का े
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गरिमा, पाठक. "बुन्द ेलखण्ड क े कलासाधक: किशन सा ेनी के चित्रा े ं का रंगस ंया ेजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.892058.

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Abstract:
ब ुन्देलखण्ड के कला साधक श्री किशन सा ेनी जी का जन्म उ.प ्र. के झांसी जिले में 19 नवम्बर सन् 1958 को ह ुआ। इनके पिता जी श्री सूरज प ्रकाश सा ेनी मूलतः राजस्थानी थे लेकिन र्कइ वर्षा ें से झा ंसी में ही रह रह े ह ैं इनकी माताजी का नाम श्रीमति चंदा सोनी ह ै। सन् 1975 में सा ेनी जी ने र्हाइ स्कूल की परीक्षा पास की लेकिन परिस्थितिवश वे आगे नही ं पढ़ सक े। आज उनके व्यक्तित्व, व्यवहार आ ैर ज्ञान को देखकर का ेई भी यह नहीं सा ेच सकता कि उनकी संस्थागत शिक्षा के कुछ चरण बाकी रह गये है और वह इस तथ्य क े भी साक्षात् उदाहरण ह ै कि ‘कला किसी भी स्कूली शिक्षा व ज्ञान की मोहताज नहीं’ बचपन से ही सोनी जी ने अपने
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हरीश, वर्मा. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय प्रयोग". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884616.

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Abstract:
संगीत क े बिना भारतीय फिल्मों की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भारतीय सिनेमा की पहचान उसका सषक्त संगीत ही ह ै। भारतीय फिल्में चाह े व े किसी भी भाषा (अर्था त् हिन्दी, तमिल, ब ंगाली, मराठी, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम) की हों, संगीत उनमें प ्रमुख होता ह ै। क्षेत्रीय बोलिया ें जैसे भोजप ुरी, राजस्थानी, ब ंुदेली, छत्तीसगढ़ी आदि में बनने वाली फिल्मों में तो संगीत ही उनका मूल तत्व होता ह ै। भारत में सर्वा धिक फिल्में हिन्दी भाषा में बनती हैं जा े विश्व भर में लोकप्रिय हा ेती हैं। अतः आगे हम भारतीय फिल्मों की चर्चा हिन्दी फिल्मों का े केन्द्र में रखकर ही करेंगे। भारतीय संगीत का आधार शास्त्रीय संगीत ही ह ै
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डा, ॅ. सीमा सक्सेना. "स ंगीत आ ैर समाज". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886828.

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Abstract:
्रकृति का मूल सिद्वान्त ह ै कि मनूष्य न े अपनी नैस ेर्गिक आवष्यकताओं क े लिये समाज क े अवलम्ब को अवधारित किया उसे अपने सुखःदुख की हिस्सेदारी एव ं व्यवहारिक बल व असुरक्षा से बचकर क े लिये समाज की सृष्टि करनी पड़ी अथवा समाज की शरण में जाना पड़ा। बाल्यकाल, युवावस्था, व ृद्वावस्था, अथवा यह कहा जाये कि जीवन क े प ्रत्येक चरण में मनुष्य का े समाज की आवष्यकता नैसर्गिक होती ह ै। समाज यदि जननी है तो व्यक्ति उसका बालक। विकास की प्रारंभिक अवस्था से निरन्तर प ्रगति पथ पर बढ़ते ह ुऐ उसने अपनी आवष्यकताओं क े रूप सृजन करना आरंभ किया आ ैर-यही सृजन कलाओं का उद्गम स्थल बना। उसे यह पता ही नहीं चला कि कब उसकी इसी
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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डा, ॅ. स्मिता सहस्त्रब ुद्धे. "स ंगीत क े प्रचार प्रसार में स ंचार साधन¨ ं की भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884794.

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Abstract:
संगीत जीवन क¢ ताने-बाने का वह धागा है जिसक¢ बिना जीवन सत् अ©र चित् का अंश ह¨कर भी आनंद रहित रहता ह ै तथा नीरस प्रतीत ह¨ेता ह ै। संगीत में ए ेसी दिव्य शक्ति ह ै कि उसक ¢ गीत क ¢ अर्थ अ©र शब्द¨ं क¨ समझे बिना भी प्रत्येक व्यक्ति उसस े गहरा सम्बन्ध महसूस करता ह ै। ”संगीत“ एक चित्ताकर्शक विद्या ज¨ मन क¨ आकर्षि त करती ह ै। गीत क ¢ शब्द न समझ पाने पर भी ध ुन पसंद आने पर ल¨ग उस गीत क¨ गाते ह ैं, क्य¨ ंकि भारतीय संगीत-कला भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अ ंग है एवं भारत क ¢ निवासिय¨ं की जीवनशैली का प्रमाण ह ैं। ”संगीत“ मानव समाज की कलात्मक उपलब्धिय¨ ं अ©र सांस्कृतिक परम्पराअ¨ं का मूर्तमान प्रतीक ह ै। यह आ
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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प, ्रो. किन्श ुक श्रीवास्तव. "हिन्दुस्तानी एवं पाश्चात्य स ंगीत पद्धति क े सम्मिश्रण द्वारा उत्पन्न स ंगीत- तत् वाद्या ें के विश ेष स ंदर्भ में (फ़्य ूज़न-म्यूजि ़क)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885857.

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Abstract:
शास्त्रीय संगीत भारतीय संस्कृति का एक अनमोल तत्व है। का ेई भी धर्म, सभ्यता, संस्कृति, परम्परा संगीत के साथ ही चिरन्तनता को प ्राप्त हा ेता ह ै। पृथ्वी पर प्रत्येक जीवन्त तत्व संगीत से जुड़ा ह ै आ ैर प ्राणीमात्र आपस में संगीत द्वारा ही जुड़े ह ै। क्योंकि मानव भाव-प ्रधान है आ ैर संगीत क े द्वारा अभिव्यक्त भावों क े माध्यम से ही भिन्न संस्कृतियों क े लोग भी आपस में जुड़े ह ै ं। शास्त्रीय संगीत या भारतीय सांस्कृतिक संगीत जिसे व ैदिक संगीत अथवा प्राचीन संगीत आ ैर कलात्मक संगीत भी कहा जा सकता ह ै, अपनी भा ैगोलिक सीमाओं क े अन्दर ही भिन्न-भिन्न धाराआ ें में पल्लवित होता आ रहा ह ै। भिन्न-भिन्न धर्मा
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डा, ॅ. गीताली स. ेनगुप्ता. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.889241.

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Abstract:
रंगा ें क े प ्रति मानव का अनुराग आज से नहीं बल्कि सदिया ें से रहा ह ै। रंग प ्रकृति एव ं ईष्वर की सबसे बह ुमूल्य देन ह ै। रंग क े बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। प ्रकृति द्वारा रचित अनगिनत वस्तुओं क े विविध रंग प ्र ेरणा क े स्त्रा ेत रह े ह ै ं। इन्ह ें देखकर मनुष्य ने उसे चित्रकलाओं, मूर्तिकलाओं, नाट्य एवं साहित्य में उकेरा है। रंगा ें से हमें निरन्तर ऊर्जा एवं चैतन्य शक्ति प ्राप्त होती है, निष्चित ही रंगविहीन जीवन नीरस, उदासीन एवं एकसार होता है। मनुष्य स्वभाव से सुन्दरता प ्रेमी है। अतः रंगा ें स े उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। पहले प्रकृति से फिर धीरे-धीरे व ैज्ञानिक अनुभवा ें
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डाॅ., खालिदा दुधाले. "स ंगीत आ ैर मना ेविज्ञान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.885875.

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Abstract:
स ंगीत मना ेविज्ञान एवं संगीत शास्त्र की एक शाखा ह ै जिसका लक्ष्य ह ै संगीत व्यवहार आ ैर संगीत के अनुभवा ें का े समझना आ ैर समझाना। साथ ही साथ यही समझना कि संगीत कैसे रचा जाता ह ै आ ैर उसकी प्रतिक्रिया कैसी होती ह ै आ ैर व्यक्ति उसे दैनिक जीवन में क ैसे अपनाते ह ै? माॅर्ड न संगीत का मना ेविज्ञान सिस्टेमेटिक अवलोकन से मनुष्य की भागीदारी का विश्लेषण करता ह ै। इसके अनेक क्षेत्र ह ै ं शोध व प्रया ेग क े साथ निष्पादन (चमतवितउंदबम) कम्पोजिशन, शिक्षा, आलोचना, चिकित्सा आदि। संगीत मना ेविज्ञान मानव की ब ुद्धि, का ैशल व क्रियात्मकता से सामाजिक व्यवहार को समझने में मदद करती ह ै। संगीत निःसंदेह हमारे संव
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रीना, गौतम (शोधार्थी ). ""भारत में ग्राफिक्स कला में र ंगा ें का उपया ेग"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889217.

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Abstract:
उद्द ेश्यः ऽ छापाचित्रण की उत्पत्ति एवं विकास ऽ छापाचित्रण का भारत में इतिहास एवं विकास ऽ भारत में रंगीन छापाचित्रण की श ुरुआत ऽ छापाचित्रण में रंगा ें का समाज पर प्रभाव ऽ छापाचित्रों की ललित कला में मान्यता यह एक विदेशी कला ह ै जा े यूरा ेप आदि से भारत र्में आइ . “ मशीनी छपाई का परिचय भारत में 16वी ं शताब्दी के मध्य ह ुआ। ‘‘ ;1द्ध छापा चित्रकला का इतिहास: छापाकला की उत्पत्ति मोहन जोदड़ा ें स े प्राप्त मोहरा ें स े मानी जा सकती ह ै। मोहन जोदड़ा े की सभ्यता में एवं आदि सभ्यताओं में रेशमी आ ैर सूती वस्त्रा ें क े प्रया ेग एवं उन पर छापा ें क े प्रमाण भी मिले है ं अतः लकड़ी क े ठप्पों क े छापों क
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डा0, इन्दु शमा, та अंजुली बिसारिया डा0. "र ंगा ें का मनौवैज्ञानिक प्रभाव एवं र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889225.

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Abstract:
सोशिएट प ्रोफेसर चित्रकला विभ्सृष्टि की प ्रत्येक वस्तु में रंग ह ै। मानव जीवन से रंग का नैसर्गिक सम्बन्ध है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव जीवन रंगा ें क े मध्य ही दृष्टिगोचर हा ेता ह ै। प्रकृति की प ्रत्येक रचना चाहे वह सूर्य हो धरणी हो, आकाश हा े या व ृक्ष हो का ेई न कोई रंग लिय े ह ुये ह ैं। वस्तुआ ें क े धरातल में रंग हा ेने के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती है। रंग क े अनुभव का माध्यम प ्रकाश ह ै, जो वस्तु से प ्रतिबिम्बित हा ेकर हमारे अक्षपटल तक पह ुॅंचता ह ै। अतः प ्रकाश क े परिवर्तित हा ेने से अथवा प ्रकाश की मात्रा कम या अधिक होने से एक ही रंग की वस्तुएॅं अलग-अलग दिर्खाइ पड़ती ह ैं। तेज
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खापर्ड े, स. ुधा, та च. ेतन राम पट ेल. "कांकेर में रियासत कालीन जनजातीय समाज की परम्परागत लोक शिल्प कला का ऐतिहासिक महत्व". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 53–56. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20218.

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Abstract:
वर्त मान स्वरुप म ें सामाजिक स ंरचना एव ं ला ेक शिल्प कला म ें का ंक ेर रियासत कालीन य ुग म ें जनजातीय समाज की आर्थि क स ंरचना म ें ला ेक शिल्प कला एव ं शिल्प व्यवसाय म ें जनजातीया ें की वास्तविक भ ूमिका का एव ं शिल्प कला का उद ्भव व जन्म स े ज ुड ़ी क ुछ किवद ंतिया ें का े प ्रस्त ुत करन े का छा ेटा सा प ्रयास किया गया ह ै। इस शा ेध पत्र क े माध्यम स े शिल्पकला म ें रियासती जनजातीया ें की प ्रम ुख भ ूमिका व हर शिल्पकला किस प ्रकार इनकी समाजिकता एव ं स ंस्क ृति की परिचायक ह ै एव ं अपन े भावा ें का े बिना कह े सरलता स े कला क े माध्यम स े वर्ण न करना ज ैस े इन अब ुझमाडि ़या ें की विरासतीय कला ह
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डा, ॅ. संगीता शर्मा. "भारतीय लोक संस्कृति आ ैर रंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890501.

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Abstract:
मानव के पास संस्कृति ह ै इसीलिए वह पशु से अलग ह ै। भर्तृ हरि ने माना ह ै - “साहित्य स ंगीत कला विहीनः साक्षात् पश ु पुच्छ विषाण हीनः।।“ डा ॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार - “लोक शब्द का अर्थ जनपद या गाँव नहीं बल्कि नगरों व गाँवों मे फ ैली वह समूची जनता ह ै जिसका आधार पा ेथियाँ नहीं, अकृत्रिम आ ैर सरल जीवन व्यतीत करने वाले जन ह ै।“ लोक संस्कृति का अहम भाग ह ै लोक कला। यह संस्कृति का पहचान है जहाँ तक भारतीय लोक संस्कृति की बात ह ै इसमें लोक कला का विष ेष महत्व है। कला का प्रयोजन अभिव्यक्ति, यष प ्राप्ति, धनोपार्जन, सेवा, आनंद की प्राप्ति, विष्व कल्याण आदि हो सकते ह ै। भौगोलिक स्थितियाँ लोक चि
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अमृता, सोनी. "स ंगीत चिकित्सा (एक नवाचार)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.885055.

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Abstract:
भगवान श्री विष्णु से एक बार नारद जी ने प ूछा आप कहां रहते हैं। तब उन्होंने कहा ह े नारद ना ही मैं ब ैकुण्ठ में रहता ह ूं आ ैर ना ही या ेगिया ें क े हृदय म े।ं लेकिन मेरे भक्त जहां गायन वादन करते ह ै ं वहां मैं मूर्त रूप में उपस्थित रहता हूं। (नारद भक्ति सूत्र) ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण मानव-जगत में नित नए प्रया ेग हा े रहे ह ैं। जब ये प ्रया ेग जीवन क े अभिन्न अंग बन जाते हैं, तब मानव फिर अभिनव अनुसंधान में प ्रवृत्त हा े जाता है। यद्यपि संगीत स्वयं एक विज्ञान है, किन्तु अभी उसकी सिद्धी क े लिए वर्षा ें की तपस्या अपेक्षित ह ै। इधर कुछ समय से व ैज्ञानिकों का ध्यान संगीत की ओर गया ह ै, लेकिन संग
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मोनीषा, वीरवानी. "स ेहत का मीत - स ंगीत". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.885867.

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Abstract:
संगीत लोगा ें का े संव ेदना क े स्तर पर एक गहरी समझ देकर उन्ह ें ब ेहतर बनने की दिशा में प्र ेरित करता ह ै आ ैर यही तत्व जब निज से व्यापक हा ेता ह ै ता े दुनिया भी बदल सकती ह ै. ये संगीत ही है जो आदि का े अ ंत से जा ेडकर हमारे हृदय का साहित्य बन जाता ह ै। आत्मा का े स्नेह से भर देता ह ै मन का े गहन अन्धकार से लेकर अनन्त ऊंचाइया ें तक ले जाता ह ै । संगीत क® ईश्वर का दर्जा प्राप्त ह ै, इसीलिए इस विधा में शुध्दता का विश ेष महत्व है। सात ष ुघ्द अ©र पा ंच क®मल स्वर®ं क े माध्यम से मन क® साधने का उपाय ह ै संगीत। अतः कहा जा सकता ह ै कि शरीर तथा मन क® स्वस्थ््ा, प्रफुल्लित रखने क े लिए संगीत आवश््यक ह
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SAKSHI, GUPTA (JRF). "र ंगा ें का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवम् रंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.889290.

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Abstract:
सरंाश- संसार में प ्रत्येक व्यक्ति अन्तर्मन क े भावा ें का े व्यक्त करने क े लिय े किसी न किसी माध्यम का े अपनाता ह ै। किसी के लिये स्वर माध्यम ह ैं तो किसी क े लिये शब्द परन्तु एक चित्रकार के लिये उसक े भावा ें को अभिव्यक्त करने का माध्यम या साधन रंग ह ै। रंगा ें की विभिन्न ताना ें क े द्वारा मन म ें उद्व ेलित भावों का े अभिव्यक्त करता ह ै। वह चित्रा ें में संया ेजन विधियों का प ूर्ण ध्यान रखते हुये कहीं गहरे या तीख े रंगा ें का प ्रया ेग करता है तो कहीं हल्के व का ेमल रंगा ें का। इस विधि से अपने भावों की अभिव्यक्ति करके उसे आत्म-संता ेष मिलता ह ै। एक कृति अपने भीतर छुपे ह ुये अनेक आयामों का
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डा, ॅ. नीरज राव. "स ंगीत क े प्रचार-प्रसार म ें स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.886994.

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Abstract:
मनुष्य को आदिकाल से ही संगीत मना ेरंजन एव ं आमोद-प्रमोद का साधन रहा ह ै। आदिकाल से ही मानव ने अपने मना ेरंजन क े साधन क े लिये विभिन्न प्रकार क े प ्रया ेग किये जैसे-जैसे मानव अपनी सभ्यता का विकास करता गया व ैसे-व ैसे उसकी समझ आ ैर सूझ-बूझ ने नृत्य, गायन आ ैर वादन की ओर आकर्षि त किया। मानव ने सभ्यता और संस्कृति को समझकर अपने का े प ्रकृति क े साथ तालमेल करते ह ुए संगीत का े सीखा। हमारे पा ैराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख ह ै कि माँ पार्वती की गायन मुद्रा को देखकर भगवान षंकर ने क्रमषः पाँच राग हिंडा ेल, दीपक, श्री, मेघ, का ैषिक आदि रागों की रचना की एवं संगीत की उत्पत्ति भगवान षिव क े ताण्
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डा, ॅ. मीनाक्षी जा ेषी. "स ंगीत म ें नवाचार - एक अप ेक्षा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.887008.

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Abstract:
आधुनिक युग में सर्वा धिक विकास का अथवा प ्रगतिषीलता का द्या ेतक षब्द ह ै ‘नवाचार‘ जिसे अ ंग्र ेजी भाषा में कहते है ं प्ददवअंजपवद अर्थात् कुछ ऐसा नयापन जो विकास अथवा प ्रगति/उन्नति में सहायक हा े जावे। ये नयापन तकनीकी से अधिक जुड़ा हुआ होता ह ै। आज सारा विष्व इस नवाचार के लिये संकल्पित व कटिबद्ध सा दीखता है। षिक्षा के क्षेत्र में, अध्ययन-अध्यापन क े क्षेत्र म ें निरंतर किये जा रह े सायास प ्रयासा ें में नवाचारों का े विषेष स्थान दिया जा रहा ह ै। उच्च षिक्षा क े क्षेत्र में अध्ययन-अध्यापन की आधुनिक ष ैलिया ें के प ्रयोग ह ेतु विषेष तकनीकी व्यवस्थाओं क े लिये नवाचारों की महती आवष्यकता अनुभूत की ज
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डा, ॅ. प्रतिभा सुगंधी. "र ंगा े का मना ेवैज्ञानिक प्रभाव एवम र ंग चिकित्सा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.891938.

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Abstract:
मनुष्र्य इ श्वर की सर्व श्र ेष्ठ कृति ह ै आ ैर रंग स ृष्टि का बेहतरीन उपहार है । यह प्रकृति की ए ेसी भ े ंट ह ै जिससे जीवन आ ैर अधिक आर्कषक बनता है । प ्रकृति के सांिनध्य से मनुष्य अपने जीवन को निर्धारित करता है आ ैर इस सामाजन्स्य को स्थापित करते ह ुए स्वस्थ जीवन जीने का प ्रयास करता ह ै। जैसे सूरज क े ताप व प ्रकाश का हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता ह ै वैसा ही रंगा े का प्रभाव हमारे शरीर व मन पर पड़ता है। रंगा े का महत्व केवल सा ैन्दर्य व ृद्धि तक सीमित नहीं ह ै अपितु मनुष्य के स्वभाव उसके भविष्य एवम उसक े स्वास्थ्य पर भी इसका सीधा प ्रभाव पड़ता ह ै । प ्रकृति अपने गर्भ में असंख्य रंग समाए ह ुए ह
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