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Journal articles on the topic 'समाज'

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राठोड, मीना, та रमेशभाई बनकर. "जीवनी और महिला लेखनः छूटे पन्नो की उड़ान – एक समीक्षा". VIDYA - A JOURNAL OF GUJARAT UNIVERSITY 2, № 2 (2023): 6–9. http://dx.doi.org/10.47413/vidya.v2i2.198.

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Abstract:
दलित साहित्य मनुष्य को मनुष्य के रुप में देखता है। जिसे हम दलित मनोवैज्ञानिक मुक्ति का साहित्य कहते है। हशिये के बहार पडा भारतीय दलित समाज आज आत्मसम्मान तथा बहिस्कृत जिंदगी से मुक्ति पाने का संघर्ष एवं अपने आत्मसम्मान की पहचान की लडाई लड़ रहा है। शोषण के प्रति विद्रोह भाव जगाना ही साहित्य कर्मियों का कर्तव्य है। दलित साहित्य का उद्देश्य दलित समाज में जागृति पैदा करके उनमें स्वाभिमान भरना है। वे चाहते है कि संपूर्ण समाज व्यवस्था को नष्ट करके समान समाज व्यवस्था का निर्माण हो, नवीन समाज व्यवस्था निर्मित हो वहाँ हरेक व्यक्ति को समान अधिकार मिले।
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Kalpana Luitel. "मानुषी कविताको लैङ्गिक अध्ययन". Journal of Development Review 8, № 1 (2023): 43–51. http://dx.doi.org/10.3126/jdr.v8i1.57140.

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Abstract:
प्रगतिवादी साहित्यकार पारिजातद्वारा रचित मानुषी कविता मूलतः लैङ्गिक समानताका दृष्टिले नारीवादी मान्यतामारचना भएको पाइन्छ । प्रस्तुत मानुषी कवितामा नेपाली समाजमा विद्यमान लैङ्गिक भेदभाव र शोषण रहेको तथा पुरुषलेमहिलालाई कोसौं पछाडि पारेको तथ्य विभिन्न उदाहरणका साथ प्रस्तुत गरिएको छ । प्रस्तुत कवितामा लैङ्गिक शोषणर भेदभावको अन्त्य गरी समानतामूलक उन्नत समाज निर्माण गर्नुपर्ने उद्देश्य राखेको पाइन्छ । सभ्यताको प्रारम्भमा नारी शक्तिशाली थिए । तापनि पुरुषलाई नारीले अवसर दिएर अगाडि बढाएको दृष्टान्त दिँदै अहिले नेपाली नारीको अवस्था धेरै पछाडि रहेको देखाउन पारिजात सफल भएकी छन्। जबसम्म नारी र पुरुष दुवै
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विवेक, आत्रेय. "मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में नारी व्यथा". International Educational Applied Research Journal 09, № 05 (2025): 236–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.15593908.

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Abstract:
प्रस्तावना :- कहते है 'साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी भी समाज, संस्कृति या राष्ट्र का प्रतिबिंब उस समाज, संस्कृति या राष्ट्र के साहित्य में देखा जा सकता है। इसी दर्पण को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु हिंदी साहित्य में अनेक साहित्यकार हुए। इन सबमें मुंशी प्रेमचंद जी अग्रणीय भूमिका में नजर आते हैं। समाज के हर वर्ग को आधार बनाकर इन्होने अपनी रचनाएं लिखी । किसान, जवान, दलित, आदिवासी, नारी इत्यादि हर वर्ग की समस्याओं को छूने का प्रयास मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी कलम के माध्यम से किया।     नारी संवेदनशीलता भी मुशीं प्रेमचंद जी की रचनाओं का आधार रही है। समाज में स्त्री को पुरुष के समा
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रीतू रानी та डॉ. निरुपमा हर्षवर्धन. "कमलेश्वर के उपन्यासों में नारी के संघर्ष की दिशाएँ". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 2 (2024): 37–38. http://dx.doi.org/10.29070/zbg0n777.

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Abstract:
कमलेश्वर के उपन्यासों में नारी के संघर्ष की यथार्थ दिशाओं का चित्रण प्राप्त होता है। कमलेश्वर के उपन्यासों में ग्रामीण, कस्बाई तथा महानगरीय नारी के विविध रूपों के साथ विभिन्न संघर्ष की दशाओं का चित्रण हुआ है। उन्होंने नारी को भारतीय आदर्श नारी की प्रतिभा से मुक्त कर यथार्थ की पृष्ठभूमि पर उतारा है। निम्न वर्ग से लेकर उच्च, मध्यवर्ग तक की महिलाओं के पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन का वास्तविक चित्रण कमलेश्वर ने नारी के संघर्ष को दर्शाते हुए किया है। कमलेश्वर ने नारी को घर से लेकर समाज तक अपने अस्तित्व एवं सम्मान के लिए सदैव संघर्ष करने वाली स्त्री कहा है। कमलेश्वर का कहन
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श्रीवास्तव, मेघा, та नीतू मौर्य. "महिला सशक्तिकरण पर महात्मा गांधी के विचारों पर एक अध्ययन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 22, № 01 (2025): 261–67. https://doi.org/10.29070/j8hcz910.

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Abstract:
महात्मा गांधी का महिला सशक्तिकरण के प्रति दृष्टिकोण उनके संपूर्ण समाज सुधार और स्वतंत्रता संग्राम के प्रयासों का एक अभिन्न हिस्सा था। उनका मानना था कि महिलाओं को समान अधिकार, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता प्रदान किए बिना समाज का नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान संभव नहीं है। इस अध्ययन में गांधीजी के विचारों का विश्लेषण कर उनके दृष्टिकोण की प्रासंगिकता का मूल्यांकन किया गया है।
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डा, ॅ.श ुचि गुप्ता. "स ंगीत एवं समाज". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886083.

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Abstract:
संगीत ग्रन्थ ‘स्वर मेल कलानिधि‘ में वर्णित प ्रस्तुत श्लोक सृष्टि में संगीत कला की अनन्तता का े दर्शाता ह ै। भारतीय समाज में संगीत उस समय से व्याप्त ह ै जब समाज पूर्ण रूप से विकसित भी नहीं ह ुए थे। मानव कल्याण हेतु ज्ञान की देवी माँ सरस्वती ने नारद जी के माध्यम से इस देवी कला को भूला ेक में भेजा था। तभी से संगीत एवं समाज रूपी अविरल धाराए ं एक-दूसरे से आश्रय पाते हुए निरन्तर समान गति से बह रही ह ै। समाज व्यक्ति क े लिए एक अनिवार्य एवं आधारभूत ढांचा ह ै जिसके आश्रय में वह अपने आचार-विचार, रीति-रिवाज, संस्कार, मान्यताएं एवं परम्परराए ं आदि सांझा करता ह ै, प ्रतिदान स्वरूप समाज व्यक्ति को सुरक्षात
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प्रा., कविता तुकाराम चानकने. "२१ वीं सदी के हिंदी काव्य में चित्रित हाशिए का समाज". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 138–43. https://doi.org/10.5281/zenodo.10483888.

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Abstract:
२१ वीं सदीं में भारत को सार्वभौमिक राष्ट्र बनाने के लिए हमें गरीबीं, भूख, युद्ध, सामाजिक - आर्थिक विषमता के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। प्राचीन काल से वर्तमान काल की कविताओं में समाज द्वारा प्रताड़ित, पूंजीपतियों द्वारा शोषित तथा भूमंडलीकरण से प्रभावित एक ऐसा जनसमुदाय जिसे हाशिए का समाज कहा जाता है, मूल केंदीय विषय बना है। दलित समाज और हाशिए में मुलभुत अंतर केवल इतना है कि, कृषि - कर्मियों और नौकरों के साथ अस्पृश्यता का बर्ताव नहीं किया जाता।'' संस्कृत, मराठी, हिंदी, अंग्रेजी भाषा कोई भी हो, उस भाषा में लिखी गई कविताएँ उस समाज की आत्मपीड़ा, शोषण, वेदना को अभिव्यक्त करती है। का
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डॉ., सुधा जैन. "भारतीय कला में सूर्य की प्रतीकात्मक प्रस्तुतिदृ 'स्वस्तिक'". International Journal of Advance Research in Multidisciplinary 2, № 3 (2024): 178–81. https://doi.org/10.5281/zenodo.12803689.

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Abstract:
आपका अनुभव सूर्य के महत्व को भारतीय संस्कृति में व्यापक रूप से समझाने वाला है, और इसे संस्कृति और धर्म के संगम में एक अद्वितीय प्रतीक माना गया है। सूर्य की पूजा और सूर्य के प्रति आदर की यह व्याख्या बहुत गहरी है, और यह अच्छे ढंग से दिखाती है कि इसका कैसे सम्बंध है भारतीय समाज, धर्म और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं से। धर्म-मतों की विविधता के बावजूद, सूर्य के प्रति अध्यात्मिकता और आदर एक समान हैं, जो भारतीय समाज के एकता और समाहितता को प्रदर्शित करता है। इसमें भारतीय संस्कृति के स्वाभाविक और सांस्कृतिक विकास का संवाहक भाव दिखाया गया है, जो भारतीय समाज के अद्वितीय रूप के साथ जुड़ा है।
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जाधव, विनोद विठ्ठलराव. "आदिवासी स्त्री जीवन". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR INTERDISCIPLINARY STUDIES 8, № 65 (2021): 15095–99. http://dx.doi.org/10.21922/srjis.v8i65.1353.

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Abstract:
जगातील सर्वच देशात कमी अधिक प्रमाणात आदिवासी समाज आढळून येतो. जगाच्या तूलनेत भारतातील आदिवासींची लोकसंख्या लक्षणिय आहे. डोंगर, द-या खो-यामध्ये राहणारा हा समाज प्रगत समाजापासून अलिप्त आहे. भारताच्या चौफेर दिशांनी आदिवासी विखूरलेला आहे. त्यांना वेगवेगळ्या नावानी संबोधले जाते. ठक्कर बाप्पा यानी ‘मुळ निवासी’ डॉ.धूर्ये यांनी ‘मागासलेले हिंदु’ एलविन यांनी ‘गिरीजन’ तर भारतीय राज्यघटनेत ‘अनुसूचित जमाती’ असा उल्लेख आहे. गिलीन व गिलीन यांच्यामते, “एका विशिष्ठ भूप्रदेशात राहणारा, समान बोलीभाषा बोलणारा व समान सांस्कृतीक जीवन जगणारा पण अक्षरओळख नसलेल्या व्यक्तिच्या समुच्चयाला आदिवासी असे म्हणतात.” आदिवासी
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., चन्द्रशेखर. "उच्चतर माध्यमिक स्तर के हिन्दी माध्यम के ग्रामीण व शहरी छात्र-छात्रों के मध्य समायजन क्षमता का तुलनात्मक अध्ययन". International Journal of Science and Social Science Research 1, № 2 (2023): 194–98. https://doi.org/10.5281/zenodo.13379675.

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Abstract:
शिक्षा किसी भी देश या समाज के वर्तमान क¨ विकसित और भविष्य को  उज्जवल बनाने की आधारशिला ह¨ती है। शिक्षा के माध्यम से ही छात्र-छात्राओं व देश व समाज के सर्वांगीण विकास करते हुए उसकी संस्कृति का संरक्षण अ©र सभ्यता क¨ आगे बढ़ाया जाता है। एवं शिक्षा ही समाज कें सुख-समृद्धि लाने का कार्य करती है। चार्वाक दर्शन के अनुसार भी शिक्षा वह है ज¨ मनुष्य क¨ सुखपूर्वक जीवन जीने य¨ग्य बनाती है।प्ल्¨ट¨ के शब्दों  में ‘‘शिक्षा से अभिप्राय उस प्रशिक्षण से है ज¨ अच्छी आदतों  के द्वारा बच्चों  में अच्छी नैतिकता का विकास करती है।’’
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अधिकारी Adhikari, दीपबहादुर Dip Bahadur. "नेपाली समाज र यसले जनस्वास्थ्यमा पारेको प्रभाव". Samaj Anweshan समाज अन्वेषण 2, № 1 (2024): 94–104. http://dx.doi.org/10.3126/anweshan.v2i1.68579.

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Abstract:
समृद्ध र स्वस्थ समाज निर्माणका लागि हरेक नागरिक शारीरिक, मानसिक, सामाजिक र आध्यात्मिक रूपले स्वस्थ हुन जरुरी हुन्छ । मृत्यु शास्वत सत्य हो अर्थात् प्राकृतिक प्रक्रिया हो । यद्यपि दिनहुँ यहाँ मानिसहरूले अप्रत्यासित ज्यान गुमाइरहेका हुन्छन् । अकालमा मृत्यु हुनु अथवा उपचार विधि भएर पनि रोग पालेर बस्न बाध्य हुनु स्वस्थ समाज निर्माणको सूचक भने पक्कै होइन । मानिस सामाजिक प्राणी हो । यसर्थ, साझा उद्देश्य प्राप्तिका लागि व्यक्तिहरू सङ्गठित भएर समाज निर्माण गरिएको हुन्छ । समाज स्थापना र रूपान्तरण गर्ने क्रममा आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक र राजनीतिकजस्ता तत्त्वहरू आधार बन्न पुगेका छन्, जसले जनस्
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Ranjan, Priya. "सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा और स्त्री शिक्षा की भूमिका". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 2, № 2 (2011): 1–5. http://dx.doi.org/10.29070/45y57c37.

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Abstract:
व्यक्ति स्वभाव से ही एक गतिशीलप्राणी है। अतः मानव समाज कभी भी स्थिर नही रहता उसमें सदैव परिवर्तन हुआ करता है। परिवर्तन संसार का नियम है। परिवर्तन किसी भी वस्तु, विषय, विचार, व्यवहार अथवा आदत में समय के अन्तराल से उत्पन्न हुई भिन्नता को कहते है। परिवर्तन एक बहुत बड़ी अवधारणा है और यह जैविक, भौतिक तथा सामाजिक तीनो जगत में पाई जाती है किन्तु जब परिवर्तन शब्द के पहले सामाजिक शब्द जोड़कर उसे सामाजिक परिवर्तन बना दिया जाता है तो निश्चित ही उसका अर्थ सीमित हो जाता है परिवहन निश्चित है क्योकि यह प्रकृति का नियम है। संसार में कोई भी पदार्थ नही जो स्थिर रहता है उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन सदैव होता रहता है
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डॉ.सलमा, खमरोद्दीन शेख. "समाज में महिला सशक्तीकरण का योगदान". International Journal of Advance and Applied Research 2, № 19 (2022): 93–94. https://doi.org/10.5281/zenodo.7053778.

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Abstract:
स्त्री व पुरुष समाज रचना की गाडी के दो पहिए है जब तक ये दोनो पहिए सहजता, समता, समानता के साथ होकर आगे नही, बढते तब तक प्रगती और सही विकास संभव नही है | उन दोनो कोक समान रुप से गतिशील रहने से ही समाज का विकास होना संभव है |  इस बारे में स्वामी विवेकानंदजी का कथन है "जब तक महिलाओं की स्थिती में सुधार नही होगा तब तक विश्व का कल्याण नही हो सकता किसी भी पक्षी के लिए एक पंख से उडना असंभव है | "भारतीय साहित्य में कवी ने सच ही कहा है कि नारी नर की खान है अर्थात नर का अस्तित्व नारी पर ही निर्भर है "यह नार्यास्तु पुज्यते रमन्नि नत्र देवतां" इसका अर्थ है जहॉ स्त्री की पूजा,आदर कि
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शर्मा, अभिषेक, та अन्नू शर्मा. "समावेशी वर्ग में शिक्षा समता और समानता भीमराव रामजी अंबेडकर का दृष्टिकोण". Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal 02, № 03 (2023): 350–57. http://dx.doi.org/10.59231/sari7611.

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Abstract:
डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का समावेशी वर्ग में शिक्षा, समता और समानता का दर्शन भारत के सामाजिक आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के दशकों में हम विभिन्न विधानों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पहुंच और समानता के मुद्दों में व्यस्त रहे हैं इन में अम्बेडकर ने शिक्षा, शैक्षिक संस्थान, जाति, धर्म, स्त्री आदि मामलों पर प्रकाश डाला । अंबेडकर का मानना हैं की समता और समानता यह हर इंसान की जरूरत ही नहीं यह सभी का अधिकार है । जो खुलकर और बेबाकी से बाबा साहब (बी. आर. अम्बेडकर ने समाज को बताया। बी. आर. अम्बेडकर ने समाज के उन सभी वर्गों को समावेशी कहा, जिनका समाज के अन्य वर्गों द्वारा क
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डॉ., सूरज बाळासो चौगुले. "२१वीं सदी के भारतीय भाषाओं से अनूदित हिंदी काव्य में चित्रित हाशिए का समाज". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 84–89. https://doi.org/10.5281/zenodo.10478604.

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Abstract:
भारत देश विभिन्न संस्कृति, प्रदेश, भाषा आदि का मिला-जुला रूप है। इस देश की विविधता ही भारत की सही पहचान है। भारत में अनेक भाषाएं बोली और समझी जाती है। इन प्रादेशिक भाषाओं की अपनी अलग पहचान है,अपना अलग साहित्य है। हर प्रदेश की भाषा का साहित्य अपनी मिट्टी की समस्याओं को उद्घाटित करता है। जहां समस्या होती है वहां दो वर्ग निश्चित होते हैं,एक समस्या निर्माण कर अपना निजी स्वार्थ देखने वाला और दूसरा इस समस्या से पीड़ित होने वाला वर्ग। समस्या से पीड़ित वर्ग में अधिक मात्रा में हाशिए का वह समाज है जो पिछड़ा, दीन, दलित और परंपरा से चला आया है। भारत देश, प्रादेशिक विविधताओं में बटने के बावजूद भी पूरे देश
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., आलोक. "ग्रामीण महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति तथा ई0-प्रशासन". Humanities and Development 18, № 02 (2024): 70–78. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.147.

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Abstract:
स्वस्थ नागरिक समाज तथा राष्ट्र की निधि है। यह बात स्त्री तथा पुरुष दाने ां के लिए समान रूप सेलागू होती है। व्यक्ति की अस्वस्थता का प्रभाव उसकी कार्य क्षमता पर पड़ता है, जिसका सीधा संबंधसंपूर्ण राष्ट्र एवं समाज के विकास में अवरोध से है। समाज की सबसे छोटी संगठित एव ं पहिचान कीजाने वाली इकाई परिवार है। किसी भी परिवार की धुरी महिला होती है और उसके स्वास्थ्य स्थिति कासीधा प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ता है। यदि घर की महिला स्वस्थ है, तो परिवार के प्रत्येकसदस्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ महिला स्वस्थ संतान को जन्म देकर स्वस्थ औरखुशहाल भावी पीढ़ी का निमार्ण् ा करती है। समाज में दोयम दर्जा प्र
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Bairwa, Jitendra Kumar. "Analysis of Social and Political Thoughts of Dr. Bhimrao Ambedkar." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 6, no. 12 (2021): 159–63. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2021.v06.i12.023.

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Abstract:
सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया, कई स्तरों पर और कई पद्धतियों से चलने वाली एक अखण्ड प्रक्रिया है। व्यक्ति या वर्ग के समूह से जब समाज बनता है, तो धीरे-धीरे कुछ नियम-उपनियम बनाये जाते है। इसके मूल में दृष्टि केवल इतनी ही होती है कि उस समाज में स्थित प्रत्येक को व्यक्तित्व का समुचित अवसर उपलब्ध हो। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्वतंत्र हो उस पर किसी व्यक्ति अथवा गुट का कोई बंधन न हो। यह सब, प्रत्येक समाज का मूलभूत सिद्धान्त होता है। धीरे-धीरे ये सिद्धान्त स्थायी बन जाते है, फलतः इनको वैधानिक स्वरूप देने के लिए किसी ‘ग्रन्थ’ की आवश्यकता पड़ती है। जब ‘ग्रन्थ’ की रचना समाज के
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डॉ., मुकेश आहूजा. "धर्म, समाज और राजनीति: भारतीय समाज के त्रिभुज में समाजशास्त्रीय विश्लेषण". INTERNATIONAL JOURNAL OF INNOVATIVE RESEARCH AND CREATIVE TECHNOLOGY 2, № 6 (2016): 1–8. https://doi.org/10.5281/zenodo.15223022.

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Abstract:
धर्म, समाज, और राजनीति: भारतीय समाज के त्रिभुज में समाजशास्त्रीय विश्लेषण का यह शोध पत्र भारतीय समाज की विविधता और संरचना को समझने का प्रयास करता है। भारतीय समाज में धर्म, समाज, और राजनीति के बीच संबंध को समझने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों का विश्लेषण किया गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 79.8% हिंदू, 14.2% मुस्लिम, 2.3% ईसाई, 1.7% सिख, और अन्य धर्मों के लोग निवास करते हैं (रामनिक, 2011)। यह धार्मिक विविधता समाज और राजनीति को गहराई से प्रभावित करती है। यह शोध पत्र धर्म, समाज, और राजनीति के तत्वों के संबंध को समझाने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों को विश्लेषण करता है।प्रस्तावना में, विभिन्न
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चौधरी, विजय शंकर, та देवेंद्र मौर्य. "डॉ. अम्बेडकर की समावेशी समाज की संकल्पना: एक विश्लेषण". Lokprashasan 16, № 1 (2024): 102–14. http://dx.doi.org/10.32381/lp.2024.16.01.8.

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Abstract:
भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली को लेकर एक समावेशी दृष्टिकोण था, जो समाज के प्रत्येक वर्ग को इसके अंतर्गत शामिल करने एवं सशक्त करने पर जोर देता है। उनका मानना था कि राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र आदर्श समाज के दो अनिवार्य घटक हैं, और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उनका दृढ़ मत था कि आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पायेगी। डॉ. अम्बेडकर एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली में विश्वास करते थे जहाँ प्रत्येक नागरिक के पास अपने देश में निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने और योगदान करने के समान अवसर उपलब्ध हों। उन्होंने सार्वभौ
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Dr., Manoj kumar sah. "बुद्ध और समाज सुधार: तत्कालीन भारतीय समाज पर प्रभाव". SIDDHANTA'S INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCED RESEARCH IN ARTS & HUMANITIES 2, № 5 (2025): 93–105. https://doi.org/10.5281/zenodo.15559501.

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Abstract:
गौतम बुद्ध, जिन्होंने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में एक गहन सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक आंदोलन की शुरुआत की, आज भी भारतीय समाज में प्रासंगिक बने हुए हैं। भzले ही समय बदल गया हो, तकनीक विकसित हो चुकी हो, और समाज आधुनिक दिखता हो, लेकिन कई समस्याएँ&mdash;जैसे जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, धार्मिक असहिष्णुता और मानसिक तनाव&mdash;अब भी गहराई से मौजूद हैं। वर्तमान भारत विकास के मार्ग पर अग्रसर होते हुए भी सामाजिक और मानसिक असंतुलन से जूझ रहा है। ऐसे में बुद्ध की शिक्षाएँ समाज के लिए एक नैतिक और व्यावहारिक दिशा प्रदान करती हैं। बुद्ध के जीवन और उपदेशों की केंद्रीय भावना है &ndash; <strong>समता, करुणा, औ
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Dr., Reeta Maurya. "भारत में महिलाओं के प्रति हिंसा और अपराध: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन". International Journal of Trends in Emerging Research and Development 2, № 1 (2024): 256–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.13995097.

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Abstract:
भारत में महिलाओं के प्रति हिंसा और अपराध एक गहरा सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दा है, जो पितृसत्तात्मक संरचनाओं, परंपराओं, और असमानताओं से उत्पन्न होता है। इस समाजशास्त्रीय अध्ययन में महिलाओं के खिलाफ विभिन्न प्रकार की हिंसा, जैसे घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, दहेज हत्या, बाल विवाह, एसिड हमले, और मानव तस्करी जैसी समस्याओं की चर्चा की गई है। अध्ययन इस बात पर भी जोर देता है कि भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति असमानता, शिक्षा की कमी, और आर्थिक निर्भरता जैसी समस्याएं इन अपराधों को बढ़ावा देती हैं। इसके अलावा, कानूनी ढांचे और उसके कार्यान्वयन में सुधार की आवश्यकता को भी रेखांकित किया गया है। इस शोध का उद्
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Daya Shankar та Dr. Dharmendra Kumar Sonker. "वैश्वीकरण और बदलते परिदृश्य में संयुक्त परिवार का अध्ययन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 1 (2024): 254–62. http://dx.doi.org/10.29070/47w3bq91.

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Abstract:
वैश्वीकरण अपने शाब्दिक अर्थ में स्थानीय या क्षेत्रीय चीजों या घटनाओं को वैश्विक में बदलने की प्रक्रिया है। इसका उपयोग उस प्रक्रिया का वर्णन करने के लिए भी किया जा सकता है जिसके द्वारा दुनिया के लोग एक समाज में एकीकृत होते हैं और एक साथ कार्य करते हैं। यह प्रक्रिया आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक ताकतों का एक संयोजन है। पारंपरिक मूल्य महत्व खो रहे थे और समाज में नई सोच, नए मूल्य जुड़ रहे थे। आधुनिक युग में पुरुष और महिला को समान माना जाएगा। गांव के लोगों के स्वास्थ्य क्षेत्र की सेवा के लिए नई स्वास्थ्य उपचार और सुविधाएं खोली गईं। सभी व्यक्तियों को समाज में समान अवसर दिए गए। हमारे
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मन्जू, रानी, та धीरज बाकोलिया डॉ. "वैश्वीकरण और नारी आत्मनिर्भरता: एक विश्लेषण". SIDDHATNA'S INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCED RESEARCH IN ARTS & HUMANITIES 1, № 5 (2024): 42–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.11654621.

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Abstract:
20वीं शताब्दी की एक प्रमुख घटना है - वैश्वीकरण। इसके अंतर्गत आतंकवाद, पर्यावरण, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि विषयों के साथ-साथ नारी विमर्श जैसे ज्वलंत विषय का भी अध्ययन किया जा रहा है। नारी विमर्श सिर्फ एक देश की सीमाओं तक की सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर नारी सशक्तिकरण के लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। पाश्चात्य देशों में नारी स्वतंत्रता के लिए अनेक आंदोलन हुए। संचार साधनों, पूंजीवाद तथा बाजारीकरण ने जहां नारी को आत्मनिर्भर तो बनाया परंतु उसके अस्तित्व पर आज भी प्रश्न चिन्ह लगे हुए हैं।&nbsp;संवैधानिक व सामाजिक अधिकार स्त्री को पुरुष के समान ही प्राप्त है परंतु आज भी नारी को अपने जीवन पर
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न्यौपाने Neupane, नम्रता Namrata. "स्वास्थ्य र समाज". Samaj Anweshan समाज अन्वेषण 2, № 2 (2025): 191–200. https://doi.org/10.3126/anweshan.v2i2.74237.

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Abstract:
यो लेखमा नेपाली समाजमा स्वास्थ्यको महत्त्व र स्वास्थ्य र समाजसँगको पारस्परिक सम्बन्धलाई उजागर गरिएको छ । शारीरिक, मानसिक, र सामाजिक रूपमा स्वस्थ व्यक्तिहरू समृद्ध समाजको आधार हुन् । नेपाल सरकारले वि.सं. २००७ सालपछि पञ्चवर्षीय योजनाहरू सुरु गर्यो, जसले समाजमा स्वास्थ्य जागरूकता र सेवाहरूको पहुँच बढाउन थाल्यो । अहिले करिब ७३ वर्षमा पुग्दा स्वास्थ्य क्षेत्रमा धेरै परिवर्तन भएको छ । तर पनि अझै पनि धेरै नागरिक निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाको उपभोगबाट वञ्चित छन् । लेखले समाजमा रहेका अन्धविश्वासहरू र स्वास्थ्य सेवामा आधुनिकीकरणको आवश्यकतालाई चित्रित गर्न खोजेको छ । यो लेखले समृद्ध समाज निर्माणको लागि सरोका
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पाटील, श्री पांडुरंग पंडीत. "नागरी समाजाची भूमिका". International Journal of Advance and Applied Research 11, № 2 (2023): 305–6. https://doi.org/10.5281/zenodo.13990751.

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Abstract:
नागरी समाजाची संकल्पना ही एक प्राचीन संकल्पना मानली जाते.&nbsp; जागतिकीकरण व माहिती तंत्रज्ञानातील क्रांतिकारी बदलांमुळे जागतिक समुदाय अगदी जवळ आला आहे. नागरी समाजामध्ये अनेक संस्था, संघटना कार्यरत झाल्या आहेत. अ-राज्य घटकांचे महत्व वाढीस लागले आहे. लोकशाही प्रक्रिया त्यातून प्रभावित व गतिमान होतांना दिसत आहेत.&nbsp; सामाजिक चळवळींमध्ये समान हितसंबंध असलेले गट व व्यक्ति विशिष्ट राजकीय उद्दिष्टांच्या पूर्ततते करिता एकत्र येतात. या संघटनांना समाजव्यवस्थेमध्ये बदल अपेक्षित असतो. यानुसार &nbsp;&ldquo;नागरी समाज ही एक प्रक्रिया आहे जिच्यामध्ये व्यक्ती आपापसात व आर्थिक आणि राजकीय सत्ताकेंद्रा बरोबर
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सुप्रिया, सक्सेना. "गढ़वाली गाथाओं का समाज पर प्रभाव". International Educational Applied Research Journal 09, № 03 (2025): 41–46. https://doi.org/10.5281/zenodo.15059475.

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Abstract:
समाज मनुष्य के एक-दूसरे के साथ संबंधों का ताना-बाना है। यह हमारे पारस्परिक व्यवहारों का जाल है। समाज हमारी व्यावहारिक दुनिया है । समाज के बिना मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। समाज मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण और समाज के लिए मनुष्य महत्वपूर्ण है। समाज के अंतर्ग मनुष्य का व्यवहार, रहन-सहन, पारस्परिक संबंध, वेश-भूषा के साथ ही पारिवारिक एवं जाति व्यवस्था आती है। सारांश यह है कि मनुष्य एक-दूसरे के प्रति व्यावहारिक संबद्धता ही समाज है । यह रक्त व अन्य संबंधों का पटल है । समाज पर मनुष्य की निर्भरता के कारण ही मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है। मनुष्य समाज को प्रभावित करता है तथा समाज उसको प्रभावित
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प्रहलाद, सिंह अहलूवालिया. "समाज सुधार बनाम स्वयं सुधार : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन". Siddhanta's International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities 2, № 3 (2025): 30–40. https://doi.org/10.5281/zenodo.15052796.

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Abstract:
समाज सुधार और स्वयं सुधार दोनों ही समाज और व्यक्ति के विकास के महत्वपूर्ण अंग हैं। इस शोधपत्र का उद्देश्य समाज सुधार और स्वयं सुधार के बीच अंतर और उनके प्रभावों का विश्लेषण करना है। समाज सुधार का उद्देश्य समाज के ढांचे और सामाजिक संस्थाओं में सुधार लाना है, जबकि स्वयं सुधार व्यक्ति के आचरण, मानसिकता और आत्म-निर्माण से संबंधित है। समाज सुधार का दायरा व्यापक होता है, जिसमें समाज में व्याप्त असमानताएँ, भेदभाव, और सामाजिक अन्याय को दूर करने का प्रयास किया जाता है। वहीं, स्वयं सुधार का उद्देश्य व्यक्ति को आत्म-संवेदनशील बनाना और उसे नैतिक, मानसिक, और शारीरिक दृष्टि से बेहतर बनाना है। इस अध्ययन में
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ब ेगम, आब ेदा. "छŸासगढ ़ क े महाप ुरूषा ें का सामाजिक समरसता म ें या ेगदान’". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 87–90. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201914.

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Abstract:
सामाजिक समरसता एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा करना एवं इसे ठीक प्रकार से कार्यान्वित करना आज समाज एवं राष्ट ्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसके लिए हमें सर्वप्रथम सामाजिक समरसता के अर्थ का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। संक्षेप में इसका अर्थ है सामाजिक समानता। यदि व्यापक अर्थ द ेखें तो इसका अर्थ है जातिगत भेदभाव एव ं अस्पृश्यता का जड ़मूल से उन्मूल कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहाद र् बढ ़ाना तथा समाज के सभी वर्गों एव ं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना। समरस्ता का अर्थ है सभी को अपन े समान समझना। सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है इस बात को हृदय से स्वीकार
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प्रा., हसीना अब्दुलअजीज मालदार. "वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी कविता का मूल्याकन (पर्यावरणीय समस्या के विशेष सन्दर्भ में)". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 6 (2025): 385–87. https://doi.org/10.5281/zenodo.15067412.

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Abstract:
<em>आज तेजी के साथ विश्व बदल रहा है। यह बदलाव विविध क्षेत्रों में हो रहा है। घर- परिवार की समस्या से लेकर, वसुंधरा की पर्यावरणीय समस्या तक के घेरे में मनुष्य एवं मनुष्य का जीवन घिर गया है। ये सभी समस्याएँ जटिल समस्याएँ हैं। इन समस्याओं की चपेट में पूरा मानव समाज घिरता ही जा रहा है। साहित्य समाज के लिए आईने के समान होता है। मनुष्य जीवन को दिशा निर्देश देने का कार्य साहित्य द्वारा किया जाता है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, फिल्म एवं टेलीफिल्म आदि साहित्य विधाओं में इन समस्याओं को दिखाया जाता है। इन समस्याओं को समझ कर समाज के लोगों की आंतरिक पीड़ा जागृत होकर आंतरिक चेतना भी जागृत हो जाती है। साहि
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कन्नौजिया, कविता. "स्वामी विवेकानन्द का विचार, दर्शन एवं आदर्श समाजः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR INTERDISCIPLINARY STUDIES 9, № 67 (2021): 15947–53. http://dx.doi.org/10.21922/srjis.v9i67.8237.

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Abstract:
भारत भूमि पर समय-समय पर अनेकानेक महान् पुरूषों ने जन्म लिया। उन्ही में सें एक स्वामी विवेकानन्द का नाम शीर्षस्थ है जिनके जीवनज्योति से जगतीतल जगमगा उठा है। जिन्होने भ्रमित युवाओं में चेतना को अवलोकित करके उन्हे साहस के साथ आगे बढ़ने, दीन-दुखियों में आशा का संचार भरने, एवं भारतीय धर्म, दर्शन तथा अध्यात्म को विश्वपटल पर पहुँचाने, निष्काम कर्म, सेवा, निष्ठा, को प्रेरित करने वाला आदर्श प्रस्तुत किया। स्वामी विवेकानन्द का जीवन दर्शन निश्चय ही अत्यन्त गौरवपूर्ण और प्रेरणादायक है। जिनके अमूल्य विचारों को अपनाकर एक उत्तम चरित्रयुक्त आदर्श समाज का निर्माण कर सकते है। मानव समाज का इतिहास एक आदर्श समाज बन
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मनीषा, दीपक केळूसकर, та डॉ. सुनील बनसोडे प्रो. "२१वीं सदी के उपन्यास में हाशिए का समाज 'मुक्तिपर्व' उपन्यास के विशेष संदर्भ में". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 98–101. https://doi.org/10.5281/zenodo.10479447.

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Abstract:
हाशिए का अर्थ ही है समाज में एक किनारे पर फेंका हुआ मानव समाज। जो समाज की सभी सुविधाओं से वंचित है। यह वंचना राजनीति, सामाजिक, आर्थिक न्यायिक, भाषिक लिंग संबंधी या जाति आधारित किसी भी प्रकार की होती है। समाज में कुछ उच्चवर्गिय लोगों की सत्ता होती है जो अपने ही समाज के कुछ लोगों को समाज से दूरी रखने के लिए एक किनारे पर रखता है। और अपने समाज के लोगों की शिक्षा न्याय, अर्थ धर्म सुविधा देना चाहता है। अपने स्वार्थ सुविधाओं और सुरक्षा पर आँच नहीं आने देता। जिसके कारण हाशिए का समाज गरीबी, बीमारी के दलदल में घिसता चला जाता है। उनपर तरह-तरह के अत्याचार किए जाते ते। उनसे दृष्टिपात होनेपर सवर्ण उन्हें कड
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Gupta, Shuchi. "MUSIC AND SOCIETY." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 3, no. 1SE (2015): 1–2. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v3.i1se.2015.3448.

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Abstract:
The shloka presented in the musical text 'Swar Mel Kalanidhi' indicates the infinity of musical art in creation. Music pervades Indian society from a time when societies were not even fully developed. Mother Goddess Saraswati, the Goddess of knowledge for human welfare, sent this Goddess art to Bhuloka through Narada. Since then, uninterrupted streams of music and society have been continuously flowing at the same pace, seeking shelter from each other. Society is an indispensable and basic structure for a person, under whose shelter he shares his ethics, customs, rituals, beliefs and tradition
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Bhupendra, Singh, та Sharma Anju. "महलाओं एवं दलत के उथान म मालवीय जी का योगदान". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 11, № 4 (2024): 63–68. https://doi.org/10.5281/zenodo.14840759.

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Abstract:
67टश हत और उसके :यापा(रक उ;े&lt;य ने भारतीय अथ":यव*था का नाश कर दया। भारतीय समाज अनेक कु?थाओंसे @ सत था, िजसम पैदा होते ह/ क5या कC हया, 'वधवाओं कC दयनीय दशा, 'ववाह-'वDछेद, बाल-'ववाह, वे&lt;यावृित,जात-पात छुआछूत आद ?मुख थी। मदन मोहन मालवीय ने आधु&amp;नक 'वचार के माHयम से सव"?थम समाज म फैल/कु?थाओं को जड़ से उखड़ने का संकKप Lकया। मदन मोहन मालवीय ने रचनामक कायM को इस ?कार से हाथ म &nbsp;लयाLक समाज एक नई *फू&amp;त" और ?ेरणा से भर उठा। मालवीय जी ने पQका(रता और साहय के माHयम से समाज को ?ेरणाद/। महलाओं एवं द लत के उथान म योगदान देकर मालवीय जी न समाज को एक सह/ दशा देने के साथ-साथ एकताके सूQ म 'परोने का
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शर्मा, सुनीता, та योगेन्द्रप्रसाद त्रिपाठी*. "विद्यार्थी वर्ग में सोशल मीडिया जनित बदलते सामाजिक मूल्य सम्बंधी चेतना: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन". Humanities and Development 17, № 1 (2022): 79–84. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i1.49.

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Abstract:
समाज में प्रारम्भ से ही मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। और प्रत्येक सामाजिक व्यक्ति एक दूसरे व्यक्ति के बीच रहना पसंद करता है। क्योंकि दो या दो से अधिक व्यक्ति के अंतःक्रिया से ही समाज का निर्माण होता है। विकसित समाज के इस दौर में मनुष्य अपनी बुद्धि और कौशल से सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों की स्थापना का प्रयास किया। जिसके द्वारा न केवल संपूर्ण समाज का विकास हो सके बल्कि समाज में व्याप्त अनैतिक और असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण रख सके। बदलते समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों ,आदर्शो इत्यादि मानक नियम भी तेजी से परिवर्तित हो रहे हैं। हमारे समाज में हो रहे बदलाव में सोशल मीड
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कुमार, अरूण. "महिला विमर्श बनाम समाज". International Journal of Advanced Academic Studies 4, № 2 (2022): 102–4. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2022.v4.i2b.781.

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Timilsina, Yemnath. "दिव्योपदेशको समाज भाषावैज्ञानिक विश्लेषण". Kanya Journal 4, № 1 (2023): 99–115. http://dx.doi.org/10.3126/kanyaj.v4i1.57071.

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Abstract:
दिव्योपदेशको समाज भाषावैज्ञानिक विश्लेषण’ शीर्षकको यो आलेख समाज भाषावैज्ञानिक सिद्धान्तको पृष्ठभूमिमा दिव्योपदेशको विश्लेषण गर्ने उद्देश्यले तयार गरिएको हो । पृथ्वीनारायण शाहले भाइभारदारहरूलाई दरबारमा बोलाई राज्यसञ्चालनका लागि आवश्यक पर्ने नीति तथा सुझाव समेटेर दिएको मार्गदर्शनलाई ‘दिव्योपदेश’ (१८३१) भनिन्छ । आलेख तयार पार्ने सन्दर्भमा मूलतः पुस्तकालयीय कार्यको उपयोग गरी सङ्कलन गरिएका प्राथमिक तथा द्वितीयक स्रोतका सामग्रीहरूको अध्ययनबाट प्राप्त तथ्यलाई तर्क, प्रमाण÷साक्ष्य र दृष्टान्तका आधारमा पुष्टि गरिएको छ । आवश्यक ठाउँमा पूर्वअध्येताहरूसँग छलफल वा संवाद गर्दै आलेखलाई पूर्णता दिइएको हो । सम
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अधिकारी, तेजविलास. "समाज, साहित्य र ललितकला". DMC Journal 8, № 7 (2023): 1–12. http://dx.doi.org/10.3126/dmcj.v8i7.62413.

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Abstract:
प्रस्तुत लेखमा समाज, साहित्य र ललितकलाको परिचयका साथै आपसी सम्बन्धका विविध आयाम प्रस्तुत गरिएको छ । समाज विकासको प्रक्रियामा मानव भावनाको अभिव्यक्तिले स्थान पायो । मानिस आफ्नो भावनालाई केवल आफूमा मात्र सीमित राख्न सक्दैन । मानव अभिव्यक्तिको साधन भाषाको प्रयोग गर्दै सजिलो जीवनयात्राको मार्ग खोज्दै हिँड्यो । उसले अपनाएको मार्ग कष्टकर थियो तर असम्भव भने थिएन । मानिसले तय गरेको यात्राको लयको माध्यम मूलतः कला हो । भाषाको स्रोत सोच मात्र होइन वस्तु पनि हो । वस्तुको निर्माण आवश्यकताको सिद्धान्तमा आधारित हुन्छ । यस कोणबाट हेर्दा भाषा, वस्तु निर्माणले समाजको सन्दर्भलाई जोड्दै लग्यो । बाँच्ने कला निर्मा
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निर्मला, शाह. "पर्यावरण प्रबन्धन एव ं समाज". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883555.

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Abstract:
मानव और पर्या वरण का निकट का सम्बन्ध है। पर्यावरण मानव का े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। स्वावलम्बी विकास की अवधारणा पर्यावरण एव ं विकास नीतियों के एकीकृत नजरिये पर आधारित है जिनका अभिप्राय किसी पारिस्थितिक क्षेत्र से अधिकाधिक आर्थिक लाभ लेना एव ं पर्यावरण के संकट एव ं जोखिम को न्यूनतम करना ह ै। इसम ें अन्तर्नि हित है, वर्त मान की आवश्यकताओं एव ं अप ेक्षाओं को भविष्य की क्षमताओं स े समझौता किय े बिना प ूरा करना। इसको प्राप्त करन े के लिये हमें विकास का पारिस्थितिक समन्वय करना होगा जिसमें हमें अपनी प्राथमिकताओं का प ुनर्नि न्यास करना चाहिये तथा एक आयामी प ्रतिमान छा ेड ़ द े
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डा, ॅ.गीता मिश्रा. ""स ंगीत एवं समाज"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886976.

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Abstract:
‘‘संगीत‘‘ सृष्टि की अनुपम कृति ह ै,जो चराचर जगत में मानव क े चेतन मन की संव ेदनाआ ें का े संचारित करके असीम आनंद की अनुभ ूति कराती है। संगीत में नवाचार मन क े संव ेग का संचरण ह ै,जा े वातावरण से प ्रभावित होता ह ै। सृष्टि की रचना एवं विकास क े साथ साथ ही मानव मन की तीव्र संव ेदनशील भावनाओं की अभिव्यक्ति का स ंचार नाद(संगीत) क े रूप में ह ुआ। ब्रह्म स्वरूप ”नाद” ने वेद ज्ञान को सामगान से आलोकित करके मानव मन को देवत्व क े शिखर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया ह ै। प ्रकृति में नवाचार की क्रिया निरंतर प ्रवाहित होती रहती ह ै। ऋषि मुनिया ें ने नवाचार से मानव को कर्म,साधना का ज्ञान कराया,
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आदिनाथ, दरंदले, та हेमकांत चौधरी डॉ. "समाज माध्यम आणि वाचन". International Journal of Advance and Applied Research 10, № 1 (2022): 756 to 759. https://doi.org/10.5281/zenodo.7223561.

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Abstract:
संत तुकाराम महाराज म्हणतात आमचे घरी शब्द रुपी धन असून ते धन आमचे रत्न आहेत. जसे रत्न चमकदार असते ,व या तेजाने ते परिसर उजळून टाकते तसे हे शब्द रुपी रत्न ज्ञानरुपी तेज निर्माण करते. शब्द हेच धन, रत्न ,शस्त्र , गौरव ,पूजा व देव आहे असे तुकाराम महाराजांचे मत होते. म्हणून महाराज सर्व जणांना ज्ञान संपादन करण्याचे आवाहन करतात आणि हे ज्ञान संपादन करण्यासाठी शब्द म्हणजेच वाचन किती महत्वाचे आहे, हे त्यांच्या वरील अभंगातून विषद करतात. उगवण्यासाठी पेरणे गरजेचे असते. जमिनीत जसे जे बियाणे पेरले ते उगवते ,तसे वाचणारा वाचक ज्या दर्ज्याचे वाचतो त्या दर्जेने तो अभिव्यक्त &nbsp;होत असतो. वाचणे म्हणजे पेरणे आहे
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प्रा., डॉ. सोनावले राजेंद्र रघुनाथ. "मलकापूर शहराचे समाज जीवन". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 9 (2022): 4–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.7500377.

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Abstract:
मलकापूर शहराला ऐतिहासिक, धार्मिक आणि राजकीय वारसाही लाभलेला आहे. शिलाहार, यादव, बहामनी, मोघल, मराठे, इंग्रज अशा अनेक घराण्यांनी व राजसत्तांनी येथे राज्य केले. या सर्व सत्तांचा अमंल या भागावर प्रस्थापित झाला होता. या सर्वांची सत्ता उलटवून टाकण्यात मराठयांना सहाय्य करण्यात परशुराम त्रिंबक प्रतिनिधी आणि त्यांच्या वंशजांनी महत्त्वाची भूमिका बजावली. १९ व्या शतकात कोल्हापूर जिल्हयाची समाजरचना ही तत्त्कालीन महाराष्ट्रातील समाजरचेनेला धरूनच होती. मलकापूर शहराच्या समाज जीवनाचा आढावा घेत असता येथे अनेक जातीजमातीचे लोक पूर्वीपासून एकत्र राहताना दिसतात. ब्राह्मण, मराठा, सोनार, कुंभार, सुतार, बुरूड, गवंडी,
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तिवारी, महेन्द्र प्रताप. "भारतीय समाज में वृद्धजन". Humanities and Development 18, № 02 (2023): 43–48. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.142.

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Abstract:
वृद्धावस्था विविध प्रकार के दुःखों की सुग्राह्य अवस्था है। सामाजिक, आर्थिक, मानसिक आदिसमस्याओं से जीवन की सांध्यबेला अनके दुःखां के मकड़जाल में उलझता जाता है। आधुनिकताअविवेकी दौड़ में समाज और परिवार में वृद्धजनां े के प्रति मल्ू यात्मक दृष्टिकांण्े ा मं े अवनमन हुआ है।आज की युवा पीढ़ी और वृद्धजनां के बीच स्वस्थ्य अन्तःक्रिया का लोप होता जा रहा है । वृद्धजनां े मेंलचीलेपन का अभाव तथा युवाआें में परपं रागत मूल्यां के प्रति विमुखता के कारण दोनां में समायोजनदुःसाध्य हाते ा जा रहा है। संतुलित संस्कारां के निवेश के अभाव में युवा पीढ़ी वृद्धजनां के साथ सहजसकारात्मक व्यवहार नहीं कर रही है। नई पीढी़ द्वारा
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प्रा., डॉ. कल्पना तायवाडे. "महात्मागांधी व सर्वोदय समाज". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 04 (2023): 1076–80. https://doi.org/10.5281/zenodo.10287759.

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Abstract:
मोहनदास करमचंद गांधी यांचा जन्म 2 ऑक्टोबर । 869 साली काठेवाडीतील पोरबंदर येथे झाला. त्यांचे वडील संस्थानाचे दिवाण होते. निस्पृह व स्वच्छ शासनाबद्दल त्यांची ख्याती होती. त्यांच्या मातोश्री कमालीच्या धार्मिक वृत्तीच्या होत्या. त्याचा परिणाम गांधीजीच्या जीवनावर सर्वाधिक झाला.इसवी सन १८८८ मध्ये एक सामान्य विद्यार्थी म्हणून मॅट्रिकची परीक्षा उत्तीर्ण झाल्यावर कायद्याच्या अभ्यासासाठी त्यांची इंग्लंडला रवानगी झाली. तेथे त्यांनी कायद्याबरोबरच धार्मिक व नैतिक चळवळीचा अभ्यास केला । 891 मध्ये भारतात परत आल्यानंतर त्यांनी काठेवाड आणि मुंबई येथे वकिली व्यवसाय चालू केला. । 893 मध्ये ते दक्षिण आफ्रिकेत गेले
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प्रा., डॉ. यशवंत मारुती चव्हाण. "फॅन्ड्री चित्रपटातील समाज वास्तव". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 03 (2024): 79–82. https://doi.org/10.5281/zenodo.14522705.

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रामकेश, पाण्डेय. "पंचतंत्र में समाज मनोविज्ञान". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 11, № 4 (2024): 93–96. https://doi.org/10.5281/zenodo.14841101.

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Abstract:
पंचतंत्रकार ने राजा के स्वरूप का भी उल्लेख किया है। कैसा राजा होना चाहिए इसे बताते हुए पंचतंत्रकार लिखता हैकि- राजाओं को यश बढ़ाने वाला कार्य प्रजा का पालन ही है। स्वर्ग के कोश की वृद्धि का एकमात्र उपाय यही है। प्रजाका उत्पीड़न धर्मनाश, पाप और अपयद्या का कारण होता है। राजा रूपी गोपाल का कत्र्तव्य है कि प्रजारूपी गाय काधीरे-धीरे दोहन करे। प्रजा का पोषण और न्याय की रीति पर चलना राजा का धर्म है जो राजा मोह के वश में पड़करअपनी प्रजा का नाश करता है तो अकेले उस राजा की तृप्ति होती है, दूसरे की कदापि नहीं। फल की कामनावाले राजाको यत्नपूर्वक प्रजा का पालन वैसे ही करना चाहिए, जैसे कि दान-मान रूपी जल को
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Dhuriya, Ritu, та Sandhya Bisen. "मनोविश्लेषणवाद और आधुनिक समाज". Naveen Shodh Sansar 1, № 50 (2025): 90–93. https://doi.org/10.63574/nss.9143.

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सिंह, मंजू, та प्रियंका वर्मा. "भारतीय समाज में परलैंगिक समुदाय की प्रास्थिति एवं सामाजिक स्वीकार्यता का समाजशास्त्रीय विश्लेषण". Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika 11, № 8 (2024): H17—H22. https://doi.org/10.5281/zenodo.11209049.

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Abstract:
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Shrinkhla Ek Shodhparak Vaicharik Patrika"&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=9001 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)&nbsp; Abstract :&nbsp; '&lsquo;हम बाकी लोगों के जैसे ही सामान्य हैं।&lsquo;&lsquo;-&nbsp;लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी भारतीय समाज के निर्माताओं ने समाज की रचना करते समय एक ऐसे समाज की परिकल्पना की थी,&nbsp;कि भारत मे
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डॉ.अनिल, विजय शितोळे. "नविन शैक्षणिक धोरण २०२० - उच्चशिक्षण व प्रौढशिक्षण". Journal of Research & Development 4, № 14 (2023): 43–44. https://doi.org/10.5281/zenodo.7817253.

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Abstract:
भारतासारख्या आर्थिक विकासाकडे वाटचाल करणाऱ्या देशामध्ये समाज शैक्षणिकदृष्ट्या सक्षम करून समान आणि न्याय समाज विकसित करणे. देशाच्या विकासाला चालना देणे हे महत्वाचे घाटक आहेत. त्यासाठी शिक्षण हा मुलभूत पाया आहे. भारतासारख्या विकसनशील देशाच्या प्रगतीसाठी आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, शास्त्रीय प्रगती, राष्ट्रीय एकात्मता आणि देशाची संस्कृतीचे जपणूक करणे यासाठी आहे. देशामध्ये दर्जेदार शिक्षण उपलब्ध करने महत्वाचे आहे. समाजातील सर्वांना देशामध्ये असणारी नैसर्गिक साधन सामग्रीचा पुरेपूर वापर करण्यासाठी उच्च दर्जाचे शिक्षण मिळणे आवश्यक आहे. &nbsp;राष्ट्रीय शिक्षण धोरण 1986 चा कृती कार्यक्रम १९९२ मध्ये सु
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प्रा., साळवे संगिता दशरथ. "नविन शैक्षणिक धोरण २०२० - प्रौढशिक्षण". Journal of Research & Development 4, № 14 (2023): 67–68. https://doi.org/10.5281/zenodo.7817319.

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Abstract:
भारतासारख्या आर्थिक विकासाकडे वाटचाल करणाऱ्या देशामध्ये समाज शैक्षणिकदृष्ट्या सक्षम करून समान आणि न्याय समाज विकसित करणे. देशाच्या विकासाला चालना देणे हे महत्वाचे घाटक आहेत. त्यासाठी शिक्षण हा मुलभूत पाया आहे. भारतासारख्या विकसनशील देशाच्या प्रगतीसाठी आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, शास्त्रीय प्रगती, राष्ट्रीय एकात्मता आणि देशाची संस्कृतीचे जपणूक करणे यासाठी आहे. देशामध्ये दर्जेदार शिक्षण उपलब्ध करने महत्वाचे आहे. समाजातील सर्वांना देशामध्ये असणारी नैसर्गिक साधन सामग्रीचा पुरेपूर वापर करण्यासाठी उच्च दर्जाचे शिक्षण मिळणे आवश्यक आहे. राष्ट्रीय शिक्षण धोरण 1986 चा कृती कार्यक्रम १९९२ मध्ये सुधारणा
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नम्रता, नितिन काडगे. "महिलाओं की आत्मकथाओं में अभिव्यक्त हाशिए का समाज". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 79–83. https://doi.org/10.5281/zenodo.10478374.

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Abstract:
भारतीय समाज में हाशिए का समाज स्वाधीनता के बाद एक मुख्य हिस्सा बन गया है। हाशिए का यह समाज केंद्र में जाने के लिए अविरत प्रयास कर रहा है। विद्यमान समय में हाशिए का समाज दो तरह से हाशिए पर अपना जीवन कर व्यतित रहा है। इसमें एक वर्ग जैसे स्त्री समाज, कृषक, मजदूर, दलित, दिव्यांग एवं अल्पसंख्यक ऐसा है जो केंद्र के मुख्य प्रभाव से जुड़ा हुआ है। वही दूसरा वर्ग ऐसा है जो केंद्र से बहुत दूर है जैसे आदिवासी एवं जनजातीय है। इन समाज में भी दिव्यांग, दलित, दलित स्त्रियों का जीवन और भी कष्टप्रद एवं दयनीय है। साहित्य में हाशिए समाज के लिए स्वामी अच्युतानंद मिल का पत्थर सिद्ध हुए। इन्हें वर्तमान दलित साहित्य
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