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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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आचार्य Acharya, ओमप्रकाश Omprakash. "सिँजाली खस भाषाको वर्णव्यवस्था". Shabda Sadhana शब्दसाधना 7, № 1 (2024): 145–65. https://doi.org/10.3126/shabdasadhana.v7i1.75099.

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Abstract:
सिँजाली भाषा भारोपेली भाषापरिवारको शतम वर्गको आर्यइरानेली बाल्हीक खस हुँदै विकसित भएको हो । खस पूर्वी पहाडी भाषा सिँजाली पर्वते गोर्खाली र नेपाली भाषा विकसित हुनपुग्यो । वर्तमान समयमा त्यही सिँजा नेपालको कर्णाली प्रदेशको जुम्ला जिल्लामा पर्छ । सिँजादरा, सिँजाउपत्यका, सिँजाभेग भनेर चिनिन्छ । यही नेपाली भाषाको आधार भाषा रहेको सिँजाली खस भाषा भाषामा वर्णव्यवस्था कस्तो छ ? नेपाली भाषासँग यसको समानता र भिन्नता के कति छ भन्ने समस्यामा केन्द्रित भएर सिँजाली भाषाको वर्णव्यवस्थाको खोजी गर्नु नै यस अनुसन्धानात्मक लेखको मुख्य उद्देश्य हो । नेपाली भाषाको प्राचीन स्वरुप सिँजाली भाषा भएकाले यसको अध्ययन आवश्
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खापर्ड े, स. ुधा, та च. ेतन राम पट ेल. "कांकेर में रियासत कालीन जनजातीय समाज की परम्परागत लोक शिल्प कला का ऐतिहासिक महत्व". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 53–56. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20218.

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Abstract:
वर्त मान स्वरुप म ें सामाजिक स ंरचना एव ं ला ेक शिल्प कला म ें का ंक ेर रियासत कालीन य ुग म ें जनजातीय समाज की आर्थि क स ंरचना म ें ला ेक शिल्प कला एव ं शिल्प व्यवसाय म ें जनजातीया ें की वास्तविक भ ूमिका का एव ं शिल्प कला का उद ्भव व जन्म स े ज ुड ़ी क ुछ किवद ंतिया ें का े प ्रस्त ुत करन े का छा ेटा सा प ्रयास किया गया ह ै। इस शा ेध पत्र क े माध्यम स े शिल्पकला म ें रियासती जनजातीया ें की प ्रम ुख भ ूमिका व हर शिल्पकला किस प ्रकार इनकी समाजिकता एव ं स ंस्क ृति की परिचायक ह ै एव ं अपन े भावा ें का े बिना कह े सरलता स े कला क े माध्यम स े वर्ण न करना ज ैस े इन अब ुझमाडि ़या ें की विरासतीय कला ह
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अग्रहि, रामानन्द, та अवधेश चन्द्र मिश्रा. "भारतीय समाज में मीडिया का बदलता स्वरूप". International Journal of Science and Social Science Research 1, № 1 (2023): 44–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.13328124.

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Abstract:
त बह ुत ही प्रतिभावान एवं ऊर्जावान य ुवा देश है, और यहां के युवा द ेश की तरक्की मे ं या ेगदान देने क े लिए लालयित रहते हंै। जिस तरहभारत के युवा अपने ह ुनर से देश का े आगे ले जा रह े है उसी प ्रकार भारत की वर्तमान मीडिया द ेश में क्रान्ति कारी परिवर्तन ला रही है, वर्त मान मीडिया का ेयुवा मीडिया कह सकते है। जिस प ्रकार मन ुष्य का जीवन काल का विकास बाल्यावस्था से किशा ेरावस्था, किशोरावस्था से युवावस्था एवं प ्रौढ़ा, वृद्धक्रम हा ेता हैठीक इसके विपरीत मीडिया का विकास-वृद्धावस्था स े प्रौढ़ावस्था, प ्रौढ़ावस्था से युवा वस्था क्रम ह ुई जैसे की प्रिंट मीडिया से इलेक्ट्रानिक मीडिया, इलेक्ट्राॅनिकमीडिय
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डॉ., रमाकांत शिवाजीराव शातलवार. "सुलतानशाही काळातील स्‍थापत्‍य कला". International Journal of Advance and Applied Research 9, № 6 (2022): 130–32. https://doi.org/10.5281/zenodo.6988526.

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Abstract:
<strong>प्रस्&zwj;तावना </strong> प्राचीन काळापासुन भारतात स्&zwj;थापत्&zwj;य आणि कला यांचा उदय आणि विकास झाला. मानवाच्&zwj;या विकासाबरोबर स्&zwj;थापत्&zwj;य आणि कलांची निर्मिती आणि विकास झाला. मुहम्&zwj;मद घौरीचा विश्&zwj;वासू कुतुबुद्दीन ऐबकाने इ.स. १२०६ ला सुलतानशाहीची स्&zwj;थापना केली. कुतुबुद्दीन ऐबक, अल्&zwj;तुतमिश आणि बल्&zwj;बन हे प्रारंभी दास होते. ट्रान्&zwj;स, ऑक्सियाना, इराण, अफगाणिस्&zwj;थान, मेसोपोटेमिया, इजिप्&zwj;त, उत्&zwj;तर आफ्रिका, नैऋत्&zwj;य युरोप व अरेबिया या देशातून आपली खास मुसलमानी शैली आकारास आणली होती. या शैलीची विशेष महत्&zwj;वपूर्ण अंगे म्&zwj;हणजे घुमट, उंच मिना
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डा, ॅ. नीरज राव. "स ंगीत क े प्रचार-प्रसार म ें स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.886994.

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Abstract:
मनुष्य को आदिकाल से ही संगीत मना ेरंजन एव ं आमोद-प्रमोद का साधन रहा ह ै। आदिकाल से ही मानव ने अपने मना ेरंजन क े साधन क े लिये विभिन्न प्रकार क े प ्रया ेग किये जैसे-जैसे मानव अपनी सभ्यता का विकास करता गया व ैसे-व ैसे उसकी समझ आ ैर सूझ-बूझ ने नृत्य, गायन आ ैर वादन की ओर आकर्षि त किया। मानव ने सभ्यता और संस्कृति को समझकर अपने का े प ्रकृति क े साथ तालमेल करते ह ुए संगीत का े सीखा। हमारे पा ैराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख ह ै कि माँ पार्वती की गायन मुद्रा को देखकर भगवान षंकर ने क्रमषः पाँच राग हिंडा ेल, दीपक, श्री, मेघ, का ैषिक आदि रागों की रचना की एवं संगीत की उत्पत्ति भगवान षिव क े ताण्
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ख ुट, डिश्वर नाथ. "बस्तर का नलवंश एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 47–52. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20217.

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Abstract:
सभ्यता का विकास पाषाण काल स े प ्रार ंभ हा ेता ह ै। इस काल म ें बस्तर म े रहन े वाल े मानव भी पत्थर क े न ुकील े आ ैजार बनाकर नदी नाल े आ ैर ग ुफाआ ें म ें रहत े थ े। इसका प ्रमाण इन्द ्रावती आ ैर नार ंगी नदी के किनार े उपलब्ध उपकरणों स े हा ेता है। व ैदिक युग म ें बस्तर दक्षिणापथ म ें शामिल था। रामायण काल म ें दण्डकारण्य का े उल्ल ेख मिलता ह ै। मा ैर्य व ंश क े महान शासक अशा ेक न े कलि ंग (उड ़ीसा) पर आक्रमण किया था, इस य ुद्ध म ें दण्डकारण्य क े स ैनिका ें न े कलि ंग का साथ दिया था। कलि ंग विजय क े बाद भी दण्डकारण्य का राज्य अशा ेक प ्राप्त नही ं कर सका। वाकाटक शासक रूद ्रस ेन प ्रथम क े समय
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सीमा, शमा, та तिवारी आभा. "पर्यावरण संरक्षण एव ं मानवीय स ंवेदना आज के संदर्भ म ंे". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883549.

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Abstract:
मानव एव ं प्रकृति एक द ूसर े के प ूरक हैं। मन ुष्य का जीवन प्रकृति अर्थात ् पर्यावरण संरक्षण के बिना संभव नही ं है। मन ुष्य की आत्मके ंदि ्रत सोच के कारण प ्रकृति का दोहन करत े हुए उसन े संरक्षण का विचार त्याग दिया। कटत े हुए व ृक्ष, प ्रद ूषित होती हुई नदियाँ, सूखत े ह ुए कुँए, धुँए और धूलका ग ुबार बनती हुई हवा, कीटनाशका ें के जहर से भरी हुई खाद्य सामग ्री, मन ुष्य की सूखती हुई संव ेदना की कहानी कह रहे है ं। हम सब प्रक ृति की संतान ह ै। पँचतत्वों स े निर्मित है, हमारा शरीर: भूमि, वायु, जल, आकाश एव ं अग्नि। ये पाँच तत्व ही पर्यावरण है ं। इनमंे से एक भी यदि प ्रद ूषित होता ह ै तो मानव जीवन भी प
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डा, ॅ. स्मिता सहस्त्रब ुद्धे. "स ंगीत क े प्रचार प्रसार में स ंचार साधन¨ ं की भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884794.

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Abstract:
संगीत जीवन क¢ ताने-बाने का वह धागा है जिसक¢ बिना जीवन सत् अ©र चित् का अंश ह¨कर भी आनंद रहित रहता ह ै तथा नीरस प्रतीत ह¨ेता ह ै। संगीत में ए ेसी दिव्य शक्ति ह ै कि उसक ¢ गीत क ¢ अर्थ अ©र शब्द¨ं क¨ समझे बिना भी प्रत्येक व्यक्ति उसस े गहरा सम्बन्ध महसूस करता ह ै। ”संगीत“ एक चित्ताकर्शक विद्या ज¨ मन क¨ आकर्षि त करती ह ै। गीत क ¢ शब्द न समझ पाने पर भी ध ुन पसंद आने पर ल¨ग उस गीत क¨ गाते ह ैं, क्य¨ ंकि भारतीय संगीत-कला भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अ ंग है एवं भारत क ¢ निवासिय¨ं की जीवनशैली का प्रमाण ह ैं। ”संगीत“ मानव समाज की कलात्मक उपलब्धिय¨ ं अ©र सांस्कृतिक परम्पराअ¨ं का मूर्तमान प्रतीक ह ै। यह आ
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डा, ॅ. सुषमा श्रीवास्तव. "विज्ञापन की सृष्टि: स ंगीत की दृष्टि". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886102.

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Abstract:
संचार को जीवन का पर्या य कहा जा सकता है हमारे शरीर की लाखों का ेशिकाएँ आपस में लगातार संचार करती रहती ह ैं। जिस क्षण यह प्रक्रिया बंद हो जाती ह ै उसी क्षण हम मृत्यु को प ्राप्त हा े जाते ह ैं। जीवन का दूसरा नाम संचार संलग्नता है, संचार-श ून्यता मृत्यु का द्योतक ह ै। वर्तमान परिवेश में संचार का व्यापक स्तर ह ै ‘जनसंचार‘ अर्थात जब हम किसी भाव या जानकारी को दूसरा ें तक पहुँचाते ह ै ं आ ैर यह प ्रक्रिया सामूहिक पैमाने पर होती है ता े इसे ‘जनसंचार‘ कहते ह ैं। जनसंचार में प्रेषक तथा बड़ी संख्या में ग्रहणकर्ता क े बीच एक साथ संपर्क स्थापित हा ेता ह ै एवं इस बात की संभावना बनी रहती ह ै कि सूचना या जान
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ममता, गौड ़. "पर्यावरण एवं भारत म ें विधिक प्रावधान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882533.

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Abstract:
पर्यावरण शब्द परि$आवरण शब्दों से मिलकर बना है, इसका शाब्दिक अर्थ हमार े चारा ें ओर के उस वातावरण से है, जिसमें जीवधारी रहत े है ं। इस प्रकार पर्या वरण भौतिक तथा जैविक अवयव या कारक का वह सम्मिश्रण है, जो चंह ु ओर से जीवधारिया ें को प्रभावित करता है। इस प्रकार पर्या वरण जीवा ें को प्रभावित करन े वाल े समस्त भौतिक एव ं जैविक कारकों का योग होता ह ै। यह कहा जा सकता है कि हमारी प ृथ्वी का पर्या वरण वह बाहरी शक्ति है जिसका जीवन पर स्पष्ट प्रभाव द ेखा जा सकता है। य े शक्तियाँ परस्पर सम्बद्ध हैं, परिवर्तनशील हैं तथा सम्पूर्ण एव ं संय ुक्त रूप मे ं जीवन पर प ्रभाव डालती हैं। इनमें भौतिक कारक के रूप म ें
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अर्च, ना परमार. "पर्यावरण संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883529.

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Abstract:
मानव शरीर प ंच तत्वों- प ्रथ्वी, जल, वाय ु, अग्नि आ ैर आकाश स े ही बना ह ै। य े सभी तत्व पर्या वरण के धोतक है। प ्रकृति मे मानव को अन ेक महत्वप ूर्ण प्राकृतिक सम्पदायें भी ह ै। जिसका उपयोग मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में करता आया है ज ैसे- नदियाँ, पहाड ़, मैदान, सम ुद ्र, प ेड ़-पौधे, वनस्पति इत्यादि। प्रथ्वी पर प्राकृतिक संसाथनों का दोहन करन े से प्राकृतिक संसाथनो के भण्डार तीव्र गति से घटत े जा रह े है, जिससे पर्यावरण में असन्त ुलन बढ ़ रहा है। उसके परिणाम स्वरूप जल की कमी, आ ेजा ेन परत में छेद का पाया जाना, वना ें की अत्यधिक कर्टाइ से वना ें की कमी आना, सम ुद ्रों का जल स्तर बढना, ग्लेशियरों
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भाग्यश्री, सहस्त्रब ुद्धे. "सिन े संगीत म ें शास्त्रीय राग यमन का प्रय¨ग - एक विचार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886051.

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Abstract:
हिन्दुस्तानी संगीत राग पर आधारित ह ै। राग की परिभाषा अलग-अलग विद्वान¨ं ने अपनी-अपनी पद्धति से दी ह ै परन्तु सबका आशय ”य¨ऽयं ध्वनिविषेषस्तु स्वर वर्ण विभूषितः रंजक¨जन चित्तानां सः रागः कथित¨ बु ेधैः“ से ही संदर्भित रहा है। अतः यह कहा जा सकता ह ै कि भारतीय संगीत की आत्मा स्वर, वर्ण से युक्त रंजकता प ैदा करने वाली राग रचना में ही बसती ह ै। स्वर¨ं क ¢ बिल्ंिडग बाॅक्स पर राग का ढाँचा खड़ा ह¨ता है। मोटे त©र पर ये माना गया है कि एक सप्तक क¢ मूल 12 स्वर सा रे रे ग ग म म प ध ध नि नि राग क ¢ निर्माण में वही काम करते ह ैं ज¨ किसी बिल्डिंग क ¢ ढाँचे क¨ तैयार करने में नींव का कार्य ह¨ता ह ै। शास्त्रकार¨ं न
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श्रीमती, सुधा शाक्य. "र ंग दृष्टि दा ेष: र ंग अ ंधता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889298.

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Abstract:
्रस्तावना:- मानव में र्कइ प्रकार की संव ेदनाएं होती हैं जैसे दृष्टि, श्रवण, स्पर्श , गंध, स्वाद आदि। इनकी उत्पत्ति उद्दीपका ें से होती ह ै, जिसे व्यक्ति अपने बाह ्य पर्यावरण से ग्रहण करता ह ै, यह उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिया ें अर्था त आंख, कान, त्वचा, नाक आ ैर जिव्हा को उद्दीप्त करते ह ैं, आ ैर विभिन्न संव ेदना को उत्पन्न करते ह ै ं। आइजनेक (1972) क े अनुसार ‘‘ संव ेदना एक मानसिक प ्रक्रम ह ै जा े आगे विभाजन या ेग्य नहीं होता। यह ज्ञानेन्द्रिया ें को प ्रभावित करने वाली बाह ्य उत्तेजना द्वारा उत्पादित हा ेता ह ै, तथा इसकी तीव ्रता उत्तेजना पर निर्भ र करती ह ै, आ ैर इसके गुण ज्ञानेन्द्रिय की प ्रकृत
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Trivedi, Yogeshkumar. "हेमश᭣द ेवा᭍समा᳜ायपयाᭅलोचनम". Towards Excellence, 30 червня 2020, 137–43. http://dx.doi.org/10.37867/te120313.

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Abstract:
पािणनीतर᳞ाकरणेषु ए᭠ᮤं चा᭠ᮤं काशकृ᭜ᳩिम᭜याᳰदषु अ᭠यतमं िस᳍हमे श᭣दानुशासनम् । अमुि᭭मन् पᮢेहमे िन᳸द᳥ᭅ ंवणᭅसमा᳜ायिवषयमादाय िवमशᲃ िविहतः। अᮢ आचायᭅहमे च᭠ᮤ᭭य दीघᭅलृकार᭭य अ᭑गीकारः ᭭वमते दᳶशᭅतः। अथाᭅत् लृकार᭭य अ᳥ादशभेदाः। तथैव िवजातीयौ कौचन ऋकार-लृकारौ ᮧ᭜यपाᳰद । अ᭭य ᮧयोजनोदाहरणािन अिप उप᭠य᭭तािन सि᭠त। वणाᭅनां ᭭थानᮧय᳀भेदिवषये एकार-ऐकारयोः ओकार-औकारयोः ᭭थान-ᮓमेण तालु- ओ᳧᭭थानं हमे च᭠ᮤसूᳯरणा िन᳸द᳥ᭅ म्। अि᭭मन् िवषये अहाᭅनहिवचारः सयु ᭅ ᳲᲦं दᳶशᭅतः। तथैव अनु᭭वार-अनुनािसराᳰदनां नानावणाᭅनां ᭭थानᮧय᳀ाᳰदिवषयाः ᭭वमत(हमे च᭠ᮤः) परमत(अ᭠य᳞ाकरणमत-) पुर᭭सरं िवविेचताः। येन वणसमा ᭅ ᳜ाय िवषये हेम᳞ाकरण᭭य पᳯर᭄ानं ᭭यात्।
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Patel, Sureshbhai. "वा᭨मीᳰक रामायण म ᱶपरुाक᭨पन". Towards Excellence, 30 червня 2020, 144–51. http://dx.doi.org/10.37867/te120314.

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Abstract:
भारतीय सं᭭कृ त सािह᭜यकᳱ शुᱧआत वैᳰदक सािह᭜य से होती है। ऋ᭏वेद आᳰद वेदᮢयी, ᮩाᳬण ᮕंथ, आर᭛यक ᮕंथ और उपिनषद्। इस ᮧकार यह सब वैᳰदक सािह᭜यके ᱨप मᱶ जाना जाता है । इसके अलावा अ᭠य सािह᭜य को ᮧिश᳥ या लौᳰकक सं᭭कृ त सािह᭜यके ᱨप म जाना ᱶ जाता है । लौᳰकक सं᭭कृत सािह᭜यकᳱ शुᱧआत आᳰदकिव वा᭨मीᳰक ᳇ारा रिचत रामायण से होती है। िजसेबालका᭛ड आᳰद सात का᭛डᲂ म िवभािजत ᱶ ᳰकया गया ह।ै िव᭄ानके इस युग मᱶ, वा᭭तिवक ि᭭थित कᳱ खोज एक ही शोध का मु᭎य ल᭯य बन गया है, इसके बारे म कई अटकल ᱶ और कहािनयां थी ᱶ । उनसे पहले, िव᭄ान कᳱ उ᮫ ने उ᭠ह एक ᱶ ि᭭थर िसतारा बना ᳰदया था । ताᳰक पᳯरक᭨पनाᲐ पर संदेह हो । ऐसी कहािनयाँᳰक िजनमᱶ व᭛यᭅिवषय, चᳯरᮢ, घटन
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गणेश, अनिल थोर. "द्वितीय भाषा शिक्षण में प्रौद्योगिकीय संसाधनों का अनुप्रयोग". 9 січня 2025. https://doi.org/10.5281/zenodo.14622255.

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Abstract:
शोधालेख सार:-िवīमान यगु &yuml;ौīोिगक&igrave;य संसाधनŌ का युग है। इस वै2ािनक यगु म&curren;िहदं ी भाषा अिधगम एवं िश&plusmn;ण म&curren;संगणक क&igrave; महनीय भिूमका है। िकसी भी भाषा के सवा&laquo;गीण िवकास के िलए यह आव&Ocirc;यक हैिक उससेसंबंिधतसाम&uacute;ी का िनमाणa एवं &yuml;&Ouml;ततुीकरण के िलए िडिजटल साधनŌ का अिधकािधक मा&yacute;ा म&curren;&yuml;योग हो । &yuml;ौīोिगक&igrave;य यगुम&curren;सगं णक एक सवाaिधक िवकिसत, उपयोगी व सावaभौिमक अिभकल&yacute; है । इसे&yuml;ौīोिगक&igrave; संसाधनŌ का मि&Ouml;त&Otilde;क भीकह सकते ह ।&sect; आज के समय म&curren;िहदं ी भाषा व वाङमयीन िवकास और &yuml;चार-&yuml;सार म&cu
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