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Journal articles on the topic 'स्थिति'

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खड्का, बोमबहादुर. "'उकास' कथामा आञ्चलिकता". DMC Journal 8, № 7 (2023): 22–33. http://dx.doi.org/10.3126/dmcj.v8i7.62421.

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Abstract:
प्रस्तुत अनुसन्धानात्मक लेख सनत रेग्मीद्वारा लेखिएको ‘उकास’ कथा आञ्चलिकता शीर्षकमा केन्द्रित छ । आञ्चलिकता शब्दको अर्थ अञ्चलसँग सम्बन्धित रहेको हुन्छ । त्यहीँ कथाञ्चलमा देखिएका प्राकृतिक एवं मानव निर्मित मौलिक विशेषतालाई नै आञ्चलिकता भनिन्छ । कुनै निश्चित कथाञ्चलमा आधारित रहेर त्यस भेगमा देखिएका सिद्धान्त, मूल्यमान्यता, वेशभूषा, सभ्यता, भूगोल तथा प्रकृति, सामाजिक सांस्कृतिक स्थिति, आर्थिक स्थिति, शिक्षाको स्थिति, भाषिक स्थिाति, चालचलन, लोकतत्व, राजनीतिक चेतना, चाडपर्व आदि विशेषताको समष्टि रूप नै आञ्चलिकता हो । यस विवेच्य कथाको कथाञ्चल बाँके जिल्लाको रापती नदी पारि दक्षिणी तराई क्षेत्र रहेको छ
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2

Singh, Shivangi. "Geographical and Strategic Significance of the Indian Ocean: General Analysis in the Context of India." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 9, no. 1 (2022): 61–64. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2022.v09i01.012.

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Abstract:
A.T. Mahan has mentioned some important facts for the growth of the nine powers, which include geographical location, physical shape, territorial expansion, population, national character and government institutions which also have scientific and industrial potential, no nation without benefits. If we put India on this criterion, then India's location is definitely going to make India strong. Undoubtedly, India's position is ideal for naval power. Due to its peninsular position, it affects the vast ocean. Several ports are located on its coastline. However, apart from the Gulf of Kutch, it lac
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Sao, Pragya, and Dr Arun Kumar Sao. "Mental health from the perspective of Maharishi Patanjali." International Journal of Multidisciplinary Research Configuration 4, no. 1 (2024): 14–26. http://dx.doi.org/10.52984/ijomrc4102.

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Abstract:
वर्तमान युग में मानव जीवन मानव तनाव से भरा है। वह अपने दिनचर्या में इतना व्यस्त है कि स्वयं की मानसिक शांति के लिए वह समय नही निकाल पाता। इतनी व्यस्तता के कारण वह हमेशा परेशान रहता है। उसके अन्दर चिड़चिड़ापन, थकान, नींद में कमी, एकाग्रता में कमी, वजन का कम होना या बढ़ना, आत्मसम्मान में कमी महसूस करना आदि लक्षण परिलक्षित होने लगते है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति का सहारा लेने पर हमें भी अच्छा लाभ नहीं मिलता जिससे मानव हताश और निराश होने लगता है। मानसिक स्वास्थ्य का आधार मन जो चित्त का एक भाग है और मानसिक स्वास्थ्य को बनाये रखने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में उतनी क्षमत
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पायल, सिंह, та पारूल कुमार डाॅ. "प्राथमिक विद्यालयों में अध्ययनरत बच्चों के शारीरिक स्वस्थ्ता सम्बन्धित दक्षता कारकों पर हठयोग प्रदीपिका में वर्णित आसनों का संक्षिप्त विश्लेषण". International Journal of Trends in Emerging Research and Development 2, № 4 (2024): 08–11. https://doi.org/10.5281/zenodo.12788530.

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Abstract:
हठयोग प्रदीपिका यौगिक ग्रन्थ है। महर्षि के योग सूत्र को राजयोग भी कहा जाता है। यह छोटा और आसानी से याद हो जाता है। स्वात्माराम रचित हठयोग प्रदीपिका राजयोग रचना है। जोकि शारीरिक क्रियाओं से शुरू हाती है। हठयोग साधना का द्वितीय साधन आसन है। मन और शरीर को पुष्ट, दृढ़ और आरोग्य प्रदान करने की विशेष शारीरिक स्थितियाॅं आसन कहलाती है। गोरक्षनाथ जी ने आसन को स्वरूप चेतन आत्मा में स्थित हो जाना कहा है। मत्सयेन्द्रनाथ जी ने संतोष को आसन कहा है। इसका अर्थ यह है कि शरीर को जो स्थिति साधना के लिए साधक को सन्तुष्ट करती हो वही आसन है। महर्षि पंतजलि आसन को स्थित एवं सुख की स्थिर मानते हैं। महर्षि घेरण्ड आसनों
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गोपालबहादुर श्रेष्ठ. "नेपालका विद्यालयमामातृभाषामा सिकाइको स्थिति". Interdisciplinary Research in Education 6, № 2 (2021): 117–32. http://dx.doi.org/10.3126/ire.v6i2.43544.

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Abstract:
प्रस्तुत लेख नेपालमा मातृभाषामा सिकाइको स्थितिको विश्लेषणमा केन्द्रित रहेको छ ।यस लेखको प्रमुख उद्देश्य नेपालका विद्यालयमा माध्यम वा विषयका रूपमा मातृभाषा अध्ययन अध्यापन हुने अवस्थाकोअध्ययन गर्नु रहेको छ । मातृभाषालाई बहुसंस्कृति र भाषा, मातृभाषामा शिक्षा र बहुभाषिक शिक्षा, बहुभाषिकता र संज्ञानात्मक विकासकोे कोणबाट हेरिएको छ । विश्वमा भाषाको स्थिति र शिक्षा, नेपालको जनगणनामा मातृभाषाको सङ्ख्या र वक्ता सङ्ख्या, नेपालमा मातृभाषा मानिएका विदेशी भाषा र त्यसको वैधता निर्माणको आधार, नेपालमा मातृभाषामा शिक्षा सञ्चालनको लागि भएका प्रयास र वर्नमान अवस्था जस्ता शीर्षकमा रहेर खोजमूलक सामग्री प्रस्तुत गरि
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देवांगन, अशोक कुमार, फलेन्द्र कुमार साहु та डॉ एल एस गजपाल. "वैश्विक महामारी कोविड-19 का प्रवासी महिला श्रमिकों के सामाजिक-आर्थिक स्थित पर प्रभाव-एक समाजशास्त्रीय अध्ययन (छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले के विशेष संदर्भ में)". Journal of Ravishankar University (PART-A) 28, № 1 (2022): 80–92. http://dx.doi.org/10.52228/jrua.2022-28-1-10.

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Abstract:
विश्व अर्थतंत्र के महत्वपूर्ण इकाई होने के बाद भी श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। खासकर श्रम-प्रवास में प्रवासी महिला श्रमिकों के लिए यह स्थिति बेहद दयनीय है। विकासशील देश भारत में प्रवासी श्रमिकों के संबंध में विभिन्न समस्याएं एवं संकट मौजूद हैं। अनेक शोध अध्ययन यह दर्शाते है कि श्रम प्रवास में महिलाओं की स्थिति सकारात्मक कम बल्कि नकारात्मक अधिक परिणीत हुए हैं। विशेषकर वैश्विक महामारी कोविड-19 से प्रवासी श्रमिक महिलाएं अधिक प्रभावित हुई हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर जिले के प्रभावित 80 महिला प्रवासी श्रमिकों से अर्द्ध संरिचत साक्षात्कार अनुसूची उप
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Pooja, Pokhariya. "पर्वतीय क्षेत्र की ग्रामीण गर्भवती महिलाओं की दृष्टि में परिवार में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन - नैनीताल जिले के". International Journal of Scientific Development and Research 8, № 8 (2023): 751–56. https://doi.org/10.5281/zenodo.8373965.

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Abstract:
सारांश - नारी हमेशा से ही सामाजिक रचना और व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। किसी भी क्षेत्र की प्रगति में पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं की भूमिका अहम् रहती है। इसीलिए पर्वतीय क्षेत्रों में भी महिलाओं के विकास के बिना परिवार, क्षेत्र की उन्नति सम्भव नहीं है। उत्तराखण्ड में रोजगार के सीमित संसाधन होने के कारण पर्वतीय क्षेत्र के पुरूष वर्ग धनोपार्जन के लिए अपने क्षेत्र और परिवार को छोड़कर बाहरी क्षेत्रों मे जाने के लिए विवश है। इस स्थिति मे महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। ऐसी स्थिति में पर्वतीय क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पूर्ण रूप से महिलाओं पर ही निर्भर हो जाती है। उसे प्रा
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राजेन्द्र, कुमार, та उपासना. "शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 10, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 43–45. https://doi.org/10.5281/zenodo.7944517.

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Abstract:
महिलाएं अपने प्रति होने वाले सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक अन्याय, लिंग भेद व समानता, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक शक्तियों के नकारात्मक प्रभाव के विरुद्ध जागरूक हो जाएं तो यह समझा जा सकता है कि उनका सशक्तिकरण हो रहा है। उसके महत्व को स्वीकार किया जा सके तथा उसे समान नागरिक एवं समान अधिकार की स्थिति तक ला सके। शिक्षित महिलाएं ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं जिससे वह सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में अपना सहयोग दे सकती हैं। वर्तमान समाज में शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा महिलाएं अपनी स्थिति को सुदृढ़ बना सकती हैं। आज महिलाओं की स्थिति में जो परिवर्तन हुए है
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सोमबीर, सोमबीर, та विभूति नारायण सिंह. "आधुनिक भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति: ऐतिहासिक विकास और वर्तमान परिप्रेक्ष्य". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 22, № 01 (2025): 484–92. https://doi.org/10.29070/x41qme95.

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Abstract:
भारतीय समाज में महिलाओं की ऐतिहासिक स्थिति को समझना और उनके सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों का विश्लेषण इस शोध का मुख्य उद्देश्य है। प्राचीन काल में महिलाओं की स्थिति सम्मानजनक थी, लेकिन समय के साथ पितृसत्तात्मक संरचनाओं और सामाजिक रूढ़ियों के कारण उनकी स्थिति में गिरावट आई। औपनिवेशिक काल ने महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए कई नीतिगत प्रयास किए। सती प्रथा उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, और महिला शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना उन सुधारों में शामिल था। हालांकि, ये सुधार मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और उच्च वर्ग तक सीमित रहे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महिलाओं ने सामाजिक और राजनीतिक रूप
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यादव, हरी शंकर, та नूतन कुमारी. "विभिन्न युगों में स्त्रियों की स्थिति". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR HUMANITY SCIENCE AND ENGLISH LANGUAGE 10, № 49 (2021): 12144–47. http://dx.doi.org/10.21922/srjhsel.v10i49.9756.

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Abstract:
प्राचीन काल से आधुनिक काल यानि वर्तमान समय तक भारत में स्त्रियों की स्थिति परिवर्तनशील रही है। हमारा समाज प्राचीन काल से आज तक पुरुष प्रधान ही रहा है। ऐसा नहीं है कि स्त्रियों का शोषण सिर्फ पुरुष वर्ग ने ही किया, पुरुष से ज्यादा तो एक स्त्री ने दूसरी स्त्री पर या स्त्री ने खुद अपने ऊपर अत्याचार किया है। पुरुष की उदंडता, उच्छृंखलता और अहम् के कारण या स्त्री की अशिक्षा, विनम्रता और स्त्री सुलभ उदारता के कारण उसे प्रताड़ित, अपमानित और उपेक्षित होना पड़ा। पहले हम इतिहास में भारतीय स्त्रियों की स्थिति पे नजर डाल लें फिर वर्तमान स्थिति का आंकलन करेंगे।
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सरोज, निशा. "‘‘बौद्ध साहित्य में महिलाओं की स्थिति‘‘". Humanities and Development 18, № 02 (2024): 64–69. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.146.

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Abstract:
स्त्रियां े की दशा में युग के अनुरूप परिवर्तन हाते ा रहा है। बौद्ध ग्रन्थां े के माध्मय से हमेंमहिलाआें की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।1 धर्मकीर्तिके अनुसार गीता में स्त्री वर्ग को पापयोनि कहा गया। ऐसी स्थिति में बौद्ध धर्म का उदय स्त्रियों कीस्वतंत्रता का महत्वपण्ू ार् कारक बना।
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प्रियंका, रंजन. "छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य : एक व्यापक अध्ययन". International Educational Scientific Research Journal 10, № 6 (2024): 40–42. https://doi.org/10.5281/zenodo.12545616.

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Abstract:
मानसिक स्वास्थ्य एक वैश्विक शब्द है, जो व्यक्ति की उस स्थिति को संदर्भित करता है जो मन की कार्यप्रणाली से उत्पन्न होती है।मानसिक स्वास्थ्य निस्संदेह हमारी सबसे कीमती संपत्तियों में से एक है, जिसे जितना संभव हो सके पोषित, बढ़ावा और संरक्षित किया जाना चाहिए। यह मन की वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति उत्पादक रूप से काम करते हुए, दूसरों के साथ सार्थक रूप से बातचीत करते हुए और शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप से कार्य करने की क्षमता खोए बिना प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए जीवन का निरंतर आनंद अनुभव कर सकता है। आज मानसिक स्वास्थ्य और उससे जुड़े क्षेत्रों को बहुत महत्व दिया जा रहा है क्योंकि यह पाया गय
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Verma, Krishan, Chedilal Verma, Munna Singh, et al. "PREDICTION OF PHOTOSYNTHETIC RESPONSES BY MATHEMATICAL MODEL." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 8, no. 6 (2020): 102–20. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v8.i6.2020.402.

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Abstract:
English: Plant photosynthetic responses such as photosynthesis, transpiration rate and stomatal conductance are interrelated. There is a definite tendency for variability between photosynthetic responses and leaf positions at different branches. The variability is in the form of diurnal variations relative to the leaf positions of photosynthesis, transpiration and stomatal conductance on the same branch of Jatropha curcas plants. This research paper presented shows that the correlation between plant photosynthetic responses through mathematical modeling. Through the proposed model, the charact
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पटेल, अखिलेश कुमार, та यतीन्द्र मिश्रा*. "अनुसूचित जातियों के सामाजिक समावेशन में शैक्षिक कारकों की भूमिका का अध्ययन". Humanities and Development 17, № 2 (2022): 43–46. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i2.67.

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Abstract:
प्राचीन काल से भारतीय समाज में अनुसूचित जातियों की स्थिति दयनीय रही है। अनुसूचित जातियों को मानवाधिकारों तथा जीवन जीने के मौलिक अधिकारों से वंचित रखा गया। शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार भी अनुसूचित जातियों को प्राप्त नहीं था। समाज में अनुसूचित जातियों को दोयम दर्जा प्रदान किया गया था। सामातिक स्तरीकरण में अनुसूचित जातियों की स्थिति सबसे निचले पायदान पर थी। विभिन्न सामाजिक प्रतिबन्धों का अनुसूचित जातियों को सामना करना पड़ता था। परणामस्वरूप उनकी स्थिति दिन-प्रतिदिन दयनीय होती गयी। स्वतन्त्रता के बाद अनुसूचित जातियों की स्थिति में सुधार लाने हेतु प्रयास किये गये। भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों के
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Anita, Nagle, Santosh Salve Dr. та Archana Tripathi Dr. "गोंड जनजाति की महिलाओं की स्थिति पर प्रभाव डालने वाले सामाजिक गतिविधियों और संरचनाओं का मूल्यांकन करना". International Journal of Trends in Emerging Research and Development 2, № 6 (2024): 130–35. https://doi.org/10.5281/zenodo.15176112.

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Abstract:
शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य के मामले में आदिवासी महिलाओं की स्थिति न केवल आदिवासी पुरुषों की तुलना में बल्कि सामान्य आबादी की महिलाओं की तुलना में भी कम है। इस सैद्धांतिक पत्र का उद्देश्य आदिवासी महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों का पता लगाना और उन रणनीतियों पर चर्चा करना है, जिन पर वे इन चुनौतियों से सफलतापूर्वक निपटने के लिए विचार कर सकती हैं।कानून और धर्म ने पुरुष और महिला की समानता और समान अधिकारों को मान्यता नहीं दी। महिलाओं का स्थान काफी हद तक घर में माना जाता था। संक्षेप में, महिलाओं की भूमिका को अपने पति, परिवार के स्वामी और शासक के अधीन रहने के रूप में माना जाता था। महिलाओं की निम्न
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ब, ृजेश क. ुमार. "भारतीय चित्रकथाआ ें (काॅमिक्स) म ें र ंग सया ेजन क े ग्राफिक अभिप्राय". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.890567.

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Abstract:
रंग संया ेजन के आधार पर ग्राफिक अभिप्राय एक व्यवस्थित और प्रबन्धात्मक विचार धारा का े कला की भाषा में संया ेजन कहते ह ै। जिसका विभिन्न समस्या अन्तराल आ ैर क्षेत्रा ें में विभाजित करने ए ंव रेखाओं, आकृतियों, वर्णा े (रंगा ें), ताना े तथा वयन आदि के चयन का े व्यवस्थित करने से सम्बधित ह ै।चित्रकथा (काॅमिक्स) में रंगा ें का सयोजन का इतिहास काफी प ुराना रहा ह ै। मानव ने जब सर्व प ्रथम आँखे खोली ता े वह प ्राकृतिक वातावरण के बीच रहते ह ुए शिकार करके अपना पेट भरने लगा। परिणाम स्वरूप अपने प ्राकृतिक वातावरण को देखकर उसने पत्थरों, चट्टानों, गुफाआ ें आदि की दीवारांे पर का ेयले, पत्थर तथा प्रकृति प्रद्दत
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., कृष्णा. "बुन्देलखण्ड समाज में महिलाओं की स्थिति". International Journal of History 6, № 1 (2024): 11–14. http://dx.doi.org/10.22271/27069109.2024.v6.i1a.254.

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भुसाल Bhusal, केशव Keshab. "वाक्क्रियाको सैद्धान्तिक अवधारणा र भाषाशैक्षणिक स्थिति". ILAM इलम 21, № 1 (2025): 159–71. https://doi.org/10.3126/ilam.v21i1.75692.

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Abstract:
प्रस्तुत लेख वाक्क्रियाको अध्ययनमा आधारित रहेको छ । यस लेखमा वाक्क्रियाको सैद्धान्तिक अनुशीलन गरिएको छ । वाक्क्रियाको परिचय दिनु, वाक्क्रियाका प्रकारहरू प्रस्तुत गर्नु, वाक्क्रियाको भाषाशैक्षणिक स्थिति निरूपण गर्नु यस अध्ययनका मुख्य उद्देश्यका रूपमा रहेका छन् । प्रस्तुत अध्ययन गुणात्मक अनुसन्धान विधिमा आधारित रहेको छ । यस अध्ययनमा सैद्धान्तिक अनुसन्धान पद्धतिको प्रयोग गरिएको छ । यसमा मूलतः अङ्ग्रेजी सैद्धान्तिक सामग्रीहरूको अध्ययन गरिएको छ । अध्ययनबाट प्राप्त वाक्क्रियासम्बन्धी अवधारणाहरूको विश्लेषण र संस्लेषण गरिएको छ । साथै वाक्क्रिया सम्बन्धमा प्राप्त तथ्यहरूको तुलनात्मक अध्ययन गरी त्यसको त
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Perwez, Md Ashraf. "बिहार में समावेशी शिक्षा की स्थिति". International Journal of Science and Social Science Research 1, № 2 (2023): 91–93. https://doi.org/10.5281/zenodo.13375541.

Full text
Abstract:
वर्तमान समय मे समावेशी शिक्षा पर विशेष जोर दिया जा रहा है|समावेशी शिक्षा, शिक्षण की ऐसी प्रणाली है जहाँ समान्य बच्चो के साथ विशिष्ट बालको को एक साथ शिक्षा मुहैया करायी जाती है |विशिष्ट बालको से तात्पर्य है जिसकी बुद्धिलब्धि समान्य औसत से कम हो|विशिष्ट बालक के बच्चे समान्यत: दृष्टि, श्रवण एवम अधिगम अक्षमता तथा मानसिक मंदता और बाधिरधता से ग्रस्त होते है|समावेशी शिक्षा देने का तातपर्य समान्य बालक के साथ विशिष्ट बालक को भी विधालय से जोड़ा जाए तथा सभी बालको को एक साथ शिक्षा प्रदान की जाए ताकि विशिष्ट बालक को भी आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्राप्त हो एवंम समाज की मुख्यधरा मे शामिल हो सके|शिक्षण की इस नव
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Talekar, Publisher: P. R. "भारत में स्त्री शिक्षा की स्थिति". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 14 (2024): 154–58. https://doi.org/10.5281/zenodo.11178366.

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Abstract:
<strong>शोध सार:</strong> मानव सभ्यता के विकासक्रम में आरंभ से लेकर अब तक जहाँ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थितियों में निरंतर विकास एवं बदलाव आया वहीं भारतीय स्त्री के जीवन में भी काफी बदलाव के बावजूद शिक्षा के अभाव के चलते उनकी स्थिति निरंतर दयनीय होती चली गई। भारत में वैदिक काल में स्त्री की छवि सम्मानजनक थी। उन्हें समाज में अत्यंत प्रतिष्ठापूर्ण स्थान प्राप्त था एवं वे शिक्षा ग्रहण कर सकती थी। सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि उन्हें स्वैच्छिक रूप से विवाह या विवाह योग्य वर का चयन करने का अधिकार भी प्राप्त था। प्राचीन भारतीय परम्परा में स्त्रियों को पृथ्वी पर समस्त दैवीय गुणों
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चौरसिया, सपना, та कविता गुप्ता. "सामाजिक आर्थिक स्थिति और मनोदृष्टि के बीच संबंध: एक समीक्षात्मक अध्ययन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 20, № 2 (2023): 778–85. https://doi.org/10.29070/rcntd647.

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Abstract:
इस समीक्षात्मक अध्ययन का उद्देश्य सामाजिक आर्थिक स्थिति और मनोदृष्टि के बीच संभावित संबंधों का मूल्यांकन करना है। विभिन्न सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, इस पेपर में सामाजिक आर्थिक स्थिति और मनोदृष्टि के आपसी प्रभाव पर किए गए प्रमुख शोधों और निष्कर्षों की समीक्षा की गई है। सामाजिक आर्थिक स्थिति, जिसमें आय, शिक्षा स्तर, और परिवार की स्थिति जैसे कारक शामिल हैं, व्यक्ति की मानसिकता, आत्म-सम्मान, सामाजिक दृष्टिकोण और शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस अध्ययन में विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक कारकों के प्रभावों को भी समझन
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कुँवर, भवीन्द्र. "‘बाढी’ कवितामा बल". Prajna प्रज्ञा 124, № 2 (2023): 119–29. http://dx.doi.org/10.3126/prajna.v124i2.60590.

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Abstract:
मानवजातिका क्रियाकलाप, अनुभव, र अभिव्यक्तिमा कुनै न कुनै रूपले बलको उपस्थिति हुन पुग्दछ । बल लगानी भएपछि मात्र वस्तु वा पदार्थहरू चल्ने वा रोकिने हुन पुग्दछन् र बलले वस्तु वा पदार्थका स्थिति, आकृति, वा आकारमा परिवर्तन गराउने कार्य गर्दछ भने बलको अनुभव र प्रयोगसँगै विकसित संज्ञानलाई मानव जातिले भाषाका माध्यमबाट समेत अभिव्यक्त गर्दै आएको पाइन्छ । पूर्ण वैद्यरचित ‘बाढी’ कविता पनि बलसम्बद्ध अभिव्यक्ति पाइने साहित्यिक रचनाको उल्लेख्य नमुना हो । उक्त कवितामा अभिव्यक्त बलसम्बद्ध विषयको प्राज्ञिक, वैज्ञानिक र शोधमूलक अध्ययन गरिएको भने पाइँदैन । यही अनुसन्धानरिक्तताको परिपूर्ति गर्ने उद्देश्यमा यो अनुस
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Sharma, Akhilesh Kumar. "jaunpur janpad ki boli (bhasha) ka bhasha-vaigyanik anusheelan." Hindustani 83, no. 1 (2022): 103–11. https://doi.org/10.5281/zenodo.15607995.

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Abstract:
जौनपुर जनपद उत्तर प्रदेश के वाराणसी मंडल के उत्तर-पश्चिम में अवस्थित है। भौगोलिक दृष्टि से इसकी स्थिति 24&deg;24 और 26&deg;12 उत्तरी आक्षांश एवं 82&deg;70 तथा 83&deg;50 पूर्वी देशांतर रेखाओं के मध्य स्थित है। इस जनपद का फैलाव 4038 वर्ग किमी. में है। इसके पश्चिम में प्रतापगढ़ तथा इलाहाबाद, दक्षिण में मिर्जापुर एवं वाराणसी, पूर्व में गाजीपुर तथा आजमगढ़ एवं उत्तर में सुलतानपुर जनपद है। यह ऐसा जनपद है जिसके निवासी भोजपुरी और अवधी दोनों का व्यवहार करते हैं। इस शोध पत्र के द्वारा जौनपुर जनपद की भाषा का भाषा-वैज्ञानिक अनुशीलन किया गया है। - डॉ. अखिलेश कुमार शर्मा 'शास्त्री'
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अत्रि, बजरंग लाल. "पुराणों में भारतवर्ष की राष्ट्रीयता एवं भौगोलिक सीमाएं". Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal 4 (31 липня 2014): 32–37. http://dx.doi.org/10.36018/dsiij.v4i0.42.

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Abstract:
भारत के अनेकों आधुनिक इतिहासकारों में यह भ्रम फैला हुआ है कि ब्रिटिश सरकार ने ही भारत को एक राष्ट्र के रूप में एकीकरण किया है तथा भारत: एक निर्माणाधीन राष्ट्र है। किन्तु पुराणों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों में प्राचीनकाल से ही भारत राष्ट्र और इसकी राष्ट्रीयता का वर्णन किया गया है। विभिन्न पुराणों में न केवल भारतवर्ष नाम की व्याख्या ही की गई है बल्कि इसकी अस्मिता, सांस्कृतिक प्रभाव और भौगोलिक सीमाओं का भी वर्णन किया गया है। विभिन्न पुराणों मंे भुवनकोश अर्थात् प्राचीन विश्व की भौगोलिक स्थिति का वर्णन करते हुए भारतवर्ष की भोगौलिक सीमा, इसकी सांस्कृतिक विरासत, विभिन्न भाषाओं, परम्पराओं, प्रान्तरों वा
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Nepal, Shakti Raj. "विश्वविद्यालयका प्राध्यापकको पेसागत विकासमा प्राज्ञिक लेखनको प्रभाव {The Impact of Academic Writing on the Professional Development of University Professors}". RR Interdisciplinary Journal 5, № 5 (2024): 127–37. https://doi.org/10.3126/rrij.v5i5.78935.

Full text
Abstract:
प्रस्तुत लेख विश्वविद्यालयका प्राध्यापकको पेसागत विकासमा प्राज्ञिक लेखनले पारेको प्रभावका विषयमा केन्द्रित छ । उक्त सन्दर्भमा विश्वविद्यालयका प्राध्यापकको वृत्ति तथा पेसागत विकासमा प्राज्ञिक कर्मले पारेका प्रभावको विश्लेषण गर्नु प्रस्तुत लेखको उद्देश्य रहेको छ । इन्टरप्रेटिभिज्म प्रतिमानअन्तर्गत व्याख्यात्मक अनुसन्धान ढाँचामा आधारित अध्ययन भएकाले असम्भाव्यमूलक नमुना छनोटका आधारमा क्षेत्रगत नमुना छनोट (cluster) विधिका आधारमा बहुवैकल्पिक प्रश्नावलीको प्रयोग गरी तथ्याङक सङ्कलन गरिएको छ । सङ्कलित तथ्याङ्कलाई उद्देश्यअनुरूप वर्गीकरण गरी विभिन्न उपशीर्षकका सहायताले विश्लेषण गरिएको छ । उक्त विश्लेषणब
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प्रीति. "भारत में महिला सशक्तिकरण एक अध्ययनः महिला अधिकारों के सदंर्भ में". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 11, № 1 (2024): 117–21. https://doi.org/10.5281/zenodo.11001982.

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Abstract:
गोप संस्कृति के समय से ही भारतीय समाज मंे महिलाओं की सक्रियता और सम्मान सदैव आदरणीय रहे हंै, किंतु राज्य की बढ़ती हुई भूमिका और राजनीतिक हस्तक्षेपांे के कारण मानव ने मानव को ही अपने शोषण का शिकार बना दिया। जिसकी श्रंृखला परिवार से शुरू हुई, हांलाकि महिला और पुरुष का संबध्ंा पर निर्भरता और सक्रियता से है। जिसके कारण सृष्टि की रचना और उसका संरक्षण आज तक बना हुआ है, परंतु मानव के सत्ता संघर्ष के बीच महिला संवेदनशील स्थिति मंे पहंुच गई। संवैधानिक संस्थाआं े के विकास के बाद सामाजिक हुए सामाजिक सुधारो के कारण महिलाआं े की समझ मंे सक्रिय भागीदारी और मुख्य धारा मं े सक्रियता सिद्धांत के रूप से 20वी ं
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सिंह, विक्रमजीत. "राव शेखा के समय की राजनैतिक स्थिति". International Journal of Humanities and Education Research 5, № 1 (2023): 66–70. https://doi.org/10.33545/26649799.2023.v5.i1a.179.

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प्रा., डॉ. अजयकुमार कृष्णा कांबळे. "आदिवासी समाज की स्थिति तथा हिंदी उपन्यास". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 117–20. https://doi.org/10.5281/zenodo.10480352.

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Abstract:
आदिवासी समुदाय हाशिए की जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त रहा है। उनकी चिंता न प्रशासन को न ही समाज को है। इस समुदाय ने अपनी लडाई स्वंय ही लडी है परंतु मुख्यधारा में लेखन करनेवाले रचनाकारों ने इस समुदाय को भी मानवीय संवेदनशीलता की आवश्यकता है यह नहीं सोचा। आज भी आदिवासी समुदाय बहिष्कृत जीवन जी रहा है। समाज व्यवस्था एवं प्रशासन के तबके ने अदिवासियों के हित के बारे में कभी नहीं सोचा। दूर दराज के जंगलों में उन्हें मुख्य धारा के लोगों द्वारा खदेडा जाता है। आदिवासी जनजातीयाँ आज भी वंचित, उपेक्षित, तिरस्कृत तथा बहिष्कृत जीवन जीने के लिए अभिशप्त दृष्ट्व्य होता है।
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Yadav, Sunil. "मुग़लकालीन किसानों की स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन". मुग़लकालीन किसानों की स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन XI, NO.- 4, № 4 (2023): 33–36. https://doi.org/10.5281/zenodo.15318597.

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कुमारी, डॉ मनीषा. "वरिष्ठ नागरिक सामाजिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य स्थिति". International Journal of Applied Research 11, № 7 (2025): 98–101. https://doi.org/10.22271/allresearch.2025.v11.i7b.12714.

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डॉ., अमित त्रिपाठी, हर्ष कुमार सिन्हा प्रो. та वर्मा ज्योति. "पाकिस्तानी आधिपत्य में गिलगित-बाल्टिस्तान: वर्तमान भौगोलिक एवं राजनीतिक स्थिति". International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary 3, № 6 (2024): 171–74. https://doi.org/10.5281/zenodo.14562779.

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Abstract:
जम्मू एवं कश्मीर रियासत का अभिन्न अंग रहा<strong> </strong>गिलगित-बाल्टिस्तान वर्तमान में पाकिस्तान के आधिपत्य में है। भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से गिलगित-बाल्टिस्तान पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से छह गुना बड़ा है। राजनीतिक रूप से इस क्षेत्र की चर्चा प्राय: कम हुई जबकि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर रियासत में गितगित-बाल्टिस्तान की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत शोधपत्र में पाकिस्तानी आधिपत्य में मौजूद इस क्षेत्र की भौगोलिक एवं राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण किया गया है।
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सिंह, राजकुमार. "पंचायत चुनाव 2021 में ग्रामीण मतदान व्यवहार". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR INTERDISCIPLINARY STUDIES 9, № 68 (2021): 16306–11. http://dx.doi.org/10.21922/srjis.v9i68.10028.

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Abstract:
ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक व राजनैतिक परिदृष्य में बदलाव तो आया है पर इतना भी नहीं कि ग्रामीण समाज का परम्परात्मक ढांचा बदल गया हो। जमीदारी व्यवस्था समाप्त हुई है। जमीदार अब परिदृष्य से बाहर हो गये हैं। जमीन अब उच्च जातियों से मध्यम जातियों को बेची जा रही है किन्तु यह प्रक्रिया बहुत धीमी है। जिसके चलते उच्च जातियों का गाँवों में आर्थिक प्रभुत्व अभी बना हुआ है। इसके अतिरिक्त उच्च जातियों के लोगों ने अन्य क्षेत्रों में निवेष कर अपनी आर्थिक स्थिति पहले से अधिक सुदृढ़ कर ली है। जजमानी व्यवस्था कमजोर हुई है। सेवक जातियाँ परम्परात्मक षर्तों पर सेवा करने से स्वतंत्र अवष्य हुई है जिससे उनकी परम्परात्मक
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सोमबीर, सोमबीर, та विभूति नारायण सिंह. "औपनिवेशिक भारत में महिलाओं के अधिकार और सशक्तिकरण: नीतियों और सुधारों का ऐतिहासिक अध्ययन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 22, № 01 (2025): 334–40. https://doi.org/10.29070/7pq3x917.

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Abstract:
औपनिवेशिक काल में भारतीय महिलाओं की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला। इस शोध पत्र का उद्देश्य औपनिवेशिक सुधार नीतियों और उनके प्रभावों का विश्लेषण करना है, जिसमें महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक सुधार, और अधिकारों को सशक्त बनाने के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा की गई है। ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसे सुधार आंदोलनों ने महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक परिवर्तनों की दिशा में काम किया। साथ ही, राजा राममोहन राय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे सुधारकों ने महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।शोध पत्र में यह चर्चा की
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रामकेश, पाण्डेय. "पंचतंत्र में संवेगात्मक मनोविज्ञान की अवधारणा". RECENT EDUCATIONAL & PSYCHOLOGICAL RESEARCHES 12, № 4 (2023): 15–21. https://doi.org/10.5281/zenodo.10445130.

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Abstract:
संवेग व्यवहार का वह प्रतिमान है जो अन्तरंग तथा शरीर के अन्य भागों में घटित होता है। बालक के शिक्षण में उसकी संवेगात्मक स्थिति का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। यदि किसी प्रखर बुद्धि बालक की संवेगात्मक स्थिति अच्छी नहीं है तो उसकी अपेक्षित शैक्षिक प्रगति नहीं हो सकती। इसलिए माता-पिता, शिक्षक आदि को इस संदर्भ में सतत् जागरूक रहने की आवश्यकता है। ळंजमे के अनुसार मानसिक तनाव उत्पन्न वाले संवेग बालक की मानसिक क्षमताओं को कुंठित कर देते हैं, किन्तु यह प्रभाव एक तरफा नहीं है। बालक की संवेगात्मक स्थिति उसके अपने वातावरण से स्वस्थ समायोजन करने में सफलता या असफलता तथा इनसे उत्पन्न अभिवृत्तियाँ तथा भावनायें उस
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पन्धाक Pandhak, पदमा देवी Padma Devi, та मोहनकुमार Mohankumar तुम्बाहाङ Tumbahang. "प्रदेशमा बोलिने मातृभाषाको स्थिति र तिनको संरक्षण, सम्बद्र्धनका उपायहरू". Journal of Janta Multiple Campus 3, № 1 (2024): 60–70. http://dx.doi.org/10.3126/jjmc.v3i1.66112.

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Abstract:
यस लेखको मूल उद्देश्य हो कोसी प्रदेशमा बोलिने मातृभाषाको स्थितिको आकलन गर्नु र सङ्कटग्रस्त हालतमा गुज्रिरहेका भाषाहरूलाई यथोचित तरिकाले संरक्षण र संवर्धनका उपायहरूको निरूपण गर्नु हो । यो अध्ययन पुस्तकालयीय विधि अपनाउने गुणात्मक ढाँचामा आधारित भएर व्याख्या तथा विश्लेषण गरिएको छ । यो लेखमा सोद्देश्यपूर्वक नमुना छनोटको आधारमा राष्ट्रिय जनगणना (सन् २०११ र २०२१) को तथ्याङ्कलाई प्राथमिक तथ्याङ्कको आधार मानी अन्य लेखरचना, जर्नल, पुस्तक, पत्रपत्रिका आदिलाई द्वितीयक सामग्रीका रूपमा सङ्कलन गरेर विश्लेषण गरिएको छ । व्याख्या र विश्लेषण गर्ने विधिहरूको अवलम्बन गर्दै भाषा क्षयीकरणको सिध्दान्तमाथि केन्द्रित
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Gupta, Dr Rajni. "Depiction of women in the traditional and changing dimension of Indian culture (भारतीय संस्कृति के परम्परागत एवं परिवर्तनशील आयाम में महिलाओं का चित्रण)". International Journal of Multidisciplinary Research Configuration 1, № 4 (2021): 45–47. http://dx.doi.org/10.52984/ijomrc1407.

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Abstract:
भारत संस्कृति में नारी को बहुत ही उत्तम स्थान प्राप्त है जबकि अन्य देशों में नारी को केवल भोग विलास की वस्तु समझा जाता है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता” अर्थात् जहाँ नारी की पूजा की जाती है वहाँ देवता निवास करते है। भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक महिलाओं की स्थिति परिवर्तनशील रही है। संसार की ईश्वरीय शक्ति दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती आदि नारी शक्ति, धन, व ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। वैदिक काल भारतीय नारी के लिए स्वर्णिम काल था। ऐतिहासिक पात्रों में भी उसे वीरागंना के रूप में प्रस्तुत किया है। भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति समय और काल के अनुसार बदलती रही है
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आशुतोष, कुमार सोनिया. "कला और समाज का अर्न्तसम्बन्ध". International Journal of Research - Granthaalayah 7, № 11(SE) (2019): 200–203. https://doi.org/10.5281/zenodo.3591422.

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Abstract:
कलाकार वाह्&zwnj;य जगत के रूप-स्वरूप, गतिविधियों एवं समाज की भावनाओं से सम्बन्ध बनाकर ही सृजन किया करता है वह अपने सृजन में सामाजिक भावनाओं का मानव-वृत्तियों से सीधा सम्बन्ध रखता है। कलात्मक सृजन में इन्ही भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है, परिणाम स्वरूप कला का रूप भी विश्वव्यापी होता है। कलाकार की प्रतिभा, उसकी आत्मशक्ति एवं उसके कलात्मक तत्व, कला के रूप में समाज के स्वरूप और भावनाओं के साथ सामंजस्य जोड़कर, उसको व्यापक रूप प्रदान करते हैं। कला के अधिकांश विषय तत्कालीन समाज की समस्यायें ही होती है, इस उद्&zwnj;देश्य से किये गये सृजन में व्यक्तित्व गौण रूप ले लेता है ओर समाज की आवश्यकताओं का प्रतिब
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Adhikari, Dr Girish Singh, Mr Rajneesh Kumar Joshi, Miss Deepika Punetha, Dr Naveen Chandra Bhatt та Prof Madhu Lata Nayal. "किशोरों के शैक्षिक चिंता स्तर पर महामृत्युंजय-जप एवं ध्यान के प्रभाव का अध्ययन". International Journal of Enhanced Research in Educational Development 12, № 06 (2024): 49–55. https://doi.org/10.55948/ijered.2024.0109.

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Abstract:
प्रस्तुत अध्ययन उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल के पिथौरागढ़ जनपद में किया गया। इसमें 14 से 17 वर्ष के निजी विद्यालयों में अध्ययनरत इंटरमीडिएट (11 वीं एवं 12 वीं) के 60 किशोरों (छात्र एवं छात्राएं) के शैक्षिक चिंतास्तर पर पूर्व एवं पश्चात परीक्षण विधि द्वारा योगाभ्यास के प्रभाव का अध्ययन देखा गया। सर्वप्रथम प्रयोज्यों के शैक्षिक चिंता स्तर का मापन कर समतुल्य युग्म विधि द्वारा 30 किशोरों ( 15 छात्र एवं 15 छात्राएं) को प्रयोगात्मक समूह में और 30 किशोरों (15 छात्र एवं 15 छात्राएं) को नियंत्रित समूह में रखा गया। इसके उपरांत प्रयोगात्मक समूह के 30 किशोरों को 40 कार्यदिवसों तक प्रत्येक दिन में 20 मिनट (10
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खतिवडा, लय. "ध्वनिविज्ञान र नेपाली भाषाका ध्वनिको सैद्धान्तिक अध्ययन". Journal of Tikapur Multiple Campus 4, № 4 (2018): 137–44. http://dx.doi.org/10.3126/jotmc.v4i4.70259.

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Abstract:
ध्वनिविज्ञानले मानवीय ध्वनिको सूक्ष्मरुपमा अध्ययन गर्दछ । ध्वनि अवयव, श्वाास प्रवाह, उच्चारण प्रक्रिया, स्वर र व्यञ्जन ध्वनिको वर्गीकरण ध्वनिविज्ञानमा गरिन्छ । आदिका बारेमा वैज्ञानिक अध्ययन गर्ने काम ध्वनिविज्ञानले गर्दछ । स्वर ध्वनिको वर्गीकरण जिब्रोेको सक्रिय भाग,जिब्रोको उचाइ,ओठको स्थिति, मांसपेशीय आधार, हाब्रोको स्थिति, मूल र सयुंक्त आदि आधारमा गरिन्छ भने व्यञ्जन ध्वनिको वर्गीकरण उच्चारण स्थान, प्रयत्न, घोषत्व र प्राणत्वका आधारमा गरिन्छ । ध्वनि परिवर्तनको कारण, ध्वनिका कारणले अर्थमा हुने भिन्नतालाई ध्वनिविज्ञानले सुक्ष्मरुपमा अध्ययन गर्दछ । ध्वनिविज्ञान र यसका शाखाहरू, ध्वनिको पहिचान, वर्ग
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Vinod, Kumar. "PARYAWARAN CHETNA : VAISHWIK SHANKHNAAD (GURU JAMBHOJI KE SANDARBH MEN)." International Journal of Hindi Research 02, no. 06 (2016): 49–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.8198300.

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Abstract:
वर्तमान युग में पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, विभिन्न वनस्पतियों व प्राणियों की प्रजातियों का विलुप्त होने जैसी समस्याएं दिन-प्रतिदिन भयानक होती जा रही है। प्राकृतिक असंतुलन के कारण बढ़ते तापमान से हिमखंड पिघल रहे है। ग्लोबल वार्मिंग की भयावह स्थिति से पूरा विश्व आतंकित है। गुरु जाम्भोजी ने अपनी दूरदृष्टि का परिचय देते हुए इस भयावह स्थिति से बचने हेतु हरे वृक्ष काटने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाकर&nbsp;पर्यावरण संरक्षण पर बल दिया। गुरु जाम्भोजी की वाणी व उनके द्वारा सुझाए&nbsp;29 नियमों&nbsp;में पर्यावरण चेतना की व्यापकता विद्यमान है।&nbsp;&nbsp;
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डा, ॅ. संगीता शर्मा. "भारतीय लोक संस्कृति आ ैर रंग". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890501.

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Abstract:
मानव के पास संस्कृति ह ै इसीलिए वह पशु से अलग ह ै। भर्तृ हरि ने माना ह ै - “साहित्य स ंगीत कला विहीनः साक्षात् पश ु पुच्छ विषाण हीनः।।“ डा ॅ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार - “लोक शब्द का अर्थ जनपद या गाँव नहीं बल्कि नगरों व गाँवों मे फ ैली वह समूची जनता ह ै जिसका आधार पा ेथियाँ नहीं, अकृत्रिम आ ैर सरल जीवन व्यतीत करने वाले जन ह ै।“ लोक संस्कृति का अहम भाग ह ै लोक कला। यह संस्कृति का पहचान है जहाँ तक भारतीय लोक संस्कृति की बात ह ै इसमें लोक कला का विष ेष महत्व है। कला का प्रयोजन अभिव्यक्ति, यष प ्राप्ति, धनोपार्जन, सेवा, आनंद की प्राप्ति, विष्व कल्याण आदि हो सकते ह ै। भौगोलिक स्थितियाँ लोक चि
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चौधरी, मनोज कुमार, та प्रो उपमा वर्मा. "‘‘उत्तर वैदिक कालीन सामाजिक परिवर्तन एवं महिलाओं की स्थिति’’". Humanities and Development 18, № 1 (2018): 76–70. http://dx.doi.org/10.61410/had.v18i1.114.

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Abstract:
जहाँ स्त्रियों की प्रस्थिति को वैदिक काल में स्वर्ण युग कहा जाता था वहीं उत्तर वैदिक काल के पश्चात् स्त्रियों की स्थिति में अवनति काल कहा जा सकता है। विवाह को आवश्यक और धार्मिक कृत्य कहा जाता था। पितृ ऋण से उऋण होने का एक मात्र साधन विवाह, नियोग प्रथम इस काल की विशेषता थी। इस काल में नवीन परम्पराओं का भी उद्भव उत्तर वैदिक काल में दिखाई पड़ती है। वर्ण व्यवस्था की स्थापना के साथ ही वर्णों की पृथकता पर भी बल दिया गया था। उत्तर वैदिक काल की सामाजिक स्थिति मूल रूप से निरन्तरता एवं परिवर्तन की प्रक्रिया कहा जा सकता है।
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सापकोटा Sapkota, कृष्णप्रसाद Krishnaprasad. "‘बाबुको काँधमा छोरो सुतिरहेको देश’ कथामा विश्वदृष्टि". Bharatpur Pragya: Journal of Multidisciplinary Studies 2, № 01 (2024): 54–65. http://dx.doi.org/10.3126/bpjms.v2i01.65888.

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Abstract:
‘बाबुको काँधमा छोरो सुतिरहेको देश’ महेशविक्रम शाहको ‘छापामारको छोरो’ सङ्ग्रहमा सङ्कलित कथा हो । यस कथालाई लुसिए गोल्डमानको विश्वदृष्टिसम्बन्धी मान्यताका आधारमा विश्लेषण गरिएको छ । समाजशास्त्रका विभिन्न मान्यताहरूमध्ये विश्वदृष्टि पनि एक हो । यस कथामा देशमा प्रजातन्त्रको पुर्नस्थापनापश्चात् दसवर्षे जनयुद्धको समयमा सर्वसाधारण नेपाली जनताका छोराछोरी कसरी मारिन्थे भन्ने कुराको सन्दर्भ प्रस्तुत भएको छ । नेपालमा दसवर्षे जनयुद्धको एउटा कालखण्डमा कहालीलाग्दो र त्रासद वातावरण सिर्जना भएको थियो । सामान्यरूपमा भन्दा पनि यातना दिएर, त्रासद वातावरणको सिर्जना गरेर व्यक्तिहत्या भएको थियो । व्यक्तिविशेषलाई झु
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शेफाली, शुक्ला. "भारत में बेरोजगारी की समस्या का विश्लेषणात्मक अध्ययन". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 7, № 5 (Special Issue) (2020): 32–35. https://doi.org/10.5281/zenodo.6586506.

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Abstract:
भारत में वर्तमान में रोजगार एक बड़ा संकट है बेरोजगारी की समस्या का समाधान न होने से समाज की स्थिरता तथा शांति प्रभावित होती है। भारत में युवा जन संख्या काफी अधिक है जिसके पास पर्याप्त रोजगार नहीं है। अधिकांश वर्ग ऐसा है जिसके पास उपलब्ध रोजगार उसकी कार्यक्षमता तथा प्रतिभा के अनुरूप नहीं है। भारत में जाति, लिंग तथा धर्म आधारित संकीर्णताओं के कारण भी युवाओं के बड़े वर्ग को रोजगार प्राप्त होने में समस्या आती है। इस स्थिति से परेशान युवा एक समय के पश्चात रोजगार की तलाश छोड़कर कई बार आपराधिक प्रवृत्तियों की तरफ मुड़ जाते हैं। बेरोजगारी के आंकड़े चिंताजनक स्थिति में है। अतः बेरोजगारी की समस्या का सम
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जोशी Joshi, हेमा Hema. "नेपालमा लोपोन्मुख भाषाहरूको स्थिति {Status of Endangered Languages ​​in Nepal}". Sudurpaschim Spectrum 1, № 1 (2023): 209–29. http://dx.doi.org/10.3126/sudurpaschim.v1i1.63468.

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Abstract:
प्रस्तुत आलेख नेपालका लोपोन्मुख भाषाहरूको स्थितिबारे अध्ययनमा केन्द्रित छ । वि.सं. २०७८ को जनगणना अनुसार नेपालमा १२४ भाषाहरू प्रयोग व्यवहारमा रहेको तथ्याङ्क पाइन्छ । नेपालमा भाषाहरूबारे व्यवस्थित सर्वेक्षण नहुँदा भाषाहरूको स्थिति र सङ्ख्याहरूमा विश्वसनीयता नभए पनि यी तथ्याङ्कहरूमा नेपालमा २७ भन्दा बढी भाषाहरूका वक्ता सङ्ख्या कम देखिनुले धेरै भाषाहरू अपक्षयको स्थितिमा रहेको प्रष्ट हुन्छ । गैररैथाने भाषाहरूलाई समावेश नगर्ने हो भने पनि २१ जति भाषाहरू अत्यन्त लोपोन्मुख (मृतप्रायः) अवस्थामा रहेका छन् । लेख तयार पार्ने सन्दर्भमा मूलतः पुस्तकालयको उपयोग गरी सङ्कल्न गरिएका प्राथमिक र द्वितीयक स्रोतका
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बम Bam, सुरेन्द्र Surendra कुमार Kumar. "सुदूरपश्चिम प्रदेशको भाषिक स्थिति Sudurpaschim Pradeshko Bhashik Sthiti". Tribhuvan University Journal 33, № 1 (2019): 251–68. http://dx.doi.org/10.3126/tuj.v33i1.28698.

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Abstract:
सुदूरपश्चिम प्रदेशकोको भाषिक स्थितिमा केन्द्रित यस लेखको मुख्य उद्दश्ेय सुदूरपश्चिम प्रदेशको भाषिक अवस्था पहिचान गर्नु रहेको छ । प्रादेशिक संरचना नेपालको नयाँ व्यवस्था भएकाले प्रदेशगत रूपमा भाषिक तथ्याङ्क पर्याप्त रूपमा उपलब्ध छैन । प्रस्तुत लेखमा शीर्षकसँग सम्बन्धित सैद्धान्तिक सामग्रीको अध्ययन गरी प्राप्त तथ्यको मिश्रित ढाँचामा व्याख्या विश्लेषण गरिएको छ । २०६८ सालको जनगणना अनुसार सुदूरपश्चिम प्रदेशमा बोलिने ८३ ओटा भाषा मध्ये नेपालीका अतिरिक्त एक दर्जन भाषाको मूल उत्पत्ति र प्रमुख प्रयोग क्षेत्र यसै प्रदेशमा भएका रैथाने भाषा रहेको पाइएको छ । वक्ता सङ्ख्याका आधारमा डोटेली सबैभन्दा ठूलो भाषा र
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कुमारी, संगीता. "समाज में कामकाजी महिलाओं की स्थिति एक अध्ययन". International Journal of Advanced Academic Studies 2, № 3 (2020): 88–89. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2020.v2.i3b.131.

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कुमारी, डॉ पूनम. "प्राक् मौर्यकालीन साम्राज्यवाद का आर्थिक स्थिति पर प्रभाव". International Journal of Advanced Academic Studies 3, № 3 (2021): 214–16. http://dx.doi.org/10.33545/27068919.2021.v3.i3c.603.

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जोशी, गोकर्ण. "माध्यमिक तहमा भाषिक विधा शिक्षण विधिहरूको प्रयोग स्थिति". Sotang, Yearly Peer Reviewed Journal 4, № 4 (2022): 14–28. http://dx.doi.org/10.3126/sotang.v4i4.57080.

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Abstract:
भाषा जनसम्पर्कको भरपर्दाे र प्रभावकारी माध्यम हो । शिक्षण प्रक्रियामा भाषाको सर्वाधिक उपयोग गरिन्छ भने भाषा शिक्षणमा भाषा साधन र साध्य दुवै रूपमा प्रयोग गरिन्छ । माध्यमिक तहमा विधा शिक्षणअन्तर्गत साहित्यिक र साहित्येतर विधाहरूको उपयोग गरिएको छ । साहित्यिक विधाहरूको शिक्षण प्रयोजन तथा शिक्षण विधिहरूको प्रयोगावस्था पहिचान गर्ने उद्देश्य लिई यस लेखलाई तयार पारिएको छ । उल्लिखित उद्देश्य पूर्तिका लागि परिमाणात्मक अनुसन्धान विधिको उपयोग गरी साहित्यिक विधा शिक्षणको प्रयोजन, शिक्षण विधिको प्रयोगावस्था तथा शिक्षण विधिहरूको सैद्धान्तिक र प्रयोगात्मक पक्षका बिचमा सन्तुलन कायम गरिएको छ । यस लेखका लागि माध
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., आलोक. "ग्रामीण महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति तथा ई0-प्रशासन". Humanities and Development 18, № 02 (2024): 70–78. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.147.

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Abstract:
स्वस्थ नागरिक समाज तथा राष्ट्र की निधि है। यह बात स्त्री तथा पुरुष दाने ां के लिए समान रूप सेलागू होती है। व्यक्ति की अस्वस्थता का प्रभाव उसकी कार्य क्षमता पर पड़ता है, जिसका सीधा संबंधसंपूर्ण राष्ट्र एवं समाज के विकास में अवरोध से है। समाज की सबसे छोटी संगठित एव ं पहिचान कीजाने वाली इकाई परिवार है। किसी भी परिवार की धुरी महिला होती है और उसके स्वास्थ्य स्थिति कासीधा प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ता है। यदि घर की महिला स्वस्थ है, तो परिवार के प्रत्येकसदस्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ महिला स्वस्थ संतान को जन्म देकर स्वस्थ औरखुशहाल भावी पीढ़ी का निमार्ण् ा करती है। समाज में दोयम दर्जा प्र
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