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Yadav, Indu. "A Study on the Freedom of the Press in the Indian Constitution." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 10, no. 2 (2023): 19–23. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2023.v10n02.005.

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Abstract:
We get the introduction of the freedoms provided in the Indian Constitution in the preamble itself. Five types of freedoms have been provided in the preamble, freedom of thought, expression, belief, religion and worship. In these also the main part of our study is the freedom of the press. Which is freedom of expression in the constitution i.e. Anu. contained in Part 1 of 19 itself. The press is considered as the fourth pillar of the constitution because the freedom of the press is especially important in the strengthening of democracy. For this reason, the press and its freedom have a history
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2

मीणा, आशुतोष. "भारतीय न्यायपालिका पर मीडिया ट्रायल का प्रभावः आलोचनात्मक विश्लेषण". Lokprashasan 16, № 1 (2024): 34–44. http://dx.doi.org/10.32381/lp.2024.16.01.3.

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Abstract:
निष्पक्ष न्याय के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक है। भारतीय संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका का प्रावधान है। न्यायपालिका की कार्यवाही में विधायिका व कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए ताकि न्यायपालिका निष्पक्ष निर्णय कर सके। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इस स्वतंत्रता के आधार पर मीडिया समाचारों की रिपोर्टिंग करता है। मीडिया द्वारा अदालतों में विचाराधीन मामलों की सनसनीखेज रिर्पोटिंग कर दी जाती है जिससे न्यायपालिका के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने व न्यायिक निर्णय प्रभावित होने की संभावना रहती है। हाई प्रोफाइल मामलों में मीडिय
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3

मौर्य, रामयज्ञ, та नितिन कुमार. "सोशल मीडिया: स्वतंत्रता बनाम स्वच्छन्दता". SCHOLARLY RESEARCH JOURNAL FOR HUMANITY SCIENCE AND ENGLISH LANGUAGE 9, № 48 (2021): 11902–6. http://dx.doi.org/10.21922/srjhsel.v9i48.8257.

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Abstract:
सोशल मीडिया आज एक बडा सामाजिक मंच है जहाँ हर कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिये स्वतंत्र है और विशेष यह कि बिना किसी नियंत्रण और हस्तक्षेप के। सोशल मीडिया पर लिखना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण अधिकार से जुड़ गया है। सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है लेकिन भारतीय संविधान में यह स्वतंत्रता देश के प्रत्येक नागरिक को पूर्व में ही प्राप्त है। किंतु इससे पहले अभिव्यक्ति के पर्याप्त मंच और सुलभ साधन नहीं थे, पर्याप्त अवसर न मिलने तथा जानकारी के अभाव के कारण आम आदमी अपनी आवाज या तो उठा नहीं पाता था या उसे दबा दिया जाता था। आम तौर पर समाचार
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4

डॉ., अर्चना चंद्रकांत पत्की. "स्वाधीनता आंदोलन और दुष्यंतकुमार का काव्य". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 34–36. https://doi.org/10.5281/zenodo.7695458.

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Abstract:
‘आजादी, स्वतंत्रता’ हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैl चाहे मनुष्य हो या पशुपक्षी उसे छिन ने का किसी को भी अधिकार नहीl हमारे देश को स्वतंत्र करने के लिए कईयौ का बलिदान रहा हैl ब्रिटिश साम्राज्य से 1947 तक की बात करेंगे तो हम देखते है कि हमारा देश गुलामी से जुझता रहा हैl आजादी को लेकर देश मे व्याप्त उथल-पुथल को हिंदी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर  साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वाहन कर साहित्य को नई दिशा दी हैl हिंदी कवियों ने अपने कविता के माध्यम से स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिये  राष्ट्रीय चेतना का आधार बनायाl स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से लेकर स्वतंत्रता &nb
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5

शिल्पी, मंडल. "स्वतंत्रता सेनानी नंदलाल भकत". 'Journal of Research & Development' 15, № 1 (2023): 5–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.7575728.

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Abstract:
15 अगस्त, 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। इस स्वतंत्रता की उपलब्धि के पीछे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों का आत्म-बलिदान था। राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, नजरुल इस्लाम, शरतचंद्र चटर्जी, खुदीराम बोस, मातंगिनी हाजरा, विनॉय-बादल-दिनेश और अन्य इस मिट्टी पर पैदा हुए थे। इन सभी महापुरुषों और कुलीनों ने बंगाल और भारत के निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभाई। कामदाकिंगकर मुखोपाध्याय (दिवंगत राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पिता), ताराशंकर बंद्योपाध्याय, दुखरीबाला देवी (उन्हें मासिमा के नाम से जाना जाता था), ननीबाला देवी, उमा दत्ता, दिनकर कौशिक, सुमित्रानंद
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6

शर्मा, वन्दना. "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका का मूल्यांकन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 5 (2024): 271–79. http://dx.doi.org/10.29070/a9bn2t22.

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Abstract:
भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता एक लंबे और कठिन संघर्ष के बाद मिली। इस संघर्ष में अनगिनत भारतीयों ने अपने प्राणों की आहुति दी और देश में व्यापक स्तर पर संपत्ति का विनाश हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के सात दशकों से अधिक समय बाद भी, स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को केवल स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, और गांधी जयंती जैसे अवसरों पर ही याद किया जाता है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं और पत्रकारिता ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस शोध पत्र में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और जनसंचार माध्यमों के योगदान को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। विदेशी सरकार द्वार
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कुमारी, काजल. "गोखले और गांधी: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बैचारिकी के दो ध्रुव का समन्वय". INTERNATIONAL JOURNAL OF SCIENTIFIC RESEARCH IN ENGINEERING AND MANAGEMENT 09, № 07 (2025): 1–9. https://doi.org/10.55041/ijsrem51503.

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Abstract:
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अनेक विचारधाराओं, प्रवृत्तियों और रणनीतियों का संगम था। इस संग्राम में दो प्रमुख वैचारिक धाराएँ विशेष रूप से उभरकर सामने आती हैं—गोपाल कृष्ण गोखले का सुधारवादी दृष्टिकोण और महात्मा गांधी का सत्याग्रही दृष्टिकोण। यद्यपि दोनों नेताओं का अंतिम उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता था, किन्तु दोनों की रणनीति, साधन और दृष्टिकोण भिन्न थे। यह शोध आलेख इन दोनों विचारधाराओं की तुलनात्मक विवेचना करता है और उनके प्रभावों की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करता है। गोपाल कृष्ण गोखले एक उदारवादी नेता थे, जिन्होंने संवैधानिक सुधार, विधायी परिषदों में भागीदारी, ब्रिटिश सरकार से संवाद और शांतिपूर्
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8

Rathore, Shipra, and Rupam Soni. "Freedom of Expression in Various Political Systems in today’s Digital Age: A Comparative Case Study." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 12, no. 4 (2025): 17–23. https://doi.org/10.53573/rhimrj.2025.v12n4.003.

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Abstract:
This research paper is an attempt to conduct a comparative analysis of the status of freedom of expression in the current global scenario, focusing on the governance systems of India, the United States of America, Russia, and China. Freedom of expression is a fundamental pillar of democracy, empowering citizens to express their views freely and ensure governmental accountability. This study employs the theoretical frameworks of liberalism, authoritarianism, and deliberative democracy to understand how different political systems and cultural heritages influence this right. The comparative anal
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प्रीति, भारती. "बिहार की महिलाओं के संघर्ष: स्वतंत्रता संग्राम में उनका प्रभाव और योगदान". Chitransh Academic & Research 01, № 02 (2025): 162–72. https://doi.org/10.5281/zenodo.15305331.

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Abstract:
यह शोध पत्र "बिहार की महिलाओं के संघर्ष: स्वतंत्रता संग्राम में उनका प्रभाव और योगदान" पर आधारित है, जिसमें बिहार की महिलाओं की स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका का विश्लेषण किया गया है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार की महिलाओं ने न केवल प्रमुख आंदोलनों में भाग लिया, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। गांधीजी के नेतृत्व में महिलाओं ने सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे आंदोलनों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। इस शोध में प्रमुख महिला नेताओं जैसे सरला देवी, इंदु देवी और बासंती देवी के योगदान को विशेष रूप से उजागर किया गया है, जिन्होंने न केवल राजनीत
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Bhole, R.V. "भारतीय संत और स्वतंत्रता आंदोलन". Journal of Research & Development 16, № 6 (2024): 17–19. https://doi.org/10.5281/zenodo.12263438.

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Abstract:
भूमिका :भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रेरक अध्याय है जिसमें हिंदू सन्यासी व मुस्लिम फकीरों ने हथियार उठाएं और दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी इसे भारत में सन्यासी फकीर विद्रोह के रूप में जाना जाता है स्वतंत्रता संग्राम में जिन लाखों साधुओं ने अपने लोकगीतों एवं लोक कथाओं के माध्यम से आजादी की लग जागी राखी भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रमों से हुए विलुप्त हैं भारतीय इतिहास का नॉरेटिव बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया गया हैl  1947 में किसी नए देश ने जन्म नहीं लिया क्योंकि भारतवर्ष की परिकल्पना प्राचीन काल से ही रही है भारतीय संतों में सबसे प्रमुख स्वामी विवेकानंद हैं जो एक प्रखर चि
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सुन्दरम, डॉ. कुमारी. "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिला योगदान : एक ऐतिहासिक अध्ययन". International Journal of Advance and Applied Research 6, № 21 (2025): 138–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.15300802.

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Abstract:
<strong>सारांश</strong> भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल वीर पुरुषों की गाथाओं से नहीं भरा है, बल्कि इसमें नारी शक्ति की अद्वितीय भूमिका भी समाहित है। इस शोध-पत्र का उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं के सक्रिय और निर्णायक योगदान का विश्लेषण करना है। भारत की महिलाओं ने सामाजिक बंधनों, पारिवारिक दायित्वों और रूढ़िवादी सोच की बेड़ियों को तोड़ते हुए स्वतंत्रता के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की। चाहे वह रानी लक्ष्मीबाई की तलवार हो, सरोजिनी नायडू की ओजस्वी वाणी, कस्तूरबा गांधी की शांत प्रतिरोध की शक्ति, या अरुणा आसफ अली का साहसिक नेतृत्व, इन सबने स्वतंत्रता की नींव को मज़बूती दी। यह अध्ययन यह
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Chanda, Varsha. "Expression of sympathy in ‘Maai’ novel of ‘Gitanjali Shree’." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 10, no. 2 (2023): 45–48. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2023.v10n02.009.

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Abstract:
The consciousness with which Gitanjali Shri touches women's discussion, this environment is favorable. Instead of aiming for boldness in man-woman relationship, Gitanjali Shree chooses narratives where women exercise their freedom to decide or are seen moving towards this freedom. The text of Gitanjali Sri's literature gives words to the voice of a woman who aspires to freedom of thought rather than merely economic or sexual freedom. That's why here women are able to register their presence without speaking or speaking less. Economic freedom is essential for the freedom of women, but even more
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प्रा., राजकुमार ज्ञानोबा चाटे. "महात्मा गांधीजी एवं सर्वोदय संकल्पना". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 04 (2023): 527–32. https://doi.org/10.5281/zenodo.10137336.

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Abstract:
मोहनदास करमचंद गांधी भारत के स्वतंत्रता से पहले और बाद में सबसे महत्वपूर्ण नेता हैं,&nbsp;जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के दौरान इतिहास बदल दिया। वे सवज्ञा जन-आंदोलन के जरिए सत्याग्रह का इस्तेमाल करने वालों में प्रथम थे। उनके सत्याग्रह की अवधारणा पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित थी । यह अवधारणा गांधी के विचार कर्म और व्यवहार में दिखाई देती है। गांधी के नेतृत्व में भारत ने स्वतंत्रता हासिल की ओर वे दुनिया भर में नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा-स्रोत बने।&nbsp;आज सर्वोदय मात्र एक विचार का स्वप्नलोकीन धारणा का प्रतिनिधित्व नहीं करता है बल्कि मानवीय मस्तिष्क को मानवीय समाज की पुर्नसंरचना
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श्रीवास्तव, मेघा, та नीतू मौर्य. "महिला सशक्तिकरण पर महात्मा गांधी के विचारों पर एक अध्ययन". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 22, № 01 (2025): 261–67. https://doi.org/10.29070/j8hcz910.

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Abstract:
महात्मा गांधी का महिला सशक्तिकरण के प्रति दृष्टिकोण उनके संपूर्ण समाज सुधार और स्वतंत्रता संग्राम के प्रयासों का एक अभिन्न हिस्सा था। उनका मानना था कि महिलाओं को समान अधिकार, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता प्रदान किए बिना समाज का नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान संभव नहीं है। इस अध्ययन में गांधीजी के विचारों का विश्लेषण कर उनके दृष्टिकोण की प्रासंगिकता का मूल्यांकन किया गया है।
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संतोष, कुमार त्रिपाठी. "स्वतंत्रता समर और हिन्दी भाषा साहित्य की भूमिका". International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary 3, № 6 (2024): 109–11. https://doi.org/10.5281/zenodo.14241942.

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Abstract:
यह शोध पत्र भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदी भाषा और साहित्य की केंद्रीय भूमिका का विश्लेषण करता है। इसमें महात्मा गांधी, मैथिलीशरण गुप्त और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों और हिंदी लेखकों के योगदान को रेखांकित किया गया है, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से जनमानस में देशभक्ति और एकता की भावना जागृत की। इन विभूतियों ने अपनी कृतियों के माध्यम से स्वतंत्रता के आदर्शों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया, औपनिवेशिक विचारधाराओं को चुनौती दी और सामूहिक कार्रवाई के लिए प्रेरित किया। इस शोध में यह भी चर्चा की गई है कि कैसे हिंदी इस युग में एकता की भाषा के रूप में उभरी और क्षेत्री
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मन्जू, रानी, та धीरज बाकोलिया डॉ. "वैश्वीकरण और नारी आत्मनिर्भरता: एक विश्लेषण". SIDDHATNA'S INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCED RESEARCH IN ARTS & HUMANITIES 1, № 5 (2024): 42–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.11654621.

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Abstract:
20वीं शताब्दी की एक प्रमुख घटना है - वैश्वीकरण। इसके अंतर्गत आतंकवाद, पर्यावरण, बेरोजगारी, अशिक्षा आदि विषयों के साथ-साथ नारी विमर्श जैसे ज्वलंत विषय का भी अध्ययन किया जा रहा है। नारी विमर्श सिर्फ एक देश की सीमाओं तक की सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर नारी सशक्तिकरण के लिए प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। पाश्चात्य देशों में नारी स्वतंत्रता के लिए अनेक आंदोलन हुए। संचार साधनों, पूंजीवाद तथा बाजारीकरण ने जहां नारी को आत्मनिर्भर तो बनाया परंतु उसके अस्तित्व पर आज भी प्रश्न चिन्ह लगे हुए हैं।&nbsp;संवैधानिक व सामाजिक अधिकार स्त्री को पुरुष के समान ही प्राप्त है परंतु आज भी नारी को अपने जीवन पर
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Khan, Asma. "Impact of Communalism in Indian Politics: General Overview." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 1 (2024): 86–91. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n1.015.

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Abstract:
Communalism is a tragedy of our history and present life. Communalism has damaged the social and cultural life of India and has dealt a blow to human civilization. This social problem, which has been going on since the pre-independence era, has taken a fierce and monstrous form after independence and has created an obstacle in the path of India's development. While thinking and writing independently on the problem of communalism, it is absolutely necessary and essential to know the background of this problem. Therefore, under the research paper, the researcher has made a proper effort to clari
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डॉ. पूजा, डॉ पूजा. "स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज का योगदान". SK International Journal of Multidisciplinary Research Hub 10, № 8 (2023): 1–4. http://dx.doi.org/10.61165/sk.publisher.v10i8.1.

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राजेश, चन्द्र पालीवाल. "स्वतंत्रता आंदोलन में हमारे साहित्यकारों का योगदान". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES (ISSN 2348–3318) 9, № 4 (Oct.-Nov.-Dec. 2022) (2022): 72–75. https://doi.org/10.5281/zenodo.7541242.

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Abstract:
देश की --तंता के िलए 1857 से लेकर 1947 तक ांितकारयों व आंदोलनकारयों के साथ ही लेखकों, किवयों और प कारों ने भी मह%पूण( भूिमका िनभाई। उनकी गौरव गाथा हम. /ेरणा देती है िक हम तं ता के मू1 को बनाए रखने के िलए कृत संक45त रह.। /ेमचंद की रंगभूिम, कम(भूिम (उप8ास), भारत.दु हर;ं&lt; का भारत- दश(न (नाटक), जयशंकर /साद का चं&lt;गु@, Aंदगु@ (नाटक) आज भी उठाकर पि़ढए, देश/ेम की भावना जगाने के िलए बड़े कारगर िसF होंगे। वीर सावरकर की &lsquo;1857 का /थम ाधीनता संIामʼ हो या पंिडत नेहL की &lsquo;भारत एक खोजʼ या िफर लोकमा8 बाल गंगाधर ितलक की &lsquo;गीता रहNʼ या शरद बाबू का उप8ास &lsquo;पथ के दावेदारʼ -िजसने भी इP. प
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यादव, राजन, та सैय्यद रज़ा. "ब्रजकिशोर प्रसादः स्वतंत्रता आन्दोलन के अन्यतम योद्धा". International Journal of History 7, № 6 (2025): 46–49. https://doi.org/10.22271/27069109.2025.v7.i6a.437.

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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 147–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.15544930.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Prof., R. V. Bhole. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15561394.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15600096.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Yadav, Shalini. "स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं का अप्रतिम योगदान". ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities 2, № 1 (2025): 120–27. https://doi.org/10.70558/spijsh.2024.v2.i1.45172.

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प्रवीन, कुमार डा. राघवेन्द्र यादव. "भारत की क्रांतिकारी चेतना के प्रतीक जतिन दास के प्रेरक व्यक्तित्व का ऐतिहासिक अध्ययन". International Educational Applied Research Journal 08, № 11 (2024): 68–75. https://doi.org/10.5281/zenodo.14510031.

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Abstract:
1857 की क्रांति भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता हेतु किया गया प्रथम प्रयास था जो अपनी असफलता के बावजूद भी भारतीयों में स्व-जागरण की &nbsp;लहर पैदा करने में पूर्णत सफल हुई । जिसको आधार बनाकर भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का मार्ग प्रशस्त किया गया ।&nbsp; यह बताना आवश्यक है की क्रांतिकारी युवाओं ने समुचित शासन व्यवस्था का विरोध किया था जो अन्याय और शोषण पर आधारित थी ।&nbsp;क्रांतिकारी जतिन दास भी एक प्रेरक तत्व की भांति भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में नजर आए थे ।&nbsp;क्योंकि भारतीय क्रान्तिकारी आत्म बलिदान के लिए सदैव तैयार रहते थे। जिस कारण क्रान्तिकारी आन्दोलन व्यापक रूप धारण करता चला गया। देश के नौजवान स
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Mohit, Mohit. "सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दलित वर्ग के अल्पज्ञात सैनानी". International Scientific Journal of Engineering and Management 04, № 05 (2025): 1–9. https://doi.org/10.55041/isjem03868.

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Yadav, Muneshwar, and Ramnath Sharma. "Relevance of democracy in Indian electoral politics." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 8, no. 7 (2023): 126–30. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2023.v08.n07.017.

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Abstract:
Democracy is the best form of government because its source is from the public. In a democracy, the relationship between the government and the public should be enabling. The sovereignty of the government depends on the consent of the people, making India a sovereign, socialist, secular. democratized and stuck to their word by giving all citizens the right to vote without distinction after adopting what the national leadership had promised in the early 1930s for universal adult suffrage. Caste, illiteracy, communalism, poverty, unemployment are the main points in Indian politics which are crea
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., गीता. "वीरांगना उदा देवी पासी : दलित महिला स्वतंत्रता सेनानी". Praxis International Journal of Social Science and Literature 4, № 3 (2021): 27–31. http://dx.doi.org/10.51879/pijssl/4.3.5.

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क ु मरर, डॉ वियेश. "1857 की क्रांति: विद्रोह, स्वतंत्रता या आत्म-संघर्ष". INTERNATIONAL JOURNAL OF SCIENTIFIC RESEARCH IN ENGINEERING AND MANAGEMENT 09, № 05 (2025): 1–8. https://doi.org/10.55041/ijsrem41861.

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Abstract:
1857 की क्रांति भररिीय इतिहरस की एक ऐसी घटनर है जिसे अलग-अलग विचररधरररओां के िहि अलग-अलग नरमों से िरनर गयर है — ब्रिटटश इतिहरसकररों ने इसे 'ससपरही विद्रोह' कहर, िहीां भररिीय ररष्ट्रिरदी इतिहरसकररों ने इसे 'प्रथम स्ििांत्रिर सांग्ररम' की सांज्ञर दी। लेककन क्यर यह क्रांति िरस्िि में एक सांगटिि ररष्ट्रिरदी आांदोलन थी यर यह एक बहुआयरमी आत्म-सांघर्ष थर जिसमें सरमरजिक, क्षेत्रीय और िैचरररक परिें अांितनटषहि थीां? यह शोध इनहीां प्रश्नों की पष्ट्ृिभूसम से उत्पनन होिर है। इस आलेख कर उद्देश्य 1857 की क्रांति को के िल एक सैनय अथिर ररिनीतिक विद्रोह के रूप में देखने से परे िरकर इसे सरमरजिक-सरांस्कृतिक सांदभ
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बनसोडे, डॉ. गोरख निळोबा. "'धारा के विरुद्ध' कवितासंग्रह में स्वतंत्रता की आवाज़". International Journal of Advance and Applied Research 10, № 4 (2023): 543–48. https://doi.org/10.5281/zenodo.13340714.

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Abstract:
<strong>सारांश</strong> &ndash; 'धारा के विरुद्ध' इस कविता संग्रह के कवि डॉ. कुसुम वियोगी जी हैं l इन्होने जनवरी, 2023 में प्रस्तुत कविता संग्रह अक्षर पब्लिशर्स एन्ड डिस्ट्रिब्युटर्स, दिल्ली, से प्रकाशित किया हैं l 'धारा के विरुद्ध' कविता संग्रह में कुल 75 कविताएं हैं l इसमें सभी कविताएं दीन-दलित वर्ग के जन जीवन से प्रभावित हैं l &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; 'धारा के विरुद्ध' यह कविता संग्रह' कवि ने समर्पित करते हुए कहा है, "उन सामाजिक न्याय एवं परिवर्तन के पक्षधर क्रांति-चेताओं को, जो आज भी अपने हाथों में मशाल थामे आगे बढ़ रहे हैं&hellip;"अर्थात कवि ने यह कविता संग्रह दीन-
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Bhole, R.V. "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साधु -संतों का योगदान". Journal of Research & Development 16, № 6 (2024): 100–103. https://doi.org/10.5281/zenodo.12528882.

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Abstract:
सारांश&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; हमारा देश सनातन धर्म भारत को सशक्त व समर्थ बनाने में यहां के युवाओं देश के समर्पित
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मौर्य, बाल गोविन्द, та प्रो मनोज कुमार मिश्रा. "ग्रामीण कार्यशील महिलाऐ पारिवारिक एवं वैवाहिक सामंजस्य". Humanities and Development 18, № 1 (2018): 71–75. http://dx.doi.org/10.61410/had.v18i1.115.

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Abstract:
इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतीय समाज परम्परागत रूप से पुरुष प्रधान रहा है। समाज में महिलाओं की प्रस्थिति सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से दयनीय रही है। महिलाऐं जीवन के प्रत्येक स्तर पर संघर्षरत रही है। शिक्षा के अधिकार से वंचित होते हुए भी पारिवारिक संस्कार का बोध उन्हें अपने पथ से कभी विपथ नहीं होने दिया। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ पुरुष सत्तात्मक समाज भी है जहाँ महिलाऐ घर की चाहरदीवारी में जीवन निर्वहन करती रही हैं। जातीय समीकरण में भी उच्च जाति की महिलाओं की अपेक्षा निम्न जातीय महिलाऐं अधिक स्वतंत्र रही हैं। स्वतंत्रता के पश्चात देश के सामाजिक, आर्थिक, एवं राजनैतिक विकास के परि
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खटीक, भवानी मल, та बी एल सैनी. "भारत में स्वतंत्रता के पश्चात महिला शिक्षा हेतु प्रयास". International Journal of Political Science and Governance 6, № 2 (2024): 56–59. https://doi.org/10.33545/26646021.2024.v6.i2a.422.

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यादव, डॉ. दिलीप कुमार. "राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक का योगदान". INTERNATIONAL EDUCATION AND RESEARCH JOURNAL - IERJ 11, № 3 (2025): 28–31. https://doi.org/10.5281/zenodo.15582426.

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Abstract:
लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को ब्रिटिश भारत में वर्तमान महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के एक गाँव चिखली में हुआ था। ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में से एक थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्कन शिक्षा सोसायटी की नहित के कार्यों में लगे रहने तथा सरकारी नौकरी न करने का निश्चय किया और अपने मित्र गोपाल गणेश आगरकर के सास्थापना की ताकि भारत में शिक्षा का स्तर सुधरे। उन्होंने मिलकर एक अँग्रेजी स्कूल स्थापित किया। बाल गंगाधर तिलक (अथवा लोकमान्य त
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प्रा., डॉ. गौरव गोविंदराव जेवळीकर. "महात्मा गांधीजी की विश्वस्त संकल्पना". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका (Udayagiri Bahubhashik Itihas Sanshodhan Patrika - A Bimonthly, Refereed, & Peer-Reviewed Journal of History) 01, № 05 (2023): 01–05. https://doi.org/10.5281/zenodo.10071198.

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Abstract:
भारतीय ज्ञान परंपरा मे महात्मा गांधीजी का योगदान महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कुछ राजकीय दृष्टि से गांधीजी के बारे मे उच-निच विचार सामने आते है l लेकिन उन्होने देश के लिए जो त्याग किया है, जो समस्त मानव जाती के हितकारी विचार हमारे सामने रखे है उसे नाकारा नही जा सकता l देश को अंग्रेजो से स्वतंत्र करना यह साध्य था, उसके साथ ही गांधीजीने मानव कल्याणपर भी ध्यान दिया है l महात्मा गांधी जी का मानना था, "जो बदलाव तुम दुनिया में देखना चाहते हो,वह खुद में लेकर आओ"। यह विचार हर व्यक्ती को अंतर्मुख करनेवाला है। महात्मा गांधी जी के इन्ही विचारो के कारणमहान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी
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प्रा., डॉ. गोरख निळोबा बनसोडे. "डॉ. युवराज सोनटक्के के कविता संग्रह अग्निध्वजा में शोषित वर्ग का चित्रण". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 302–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.10669444.

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Abstract:
जातिव्यवस्था यह हमारे भारतीय समाज को लगा कलंक माना गया हैं। यह वास्तव चित्र हैं की जातिव्यवस्था के कारण ऊँच-निचता की अपनी-अपनी मान्यता के कारण उससे उत्पन्न दंगल, शोषण यह स्वास्थ्यपूर्ण देश के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। उसके भयावह तथा उग्र रूप के कारण अनेक तत्वज्ञानी जातिव्यवस्था यह भारतीय समाज को लगा कैंसर मानते हैं। कवि डॉ. युवराज सोनटक्के जी का 'अग्निध्वजा' यह कविता संग्रह विषम व्यवस्था से उत्पन्न अनेक समस्याएं, कारण तथा उपाययोजना पर प्रकाश डालता है। 'अग्निध्वजा' कविता संग्रह की कविताएं पारिवारिक, देशप्रेम, प्रकृति चित्रण, प्रेम भाव, दलित जीवन आदि विषयक हैं। लेकिन उनका प्रमुख विषय आंबेडकरवादी
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Vardhan, Raja Prabuddha. "Kashmir problem and United Nations." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 9, no. 4 (2024): 256–59. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2024.v09.n04.031.

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Abstract:
India was partitioned on the basis of the two-nation theory of the Muslim League, which led to the formation of two separate states, India and Pakistan. In the Indian Independence Act 1947, it was provided that any princely state can join any state, India or Pakistan, on its own. But there was a delay in taking the decision by the King of Kashmir, Hari Singh. Due to this, Pakistan does not accept the merger of Kashmir with India and claims that Kashmir was pressurized to sign the merger document. This led to a dispute between India and Pakistan. India's first Prime Minister Jawaharlal Nehru be
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Swami, Almesha. "Rural life in post-independence Hindi novels." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 8, no. 3 (2023): 344–47. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2023.v08.n03.040.

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Abstract:
After independence, the novel genre has developed rapidly. Novelists have depicted both Indian village and urban life. Indian culture is basically an agricultural culture, the background of which is eternal village life, but the rural environment, influenced by capitalism, industrialization, consumerist culture, technology and technology, is losing its original form. Today's common man, wearing the cloak of post-modernity, is eager to adopt urban ways. Urbanism has entered rural life. The sub-culture affecting the values of typical rural life can be seen even in the fields, barns and footpaths
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Agarwal, Usha, та Sayyad Nasir Ismail. "मौलिक अधिकारों के उल्लंघन में राजनीतिक हस्तक्षेप और न्यायिक प्रतिक्रियाएँ: एक आलोचनात्मक समीक्षा". Shodh Manjusha: An International Multidisciplinary Journal 2, № 01 (2025): 155–70. https://doi.org/10.70388/sm240127.

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Abstract:
नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान की गारंटी के लिए, भारत के संविधान में बुनियादी अधिकारों के संरक्षण के लिए प्रावधान शामिल करना आवश्यक है। फिर भी, इन अधिकारों का उल्लंघन अक्सर राजनीतिक भागीदारी, प्रशासनिक बाधाओं और अन्य कारकों के बीच कानूनी अंतराल का परिणाम होता है। इस अध्ययन का उद्देश्य बुनियादी अधिकारों के उल्लंघन की ऐतिहासिक और वर्तमान पृष्ठभूमि की जांच करना और उन चरों की पहचान करना है जो न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता पर प्रभाव डालते हैं। यह शोधपत्र न्यायिक सक्रियता, कार्यकारी शाखा और न्यायिक शाखा के बीच मौजूद संतुलन और सरकार द्वारा लागू की जाने वाली नीतियों के प्रभाव का व्यापक विश्लेषण प्रद
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प्रा., डॉ. सुरेश चंद्रकांत मेहेत्रे, та डॉ. विजय नागोराव भोपाळे प्रा. "महात्मा गांधी आणि ग्रामीण स्वराज्य". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 05 (2023): 144–47. https://doi.org/10.5281/zenodo.10072946.

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Abstract:
मागील तीन ते चार वर्षात संपूर्ण विश्वाला ज्या कोरोनाच्या महामारीने ग्रासले होते त्याचा परिणाम हा केवळ सामाजिक, राजकीय आणि आर्थिक बाबीवरच झाला नाही तर संपूर्ण अर्थव्यवस्थेला देखील व्यापले आहे. याच दरम्यान संपूर्ण जगाला कळून चुकले की आत्मनिर्भर असणे आवश्यक आहे. त्यासाठी स्वावलंबन आणि स्वदेशीचा मोठा वापर होणे आवश्यक आहे असे संपूर्ण जगाला वाटू लागले. सोबतच स्थानिक उत्पादन, स्थानिक बाजारपेठ, स्थानिक संबंध यांची साखळी मजबूत असणे आवश्यक आहे याची आवश्यकता निर्माण झाली. याचाच अर्थ असा की, कोरोना सारख्या संकटाने उपस्थित झालेल्या परिस्थितीने संपूर्ण जगाला कळून चुकले की, महात्मा गांधींच्या 'ग्रामीण स्वराज
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Purnima, Yadev. "डॉ.बी.आर. अम्बेडकर और भारत में महिला सशक्तिकरण". International Educational Applied Research Journal 08, № 05 (2024): 35–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.12209146.

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Abstract:
एक दृढ़ संकल्पी व गंभीर - गहन विद्वान डॉ. अम्बेडकर ने समाज को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के पथ पर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए है। बाबा साहेब सामाजिक दृष्टि से महिलाओं की उन्नति के पक्षकार थे। वह भारत में महिलाओं की उन्नति में आने वाली बाधाओं को तोड़ने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने हिन्दुओं और भारतीय समाज के अन्य वर्गों के लिए समान नागरिक संहिता को संहिताबद्ध करके एक ठोस व गंभीर प्रयास की नींव रखीं । प्रस्तुत शोध पत्र स्वतंत्रता पूर्व व पश्चात् महिलाओं की समस्याओं पर डॉ. अम्बेडकर के दृष्टिकोण और वर्तमान परिदृश्य में उनके विचारों की प्रासंगिकता को उजागर करने का एक प्रयास है।डॉ. अम्बे
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SHARAN, VIVEK. "भारतीय समाज में दलित चेतना का दलित लामबंदी में परिवर्तन का समाजशास्त्रीयअध्ययन". VEDANJALI 21, № 5 (2024): 82–87. https://doi.org/10.5281/zenodo.15598549.

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Abstract:
दलितों के शोषण ओर अधिकारों को लेकर दलितों के मध्य चेतना जागृत करने के कार्य की शुरुआत समाज सुधारकों व&nbsp; धर्म सुधारकों के द्वारा की गई। दलित चेतना के प्रसार के कारण अपने अधिकारों के लिए दलितों की राजनीति मे भागीदारी की शुरुआत भारतीय स्वतंत्रता संग्रम&nbsp; के साथ हुई, जब उन्हे लगा की उनके अधिकार अपने देश के लोगों के स्थान पर अंग्रेजों से मिलने की संभावना अधिक है। किसी स्थापित राजनीतिक दल या व्यक्ति के द्वारा प्रतिनिधित्व न किए जाने की स्थिति में उन्हांनेे स्वयं अपने राजनीतिक आंदालेन का प्रतिनिधित्व करना स्वीकार किया। डॉ.अंबेडकर ने दलित जागरूकता को दलित लामबदीं में परिवर्तित कर राजनीतिक धुर्
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Suman Yadav та Dr. Pushpendra Yadav. "भारतीय लोकतांत्रिक संस्थानों की प्रासंगिकता और संवैधानिक समीक्षा की आवश्यकता: एक सैद्धांतिक विश्लेषण". International Journal of Multidisciplinary Research in Arts, Science and Technology 3, № 5 (2025): 61–73. https://doi.org/10.61778/ijmrast.v3i5.142.

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Abstract:
संसदीय प्रणाली, विधायी स्वतंत्रता, न्यायिक निष्पक्षता और संवैधानिक समीक्षा प्रक्रिया सभी हाल के वर्षों में कई कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। इस तथ्य के बावजूद कि भारतीय लोकतंत्र अपनी संवैधानिक नींव और मजबूत संस्थाओं पर आधारित है, ये मुद्दे हाल के वर्षों में उभरे हैं। संसद की गरिमा में गिरावट, सांसदों में अनुशासन की कमी, सत्ता के केंद्रीकरण की ओर झुकाव और संविधान में संशोधन की प्रक्रिया में खुलेपन की कमी सहित कई कारकों ने लोकतंत्र की प्रभावकारिता पर सवाल उठाने में योगदान दिया है। इस शोध पत्र का उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र को परेशान करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों की जांच करना और आवश्यक समाधान सुझाना
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विशेन, चंद्र देव सिंह, та डॉ अनुराग मिश्र. "अदम गोंडवी की रचनाओं में स्त्री चेतना". Humanities and Development 18, № 1 (2018): 103–6. http://dx.doi.org/10.61410/had.v18i1.123.

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Abstract:
शोध सार-किसी भी समय व समाज की सही दशा ज्ञात करनी हो तो उस समय व समाज की स्त्रियों की स्थिति पर विचार करना होगा। प्रश्न यह है कि स्त्रियों की दशा पर विचार करने के लिए क्या स्त्रियों द्वारा लिखित साहित्य पर ही विचार किया जाएगा? या महिला रचनाकारों द्वारा महिलागाथा को ही स्त्री विमर्श माना जाएगा। महिलाएं भी समाज का अंग है समाज में स्त्री पुरुष दोनों का सहजीवन है। पुरुष रचनाकारों द्वारा भी अपनी रचनाओं में ऐसी महिला चरित्रों को प्रमुखता दी गई है जो अपनी स्वतंत्रता, शोषण, गरीबी, अशिक्षा, असमानता, अस्तित्व आदि के लिए संघर्षरत रही हैं। महिला लेखन केवल महिला से नहीं बल्कि समग्र समाज से जुड़ा हुआ है इसलिए
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रीतेश रावत. "असंगघोष के काव्य में मानवीय अस्मिता की चेतना". International Journal of Multidisciplinary Research in Arts, Science and Technology 2, № 10 (2024): 27–33. https://doi.org/10.61778/ijmrast.v2i10.87.

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Abstract:
असंगघोष का जन्म मध्यप्रदेश के जावद नामक छोटे से कस्बे में 29 अक्टूबर 1962 ई0 को हुआ। असंगघोष 21वीं शताब्दी के विख्यात हिन्दी कवि है। विषमता और विद्रूपता के प्रति विद्रोह करते हुए सामाजिक समानता के पुरोधा, दलितों के शोषण का विरोध, प्रस्थापित व्यवस्था के विरूद्ध उठायी गई ईमानदार आवाज परिवर्तित समानांतर समाज व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश, मानवाधिकार के प्रति सजगता जैसी बहुआयामी चेतना से अनुप्राणित असंग जी की कविताओं में नई शती को विद्रोह की ताकत देने वाला आस्थावान विमर्श प्रस्तुत हुआ है। स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा भारतीय संविधान के प्रणीत मूल्य है जो असंगघोष की कविताओं में हमें देखने को मिलता है। स
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Deepali, Agrawal, та Mahadev Pandagre Dr. "भारत में पीएमजेडीवाई के शुभारंभ से पहले और बाद में वित्तीय समावेशन की स्थिति का विश्लेषण करना". International Journal of Trends in Emerging Research and Development 2, № 4 (2024): 66–70. https://doi.org/10.5281/zenodo.14271870.

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Abstract:
सरकार ने वित्तीय समावेशन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया है क्योंकि यह समावेशी विकास का एक प्रमुख प्रवर्तक है। प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय समावेशन कार्यक्रमों में से एक है। वित्तीय बहिष्कार गरीबी का मूल कारण है, जो स्वतंत्रता के बाद से भारत की विकास प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करता है। वे अपने सामने आने वाली वित्तीय चुनौतियों का सामना करने की अपनी क्षमता खो देते हैं। इसलिए वित्तीय समावेशन गरीबी और असमानता को कम करने का महत्वपूर्ण प्रारंभिक बिंदु है। वित्तीय समावेशन उन लोगों के आर्थिक विकास की एक व्यापक अवधारणा है जो अन्यथा देश के वित्तीय क्षेत्र से बाहर हैं।
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रेड्डी, डॉ.एम. नारायण. "कमृदुला गर्ग की कहानियों में नारी". Sahitya Samhita 9, № 10 (2023): 22–29. https://doi.org/10.5281/zenodo.10071890.

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Abstract:
प्राचीन काल की औरत से आधुनिक काल की औरत बेहतर है। पहले जिस समाज को पुरुष प्रधान समाज नाम से पहचाना जाता था,&nbsp;आज उस विचार में बहुत-कुछ बदलाव आया है। स्त्री घर के बाहर जाकर नौकरी-पेशा,&nbsp;काम-काज करने लगी है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र बन रही है। हमेशा पति के सामने हाथ&nbsp; बढ़ानेवाली स्त्री,&nbsp;दिमागी तौर पर पुरुष को ही कमजोर समझने लगी है। नया मजदूर वर्ग,&nbsp;बेकार शिक्षित युवा,&nbsp;आदि की अभूतपूर्व वृद्धि के कारण आर्थिक ढांचा एकदम बदल गया है। साहित्य में वर्तमान भारतीय समाज की आर्थिक परिस्थितियों से जन्म लेनेवाली स्त्री साठोत्तरी कहानियों में अर्थतंत्र का प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव उसका बह
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Poonam and Tripuresh Tripathi. "Tatya Tope and Kanpur in the 1857 War of Independence." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 1 (2024): 118–22. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n1.020.

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Abstract:
Till 1857, people were unfamiliar with the name of Tatya Tope. But the dramatic events of 1857 suddenly brought him out of darkness into the light. Before the start of the First War of Independence, he was only a companion of Raja Nana Saheb of Bithoor, the eldest son of the deposed Bajirao II, but after Kanpur joined the War of Independence, Tatya reached the position of Commander-in-Chief of the Peshwa's army. All the events of the subsequent wars raised his name to the forefront like a comet, which left a long line of light behind it. His name became famous not only in the country but also
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Poonam and Pintu Kumar. "Chauri Chaura Revolution: A Review." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 1 (2024): 112–17. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n1.019.

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Abstract:
The freedom struggle of any country is the greatest treasure of that country. The incidents that happened during this period and the martyrdom of the revolutionaries in them always serve as a source of inspiration for the people of that country. The Chauri Chaura incident that happened during the Indian freedom movement was also one such incident. This incident not only forced Gandhiji to withdraw the much talked about non-cooperation movement of that time but also gave a new direction and condition to the national movement. This incident happened on 4 February 1922 at a place called Chauri Ch
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पासवान, चंदन कुमार. "राष्ट्रीय आंदोलन में महर्षि अरविंद घोष का योगदान". INTERNATIONAL JOURNAL OF SCIENTIFIC RESEARCH IN ENGINEERING AND MANAGEMENT 09, № 07 (2025): 1–9. https://doi.org/10.55041/ijsrem51506.

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Abstract:
महर्षि अरविंद का योगदान भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक विशिष्ट विचारधारा और गहन वैचारिक दिशा प्रस्तुत करता है। वे न केवल एक क्रांतिकारी नेता थे, बल्कि एक दार्शनिक, कवि और आध्यात्मिक चिंतक भी थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि एक व्यापक आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखा। यह शोध आलेख उनके बहुआयामी योगदान का विश्लेषण करता है, जिसमें उनके क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से लेकर आध्यात्मिक राष्ट्रवाद तक की विचारयात्रा को शामिल किया गया है। अरविंद घोष ने प्रारंभ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तीव्र प्रतिरोध और सशस्त्र क्रांति का समर्थन किया। वे बंगाल विभाजन के विरोध मे
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