Academic literature on the topic 'Darjeeling दार्जीलिंग'

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Journal articles on the topic "Darjeeling दार्जीलिंग"

1

मुक, ुन्द कुमार. "वस्त्र अलंकरण म ें र ंगा ें की पुरातन भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888816.

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Abstract:
रंग वस्त्र आकल्पन (अलंकरण) का मूलाधार है। वस्त्र्ा के अनुरूप रंग द्रव्य¨ ं ;कलमेद्ध का चयन आ ैर उनक े प्रय¨ग की तकनीक, कलाकार अथवा रंगरेज के निजी दृष्टिक¨ण एवं उनक े अनुभव पर आधारित ह¨ती है। रंग¨ ं का, व्यक्ति की मन¨भावनाअ¨ ं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं पहल ुअ¨ं का अध्ययन करके वस्त्र्ा¨ं क े विविध प्रकार क े अनुसार रंगद्रव्य का सफलताप ूर्वक प्रय¨ग किया जाता ह ै। वस्त्र्ा रंर्गाइ की कला अतिप्राचीन ह ै। भारतवर्ष में र्कइ ऐसे प्रमाण मिलते ह ैं जिनमें वस्त्र्ा ब ुर्नाइ एवं वस्त्र्ा-रंर्गाइ के विषय र्में इ सा प ूर्व एवं उत्तरार्ध में मनुष्य¨ ं क¨ ज्ञान था। वस्त्र्ा ब ुनाई अ©र रंर्गाइ के इतिहास
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2

चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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3

लाल, बहादुर कुमार. "मधुबनी ल¨क चित्र्ाकला की विश्¨षताएँ एव ं रंग¨ ं की अद्भ ुत संय¨जन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888812.

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Abstract:
मिथिलांचल की मध ुबनी ल¨क चित्र्ाकला के माध्यम से ल¨कचित्र्ा परम्परा का निर्वाह आज भी किया जा रहा ह ै। यहाँ की ल¨क कला श्©ली वंश परम्परा क े आधार पर आज भी गतिशील ह ै। मध ुबनी ल¨क चित्र्ाकला की विदेश¨ं में काफी मांग ह ै ल्¨किन वह अपने ही देश में उप ेक्षित ह ै। दुर्भाग्य की बात है कि जिनके हाथ में ह ुनर है, वे ग्रामीण कलाकार आमत©र पर गरीब है ं। देश के कला-जगत् की नजर इस पर नहीं गई, जबकि ‘‘जापान के हासेभावा ने राजधानी ट¨किय¨ से उत्तर-पश्चिम में स्थित निगाता में एक पहाड़ी पर मिथिला म्यूजियम की स्थापना की ह ै। जापान क े कला के मर्मज्ञ एव ं कला पारखी ‘‘हासेगावा’’ पच्चीस से अधिक बार भारत आ चुक े है ं।
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4

किरण, बड ेरिया आलोक गा ेयल राकेश कवचे. "ज ैव विविधता और जलवायु परिवर्तन एक दृष्टिकोण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.882063.

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Abstract:
जैव विविधता हमार े लिए बहुत महत्त्वप ूर्ण ह ै। ये हमार े जीवन के अभिन्न अ ंग है ं। अभी तक लगभग 1.75 मिलियन प्रजातिया ें की पहचान हो चुकी है। हालाँकि वैज्ञानिकों का मानना ह ै कि हमार े ग्रह पर लगभग 13 मिलियन प्रजातियाँ हैं। विभिन्न प्रजातियों की उपस्थिति न े मानव क े लिए इस ग्रह को आवास योग्य बनान े म ें मदद की ह ै। इनके बिना हम अपन े जीवन की कल्पना नहंी कर सकत े। जैव विविधता हमार े जीवन के लिए आवश्यक र्कइ वस्त ुएँ एव ं सेवाएँ उपलब्ध कराता ह ै। ये वो स्तम्भ ह ैं जिन पर हमन े अपनी सभ्यता बसायी ह ै। आर्थिक समृद्धि के लिए उत्तरदायी र्कइ उद्या ेगों का आधार ये जैव विविधता ह ै। इनको खतरा पहुँचान े का
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5

अ, ंशु अर्प ण. भारद्वाज. "इको टूरिज्म". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.838915.

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Abstract:
पर्यटक और पर्यावरण का सहसम्बन्ध ह ै। वर्त मान समय म ें विश्व के समस्त द ेशों में पर्यटन का विकास तीव्रगति से हो रहा ह ै और इसन े उद्या ेग का रूप ले लिया है। पर्यटन उद्योग क े विकास क े साथ-साथ पर्यावरण क े संरक्षण की आवश्यकता न े विश्व के पर्यावरणविदों को चिंतित कर रखा है। अनियंत्रित पर्यटन से जैव विविधता तथा पारिस्थितिकी त ंत्र प्रभावित हा ेता है। अतः इन दुष्परिणामों का े नियंत्रित करने के लिए पर्यटकों का े उत्तरदायी पर्यटन एव ं इको ट ूरिज्म (पर्यावरणीय पर्यटन) हेत ु जागरूक करना चाहिए। उत्तरदायी पर्यटन भौतिक, सामाजिक एव ं सांस्कृतिक पतन को रोकता है। उत्तरदायी पर्य टन में स्थानीय समुदाय के सहय
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6

र, ंजना शर्मा (व्यास). "्राक ृतिक संसाधनों क े संरक्षण म ें समाज की भ ूमिका पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक, औषधीय मूल्य". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.883545.

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Abstract:
विश्व प्रकृति निधि भारत का हमेशा ही यह उद ्द ेश्य रहा है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण क े साथ दीर्घकालिक तथा न्याय संगत विकास करन े में सहभागी बन ें।1 जब तक हमार े पर्यावरण में बाह्य पदार्थ आकर मिलत े ह ैं संद ृषण होता ह ै। प ्रारम्भ में यह अल्प मात्रा में हा ेता है, जिससे एक स्तर तक मन ुष्य को कोई हानि नहीं पहुँचती तब तक यह संद ूषण की श्रेणी मे ं, ल ेकिन जैस े ही इस सीमा का उल्ल ंघन होता है तो यह द ूषण संद ूषण न रहकर प ्रद ूषण बन जाता है। हिन्द ू धर्म ग्रन्थ ‘‘वाराह पुराण’’ में लिखा है कि वृक्षो ं के उपकार पाँच महायज्ञ है ं। व े ग्रहस्थों को ईंधन पथिका ें को छाया तथा विश्राम, पक्षिया ें
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