Academic literature on the topic 'Mahishasura martyrdom day'

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Journal articles on the topic "Mahishasura martyrdom day"

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Virendra, Yadav. "सांस्कृतिक वर्चस्व और बहुजन प्रतिपरंपरा (महिषासुर: मिथक और परंपरा की वीरेंद्र यादव द्वारा लिखित समीक्षा)". आऊटलुक, 28 травня 2018. https://doi.org/10.5281/zenodo.6757564.

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Abstract:
<strong>सांस्कृतिक वर्चस्व और बहुजन प्रतिपरंपरा</strong> <strong>वीरेंद्र यादव</strong> &ldquo;महिषासुर परिघटना का जन्म &lsquo;सांस्कृतिक उपनिवेश&rsquo; और &lsquo;हिंसात्मक सांस्कृतिक प्रदर्शन&rsquo; के खिलाफ हुआ है&rdquo; भारतीय जनतंत्र आज जिन चुनौतियों और उथल-पुथल से रूबरू है वे महज राजनीतिक और आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी हैं। लंबे समय तक वर्चस्वशाली परंपराओं द्वारा बेदखल श्रमशील समाज की परंपराएं अब अपनी सांस्कृतिक जड़ों की तलाश ही नहीं कर रहीं, बल्कि प्रभुत्वशाली संस्कृति की एकआयामी समझ को प्रश्नांकित भी कर रही हैं। फॉरवर्ड प्रेस बुक्स की महिषासुर&ndash;मिथक व परंपराएं (स
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Karmanand, Arya. "महिषासुर: मिथक पर परंपराएं की समीक्षा". अस्मिता की आवाज, May 19, 2018 (19 травня 2018). https://doi.org/10.5281/zenodo.7263828.

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Abstract:
&lsquo;महिषासुर एक जननायक&rsquo; की अपार सफलता के बाद &lsquo;फारवर्ड बुक्स&rsquo; एवं &lsquo;दी मार्जिनलाइज्ड पब्लिकेशन&rsquo; ने अपनी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक &lsquo;महिषासुर मिथक व परम्परायें&rsquo; पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत की है. बहुजन तबकों खासकर आदिवासियों, पिछड़ों और दलितों के सांस्कृतिक प्रतिरोध के निर्माण में इस पुस्तक को मील का पत्थर माना जाना चाहिए. यह पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देवों और असुरों की लड़ाई में यह असुरों की तरफ से प्रस्तुत साक्ष्यों और उसकी परम्पराओं को तथ्यों और तर्कों के आधार पर पुष्ट करती है. यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या महिषासुर ही अनार्यों के पू
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Ish, N. Mishra. "मिथक-परंपराओं की पुनर्व्याख्या से इतिहास की खोज (महिषासुर: मिथक व परंपरा की ईश मिश्र द्वारा लिखित समीक्षा)". Forward Press, 28 вересня 2008. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264929.

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Abstract:
<strong>&lsquo;महिषासुर</strong>&nbsp;: मिथक व परंपराएं&rsquo; प्रमोद रंजन द्वारा संपादित एक महत्वपूर्ण किताब है। यह किताब दुर्गा-महिषासुर के मिथक का पुनर्पाठ और 2011 में जेएनयू में महिषासुर दिवस के आयोजन से शुरू विमर्श को एक नया मुकाम देती है। इसमें इस विमर्श के विविध आयामों को समेटने वाले लेख हैं। यहां यह जानना भी जरूरी है कि इसके पहले प्रमोद रंजन के ही संपादन में &lsquo;महिषासुर : एक जननायक&rsquo; (2016) आयी थी। &lsquo;महिषासुर : मिथक व परंपराएं&rsquo; किताब 6 खंडों में विभाजित है। इन विविध खंडों में अनेक जगहों की परंपरा-प्रतीकों; मिथक-उत्सवों के शोधपूर्ण अध्ययन-विश्लेषण पर आधारित लेखों का
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Srija, Naskar. "Mahishasur: Myths and Traditions-Book Review by Srija Naskar." October 30, 2022. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264671.

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Abstract:
मनुष्य और प्रकृति के साथ साहचर्य युक्त जीवन और सभ्यता की भारतीय प्राचीन संस्कृति पर सुनियोजित और सुव्यवस्थित रणनीति के साथ वर्चस्वशाली संस्कृति ने अपना नियंत्रण कायम किया। यह वर्चस्वशाली संस्कृति मनुष्यों की बराबरी में नहीं, बल्कि उंच-नीच की धारणा में विश्वास रखती थी। बहुलांश को अधीन बनाना ही इसकी मुख्य रणनीति थी। इस वर्चस्वशाली संस्कृति को स्थापित करने व चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से लोगों के मानसिक बुनावट अपने अनुकूल गढ़ने के लिए वर्चस्वशाली संस्कृति के संस्थापकों ने हिंसा, षडयंत्र, छल, दमन और क्रूरता का सहारा लिया। इन सभी की मुखर अभिव्यक्ति पौराणिक मिथकों में होती है। इन मिथकों में वर्चस्व
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Ish, N. Mishra. "Mahishasur: A people's Hero: Book Review by Ish N Mishra." Counter Currents, April 5, 2017 (April 5, 2017). https://doi.org/10.5281/zenodo.7263750.

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Abstract:
<strong>Alternative Readings of the Durga-Mahishasur Myth.&nbsp;</strong><strong><em>A Revolt Against Brahmanical Epistemology: The beginning of a new cultural renaissance in India</em></strong> <em>The alternative readings of myths from Brahmanical mythological reservoir mark the beginning of a new cultural consciousness among the Dalits, Adivasis and other deprived sections of the Indian society. The deprived peoples have realized that the Brahmanism has been able to maintain its ideological hegemony through monopoly over knowledge based mainly on epical &amp; mythological constructs of the
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Prakash, K. ray. "मिथकों का पुनर्पाठ (महिषासुर: मिथक व परंपराएं की प्रकाश के रे द्वारा लिखित समीक्षा)". 21 жовтня 2008. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264980.

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Abstract:
<strong>नयी किताब : मिथकों का पुनर्पाठ</strong> &nbsp; मिथक और पौराणिकता पर लिखी पुस्तकें अधिकाधिक पाठकों तक पहुंचनी चाहिए, क्योंकि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और सार्वजनिक जीवन में धर्म और पौराणिकता का विशेष स्थान है. देवदत्त पट्टनायक कई वर्षों से भारतीय मिथकों और पौराणिकता को सहज और सरस विश्लेषण के साथ आम जन तक पहुंचा रहे हैं. अब तक वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में 600 से अधिक लेख और 30 पुस्तकें लिख चुके हैं. टेलीविजन चैनल एपिक पर &#39;देवलोक&#39; सीरीज के माध्यम से भी वे जानकारी देते रहे हैं. इस सीरीज पर आधारित उनकी तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. तीसरी पुस्तक में ग्राम देवता, रामायण के विविध स
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Chandrabhushan, Gupta Ankur. "मिथकों का पुनर्पाठ प्रस्तुत करती एक किताब (महिषासुर: मिथक व परंपराएं की प्रोफेसर चन्द्रभूषण गुप्त 'अंकुर' द्वारा लिखित समीक्षा)". 18 лютого 2018. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264966.

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Abstract:
<strong>मिथकों का पुनर्पाठ प्रस्तुत करती एक किताब</strong> <strong>प्रोफेसर चन्द्रभूषण गुप्त &lsquo;अंकुर&rsquo;</strong> महिषासुर आन्दोलन&nbsp;21वीं सदी में आदिवासी और दलित-बहुजनों का एक आंदोलन बन कर उभर रहा है। आदिवासियों,&nbsp;पिछड़ों और दलितों का एक व्यापक हिस्सा,&nbsp;इसके माध्यम से नए सिरे से अपनी सांस्कृतिक दावेदारी पेश कर रहा है। यह आन्दोलन क्या है,&nbsp;इसकी जड़ें कहाँ तक विस्तारित हैं,&nbsp;बहुजनों की सांस्कृतिक परम्परा में इसका क्या स्थान है,&nbsp;लोक जीवन में उनकी उपस्थिति किन-किन रूपों में है,&nbsp;इसके पुरातात्विक साक्ष्य क्या हैं?&nbsp;बहुजनों के गीतों,&nbsp;कविताओं एवं नाटकों म
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Kanwal, Bharti. "महिषासुर - मिथक व परम्परा की समीक्षा: कंवल भारती". समालोचन, 9 січня 2018. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264435.

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Abstract:
वर्तमान के संघर्ष का युद्ध- क्षेत्र अतीत होता है. औपनिवेशिक शासकों ने भारतीय मिथकों को अपने हितों के सहयोगी इतिहास के रूप में सृजित किया. प्रतिक्रिया में मिथकों को समझने और व्यवस्थित करने की एक और कोशिश हुई जिसमें&nbsp;काशी प्रसाद जायसवाल, धर्मानंद कोसम्बी, दामोदर धर्मानंद कोसम्बी, वासुदेव शरण अग्रवाल, रामशरण शर्मा, रोमिला थापर&nbsp;आदि की बड़ी और महत्वपूर्ण &nbsp;भूमिका है. यह अंतर्दृष्टि खुद उस समय के लेखकों में थी.&nbsp;जयशंकर प्रसाद&nbsp;के नाटक मिथकों को साहित्य में बदलते हुए यही तो कर रहे थे.&nbsp; आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने&nbsp;&nbsp;प्रसिद्ध निबन्ध&nbsp;&lsquo;अशोक के फूल&rsquo
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Anil, Yadav. "जन संस्कृति की दुर्गम यात्रा: महिषासुर-मिथक व परंपराएं की समीक्षा". सब लोग, 29 січня 2019. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264644.

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Abstract:
<strong>आजमगढ़</strong>&nbsp;जिले से महज 8 किलोमीटर दूर पर एक गांव है &ndash; बभनौली। यादवों और दलितों का गांव है, नाम सिर्फ बभनौली है। गांव में ब्राह्मण बिल्कुल नही है। गांव के बाहर ऊंचे चबूतरे पर करीब तीन फ़ीट की मूर्ति है, जिसे लोग भैंसासुर बोलते हैं। बचपन में मैंने देखा था कि आसपास के गांवों से हर रविवार को लोग भूसा-दाना लेकर उस चबूतरे पर चढ़ाने जाते थे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान प्रतापगढ़ के कुंडा विधानसभा में भी भैंसासुर का स्थान दिखा। मैं भैंसासुर की जन के बीच उपस्थिति के कारणों पर सोच ही रहा था कि ठीक उसी समय फारवर्ड प्रेस से प्रमोद रंजन द्वारा संपादित &lsquo;महिषासुर : मिथक
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Ish, N. Mishra. "पुस्तक समीक्षा: सांस्कृतिक विद्रोह की नई परंपरा मिथक, परंपराओं और प्रतीकों का नव-अन्वेषण". Radical, 10 серпня 2018. https://doi.org/10.5281/zenodo.7264876.

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Abstract:
पुस्तक समीक्षा <strong>महिषासुर:&nbsp;<em>मिथक व परंपराएं</em></strong> संपादक प्रमोद रंजन प्रकाशक: द मार्जिनलाइज्ड, नई दिल्ली, 2017,&nbsp;मूल्य 850 रुपया. <strong>सांस्कृतिक विद्रोह की नई परंपरा मिथक, परंपराओं और प्रतीकों का नव-अन्वेषण</strong> <strong>ईश मिश्र &nbsp; &nbsp;</strong> &nbsp; 25 अक्टूबर 2011 को आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों के एक संगठन (फोरम ऑफ बैकवर्ड स्टूडेंट्स), में &nbsp;जेयनयू में दुर्गा-महिषासुर मथक के पुर्पाठ के आधार पर, हिषासुर शहादत दिवस &nbsp;आयोजित कर बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक हलकों में तहलका मचा दिया। उसके बाद के विमर्श ने एक आंदोलन का रूप ले लिया,
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