Academic literature on the topic 'अग्नि पुराण'

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Journal articles on the topic "अग्नि पुराण"

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डा, ॅ. श्रीमती प्रतिभा श्रीवास्तव. "र ंग, स ेहत, सब्जियाँ - एक दृष्टिका ेण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.890493.

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Abstract:
रंगा ें का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इनके द्वारा हमें अपने चारों ओर की स्थितिया ें का ज्ञान होता ह ै आ ैर रंगा ें का प्रभाव ज्ञात हा ेता है। रंग मनुष्य की आँख में वर्णक्रम से मिलने पर छाया संब ंधी गतिविधियों से उत्पन्न होते ह ै। मूलरूप से इन्द्रधनुष क े सात रंगा ें का े ही रंगा ें का जनक माना जाता है। ये सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला व ब ैंगनी ह ै। मानवीय गुण धर्म में आभासी बोध के अनुसार लाल, नीला व हरा रंग हा ेता है। रंगा ें स े विभिन्न प ्रकार से वस्तु प ्रकाष स्त्रोत एवं श्रेणियां इत्यादि आती ह ै। प ्रकाष स्त्रोता ें के भा ैतिक, गुणधर्म जैसे प्रकाष विलियन, समावेषन, परावर्
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2

चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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3

Ruchika, Shrivastava. "र ंगा ें म ें समाहित चित्रकार विकास भट्टाचार्यजी की कलाकृतियाँ". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890547.

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Abstract:
कला का इतिहास उतना ही प ुराना ह ै जितना की मानव का इतिहास। ऐसा कहा जाता ह ै कि मनुश्य ने जिस समय अपने नेत्रा ें का े खा ेला तब से ही वह अपनी आजीविका के लिये दिन प ्रतिदिन नव निर्मा ण के कार्य में जुट गया आ ैर उसकी इस नव निर्मा ण प्रवृति ने उसक े जीवन का े रा ेमा ंचक, खुषहाल व समृद्ध बनाया है। इस रोमांचकता, ख ुषहाली व समृद्धि को दर्षाने के लिये उसनें (मनुश्य नें) चित्रकला का सहारा लिया आ ैर उसे सही रुप में व्यक्त करने क े लिये ं रगा ें का े अपना साथी बनाया। उसने कहीं गहरे रंग ता े कही ं हल्के रंगा ें का प ्रयोग करके अपनी भावनाओं का े देखने वाला ें के सम्मुख प्रस्तुत किया। रंग किसी भी व्यक्ति के
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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डा, ॅ. कुमकुम भारद्वाज. ""अम ूर्त चित्रकला शैली म ें र ंग संया ेजन"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890369.

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Abstract:
वर्ण अर्था त रंग किसी भी कलाकृति का प्राण ह ै जा े दृष्टि एवं प ्रकाश पर निर्भ र करता ह ै प्रत्येक वस्तु में का ेई न कोई रंग विद्यमान होता ह ै अतः किसी भी वस्तु की पहचान रंगा ें क े कारण होती ह ै। रंग प ्रकाश का गुण ह ै रंग का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता ह ै अपितु अक्षपटल द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला प्रभाव रंग ह ै एक ही रूप की दा े वस्तुआ ें को प ृथक-प ृथक रंगा ें द्वारा पहचाना जाता ह ै रंग वस्तु का वह गुण है जिसका अनुभव हम नेत्रा ें द्वारा करते है प्रकाष की उपस्थिति में ही हम किसी वस्तु का े देख सकते ह ै अतः प ्रकाश हमें रंगा ें का बा ेध कराता ह ै। तूलिका और रंगा ें का निर्मा ण क े संब ंध म
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डा, ॅ. कुमकुम भारद्वाज. ""अम ूर्त चित्रकला शैली म ें र ंग संया ेजन"". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890487.

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Abstract:
वर्ण अर्था त रंग किसी भी कलाकृति का प्राण ह ै जा े दृष्टि एवं प ्रकाश पर निर्भ र करता ह ै प्रत्येक वस्तु में का ेई न कोई रंग विद्यमान होता ह ै अतः किसी भी वस्तु की पहचान रंगा ें क े कारण होती ह ै। रंग प ्रकाश का गुण ह ै रंग का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता ह ै अपितु अक्षपटल द्वारा मस्तिष्क पर पड़ने वाला प्रभाव रंग ह ै एक ही रूप की दा े वस्तुआ ें को प ृथक-प ृथक रंगा ें द्वारा पहचाना जाता ह ै रंग वस्तु का वह गुण है जिसका अनुभव हम नेत्रा ें द्वारा करते है प्रकाष की उपस्थिति में ही हम किसी वस्तु का े देख सकते ह ै अतः प ्रकाश हमें रंगा ें का बा ेध कराता ह ै। तूलिका और रंगा ें का निर्मा ण क े संब ंध म
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डा, ॅ० नमिता त्यागी. "र ंग एवं रसाभिव्यक्ति". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888772.

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Abstract:
मानव जीवन का उद्देश्य क्रियाशीलता अथवा निर्मा ण में निहित है। इससे रहित जीवन श ून्य से अधिक नही ं होता। एक कलाकृति में मानव अपने अनुभवों का े निश्चित चित्र तत्वों एवं सौन्दर्य सिद्धान्तों क े आधार पर ही अभिव्यक्ति करता है। इस रूप सजृन की प्रक्रिया का े कला की संज्ञा प्रदान की जाती ह ै। हृदय अनुभूति क े परिणाम स्वरूप ही कला की भाषा भावों स े परिपूर्ण है। भाव का अर्थ हा ेता ह ै, भावना, उद्वेग, आव ेग, संव ेग, उन्मेष, इच्छा, प ्रकृति आ ैर व्यंग इत्यादि का अ ुनभव। यह अनुभव हमारी इन्द्रियों क े द्वारा हमारे आन्तरिक मन मस्तिष्क में उतर कर हमारी आत्मा को प ्रभावित करता ह ै। यह भाव सुख एवं दुख के रूप म
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डा, ॅ. श्वेता पाण्डेय. "जामिनी राय की कला म ें र ंग योजना की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888821.

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Abstract:
जामिनी राय ने अपनी कला यात्रा के दौरान असंख्य चित्रा ें का निर्माण किया। इस निर्मा ण कार्य में शायद ही ऐसा कोई विषय हो जो जामिनी राय की तूलिका क े माध्यम से प्रकट ना हो सका हो। कला के प ्रति उनका समर्पण व उनकी निरन्तरता क े कारण ही उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में चित्रा ें का निर्माण किया। जामिनी राय ने अपने ही चित्रा ें को र्कइ बार दोहराया है, इसलिये यह कह पाना बड़ा कठिन ह ै कि का ैन सा चित्र पहले का ह ै, कौन सा बाद का, सिर्फ श ैली को देखकर ही निर्मा ण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इसक े अतिरिक्त जामिनी राय ने अपने चित्रा ें में कभी भी तिथि का उल्लेख नही किया है, इस कारण यह समस्या और भी जटिल
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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