Academic literature on the topic 'नेपालीमा रामकथा'

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Journal articles on the topic "नेपालीमा रामकथा"

1

द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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2

चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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3

राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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4

पाण्ड ेय, ऋषिराज. "रायप ुर जिल े म ें जन च ेतना का विकास". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 50–53. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20198.

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Abstract:
भारत म ें अ ंग ्रेजा ें क े विरूद्ध स्वत ंत्रता स ंग ्राम क े रूप म ें सन ् 1857 म ें सव र्प ्रथम प ्रबल क्रा ंति ह ुइ र्। छत्तीसगढ ़ अ ंचल क े रायप ुर जिल े क े सा ेनाखान जमीदारा ें क े जमी ंदार नारायण सि ंह द्वारा क्रा ंति का बिग ुल फ ूंका गया, उनकी फा ंसी क े बाद स ैन्य विद ्रा ेह का न ेतष्त्व हन ुमान सि ंह द्वारा किया गया। सन ् 1885 म ें का ंग ्रेस की स्थापना ह ुइ र्, अ ंचल म ें राष्ट ्रीय च ेतना क े विकास म ें इसका भरप ूर या ेगदान रहा। साथ ही आय र् समाज, मालिनी रीडस र् क्लब, छत्तीसगढ ़ बाल समाज, कवि समाज की स्थापना जनच ेतना क े विकास की दष्ष्टि स े उल्ल ेखनीय ह ै। प ं. स ुन्दरलाल शमा र् न
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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6

डा, ॅ. स्मिता खानवलकर. "भारतीय फिल्म संगीत म ें रसानुक ूल रंग-स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889265.

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Abstract:
मानव-सभ्यता क े साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ। चा ैसठ कलाओं में संगीत-कला, चित्र-कला आ ैर काव्य-कला विषेष महत्व रखती हैं। इनमें भी संगीत-कला अधिक प ्रभाव डालने वाली कला है। मनुष्य के हृदय में सुप्त भावा ें को जागृत करने में संगीत जितना सक्षम ह ै, उतनी आ ैर कोई विद्या नहीं। जो भाव चित्र क े माध्यम से व्यक्त नहीं किये जा सकते, उन्ह ें काव्य या भाषा क े माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता ह ैं आ ैर जिन भावों का े व्यक्त करने में भाषा भी असमर्थ रहती ह ै, उन्ह ें संगीत सहज ही व्यक्त कर देता ह ै।।शाॅप ेन हाॅवर का कहना है - ’’क ेवल संगीत ही ऐसी कला है, जो श्रोताआ ें से सीधा संबंध रखती ह ै। इसे किसी भी माध्
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7

मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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आलोक, गोयल किरण बड े़रिया राकेश कवच े. "विकास के लिए पर्या वरण क े क्षेत्र म ें मनुष्य की नैतिक भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574866.

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Abstract:
मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्त ुलन विकास मार्ग का सन्त ुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्त ुलन व्यक्ति ही नहीं समूच े समाज और मानव स ंसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण ह ै। स ुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मन ुष्य प्रक ृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रक ृति से उसका रिष्ता अहिंसक आ ैर आत्मीयता का था। स्वार्थ आ ैर भोग संस्क ृति के कारण अब यह न क ेवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’ मन ुष्य क े अन ैतिक आचरण से जहां पर्यावरण सहित लगभग सभी क्षेत्रों मंे पतन हुआ ह ै वहीं अच्छ े आचरण और सामाजिक स्वीकृति से किया जान े वाले व
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डा, ॅ. पि ्रयंका व. ैद्य. "न ृत्यकला में र ंगा ें का समन्वय". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889278.

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Abstract:
सृष्टि में सभी पदार्थ चर, अचर, प ्रकृति पा ैध े, पुष्प सभी रंगा ें से सराबोर ह ैं। यह सारी सृष्टि रंगा ें में डूबी र्ह ुइ है। प्रत्येक वस्तु का अपना अलग रंग ह ै। हर फूल, पा ैधा पल्लवित होने से लेकर मुरझााने तक र्कइ रंग व आकार में दिखाई देता ह ै। हर वस्तु का स्वरूप, रंग व आकार हमें रंगा ें का हमारे जीवन में महत्व को दर्षा ता ह ै। कहते ह ै ं ”नृत्यमयं जगत्“ अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् नृत्यमय ह ै। इस प ्रकृति व रंगा ें से मनुष्य ने अपना जीवन को संवारा व इसके माध्यम से अपनी मना ेभावनायें व्यक्त की। पंछी से उड़ता, नाचता व गाना सीखा तो प्रकृति के रंगा ें से स्वयं का े सवांरना सीखा। कहते ह ैं एक पेड़ ज
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डाॅं, सीमा शर्मा एम. एल. बी. का ॅलेज इन्दौर. "चित्रकला म ें र ंग (विशेष स ंदर्भ अजन्ता)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890545.

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Abstract:
मानव जीवन में रंग का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वस्तु र्कोइ न का ेई रंग लिए ह ै। वस्तुआ ें के धरातल मे रंग हा ेने के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती ह ै। धरातला ें पर प ्रकाश की मात्रा कम अथवा अधिक हा ेने से एक ही रंग की वस्तुयें अलग-अलग दिर्खाइ देती ह ैं। एक ही वस्तु बन्द कमरे में, धूप में तथा विभन्न ऋतुओं में अथवा विभिन्न स्थाना ें पर प ्रकाश की मात्रा तथा वातावरण के कारण रंग व्यवस्था की एक रंगत हा ेते ह ुये भी भिन्न दिखाई देगी। रंगा ें के प ्रति मानव का आकर्ष क कभी नहीं घटा ह ै क्या ेंकि रंग आकर्षक का एक माध्यम ह ै। इसलिये ता े आदिवासियों से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य के विकास में रं
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