Academic literature on the topic 'बिखोदी'

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Journal articles on the topic "बिखोदी"

1

डॉ., मीनाक्षी राणा. "लोक कलाओं के संदर्भ में उत्तराखंड के मुखौटा नृत्य". Siddhanta's International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities 2, № 5 (2025): 51–61. https://doi.org/10.5281/zenodo.15493967.

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Abstract:
‘उत्तराखंड’ ‘देवभूमि’ के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है ‘देवताओं की भूमि’। हिमालय क्षेत्र की वह भूमि जहां देवताओं ने निवास किया, ऋषि-मुनियों ने तप किया, देव नदी गंगा का इस भूमि में अवतरण हुआ, शुद्ध व शांत प्रकृति जो पग-पग में अपना सौन्दर्य बिखेरे दिखाई देती है,  अटल समाधिस्थ पर्वत जो विश्व शांति एवं विश्व कल्याण हेतु तपरत प्रतीत होते  हैं।  स्वाभाविक ही है कि उस भूमि के निवासी भी प्रकृति सदृश  सरल व शांत चित्त होंगे। यह स्वाभाविक सी बात  है कि किसी शांत, निर्जन  क्षेत्र में व्यक्ति जब अपने निकट किसी अन्य को अपनी व्यथा-कथा&nbs
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2

Nayak, Senapati, Sambit Kumar Padhi, and Rajeshvari Garg. "Social media in the digital age : Transformatively shaping society and culture." GYANVIVIDHA 02, no. 01 (2025): 05–11. https://doi.org/10.71037/gyanvividha.v2i1.09.

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Abstract:
आज के डिजिटल युग में संचार का माध्यम बहुत ही प्रभावी हो गया है। निश्चित रूप से यह डिजिटल मीडिया आज के युग के लिए एक सशक्त एवं परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभरा है। जिसके कारण न केवल समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, बल्कि समाज तेजी से वैज्ञानिक तर्क के साथ अपनी एक नई परिभाषा गढ़ रहा है। लेकिन समाज का यह बदलता स्वरूप एक ओर उन्नत एवं कल्याणकारी है, वहीं दूसरी ओर यह ऐसे मार्ग की ओर अग्रसर है, जहां समाज पूर्ण रूप से बंधन मुक्त हो जाएगा। कोई बंधन एवं आधार नहीं होगा। जिसके कारण मानव समाज विकृति की ओर अग्रसर हो सकता है। इसलिए डिजिटल तकनीक के माध्यम से समाज एवं बिखरती संस्कृति को ऐसा आकार देना हो
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3

सोनाली, बुधौलिया. "बुंदेली भाषा का इतिहास एवं उसकी साहित्यिक विकास यात्रा". International Educational Applied Research Journal 09, № 03 (2025): 21–26. https://doi.org/10.5281/zenodo.15041324.

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Abstract:
बोली का सीधा सम्बन्ध जनता से जुड़ा है, और लोक में बिखरा है, इसी से बोली की ध्वनि प्रकृति, बोली की रूप रतला प्रकृति और बोली की भाव प्रकृति बास्तविकता के अत्यन्त समीप है। लोक के अनुभव सहज होते हैं, सरलता से उपजते हैं और सांस्कृतिक समता में फलते फूलते हैं। लोक के अनुभवों की यह सम्पदा हर स्तर पर बिखरी रहती है। लोकालुभव भाषा को जीवन्तता प्रदान करते हैं, यह जीवन्तता बोली में सर्वत्र मिल जाती है। बुन्देलखण्ड का लोक जीवन सरलता के साथ समता और सहयोग पर आधारित है। बोली इसी समता और सहयोग को एक से दूसरे तक ले जाती है, पुलक को प्राणवान बनाती है, मुदिता को संदेह कर देती है, करुणा के आंगल में आंसू हो जाती है,
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Chouhan, Bindu. "Kirtilata ka punarpath." HARIDRA 1, no. 04 (2020): 07–12. http://dx.doi.org/10.54903/haridra.v1i04.7760.

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Abstract:
भारतीय वाङ्ग्मय में राजप्रशस्ति काव्यों की अविछिन्न परंपरा रही है। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में पाणिनी के ‘पातालविजय’ और ‘जम्बावतीविजय’ से लेकर वामन, उदभट्ट, धनंजय के ‘दसरूपक’ से होते हुए तेरहवी शताब्दी में विद्याधर, सत्रहवी शताब्दी में पंडित जगन्नाथ कृत ‘रसगंगाधर’ तक अपने आश्रयदाता की प्रशस्ति में रचित काव्यों की समृद्ध परंपरा मौजूद है। भारतवर्ष में राजप्रशस्ति काव्य की परंपरा और उसकी निर्मिति के कारकों की पड़ताल शोध का दिलचस्प विषय रहा है। आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी ने आदिकालीन साहित्य की सामग्रियों के परिरक्षण में जिन तीन सूत्रों का उल्लेख किया उनमे ‘राजाश्रय’ को सबसे प्रबल और प्रमुख कारक माना
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डा, ॅ. ईश्वर चन्द गुप्ता. "''रंगा ें की अभिव्यक्ति वाराणसी के भित्ति चित्रा ें म ें''". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889221.

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Abstract:
रंग चित्र की आत्मा ह ै, रंगा ें क े प ्रति मनुष्य आसक्ति आदिम समय से ही रहा ह ै। भारतीय सभ्यता एव ं संस्कृति में रंगा ें का प ्रचलन बहुत पुराना ह ै रंग हमारे जीवन के साथी, ये हमारे सुखों को इंगित करते ह ैं। सामाजिक उत्सवा ंे-पर्वों पर इनकी छठा चारों ओर बिखरी होती ह ै। शुभ कार्य हो या अतिथि आगमन पर प ्रवेश द्वार पर रंगा ेली बर्नाइ जाती है रंग हमारे जीवन में ख ुशी एवं ऊर्जा भर देते ह ै ं भारतीय आध्यात्म भी विभिन्न रंगा ें से सराबा ेर ह ै। सृष्टि में अनेक रंग मौज ूद ह ै ं भारतीय रंग मना ेविज्ञान का आधार प ्रकृति है प ्रकृति में अनेक रंगा ें को आकाश में देखते ह ै ं जिनमें से कुछ विरा ेधी प ्रकृति
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Gupta, Ishwar Chand. ""THE EXPRESSION OF COLORS IN THE MURALS OF VARANASI"." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 2, no. 3SE (2014): 1–3. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v2.i3se.2014.3591.

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Abstract:
Color is the soul of the picture, human attachment to colors has been there since time immemorial. The prevalence of colors is very old in Indian civilization and culture. Colors indicate our happiness in life, our companions. Their sixth is scattered around on social festivals. Rangoli is made at the entrance on the occasion of auspicious work or guest arrival. Colors fill our life with happiness and energy. Indian spirituality is also drenched with different colors. Many colors are present in the universe. The basis of Indian color psychology is nature. In nature, we see many colors in the s
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7

सरिता श्रीवास्तव та डॉ मंजू श्रीवास्तव. "लोकधर्मी जनकवि श्री रामस्वरूप लाल ‘मंगल’ के द्वारा रचे गए गीतों का विश्लेषण एवं मूल्यांकन". International Journal of Advanced Research in Science, Communication and Technology, 6 серпня 2023, 157–64. http://dx.doi.org/10.48175/ijarsct-12425.

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Abstract:
लोक साहित्य लोक में सर्वदा से समृद्धि रहा है। इसकी भूरि भूरि प्रशंसा चत्र-यत्र ही नहीं, भोजपुरी इतिहास समाज में सभी जगह प्रतिस्थापित है। इसके बड़े-बड़े उच्च रचनाकार लेखक हुए जिनकी धवल कीर्ति देश के इतिहास पटल पर अंकित है। उनकी यश पलाका अम्बर में बहुत दिनों से और आज भी छाई हुई है। सम्भवतः उनका नाम उनका यश सर्वदा इस धरती पर विद्यमान रहेगा। उन्हीं रचनाकारों में एक नाम है लोकधर्मी कवि श्री रामस्वरूप लाल ‘मंगल’ का जो सुकवि ही नहीं, सच्चे सन्त, एवं लोक विधाओं के पथ-प्रदर्शक रहे। इनकी रचनाएँ साधारण से उच्चकोटि तक हुई। उसमें इन्होंने जो भाव शब्दों का समावेश अलंकार छन्द आदि जो सजाया है, वह देश के लोक साह
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Jain, Lokesh. "उम्र के विविध पड़ावों पर मानसिक तनाव तथा तनाव प्रबंधन की दिशा में गांधीजी का आध्यात्मिक चिंतन एवं व्यवहार". Towards Excellence, 30 червня 2021, 1079–102. http://dx.doi.org/10.37867/te130293.

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Abstract:
भौतिकतावादी चकोचोंध से प्रेरित इस जगत में मानसिक तनाव की समस्या यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देती है। इस तनाव के पीछे मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक एवं आर्थिक कारकों की वैयक्तिक एवं संयोजनीय भूमिका रहती है। इसकी चपेट में गरीब-अमीर, छोटे-बड़े, सबल-निर्बल, शिक्षित-अशिक्षित सभी आ जाते हैं। तनाव जब व्यक्तिगत कारणों से होता है अथवा व्यक्ति विशेष के परिवेश से असरग्रस्त होता है तो उसके समाधान की संभावनाएं अपेक्षाकृत अधिक होती हैं लेकिन जब वह पारिवारिक, समाजिक प्रतिष्ठा के प्रश्नों के दायरे में चकरघिन्नी की तरह घूमता है तब इन बाह्य घटकों व हस्तक्षेप के कारण समाधान की राह उतनी ही जटिल होती चली जाती है। वह व्यक
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