Academic literature on the topic 'आजादी'

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Journal articles on the topic "आजादी"

1

Devendr, Chaubey. "भारतीय राष्ट्रवाद: कुछ ऐतिहासिक संदर्भ". Oriental Renaissance: Innovative, educational, natural and social sciences 2, № 25 (2022): 185–98. https://doi.org/10.5281/zenodo.7393817.

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Abstract:
आजकल भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा हैं। यह देश और भारतीय समाज के लिए एक बड़ा अवसर है, अपने देश को समझने और उसे जानने का। कारण, भारतीय राष्ट्र की पूरी परिकल्पना जिन विचारों पर खड़ी है, उसे निर्मित करने में देश की जनता द्वारा 1764 के बक्सर-युद्ध से 1857 तथा 1857 के संग्राम  से 1947 में देश की आजादी तक उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ किए गए संघर्ष की बड़ी भूमिका रही है; खासकर 1857 से 1947 के बीच। आजादी के अमृत महोत्सव के बहाने इतिहास, लोक स्मृतियों एवं साहित्यिक पाठों में मौजूद स्वाधीनता आंदोलन के उन संदर्भों को समझना एक महत्वपूर्ण कार्य होगा, जिनसे भारतीय राष्ट्रवाद का ढांचा खड़ा ह
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2

चौबे, मिथिलेश कुमार. "नक्सलवाद का उद्भव एवं विकास: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन". Humanities and Development 17, № 1 (2022): 40–42. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i1.38.

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Abstract:
सामाजिक व्यवस्था केे बनाने वालों को इतना भी अन्दाजा नहीं रहा होगा कि उनकी कुचालों से भविष्य में किस तरह की समस्या खड़ी हो सकती है। अगर नक्सलवाद से सम्बन्धित समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि आजादी के साथ देश का बंटवारा होना और आजादी के 20 साल बाद नक्सलवाद हमारी व्यवस्था की ही देन है। यह देश के लिए एक ऐसा नासूर बन गया है जो उसके अस्तित्व के लिए खतरनाक होता जा रहा है। 1967 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के अनाम गांव नक्सलवाड़ी से शुरू हुआ इसका सफर आज अपने लिए नित नई मंजिले तय कर रहा है।
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Vats, Dr Urmil. "आजादी के 75 वर्षः लोकतंत्र की उपलब्धियाँ और चुनौतिया". International Journal of Humanities and Education Research 5, № 1 (2023): 1–3. http://dx.doi.org/10.33545/26649799.2023.v5.i1a.34.

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4

Talekar, Publisher: P. R. "आजादी की लड़ाई में आधुनिक हिंदी साहित्यकारों की भूमिका". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 14 (2024): 91–94. https://doi.org/10.5281/zenodo.11178138.

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Abstract:
<strong>Abstract:</strong> हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु युग (सन् 1850 -1900 ई) आधुनिक कविता का प्रथम चरण था। आधुनिक काल की कविता अनेक चरणों से होकर गुजरती है, जिसमें भारतेंद्र युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता तथा समकालीन कविता आदि चरण प्रमुख हैं। मानव के इतिहास का साहित्य के साथ प्रगाढ़ संबंध है। इतिहास की हर एक घटना, साहित्य को प्रभावित करती है। इसी कारण समाज की परिवेशजन्य स्थितियों का साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान होता है। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में ही भारत में अंग्रेजी विरोधी भावना प्रबल रूप धारण कर चुकी थी। देश
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संतोष, कुमार सिंह. "मानव अधिकार एवं जनजातीय समाज: एक विश्लेषनात्मक अध्ययन". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 10, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 49–57. https://doi.org/10.5281/zenodo.7944553.

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Abstract:
एक राष्ट्र के जीवन लिए आजादी ही मायने नहीं रखती बल्कि उसमें अनवरत रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था का कायम रहना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमने एक राष्ट्र का सपना संजोया था जिसमें भय, भूख, और हर प्रकार के शोषण से मुक्ति मिल सके। दूसरी ओर आज भारत की आजादी के 75 वर्षो से अधिक का समय बीत जाने के पष्चात् भी जनजातीय समाज की अधिकांष आबादी गरीबी, तनाव, शोषण, हिंसा, अलगाव, निरक्षरता, लैंगिक विषमता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन, सामाजिक न्याय पर कुठाराघात, प्रजातीय भेदभाव, अधिकारों की वंचना आदि अनेक समस्याओं के बीच अपना जीवन व्यतीत करने को विवष है। इन सभी समस्याओं का निराकरण मानवाधिकारों की प्राप्ति से ही संभ
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प्रा, .सचिन मधुकर कांबळे. "जयप्रकाश कर्दम की कविताओं में जातीयता : एक अध्ययन". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 6 (2025): 358–61. https://doi.org/10.5281/zenodo.15067360.

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Abstract:
प्राचीन काल से ही वर्णव्यवस्था के द्वारा भारतीय समाजव्यवस्था में जातीयता के बीज बोए गए, जिसका आज विषवृक्ष बना हुआ है। ग्राम्य परिवेश में तो जातिव्यवस्था को अत्याधिक महत्त्व देते हुए उसे सुरक्षित एवं बरकरार रखने की ज&zwnj;द्दोजहद दिखाई देती हैं । जाति का जो पौधा अंकुरित हुआ था इसी कारण हुआछूत के नीति-नियम भी कड़े हो गए हैं। आजादी को प्राप्त करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर, जात-पाँत को भूलकर अत्याचारी अंग्रेज सरकार के खिलाफ भारतीय समाज ने अहिंसात्मक नीति से लड़कर एक नई मिसाल विश्व के सामने रखी थी परंतु वहीं भारतीय समाज बाद में जातीय भेदाभेद की समस्या से क्षतिग्रस्त हो गया दिखाई देता है। हर कोई व
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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 147–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.15544930.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Prof., R. V. Bhole. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15561394.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15600096.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Kumar, Upendra. "आजादी के पशचात सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक परिप्रेक्षय में महिला सशक्तिकरण". Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi) 2, № 1 (2017): 1–10. http://dx.doi.org/10.24321/2456.0510.201701.

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More sources

Reports on the topic "आजादी"

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Bhatt, Mihir R., Shilpi Srivastava, Megan Schmidt-Sane та Lyla Mehta. भारत की जानलेवा दूसरी कोविद-19 लहर: प्रभावों का सम्बोधन और भविष्य की लहरों के खिलाफ मुस्तैदी - एक चिंतन ! Institute of Development Studies (IDS), 2021. http://dx.doi.org/10.19088/sshap.2022.008.

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Abstract:
भारत में फ़रवरी 2021 से अनगिनत जानों की हानि हुई है जिसने कोविड-19 द्वारा हुए सामाजिक और आर्थिक प्रलय को बढ़ा दिया है । देश भर में तीव्र गति से बढ़ते संक्रमित मामलों ने बुनियादी स्वास्थ्य ढाँचे को हिला दिया है, जिससे आम आदमी अस्पताल में बिस्तर, आवश्यक दवाइयों और ऑक्सिजन के लिए हाथ पांव मरने के लिए मजबूर हो गया । मई 2021 तक शहरों में संक्रमण का प्रभाव कम होना शुरू हुआ। हालाँकि गाँवों में दूसरी लहर का प्रकोप जारी है । आज़ादी के बाद देश सबसे बड़ी और बुरी मानवीय तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का साक्षी बना है, जबकि क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर लगातार फैलते हुए कोविड-19 प्रकारों के विविध परिणाम होंगे
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