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Devendr, Chaubey. "भारतीय राष्ट्रवाद: कुछ ऐतिहासिक संदर्भ". Oriental Renaissance: Innovative, educational, natural and social sciences 2, № 25 (2022): 185–98. https://doi.org/10.5281/zenodo.7393817.

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Abstract:
आजकल भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा हैं। यह देश और भारतीय समाज के लिए एक बड़ा अवसर है, अपने देश को समझने और उसे जानने का। कारण, भारतीय राष्ट्र की पूरी परिकल्पना जिन विचारों पर खड़ी है, उसे निर्मित करने में देश की जनता द्वारा 1764 के बक्सर-युद्ध से 1857 तथा 1857 के संग्राम  से 1947 में देश की आजादी तक उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ किए गए संघर्ष की बड़ी भूमिका रही है; खासकर 1857 से 1947 के बीच। आजादी के अमृत महोत्सव के बहाने इतिहास, लोक स्मृतियों एवं साहित्यिक पाठों में मौजूद स्वाधीनता आंदोलन के उन संदर्भों को समझना एक महत्वपूर्ण कार्य होगा, जिनसे भारतीय राष्ट्रवाद का ढांचा खड़ा ह
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चौबे, मिथिलेश कुमार. "नक्सलवाद का उद्भव एवं विकास: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन". Humanities and Development 17, № 1 (2022): 40–42. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i1.38.

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Abstract:
सामाजिक व्यवस्था केे बनाने वालों को इतना भी अन्दाजा नहीं रहा होगा कि उनकी कुचालों से भविष्य में किस तरह की समस्या खड़ी हो सकती है। अगर नक्सलवाद से सम्बन्धित समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि आजादी के साथ देश का बंटवारा होना और आजादी के 20 साल बाद नक्सलवाद हमारी व्यवस्था की ही देन है। यह देश के लिए एक ऐसा नासूर बन गया है जो उसके अस्तित्व के लिए खतरनाक होता जा रहा है। 1967 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के अनाम गांव नक्सलवाड़ी से शुरू हुआ इसका सफर आज अपने लिए नित नई मंजिले तय कर रहा है।
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Vats, Dr Urmil. "आजादी के 75 वर्षः लोकतंत्र की उपलब्धियाँ और चुनौतिया". International Journal of Humanities and Education Research 5, № 1 (2023): 1–3. http://dx.doi.org/10.33545/26649799.2023.v5.i1a.34.

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Talekar, Publisher: P. R. "आजादी की लड़ाई में आधुनिक हिंदी साहित्यकारों की भूमिका". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 14 (2024): 91–94. https://doi.org/10.5281/zenodo.11178138.

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Abstract:
<strong>Abstract:</strong> हिन्दी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल का आरंभ भारतेंदु युग से माना जाता है। भारतेंदु युग (सन् 1850 -1900 ई) आधुनिक कविता का प्रथम चरण था। आधुनिक काल की कविता अनेक चरणों से होकर गुजरती है, जिसमें भारतेंद्र युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता तथा समकालीन कविता आदि चरण प्रमुख हैं। मानव के इतिहास का साहित्य के साथ प्रगाढ़ संबंध है। इतिहास की हर एक घटना, साहित्य को प्रभावित करती है। इसी कारण समाज की परिवेशजन्य स्थितियों का साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान होता है। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में ही भारत में अंग्रेजी विरोधी भावना प्रबल रूप धारण कर चुकी थी। देश
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संतोष, कुमार सिंह. "मानव अधिकार एवं जनजातीय समाज: एक विश्लेषनात्मक अध्ययन". Recent Researches in Social Sciences & Humanities (ISSN: 2348 – 3318) 10, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 49–57. https://doi.org/10.5281/zenodo.7944553.

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Abstract:
एक राष्ट्र के जीवन लिए आजादी ही मायने नहीं रखती बल्कि उसमें अनवरत रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था का कायम रहना भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमने एक राष्ट्र का सपना संजोया था जिसमें भय, भूख, और हर प्रकार के शोषण से मुक्ति मिल सके। दूसरी ओर आज भारत की आजादी के 75 वर्षो से अधिक का समय बीत जाने के पष्चात् भी जनजातीय समाज की अधिकांष आबादी गरीबी, तनाव, शोषण, हिंसा, अलगाव, निरक्षरता, लैंगिक विषमता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन, सामाजिक न्याय पर कुठाराघात, प्रजातीय भेदभाव, अधिकारों की वंचना आदि अनेक समस्याओं के बीच अपना जीवन व्यतीत करने को विवष है। इन सभी समस्याओं का निराकरण मानवाधिकारों की प्राप्ति से ही संभ
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प्रा, .सचिन मधुकर कांबळे. "जयप्रकाश कर्दम की कविताओं में जातीयता : एक अध्ययन". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 6 (2025): 358–61. https://doi.org/10.5281/zenodo.15067360.

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Abstract:
प्राचीन काल से ही वर्णव्यवस्था के द्वारा भारतीय समाजव्यवस्था में जातीयता के बीज बोए गए, जिसका आज विषवृक्ष बना हुआ है। ग्राम्य परिवेश में तो जातिव्यवस्था को अत्याधिक महत्त्व देते हुए उसे सुरक्षित एवं बरकरार रखने की ज&zwnj;द्दोजहद दिखाई देती हैं । जाति का जो पौधा अंकुरित हुआ था इसी कारण हुआछूत के नीति-नियम भी कड़े हो गए हैं। आजादी को प्राप्त करने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर, जात-पाँत को भूलकर अत्याचारी अंग्रेज सरकार के खिलाफ भारतीय समाज ने अहिंसात्मक नीति से लड़कर एक नई मिसाल विश्व के सामने रखी थी परंतु वहीं भारतीय समाज बाद में जातीय भेदाभेद की समस्या से क्षतिग्रस्त हो गया दिखाई देता है। हर कोई व
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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 147–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.15544930.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Prof., R. V. Bhole. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15561394.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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जयंती. "स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी महिलाओं की भूमिका". Journal of Research & Development 17, № 4 (2025): 157–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.15600096.

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Abstract:
<strong><em>सारांश</em></strong> <em>भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनेक पृष्ठ शहीदों की सूचियों से भरे पड़े हैं। परंतु क्रांति से जुड़े काम करने वालों का नाम किसी सूची में नहीं आता जबकि हकीकत यही है कि &lsquo;क्रांति&rsquo; सभी के सम्मिलित प्रयासों का फल थी। कहते हैं कि महान आत्माएँ कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। ऐसे व्यक्तित्व केवल साधारण रूप से ही जीवन बिता कर संतुष्ट नहीं होते इनके जीवन का प्रत्येक कदम देश व समाज के उत्थान के लिए उठता&nbsp; है और क्रांतिकारी परिवर्तन ले आता है।&nbsp; स्वभाव से ही कोमल समझी जाने वाली नारी जब रण क्षेत्र में उतरी तो अंग्रेज दंग रह गए। देश की आजादी से जुड़ी
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Kumar, Upendra. "आजादी के पशचात सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक परिप्रेक्षय में महिला सशक्तिकरण". Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi) 2, № 1 (2017): 1–10. http://dx.doi.org/10.24321/2456.0510.201701.

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डॉ., अर्चना चंद्रकांत पत्की. "स्वाधीनता आंदोलन और दुष्यंतकुमार का काव्य". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 34–36. https://doi.org/10.5281/zenodo.7695458.

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Abstract:
&lsquo;आजादी, स्वतंत्रता&rsquo; हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हैl चाहे मनुष्य हो या पशुपक्षी उसे छिन ने का किसी को भी अधिकार नहीl हमारे देश को स्वतंत्र करने के लिए कईयौ का बलिदान रहा हैl ब्रिटिश साम्राज्य से 1947 तक की बात करेंगे तो हम देखते है कि हमारा देश गुलामी से जुझता रहा हैl आजादी को लेकर देश मे व्याप्त उथल-पुथल को हिंदी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर &nbsp;साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वाहन कर साहित्य को नई दिशा दी हैl हिंदी कवियों ने अपने कविता के माध्यम से स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिये &nbsp;राष्ट्रीय चेतना का आधार बनायाl स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभ से लेकर स्वतंत्रता &nb
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कुमारी, करुणा. "भारत-पाकिस्तान संबंध : आजादी के 75 वर्ष बाद भी प्रतिस्पर्धा एवं वैमनस्यता". International Journal of Sociology and Humanities 6, № 1 (2024): 19–26. http://dx.doi.org/10.33545/26648679.2024.v6.i1a.69.

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गौरव, बिहार, та डॉ दलजीत स िंह. "भारत में आजादी के बाद से वर्तमान तक की जनसांख्यकीय परिवर्तनों की प्रवृत्तियों का अध्ययन". INTERNATIONAL JOURNAL OF SCIENTIFIC RESEARCH IN ENGINEERING AND MANAGEMENT 08, № 02 (2024): 1–7. https://doi.org/10.55041/ijsrem28765.

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Abstract:
यह शोध पत्र भारत में 1947 े 2021 तक की जन ािंख्यकीय पररवततनों का ववश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में जन िंख्या वद्ृधध (36 करोड़ े136 करोड़), आयु िंरचना मेंपररवततन, सलगिं ानुपात (946 े1020), शहरीकरण (17 े 35%), प्रजनन दर (6.0 े2.0) और जीवन प्रत्याशा (32 े70 वषत) मेंआए पररवततनों का ववस्ततृ ववश्लेषण ककया गया है। अध्ययन क्षेत्रीय अ मानताओिं और भववष्य की चुनौततयों पर भी प्रकाश डालता है। मुख्य शब्द: जन िंख्या वद्ृधध, आयु िंरचना, सलगिं ानुपात, शहरीकरण, प्रजनन दर, जीवन प्रत्याशा
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शर्मा, अभिषेक, та अन्नू शर्मा. "समावेशी वर्ग में शिक्षा समता और समानता भीमराव रामजी अंबेडकर का दृष्टिकोण". Shodh Sari-An International Multidisciplinary Journal 02, № 03 (2023): 350–57. http://dx.doi.org/10.59231/sari7611.

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Abstract:
डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का समावेशी वर्ग में शिक्षा, समता और समानता का दर्शन भारत के सामाजिक आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के दशकों में हम विभिन्न विधानों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पहुंच और समानता के मुद्दों में व्यस्त रहे हैं इन में अम्बेडकर ने शिक्षा, शैक्षिक संस्थान, जाति, धर्म, स्त्री आदि मामलों पर प्रकाश डाला । अंबेडकर का मानना हैं की समता और समानता यह हर इंसान की जरूरत ही नहीं यह सभी का अधिकार है । जो खुलकर और बेबाकी से बाबा साहब (बी. आर. अम्बेडकर ने समाज को बताया। बी. आर. अम्बेडकर ने समाज के उन सभी वर्गों को समावेशी कहा, जिनका समाज के अन्य वर्गों द्वारा क
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., आलोक. "ग्रामीण महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति तथा ई0-प्रशासन". Humanities and Development 18, № 02 (2024): 70–78. https://doi.org/10.61410/had.v18i2.147.

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Abstract:
स्वस्थ नागरिक समाज तथा राष्ट्र की निधि है। यह बात स्त्री तथा पुरुष दाने ां के लिए समान रूप सेलागू होती है। व्यक्ति की अस्वस्थता का प्रभाव उसकी कार्य क्षमता पर पड़ता है, जिसका सीधा संबंधसंपूर्ण राष्ट्र एवं समाज के विकास में अवरोध से है। समाज की सबसे छोटी संगठित एव ं पहिचान कीजाने वाली इकाई परिवार है। किसी भी परिवार की धुरी महिला होती है और उसके स्वास्थ्य स्थिति कासीधा प्रभाव परिवार के सदस्यों पर पड़ता है। यदि घर की महिला स्वस्थ है, तो परिवार के प्रत्येकसदस्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ महिला स्वस्थ संतान को जन्म देकर स्वस्थ औरखुशहाल भावी पीढ़ी का निमार्ण् ा करती है। समाज में दोयम दर्जा प्र
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मीणा, गीता. "कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों के प्रति असमानता की स्थिति का अ/ययन". International Journal of Education, Modern Management, Applied Science & Social Science 07, № 01(II) (2025): 86–90. https://doi.org/10.62823/ijemmasss/7.1(ii).7266.

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Abstract:
महिलाऐं प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक एवं आर्थिक गतिविधियों में अपनी भागीदारी रखती है जैसे घर के घरेलू कार्य करना कृषि में कृषि कार्यों में योगदान देकर फसल को अच्छा बनाकर आय बढ़ाने में मदद करना। अल्फा मिर्डज तथा वयोला क्लयान (1875) ने अपनी किताब वीमेन टु रोल्स में लिखा है कि समाज में कार्य का विवरण लैंगिक आधार पर हुआ है, भारत देश में पुरुष प्रधान समाज में पुरुष अपने अहं सम्मान एवं महिलाओं की उन्नति के कारण पुरुष महिलाओं को शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार बनाते रहे है। पुरुष महिलाओं को अपनी जड़श्वरदि गुलाम बनाये रखना चाहता है। महिलाओं की आजादी उसके पुरुषवादी अहं को चुनौती देती है।
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डॉ., सीताराम सिंह तोमर. "भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण के प्रभाव". International Educational Applied Research Journal 08, № 05 (2024): 46–53. https://doi.org/10.5281/zenodo.14467703.

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Abstract:
भारतीय अर्थव्यवस्था मूलतः एक अन्य विकसित अर्थव्यवस्था है। आजादी मिलने के बाद 1951 से आयोजन को सहारे यह विकास कार्य में संलग्न है। अतीत की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था इस दौरान विकास की द्विशा में निःसंदेह आगे बढ़ी हैं लेकिन इस विकास के बावजूद जनसाधारण की गरीबी और बेरोजगारी पर विशेष प्रभाव नहीं पढ़ पाया है। उनका जीवन स्तर अभी भी बहुत नीशा और असंतोषजनक है। अतः विकास कार्य का संचालन इस ढंग से किया जाना चाहिए, जहाँ एक ओर विकास की गति तेज हो सके, वहीं दूसरी ओर देश के जनसाधारण को सामाजिक न्याय उपलब्ध हो और उनका जीवन स्तर सही अर्थ में ऊपर उठ सयो।
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Poonam and Tripuresh Tripathi. "Azizan Bai's Contribution to the Freedom Struggle: With Special Reference to Kanpur." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 10, no. 4 (2025): 225–29. https://doi.org/10.31305/rrijm.2025.v10.n4.024.

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Abstract:
The period of 1857 holds great significance in the pages of India’s freedom struggle, when the spark of revolution erupted into a blazing fire against the British. Many prominent names such as Nana Sahib, Tatya Tope, Tikait Singh, and Azimullah Khan became the heroes of that uprising. The British trembled at the mere mention of their names. Yet, there was another name that illuminated the path of freedom by holding high the torch of revolution—Azizan Bai. Known for her skills in singing and dancing, Azizan Bai was no ordinary entertainer. When the call of the nation came, she cast aside her an
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Pramod, Ranjan. "भय की महामारी". Gandhi Marg (गांधी मार्ग) 63, № 1 (2021): 40–52. https://doi.org/10.5281/zenodo.6574571.

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Abstract:
इस आलेख में&nbsp;बताया गया है कि कोविड एक महामारी अवश्य है, लेकिन इसका भय वास्तविकता की तुलना में अनुपातहीन है। इस भय की बहुत बड़ी कीमत भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों को उठानी पड़ रही है। पिछली कुछ सदियों में मानव-सभ्यता ने आजादी, बंधुत्व, लोकतंत्र आदि जिन मूल्यों को सृजन किया था, वह कम से कम तीसरी दुनिया के देशों में खतरे है। हालत लगातार बदतर होते जा रहे हैं। अनेकानेक अध्ययन बता रहे हैं कि कोविड से कई गुना अधिक लोगों की मौत भुखमरी, बदहाली व अन्य बीमारियों का उचित इलाज नहीं मिलने के कारण हो रही है तथा आने वाले समय में इनमें और इज़ाफा होगा। &nbsp;
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नीलिमा, श्रीवास्तव. "21 वी सदी के हिंदी फिल्मी गीतों में राष्ट्रीय भावना". International Journal of Advance and Applied Research 10, № 1 (2022): 1051 to 1060. https://doi.org/10.5281/zenodo.7314952.

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Abstract:
<em>इस शोध में वर्ष </em><em>2000 के बाद की हिंदी फिल्मों के देशभक्ति गीतों को समाविष्ट करके उन में राष्ट्रीय भावना के विभिन्न रूपों का विश्लेषण किया गया है। देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की भावना<strong>, </strong>शहीदों के प्रति सम्मान की भावना<strong>, </strong>देश की प्रगति पर उत्साहित देशवासी<strong>, </strong>देश के प्रति अभिमान<strong>, </strong>राष्ट्रीय एकता व भाईचारे की भावना<strong>, </strong>शत्रु पर विजय की आकांक्षा<strong>, </strong>देश की विविधता का सजीव चित्रण<strong>, </strong>देश और समाज की खुशहाली और सुरक्षा की कामना तथा आजादी के सात दशक उपरांत हमने क्या खोया क्या पा
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डॉ., वैशाली बोदेले. "अण्णाभाऊ साठे यांच्या कलाकृतीतून, तसेच लोकनाट्य होणारा जनप्रबोधन". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 31 (2023): 38–40. https://doi.org/10.5281/zenodo.8365682.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना:-</strong> साहित्य रत्न, लोकशाहिर, साहित्य सम्राट, कथाकार, कादंबरीकार, पटकथाकार, नाटककार श्रमिक, कष्टकरी यांच्यासाठी निष्ठेने कार्य करणारे झुंजार नेते आणि विचारवंत म्हणून अण्णा भाऊ यांची ख्याती सर्वदूर पोचलेली आहे. ज्या मुंबई शहराने त्यांच्या पोटाचा प्रश्न सोडविला, त्या मुंबईसाठी अण्णा भाऊ क्रांतिकारक झाले. &lsquo;यह आजादी झुठी है, देश की जनता भुखी है । ही घोषणा करण्याचे सामर्थ्य अण्णाभाऊ साठे यांच्या मनगटात होते. समाजानिष्ठ कार्यकता म्हणून ते पूढे आले आहेत, चळवळीचे प्रवक्ता म्हणून पूढे आले. अण्णाभाऊ साठे यांच्या विचारांची गरज समाजातील सर्व स्तरावर महत्वाची आहे. त्यांच्या सा
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प्रा.डॉ.संग्राम, सोपानराव गायकवाड. "नाटककार सुरेन्द्र वर्मा: एक अनुशीलन". Journal of Research & Development' 14, № 8 (2022): 116–19. https://doi.org/10.5281/zenodo.6988668.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना: </strong>सुरेन्द्र वर्मा का रचना कर्म और रचना-प्रकृति साठोत्तरी हिन्दी नाटक आन्दोलन के बीच निर्मित और संगठित हुआ। यद्यपि एक साहित्यकार के रूप में अन्य विधाओं में सशक्त और प्रामाणिक अभिव्यक्ति दी है, लेकिन नाटक के प्रति उनकी देन और दिलचस्पी का पता हमें उनके चर्चित नाटकों से मिलता है। दो प्रमुख घटनाएँ स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य के विचारकों को गहराई के साथ सोचने को विवश किया। इस तरह से कहे तो उनसे प्रेरित विषय वस्तु सर्जन के केन्द्र में आयी। पहली घटना है द्वितीय विश्वयुद्ध की विध्वंसक ऐतिहासिक घटना और दूसरी प्रमुख घटना है सन् 1947 में ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में देश की आजाद
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अनिता, कुमारी. "२१वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में चित्रित हाशिए का समाज (किन्नर)". International Journal of Humanities, Social Science, Business Management & Commerce 08, № 01 (2024): 54–60. https://doi.org/10.5281/zenodo.10477201.

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Abstract:
वर्तमान समय में बौद्धिक एवं जारूक लोगों की दृष्टि हाशियाकृत समुदायों पर पड़ी, जिसमें घुमंतू, दिव्यांग, वृद्ध, अल्पसंख्यक, दलित, बालमजदूर, आदिवासी, स्त्री इत्यादि के साथ-साथ किन्नर समुदाय भी उभरकर सामने आया। सम्पूर्ण सामाजिक ताना-बाना केवल दो वर्गों से गुँथा दिखाई देता है - स्त्री एवं पुरुष। लेकिन इनके साथ ही किन्नर वर्ग के अस्तित्व को भी नकारा नहीं जा सकता। यह वर्ग मानव समाज का अंग होते हुए भी समाज की मुख्यधारा से आज भी वंचित है। इसे अलग-अलग क्षेत्र में कई नामों से पुकारा जाता है, जैसे - किन्नर, वृहन्नला, हिजड़ा, छक्का, पावैया, खुसरों, जनखा, युनक, नपुसंक, थर्ड जेंडर, तृतीयलिंगी इत्यादि। एक ओर
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गौतम, बाबूलाल, та डॉ रामसमुझ सिंह. "गरीबी उन्मूलन में मनरेगा का योगदान". Humanities and Development 18, № 1 (2018): 125–27. http://dx.doi.org/10.61410/had.v18i1.127.

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Abstract:
आजादी के बाद भारत में काफी बड़े पैमाने पर आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा काफी दिनों तक भारत गरीबी से जूझता रहा क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर जनसंख्या के आधार पर ऐसा कोई आर्थिक सुधार के लिए कल, कारखाने, उद्योग केन्द्र, कृषी क्षेत्र में आधुनिक तकनीकी ना थी, और ‛ शिक्षा, सामाजिकता, राजनीति आदि क्षेत्र विकास के क्षेत्र में जूझता रहा। भारत की गरीब जनता का जीवन बड़ी कठिनाइयों से जूझता रहा, कोई ऐसी ठोस व्यवस्था नही था कि यहां की गरीब जनता को स्थाई रूप में या गारन्टी के तौर पर रोजगार मुहैया करा सके। भारत के गरीब मजदूरों के लिए वही दैनिक मजदूरी पर जीवन कठिनाईयों के साथ जैसे-तैसे गुजारने के लिए मजबूर थे।
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Dr., Madhukar Vithoba Jadhav. "भारतीय राष्ट्रध्वजाचा इतिहास". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 5 (2022): 55–58. https://doi.org/10.5281/zenodo.7397491.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना:</strong> भारताला स्वातंत्र्य मिळून या वर्षी ७५ वर्ष पूर्ण होतआहेत. त्या निमित्ताने होणा-या सोहळ्याला &lsquo;आजादी का अमृत महोत्सव&rsquo; असे नाव दिले आहे. या प्रसंगी भारत सरकारने &lsquo;हर घर तिरंगा&rsquo; या मोहिमेची सुरुवात केली आहे.या अभियाना अंतर्गत १३ ते १५ ऑगस्ट या दरम्यान पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी प्रत्येक घरावर तिरंगा फडकवण्याचे आवाहन केले आहे.राष्ट्राभिमानाचे प्रतिक म्हणजे भारताचा राष्ट्रध्वज होय. भारताचा राष्ट्रध्वज भारतीय लोकांच्या आशा आणि आकांक्षांचे प्रतिनिधित्व करतो. राष्ट्रध्वज हा त्या देशाची ओळख असते. यशाचे, मानाचे व आदर्शाचे चिन्ह म्हणून ध्वजाचा वापर अगद
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भारती, मनीष. "कृषि और ग्रामीण-अर्थव्यवस्था को क्षमतावान बनाना: आम का उत्पादन एंव विपणन में आजादी से अमृत काल तक". International Journal of Multidisciplinary Trends 6, № 10 (2024): 05–08. http://dx.doi.org/10.22271/multi.2024.v6.i10a.485.

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ओझा, डॉ. अजय कुमार. "भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी". International Journal of Advance and Applied Research 5, № 44 (2024): 226–29. https://doi.org/10.5281/zenodo.14711465.

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Abstract:
<strong>सारांश</strong><strong>:-</strong> आधुनिक भारतीय राजनीति में कई ऐसी महिलाएं रही है, जिनकी ऐतिहासिक भूमिका से हम भलीभांति परिचित है। स्वतंत्रता के आंदोलों के दौरान से लेकर आजाद भारत में सरकार चलाने तक में महिलाओं की राजनीतिक भूमिका और पहल अहम रही है। बावजूद इसके जब राजनीति में महिला भागीदारी की बात आती है तो आंकड़े बेहद निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं। प्रत्यक्ष (एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की भागीदारी) और अप्रत्यक्ष (बोटर्स के रूप में भागीदारी) दोनों स्तर पर ही भारी गैर-बराबरी से हमारा मुठभेड होता है। विश्वस्तर पर अगर भारत की एक्टिव पॉलिटिक्स में महिलाओं की स्थिति की बात करें तो भारत 19
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डॉ, विनय कुमार गुप्ता. "भारतीय स्वत्रंत्रता आन्दोलन में झारखंड का योगदान". 'Journal of Research & Development' 15, № 8 (2023): 55–62. https://doi.org/10.5281/zenodo.7812897.

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Abstract:
स्वतंत्र भारत में पहली बार राजनीतिक क्षेत्र में अमृत महोत्सव की अवधारणा एवं उसका क्रियान्वयन का प्रारंभ भारतीय आजादी के 75 वर्ष पूर्ण (15 अगस्त, 2022) होने के 75 सप्ताह पूर्व 12 मार्च 2021 को नमक सत्याग्रह के 91 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गांधी जी की कर्मस्थली साबरमती आश्रम से&nbsp; प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किया गया | प्रधानमंत्री ने दांडी मार्च को हरी झंडी दिखाई और इस&nbsp; अवसर पर कहा कि&nbsp; - आज भारत की उपलब्धियां सिर्फ हमारी नहीं है बल्कि पूरी दुनिया को रोशनी दिखाने वाली है | कोरोना काल में जब पूरा विश्व स्वास्थ्य संकट काल से गुजर रहा था उस समय भारत मानवता को महामारी के स
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सिंह, सुखनन्दन. "जीवन मूल्यों का संकट एवं आध्यात्मिक पत्रकारिता". Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal 1 (16 липня 2019): 65–70. http://dx.doi.org/10.36018/dsiij.v1i.11.

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Abstract:
आज हम मूल्य संकट के विषम दौर से गुजर रहे हैं। जीवन एवं समाज का हर क्षेत्र नैतिक पतन एवं मूल्यों के अवमूल्यन की गिरफ्त में है। लोकतंत्र का हर स्तम्भ लड़खड़ा रहा है। इस मूल्य संकट के समाधान के रुप में कई विकल्प प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हमारे विचार में समस्त मूल्यों का स्रोत अध्यात्म है और इसके साथ पत्रकारिता को जोड़ा जाए तो आध्यात्मिक पत्रकारिता का वह स्वरुप उभर कर आता है जो वर्तमान वैचारिक प्रदूषण से भरे मूल्य संकट का एक प्रभावी समाधान हो सकता है। आजादी के दौर में भारतीय पत्रकारिता ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। इसमें आध्यात्मिक दृष्टि एवं उच्च मूल्यों से युक्त आदर्शनिष्ठ पत्रकार सक्रिय थे। तिलक, श्
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डॉक्टर बबीता та आजाद सिंह. "स्वच्छ भारत अभियान की चुनौतियां और संभावनाएं एक अध्ययन". International Journal for Research Publication and Seminar 15, № 2 (2024): 164–67. http://dx.doi.org/10.36676/jrps.v15.i2.21.

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Abstract:
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किए गए स्वच्छ भारत अभियान को तीन साल पूरे हो गए हैं। स्वच्छता का यह अभियान इन 70 सालों में भारत सरकार का देश में सफाई और उसे खुले में शौच से मुक्त करने का कोई पहला कदम हो ऐसा नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारे गांवों में स्वच्छता के लिए कोई न कोई कार्यक्रम चलाती रही है। इस दिशा में ठोस कदम 1999 में सरकार ने उठाया था एवं समग्र स्वच्छता के उद्देश्य से निर्मल भारत अभियान की शुरुआत की गई, जिसका नाम संपूर्ण स्वच्छता अभियान रखा गया था। किन्तु आजादी के इतने वर्षो बाद भी हमारे देश में स्वछता को लेकर लोग जागरूक नहीं है। 2014 में आई सयुंक्त राष्ट्र
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डा, ॅ. नर ेन्द्र कुमार ओझा. "भारत में स ंगीत क े बढ़ते ह ुए कदम". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886970.

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Abstract:
भारत की सभ्यता आ ैर संस्कृति ए ेतिहासिक ह ै। भारत में संगीत विषयक ज्ञान कोई आज का नहीं ह ै, यह बहुत पुराना ह ै। इतिहास में आज भी कई उच्च श्र ेणी क े कलाकार अपना स्थान बना चुके ह ै जैसे- भास्कर बुवा, मियाॅं जान, अब्दुल करीम खाॅ, फ ैयाज खाॅ, ह ैदर खाॅ, वजीर खाॅ, हफीज खाॅ, ओंकारनाथ ठाक ुर आदि। भारतीय कला के विकास में क ेन्द्र आ ैर राज्य सरकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, केन्द्रीय सरकार षिक्षा पात्र विद्यार्थियों का े छात्रव ृत्ति दे रही ह ै। इस प ्रकार से विद्यार्थि यों को प्रोत्साहन मिल रहा ह ै। यह स्पष्ट करते ह ुए कि आजादी की लड़ाई में भारतीय संग्रीत का अपना विषिष्ट स्थान रहा है, संगीत ने ही
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तीर्थ, प्रकाश. "नागरिकता संषोधन अधिनियम एवं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टरः भविष्य के भारतीय नागरिक समाज का आधार". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES (ISSN 2348–3318) 9, № 4 (Oct.-Nov.-Dec. 2022) (2022): 54–58. https://doi.org/10.5281/zenodo.7541172.

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Abstract:
प्राचीन सभ्यताओं की जीवन षैलियों में से एक के रूप में भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना को स्वीकार किया जाता रहा है। ऐतिहासिक तौर पर अनेक आकांक्षी व आक्रमणकारी समूह भारत में आते रहे हैं और यहाँ की धार्मिक सहिष्णुता की सनातनी परम्परा उन्हें अपने में समाहित करती रही है मगर आजादी के पश्चात् पिछले कुछ वर्षों में भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में बिगड़ती जनांकिकीय परिस्थितियों ने भारत की चिंता बढाई है। मौजूदा सरकारां द्वारा इस ओर समाधान हेतु गम्भीर प्रयास किये गये। जिनमें नागरिक संषोधन अधिनियम एवं राष्ट्रीय नागरिकता प्रमुख हैं। जो भारत भविष्य के नागरिक समाज निर्माण का आधार तैयार करेंगें। इन बुनिया
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संयोग, लाल. "बिहार में राजनीतिक दलों का उदय". 'Journal of Research & Development' 15, № 4 (2023): 31–33. https://doi.org/10.5281/zenodo.7694977.

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Abstract:
हमारे देश में बहुदलीय व्यवस्था है, लोकतांत्रिक प्रणाली में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दालों की अहम भूमिका होती है। समाज में विषमताओं के कारण क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ लेकिन राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों में टकराव की स्थिति बनी रही भले ही दोनों ने एक दूसरे का सहयोग लिया हो, इसके बावजूद राष्ट्रीय दलों की प्रतिक्रिया इस रूप में सामने आती रहती है, जो बताती है कि वे क्षेत्रीय दलों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सही नहीं मानते, वैसे तो हमारे देश में ना केवल राष्ट्रीय दल हैं बल्कि क्षेत्रीय और राज्यस्तरीय दलों की संख्या भी अच्छी खासी है। क्षेत्रीय दलों की बात की जाए तो इसका इतिहास भी पुराना है। पंजाब में 1
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रचना, पाल. "1857 की क्रांति में जनपद जालौन (लाई बाई का योगदान)". International Educational Applied Research Journal 08, № 12 (2024): 34–41. https://doi.org/10.5281/zenodo.14587487.

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Abstract:
अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में उठी बगावत की चिंगारी में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजों को धूल चटाने वाली जालौन जिले की पहली महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और अंतिम शासिका महारानी ताईबाई | 1857 की क्रांति को भला कौन भूल सकता है? इस आजादी की जंग में न जाने हमारे कितने क्रांतिवीरों और वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी है। ऐसी ही एक वीरांगना इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जिसे महारानी ताईबाई के नाम से जाना जाता है। महारानी ताईबाई जालौन की प्रथम महिला स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और जालौन राज्य की अंतिम शासिका के तौर पर जानी जाती हैं। महारानी ताईबाई का नाता वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई
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Shalu Parik та Dr. Rajbala. "अमृता प्रीतम के उपन्यासों में नारी विमार्श". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 21, № 2 (2024): 51–52. http://dx.doi.org/10.29070/ha61yd76.

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Abstract:
अमृता प्रीतम को उनकी प्रेम भरी कविताओं, कहानियों और जीवन घटनाओं के लिए साहित्य जगत में प्रसिद्धि प्राप्त हुई है। अमृता प्रीतम का उपन्यास ‘पिंजर‘ नारी विमर्श के समस्त घटकों की प्रस्तुति करता है। यह महिलाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर करने वाला उपन्यास है। अमृता प्रीतम ने महिलाओं के दृष्टिकोण से विभाजन की कहानी गढ़ने की योजना दर्शाई है। अर्थात् पिंजर उपन्यास में विभाजन के दौरान महिलाओं को जो कुछ सहना पड़ा उसका सजीव चित्रण किया है। बहुत ही सशक्त तरीके से अमृता प्रीतम ने अपना तर्क दिया कि विभाजन के दोनों पक्षों पर देश की महिलाओं का उल्लंघन उसी तरह है जैसे विभाजन ने स्वयं राष्ट्र का उल्लंघन किया था।
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रघुबर, प्रसाद सिंह, та (डॉ.) विजय कुमार यादव प्रो. "प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना: एक अध्ययन". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 3 (2022): 76–78. https://doi.org/10.5281/zenodo.7312711.

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Abstract:
<strong>सारांश:-</strong> भारत में कृषि क्षेत्र को सूखे, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण नुकसान के जोखिम का सामना करना पड़ता है और इसलिए किसानों को किसी भी तरह के नुकसान से बचाना और उन्हें अगले फसल के मौसम के लिए अपनी वित्तीय स्थिति बनाए रखने में सक्षम बनाना अनिवार्य है। कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से हैं, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 16 प्रतिशत है और देश के लगभग आधे कर्मचारियों को रोजगार प्रदान करती है। कृषि क्षेत्र के महत्व को समझते हुए, सरकार द्वारा देश में किसानों के हित में आजादी के बाद से विभिन्न योजनाएं शुरू की गई
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Khan, Asma. "Impact of Communalism in Indian Politics: General Overview." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 1 (2024): 86–91. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n1.015.

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Abstract:
Communalism is a tragedy of our history and present life. Communalism has damaged the social and cultural life of India and has dealt a blow to human civilization. This social problem, which has been going on since the pre-independence era, has taken a fierce and monstrous form after independence and has created an obstacle in the path of India's development. While thinking and writing independently on the problem of communalism, it is absolutely necessary and essential to know the background of this problem. Therefore, under the research paper, the researcher has made a proper effort to clari
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पूनम та पूजा. "वीर सावरकर - एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व". RECENT RESEARCHES IN SOCIAL SCIENCES & HUMANITIES 11, № 2 (2024): 73–77. https://doi.org/10.5281/zenodo.13337232.

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Abstract:
वीर सावरकर हमारे देश की आजादी के संघर्ष में एक महान ऐतिहासिक क्रान्तिकारी थे। वह एक महान वक्ता, विद्वान,कवि, लेखक, इतिहासकार, दार्शनिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता थे। ऐसे स्वातन्त्र्यवीर, शौर्य, साहस व राष्ट्र भक्ति के पर्यायवीर सावरकर के विषय में भी कुछ भ्रान्तियाँ फैलाई जाती है, जो बिल्कुल निर्मूल तथा आधारहीन हैं। सावरकर का सम्पूर्णजीवन एक खुली किताब है, उसमें भ्रांति के लिए कुछ है ही नहीं। इंडिया हाउस लन्दन में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्रामकी स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर सावरकर ने अपने ओजस्वी भाषण में प्रमाणों सहित 1857 के संग्राम को गदर नहीं अपितुभारत की स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम सिद्ध किया। स
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Kishor, Kumar Kumar. "ग्रामीण विकास के लिए सहकारी समितियों का सशक्तीकरण (कृषि क्षेत्र के विशेष सन्दर्भ  में)". बहुरि नहीं आवना 26, № 2 (2024): 32–36. https://doi.org/10.5281/zenodo.15408620.

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Abstract:
&nbsp;हमारे देश में सहकारी आन्दोलन का इतिहास काफी पुराना रहा है लेकिन आजादी के 75 वर्ष बीतने के बाद भी अभी इसमें काफी बिखराव दिखाई पड़ता है, ऐसा प्रतीत होता है कि देश में सहकारी आन्दोलन कई हिस्सों में बटा हुआ है। सहकारी समितियां समाज के साझा हितों के लिए निर्मित एक प्रकार की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाली संस्थाएं होती हैं, इनका प्रमुख उद्देश्य अपने समुदाय के सामाजिक-आर्थिक हितों और उनके उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराना है। देखा जाय तो सहकारी समितियों ने ग्रामीण विकास के लिए एक आर्थिक माॅडल विकसित करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसे हम लिज्जत, अमूल, इफ्को जैसी एक सफल सहकारी समिति क
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अजय, कुमार ओझा. "वर्तमान राजनीति में राज्यपाल की विवादास्पद भूमिका". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 22 (2023): 26–29. https://doi.org/10.5281/zenodo.8146298.

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Abstract:
राज्यों में शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए तथा सामाजिक एवं आर्थिक विकास कार्यों को संचालित करने के लिए हमारे संविधान वेताओं ने संसदात्मक शासन व्यवस्था के साथ-साथ एकात्मक शासन व्यवस्था के कुछ गुणों को अपनाया । विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों एवं नीतियों को व्यवहारिक रूप प्रदान करने के लिए कार्यपालिका का गठन किया गया है। हमारे देश के संघीय शासन की भांति भारतीय राज्यों में भी कार्यपालिका के तीन स्वरूप भारतीय संविधान के भाग 6 के अनुच्छेद 153 से 167 में वर्णित है। भारतीय संविधान के अनुसार राज्यपाल राज्य स्तर पर संवैधानिक प्रमुख होता है। कार्यपालिका का प्रमुख होने के नाते वह राज्य के प्रमुख के रूप
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लाड, डॉ. विभा. "'सलाम' कहानी संग्रह : दलितों की पीड़ा, संघर्ष तथा शोषण का दस्तावेज़". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 36 (2023): 208–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.10360607.

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Abstract:
<strong>शोध सार-</strong>अस्सी के दशक में आधुनिक हिंदी साहित्य में दलित विमर्श उभरकर आया।&nbsp;'विमर्श' का अर्थ है अपने अधिकारों के प्रति आवाज उठाना और&nbsp;'दलित' वह वर्ग है जो उपेक्षित सामाजिक जीवन का अनुभव करता है। जिसे मात्र जन्म के आधार पर समाज में तुच्छ जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है। आजादी के बाद दलित शब्द का प्रचलन रहा है। इस जाति को भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है ताकि उनकी स्थिति में सुधार आ सकें। दलित साहित्यकार इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने जीवन के संघर्ष को व्यक्त करते हैं उनमें चेतना निर्माण करने की कोशिश करते हैं। दलित आलोचक कंवल भारती के अनुसार&nbsp;
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Bhole, R.V. "भारतीय संत और स्वतंत्रता आंदोलन". Journal of Research & Development 16, № 6 (2024): 17–19. https://doi.org/10.5281/zenodo.12263438.

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Abstract:
भूमिका :भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रेरक अध्याय है जिसमें हिंदू सन्यासी व मुस्लिम फकीरों ने हथियार उठाएं और दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी इसे भारत में सन्यासी फकीर विद्रोह के रूप में जाना जाता है स्वतंत्रता संग्राम में जिन लाखों साधुओं ने अपने लोकगीतों एवं लोक कथाओं के माध्यम से आजादी की लग जागी राखी भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रमों से हुए विलुप्त हैं भारतीय इतिहास का नॉरेटिव बदलने की आवश्यकता पर जोर दिया गया हैl &nbsp;1947 में किसी नए देश ने जन्म नहीं लिया क्योंकि भारतवर्ष की परिकल्पना प्राचीन काल से ही रही है भारतीय संतों में सबसे प्रमुख स्वामी विवेकानंद हैं जो एक प्रखर चि
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अनुष्टुप, चंसौलिया. "रघुवीर सहाय के काव्य की सामाजिक उपादेयता". International Educational Applied Research Journal 09, № 05 (2025): 9–17. https://doi.org/10.5281/zenodo.15384139.

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Abstract:
रघुवीर सहाय जी ने देखा है कि समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो आधुनिक बनने का ढोंग करते हैं, परन्तु आधुनिक नहीं होते। समाज को सही मार्गदर्शन देने की योग्यता रखने वाले लेखक भी लिखते समय मात्र आधुनिक बने रहते हैं, अन्यथा वे अपनी-अपनी जाति के दायरे में सिमट कर रह जाते हैं- &nbsp;"मधुर यौवन का मधुर अभिशाप मुझको मिल चुका था &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;फूल मुरझाया छिपा काँटा निकलकर चुभ चुका था &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; पुण्य की पहचान लेने, तोड़ बन्धन वासना के &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; जब तुम्हारी शरण आ, सार्थक हुआ था जन्म मेरा &nbsp;&n
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प्रमिला, देवी. "आधुनिक हिंदी कविता और स्त्री-विमर्श". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 6 (2017): 693–95. https://doi.org/10.5281/zenodo.835393.

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Abstract:
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में पुरूषों के साथ-साथ नारी साहित्यकारों ने भी अपनी बहुमूल्य कृतियों से उल्लेखनीय योगदान दिया है । यहाँ अतीत भारत के इतिहास के पृष्ठ भारतीय महिलाओं की विशिष्ट कृतियों से भरे पड़े हैं । उस समय उन्हें पुरूषों के समान शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलता था । कालांतर में समाज में कुप्रथाएँ बढ़ने लगी । देश की आज़ादी के साथ-साथ स्त्रियों की आज़ादी का भी अपहरण हुआ । इसमें उनसे समानता और शिक्षा का अधिकार भी छीन लिया गया । आधुनिक युग में नवजागरण के साथ ही नारियों की शिक्षा दीक्षा शुरू हुई । साहित्य की सभी विधाओं पर नारियों ने कलम चलाई है । आधुनिक कालीन कवियों ने मध्य युग की नारिय
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नीशू, कुमार. "वर्तमान भारतीय शिक्षा पद्धति में नई शिक्षा नीति की प्रासंगिकता रू आत्मनिर्भर भारत के संदर्भ में". Recent Educational & Psychological Researches (ISSN: 2278-5949) 12, № 01 (Jan.-Feb.Mar.) (2023): 83–87. https://doi.org/10.5281/zenodo.7932284.

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Abstract:
मानवीय समाज के विकसित होने की प्रक्रिया सतत रूप से पाषाण कालीन परिस्थितियों से चली आ रही है। जिसमें शिक्षा के आयाम एवं उसके मूल्य लगातार सुधार और बदलाव की परिस्थिति में रहते हैं। भारत में शिक्षा के संदर्भ में लगातार मानवीय आधारों पर बदलाव हुई, क्योंकि हड़प्पा संस्कृति के बाद भारत में वैदिक संस्कृति एवं उत्तर वैदिक संस्कृति ने हजारों वर्षों तक मानवीय समाज को दिशा व दशा दी। जिसके उपरांत भारतीय राजनीतिक सत्ता में विदेशी संस्कृति का आगमन हुआ। जिसके आधार पर इस्लामिक और पश्चिम संस्कृति की शिक्षाओं ने भारतीय शिक्षा में अपनी जगह बनाई। किंतु भारतीय शिक्षा के संदर्भ में यह निश्चित किया जाता है कि मानवीय
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Kumar, Sudhir. "भारत छोड़ो आंदोलन में महिलाओं की ऐतिहासिक भूमिका पर शोधपरक दृष्टि". ShodhPatra: International Journal of Science and Humanities 1, № 9 (2024): 1–6. https://doi.org/10.5281/zenodo.13732116.

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Abstract:
वर्ष 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना थी। यह आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू किया गया था, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से तत्काल भारत छोड़ने की मांग की थी। गांधीजी ने इस आंदोलन के दौरान &lsquo;करो या मरो&rsquo; का ऐतिहासिक नारा दिया था। इस नारे ने पूरे देश को एकजुट कर दिया और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक सशक्त संघर्ष को प्रारंभ किया। आंदोलन के दौरान आजादी की प्रबल इच्छा के साथ लाखों भारतीयों ने हिस्सा लिया था। इसमें सभी आयु वर्ग और विभिन्न पृष्ठभूमि की महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरफ, इस आंदोलन में भा
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डॉ., अरविंद कुमार, та देवेन्द्र कुमार पाण्डेय डॉ. "सोशल मीडिया और उसके प्रभाव को समझना". International Journal of Contemporary Research in Multidisciplinary 3, № 5 (2024): 207–9. https://doi.org/10.5281/zenodo.13997555.

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Abstract:
"इंटरनेट एक दोहरी धार वाली तलवार है, जो समाज को एक ओर जोड़ती है और दूसरी ओर तोड़ती भी है। यह एक ऐसा माध्यम है जहां अच्छाई और बुराई दोनों को समान रूप से प्रसारित किया जा सकता है, और जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर इसके प्रभाव को देखना शुरू कर रहे हैं।" &nbsp;भारत ने हाल के वर्षों में मास मीडिया और सोशल मीडिया के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि देखी है, जिससे मीडिया की भूमिका वर्तमान परिदृश्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के विकास ने टेलीविजन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और प्रिंट मीडिया जैसे कई समाचार और सूचना स्रोतों की उपलब्धता और पहुंच को बढ़ाया है । मीडिया न केवल संद
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Singh, Abhimanyu. "The changing nature of ideological change in post-sixties Hindi stories: general analysis." RESEARCH REVIEW International Journal of Multidisciplinary 9, no. 4 (2024): 232–36. http://dx.doi.org/10.31305/rrijm.2024.v09.n04.026.

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Abstract:
Literature of every era follows the trends of its time, therefore it has a deep connection with politics and ideology. If we talk in the context of Hindi stories, then every story movement has a strong ideological basis on which it develops. The story encompasses the trends of the renaissance and nationalist movement before independence, and also displays social change through the medium of subject matter and craft. Therefore, the history of the story cannot be understood by disconnecting it from its social context and expressed ideology. The change in this genre of literature in every era dev
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संजीव, कुमार सिंह, та सद्गुरु पुष्पम्2 डॉ०. "भारत-पाकिस्तान संबंध और कश्मीर समस्या: दक्षिण एशिया का नया शीत युद्ध". 'Journal of Research & Development' 15, № 10 (2023): 27–32. https://doi.org/10.5281/zenodo.7943835.

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Abstract:
भारत और पाकिस्तान दक्षिण एशिया के जो प्रमुख राष्ट्र हैं, विभाजन पूर्व दोनों राष्ट्र एक ही अखंड भारत का हिस्सा थे। दोनों राष्ट्र एक समान इतिहास और संस्कृति का अंग रहे हैं तथा ब्रिटिश उपनिवेश के विरुद्ध दोनों ने मिलकर स्वतंत्रता प्राप्त की हेतु संघर्ष किया था। अखंड भारत से पृथक निर्मित पाकिस्तान निर्माण का प्रमुख कारण मुस्लिम लीग की मुस्लिम बहुल जनसंख्या वाले राष्ट्र था पाकिस्तान की मांग थी। भारत और पाकिस्तान के मध्य आजादी के बाद से लेकर आज तक कई विवादित मुददे रहे हैं, जिसको लेकर दोनों राष्ट्रों के मध्य अब तक कई बार संघर्ष देखने को मिले हैं। भारत-पाकिस्तान के मध्य प्रमुख विवाद जम्मू कश्मीर को ले
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श्रीवास्तव, अनुभा. "घरेलू हिंसा: एक समाज वैज्ञानिक विवेचन". Anthology The Research 8, № 12 (2024): H1 — H 6. https://doi.org/10.5281/zenodo.10942222.

Full text
Abstract:
This paper has been published in Peer-reviewed International Journal "Anthology The Research"&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; URL : https://www.socialresearchfoundation.com/new/publish-journal.php?editID=8829 Publisher : Social Research Foundation, Kanpur (SRF International)&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; Abstract : मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है मानवता मानव जीवन का धर्म है प्रत्येक मानव मात्र के साथ-साथ मानवता का बर्ताव होना चाहिए । वह किसी भी जाति लिंग&nbsp;,धर्म&
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