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सुशान्तमण्डलः. "जगतकल्याणे कुमारकार्तिकेयः अवदानम्". Siddhanta's International Journal of Advanced Research in Arts & Humanities 1, № 6 (2024): 93–106. https://doi.org/10.5281/zenodo.13291400.

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Abstract:
      संस्कृतसाहित्यस्य प्राचीनग्रन्थः ऋग्वेदात् आरभ्य आधुनिकसंस्कृतसाहित्ये रेबाप्रसादद्विवेदी कुमारविजय-महाकाव्यपर्यन्तं कुमारकर्तिकेयस्य परिचयः अनेकेषु ग्रन्थेषु वर्तते। वाल्मीकि-रामायणे, वेदव्यास-महाभारत-पुराणेषु च कार्त्तिकेयः देव-सेनापतिः, कुमारविजय-महाकाव्ये संसार कार्त्तिकेयः, मृच्छकटिकम्-प्रकरणे चोरस्य मनुष्यस्य देवः। अपि च तमिलसंस्कृतौ कार्त्तिकेयेन पौराणिकविशेषदेवतायाः स्थितिः प्राप्ता, विशेषतः बङ्गलासमाजस्य दृढपुत्रत्वात् सः पूज्यते। वाल्मीक-रामायण-वेदव्यास-महाभारत-पुराण-सूचनानुसारं षट् कृत्तिकाभिः सह संसर्गात् ‘कार्त्तिका’ इति पदं शोधपत्रे प्रय
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2

शुक्ल, रामपाल. "महाभारत सनत्सुजातीय उपाख्यान". HARIDRA 2, № 05 (2021): 20–21. http://dx.doi.org/10.54903/haridra.v2i05.7722.

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Abstract:
महाभारत हमारा राष्ट्रीय महाकाव्य है। इसमें भरतवंशी राजाओं की अमरगाथा है। इसे ग्रन्थरत्न में धार्मिक, नैतिक और सांस्कृति जीवन पद्धित का चित्रण है। इसमें अनेक आख्यानोपाख्यान समाहित है। यह सनतृयुजातीय उपाख्यान महाभारत के उद्योगपर्व में वर्णित है। इसमें चार अध्याय है। जो धृतराष्ट्र के प्रश्नों उत्तर सनत्सुंजात देते है।
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3

प्रा.डॉ.भारती, कुमार सुडके. "महाभारतातील ब्रह्मवादिनी 'विदुला'". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 5 (2022): 52–54. https://doi.org/10.5281/zenodo.7397438.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना</strong> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;भारतीय समाजाला प्रदीर्घ संस्कृतीचा वारसा लाभला आहे. प्राचीन काळात संहिता, ब्राह्मणके आरण्यके, उपनिषदे, पुराण, स्मृती ग्रंथ, महाकाव्य इत्यादी साहित्य निर्माण झाले. भारतीय तत्त्वज्ञानाच्या दृष्टीने महाभारत काव्याचे महत्त्व अलौकिक आहे. भारतीय संस्कृती, परंपरा, नीती कल्पना, सामाजिक धारणा राजकारण,व्यवहार, जीवनाचे ध्येय इत्यादी गोष्टींचा महाभारताशी निकटचा संबंध आहे. <sup>१ &nbsp;</sup>महाभारत हा प्राचीन संस्कृत काव्यग्रंथ आहे मूळ महाभारत महर्षी व्यासांनी लिहले.नंतर &nbsp;सौती व वैश्यपायन यांनी महाभारतात
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प्रा.डॉ.भारती, कुमार सुडके. "महाभारतातील ब्रह्मवादिनी 'विदुला'". International Journal of Advance and Applied Research 3, № 5 (2022): 52–54. https://doi.org/10.5281/zenodo.7397483.

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Abstract:
<strong>प्रस्तावना</strong> &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;भारतीय समाजाला प्रदीर्घ संस्कृतीचा वारसा लाभला आहे. प्राचीन काळात संहिता, ब्राह्मणके आरण्यके, उपनिषदे, पुराण, स्मृती ग्रंथ, महाकाव्य इत्यादी साहित्य निर्माण झाले. भारतीय तत्त्वज्ञानाच्या दृष्टीने महाभारत काव्याचे महत्त्व अलौकिक आहे. भारतीय संस्कृती, परंपरा, नीती कल्पना, सामाजिक धारणा राजकारण,व्यवहार, जीवनाचे ध्येय इत्यादी गोष्टींचा महाभारताशी निकटचा संबंध आहे. <sup>१ &nbsp;</sup>महाभारत हा प्राचीन संस्कृत काव्यग्रंथ आहे मूळ महाभारत महर्षी व्यासांनी लिहले.नंतर &nbsp;सौती व वैश्यपायन यांनी महाभारतात
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Dr., Bhagat Singh, та Kumar Sanjeev. "महाभारत युद्ध : साक्ष्यों का अभिनव चिन्तन". International Educational Applied Research Journal 08, № 08 (2024): 50–57. https://doi.org/10.5281/zenodo.13741810.

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Abstract:
महाभारत युद्ध भारतीय संस्कृति का एक केंद्रीय तत्व है, जिसे पिभिन्&zwj;न ऐतिहासिक और साॉस्कृतिक साक्यों केमाध्यम से समझा जा सकता हैं। इस शॉध में, महाभारत युद्ध के विभिन्&zwj;न साक्यों का विश्लेषण किया गया है,जिसमें पुरातात्यिक खोजें, साहित्यिक संदर्भ और ऐतिहासिक लेख शामिल हैं । शोध ने यह दर्शाया हैं कि महाभारतयुद्ध के वर्णन में धार्मिक और साॉस्कृतिक दृष्टिकोणों का समायेश है, जो युद्ध की पास्तविकता और इसकेऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। यह निष्कर्ष निकलता है कि महाभारत युद्ध कपल एक ऐतिहासिक घटना नहींबल्कि भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का भी सहत्पपूर्ण हिस्सा है, जो समाज के सोच और परंपराओंक
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शुक्ल, दिनेश चन्द्र. "महाभारत के शान्तिपर्व की उपयोगिता". Humanities and Development 17, № 2 (2022): 26–28. http://dx.doi.org/10.61410/had.v17i2.63.

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Abstract:
वर्तमान रूप में महाभारत धार्मिक एवं लौकिक भारतीय ज्ञान का विश्व कोश है। इस महान ग्रन्थ की समग्रता के सम्बन्ध में कहा गया है इस ग्रन्थ में जो कुछ विषय है, उसके अलावा इस चराचर संसार में कुछ भी शेष नही, इसलिए इस महान ग्रन्थ को पंचम वेद की संज्ञा दी गयी है।
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साहनी, प्रियंका. "भारतीय ऋषि-साधू-संत परम्परा के आराध्य: महर्षि वेदव्यास". Journal of Research & Development 16, № 6 (2024): 80–81. https://doi.org/10.5281/zenodo.12770629.

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Abstract:
<strong>lkjka'k </strong><strong>:</strong> okYehfd vkSj O;kl bl ns&rsquo;k ds ,sls nks _f"k&amp;l&Ugrave;ke gSa] ftuds lkjLor vonkuksa us Hkkjrh; laLd`fr ds fuekZ.k vkSj fodkl esa lokZf/kd Hkwfedk fuHkk;hA egf"kZ osnO;kl egkHkkjr ,oa Hkkxor lfgr v"Vkn&rsquo;k iqjk.kksa ds jpf;rk ekus tkrs gSa vkSj pkjksa osnksa ds ladyu] foHkktu ,oa lEiknu dk Js; Hkh mUgsa tkrk gSA laLd`r&amp;lkfgR; ds x|&amp;lezkV~ ck.kHk&Iacute; us ^g"kZpfjr* ds eaxykpj.k esa egkdfo osnO;kl th ds izfr fuEufyf[kr iz.kfr O;Dr dh gS&amp;
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Pandey, Rameshwar. "महाभारत में पर्यावरण पर दार्शनिक चिन्तन". Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (in Hindi) 5, № 1&2 (2020): 4–6. http://dx.doi.org/10.24321/2456.0510.202002.

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., नीलाम्बरबाघ. "महाभारत-किरातार्जुनीयमहाकाव्ययोः कथावस्तुगता समता-विषमता च-एकमनुशीलनम् ।". International Journal of Sanskrit Research 9, № 1 (2023): 24–26. http://dx.doi.org/10.22271/23947519.2023.v9.i1a.1957.

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श्रीमती, आरती शर्मा डॉ. जितेन्द्र शर्मा. "चंदेरी के प्रतिहार शासक और उनका शासन प्रबंध". International Educational Applied Research Journal 09, № 05 (2025): 200–206. https://doi.org/10.5281/zenodo.15571000.

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Abstract:
Abstractचंदेरी क्षेत्र के पुरातात्विक सर्वेक्षणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस क्षेत्र की प्राचीनता पाषाण काल तक जाती हैं। श्री टीबीजी शास्त्री एवं सीबी त्रिवेदी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत किये शोध कार्यों से इस क्षेत्र की प्राचीनता के विषय में जानकारी मिलती है। किन्तु राजनैतिक इतिहास सम्बंधी जाकारी का अभाव देखने को मिलता है। इतिहासकारों ने प्राचीन 18 जनपदों में वर्णित चेदि जनपद को चंदेरी कहने का प्रयास किया है। ऋग्वेद में वर्णित है कि चेति देश के निवासियों एवं यहाँ के राजा कसुचेद्य ने ब्रह्मतिथि नामक ऋषि को 100 ऊँट एवं सहस्त्र गाय देने का उल्लेख है। जबकि प्रो. रैप्सन के अनुसार
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Kakkar, Shruti. "NATURE OF AESTHETIC CLASSICAL THINKING IN SECULAR SANSKRIT LITERATURE." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 7, no. 11 (2019): 268–73. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v7.i11.2019.3751.

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Abstract:
English: The Ramayana and the Mahabharata are considered epics, which are two representative texts of the advanced tradition of Indian literature. Their study gives the knowledge of the state of art prevailing at that time. By the time of "Ramayana" and "Mahabharata", there had been substantial development of painting, sculpture and architecture.&#x0D; Hindi: रामायण और महाभारत को महाकाव्य माना जाता है जो भारतीय साहित्य की उन्नत परम्परा के दो प्रतिनिधि ग्रन्थ हैं। इनके अध्ययन से उस समय प्रचलित कला की स्थिति का ज्ञान होता है। ''रामायण'' और ''महाभारत'' काल तक चित्रकला, मूर्तिकला व वास्तुकला का पर
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बैरवा, रमेश चन्द्र. "महाभारत के शान्तिपर्व में धर्म दर्शन का सामान्य अध्ययन". International Journal of Sociology and Humanities 7, № 1 (2025): 384–88. https://doi.org/10.33545/26648679.2025.v7.i1e.176.

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Singh, Jitendra. "The direction of social philosophy in the novels of Narendra Kohli." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 9, no. 2 (2022): 50–54. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2022.v09i02.009.

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Abstract:
Narendra Kohli of the novel has given a new vision to social philosophy. His mind has been running from past to present and from present to past. Therefore, he has seen the characters of Ramayana from the Mahabharata standing in his midst. Due to the identity of the Indian, the components have been Ramayana and Mahabharata, so it is natural to have a relation of the cultured consciousness to the people through them. Therefore, in the emotion of the reader, Narendra Kohli has been able to expand his identity through these stories. Narendra Kohli has made him his ideal by giving special importan
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रजौरे Rajaure, पूर्णिमा Purnima. "‘आजको महाभारत’ कथामा अर्थ उत्पादनको संस्कृति {Meaning in the story 'Today's Mahabharata' A culture of production}". Prajna प्रज्ञा 125, № 1 (2024): 59–70. https://doi.org/10.3126/prajna.v125i1.75278.

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Abstract:
प्रस्तुत लेख सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व र त्यसले खोजी गर्ने अर्थको निरूपणमा केन्द्रित छ । प्रतिनिधित्वको अध्ययनबाट समाजमा आममानिसहरूको प्रतिनिधित्व कसरी भएको छ र उक्त सामाजिक संरचना कस्तो रहेको छ भन्ने कुराको बोध हुन्छ । समाजसापेक्ष सिर्जित अर्थ निरूपणको आधार नै त्यहाँ अवस्थित सांस्कृतिक प्रतिनिधित्वमा निर्भर रहन्छ । पाठमा प्रतिनिधित्व गर्ने विभिन्न पात्रहरूले प्रभुत्वशाली अर्थ, सहमतीय अर्थ र विरोधजन्य अर्थको उत्पादन गरेको पाइन्छ । यसै सन्दर्भमा घनश्याम ढकालको ‘आजको महाभारत’ कथामा संयोजित वर्गीय पात्रहरूको प्रतिनिधित्व र त्यसले सिर्जना गरेको अर्थको संस्कृतिलाई यस अध्ययनमा स्थान दिइएको छ । यहाँ नि
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शिव, पूजन पाण्डेय. "महाभारत कालीन समाज में महिलाओं की सामाजिक स्थिति और शैक्षिक उपलब्धि का विश्लेषण". SIDDHANTA'S INTERNATIONAL JOURNAL OF ADVANCED RESEARCH IN ARTS & HUMANITIES 2, № 5 (2025): 1–10. https://doi.org/10.5281/zenodo.15315167.

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Abstract:
<em>महाभारत काल में महिलाओं की सामाजिक स्थिति और शैक्षिक उपलब्धियाँ गहन चिंतन का विषय रही हैं। इस शोधपत्र का उद्देश्य महाभारत के संदर्भ में समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी शैक्षिक उपलब्धियों के दोहरे पहलुओं का विश्लेषण करना है। सामाजिक रूप से</em><em>, </em><em>इस युग में महिलाओं को मुख्य रूप से माँ</em><em>, </em><em>पत्नी और देखभाल करने वाली के रूप में पारंपरिक भूमिकाओं में देखा जाता था</em><em>, </em><em>फिर भी द्रौपदी</em><em>, </em><em>कुंती और गांधारी जैसी कई प्रमुख महिला पात्रों ने साहस</em><em>, </em><em>नेतृत्व और महत्वपूर्ण सामाजिक निर्णयों में सक्रिय भागीदारी का उदाहरण प्रस्तुत क
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Priyamvada, Dr. "Ved Vyas Ki Itihas Drishti: Mahabharat k vishesh sambandh mein." International Journal for Research in Applied Science and Engineering Technology 13, no. 2 (2025): 382–84. https://doi.org/10.22214/ijraset.2025.66860.

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Abstract:
‘‘जो सवŊũ हैवह इसमŐउपİ̾थत है, परȶुजो इसमŐनही ंहैवह कही ंअɊũ नही ंहै।ʼʼ महाभारत की यह उİƅ इसकी सवŊũ ʩापकता एवं िवˑृत कालखǷ को अवलोिकत करनेमŐसमथŊहै। यह एक उपजीʩ काʩ हैअथवा गाथा हैिजसमŐभूत भिवˈ और वतŊमान की ऐितहािसक गितिविधयो ंका वणŊन है। सʁव महिषŊवेदʩास इस अलौिकक राजनैितक घटना के ŮȑƗ ūʼा रहेइसीिलए इनकी अनुपम कृ ित मŐतǽालीन राजनैितक, धािमŊक सांˋृ ितक, पाįरवाįरक आिद अनेकानेक घटनाओंका ŢमबȠ अȯयन िमलता हैजो इितहास के लƗणो ंको ŮदिशŊत कर इसेऐितहािसक कृ ित बनानेहेतुसमथŊहै। इसेइितहास, इितहासोȅम, िनŜƅ1 , धमŊशा˓, अथŊशा˓ तथा मोƗशा˓ भी कहा गया है। इसेिलिपबȠ करनेका कायŊगणेश जी नेिकया। इसकी रचना मŐतीन वषŊका सम
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Saini, Naresh Singh. "Importance of the teachings of Shri Krishna in Bhishma Parva of Sanskrit literature Mahabharata." RESEARCH HUB International Multidisciplinary Research Journal 11, no. 2 (2024): 36–39. http://dx.doi.org/10.53573/rhimrj.2024.v11n2.006.

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Abstract:
This study examines the significance of Shri Krishna's teachings in the Bhishma Parva of the Mahabharata within Sanskrit literature. It focuses on the Bhagavad Gita, where Krishna imparts essential spiritual and philosophical wisdom to Arjuna. These teachings, addressing concepts of duty, righteousness, and the nature of reality, are crucial for understanding the ethical and moral foundations of the epic. By analyzing Krishna's discourse, the research highlights how these lessons guide characters and readers towards self-realization and dharma. This study underscores the enduring relevance of
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कुमारी, किरण, के एम पांडे, एल एन मिश्रा та गीता कुमारी. "महाभारत युद्ध के आरंभ में भगवान कृष्ण के द्वारI अर्जुन का मोहनाश: एक विश्लेषण". International Journal of Sanskrit Research 10, № 1 (2024): 10–14. http://dx.doi.org/10.22271/23947519.2024.v10.i1a.2280.

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डॉ., कुमकुम भारद्वाज, та कुमार माठे प्रवीण. "काँच पर चित्रकला की विविध तकनीक". International Journal of Research - Granthaalayah 7, № 11(SE) (2019): 21–24. https://doi.org/10.5281/zenodo.3585015.

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Abstract:
प्राचीन भारत में महाभारत, रामायण, यजुर्वेद संहिता एवं योग-वशिष्ठ में भी काँच का उल्लेख मिलता है। भारतीय काँच का विवरण 16 वीं शताब्दी से आरंभ होता है। मुगलकाल में काँच पर कला ने नये आयाम स्थापित किये। यह इसका स्वर्णीम काल माना जाता है। भारत में 19 वीं शताब्दी में काँच की चूड़िया, शीशियाँ तथा खिलौनों का निर्माण होने लगा था। वर्ष 1870 से 1915 तक कई काँच उद्योग खुले लेकिन वह असफल रहे। चैन्न्ई से 300 कि.मी. दूर तंजावुर से आरंभ हुई तंजौर कला चोल साम्राज्य के समय विकसित हुई, जिसने आज भारतीय तंजौर चित्रकला को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। &nbsp;
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डॉ., अरूण पेंटावार. "स्वामी दयानंद सरस्वती यांचे राजकीय तत्वज्ञान". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 7 (2025): 178–82. https://doi.org/10.5281/zenodo.14791682.

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Abstract:
<em>आधुनिक भारताच्या राजकीय विचारांच्या इतिहासात स्वामी दयानंद सरस्वती यांनी एक अद्वितीय स्थान व्यापलेले आहे. मुख्यतः ते राजकीय विचारवंत नव्हते पण त्यांनी केलेल्या सामाजिक व धार्मिक सुधारणेच्या कार्यातून व त्यांच्या समग्र तत्वज्ञानातून राजकीय विचार पुढे आले आहेत. दयानंद सरस्वती यांचे राजकीय विचार त्यांच्या &ldquo;सत्यार्थ प्रकाश&rdquo; या ग्रंथामधून समोर आले आहेत. दयानंद सरस्वती यांनी राज्याचा सिद्धांत, शासनाचे स्वरूप, आर्यावृत्त कल्पना</em><em>, लोकशाही, कायद्याचे राज्य, सरकारची कार्ये, ग्राम प्रशासन, सत्ता विभाजन यासारख्या राजकीय संकल्पनांचे वर्णन केलेले आहे.त्यांचे राजकीय विचार हे वेद, महाभ
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Basyal, Bhagawati. "नेपाली आधुनिक कथाको अध्ययन". Journal of Deukhuri Multiple Campus 3, № 4 (2025): 77–81. https://doi.org/10.3126/jdmc.v3i4.80562.

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Abstract:
यस लेखमा नेपाली कथाको ऐतिहासिक विकासक्रमलाई कालक्रमिक रूपमा विश्लेषण गरिएको छ । कथाको उत्पत्ति मानव सभ्यताको प्रारम्भदेखि नै भएको देखिन्छ, जुन लोकपरम्परा र प्राचीन ग्रन्थहरू जस्तैः वेद, उपनिषद्, पञ्चतन्त्र आदि मार्फत विकसित भएको हो । नेपाली कथाको लिखित परम्परा शक्ति वल्लभ अज्र्यालको महाभारत विराट पर्व (वि.सं. १८२६) पछि सुरु भएको मानिन्छ । कालखण्डलाई प्राथमिक (लोककथा, नीतिकथा), माध्यमिक १९५८–१९९१, शृङ्गारिक कथा) र आधुनिक (१९९२– हाल) कालमा विभाजन गरिएको छ । गुरुप्रसाद मैनालीको नासो (१९९२) ले आधुनिक यथार्थवादी धाराको सुरुवात गर्यो । २०२०–२०३० सम्म नवचेतनावादी कथा प्रचलित भए भने २०४० देखि समसामयिक
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Dr. Hemraj Saini. "Arthshashtra Mein Varnit rajdharm Evam Sushasan Ki Vartman Prasangikta." Knowledgeable Research: A Multidisciplinary Journal 1, no. 06 (2023): 20–26. http://dx.doi.org/10.57067/pprt.2023.1.06.20-26.

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Abstract:
यथा हस्ति पदे पदानि सर्वसत्य जानि I तथैव राजधर्मेशु सर्वे धर्मों समविशान्ति II (महाभारत, शांतिपर्व ) That is, just like everyone's feet have to go in the feet of the elephant, in the same way all the religions should be included in Rajdharma. If Rajdharma becomes disordered, then the Chaturvarna system, the four ashrams and all the systems of the state prevailing in the world will be destroyed. The state can be made safe and alive only by establishing Rajdharma. Kautilya's goal is to establish such a nation-state, whose governance system, though externally monarchical, is internally imbued wit
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प्रधानाङ्ग Pradhanang, कैलाश Kailash. "समाजवाददेखि लोकतान्त्रिक समाजवादसम्म : एक विवेचना Samajvaddekhi Loktantrik Samajvadsamma: ek Vibechana". Tribhuvan University Journal 29, № 1 (2016): 241–48. http://dx.doi.org/10.3126/tuj.v29i1.25991.

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Abstract:
समाजवाद मानव समाजको विकाससँगै मानव जातिले आत्मसात् गर्दै आएकोसमाज व्यवस्थाको वस्तुगत मान्यता हो । यही मानव सभ्यतासँगै विकसित हुँदै आएकामूल्य र मान्यताहरूलाई सँगालेर पूर्वीय वैदिक कालका महाभारत, स्मृतिग्रन्थ, पुराणआदिमा मानव जातिले अपनाएका जीवनशैलीले समाजमा शान्तिपूर्ण व्यवस्था निर्माणगरेको पाइन्छ । त्यसै गरी पश्चिममा प्राचीन ग्रीस तथा रोमका नगर राज्यहरूमा स्थापितनागरिक समाजदेखि नै समाजवादका किरणहरू भेटिन्छन् । आधुनिक युगका सेन्टसाइमन, चाल्र्स फोरियर्स, रोवर्ट ओवेन आदिको काल्पनिक समाजवाद होस् या कार्लमाक्र्सले प्रतिपादन गरेको वैज्ञानिक समाजवाद नै किन नहोस्, यी सबै समयक्रमसँगैविकसित हुँदै आएका च
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गुरागाईं Gueagain, यज्ञप्रसाद Yagyaprasad. "कृष्णप्रसाद शर्मा वस्तीका खण्डकाव्यमा गीता दर्शन Krishna Prasad Sharma Wastika Khandakavyama Geeta Darshan". Rupantaran: A Multidisciplinary Journal 4, № 1 (2020): 255–64. http://dx.doi.org/10.3126/rupantaran.v4i1.34245.

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Abstract:
यो लेख खण्डकाव्यकार कृष्णप्रसाद वस्तीद्वारा लेखिएका खण्डकाव्यमा व्यक्त भएको गीता दर्शनको अध्ययनविश्लेषणमा केन्द्रित रहेको छ । महाभारत युद्धको पूर्वसन्ध्यामा श्रीकृष्णले अर्जुनलाई दिएको ज्ञान, भक्ति, वैराग्यएवम् मानवदर्शनमूलक शिक्षा नै गीता दर्शन हो । काव्यकार कृष्णप्रसाद शर्मा वस्तीका विभिन्न खण्डकाव्यमायस प्रकारको दर्शनको प्रयोगको अवस्था के कस्तो रहेको छ भन्ने कुरालाई अध्ययनको मूल समस्याको समाधानयस लेखमा खोजिएको छ । यसर्थ उनका खण्डकाव्यमा गीता दर्शको प्रयोगको अवस्था पत्ता लगाउनु यसलेखको उद्देश्य रहेको छ । यस अध्ययनबाट उक्त काव्यका भावी अध्येताहरूलाई लाभ पुग्न सक्छ । यस लेखमावस्तीका खण्डकाव्यह
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दर्नाल Darnal, प्रकाश Prakash. "उदयपुर गाईघाटस्थित मुढगडाको परीक्षण उत्खनन". HISAN: Journal of History Association of Nepal 10, № 1 (2024): 151–57. https://doi.org/10.3126/hisan.v10i1.74909.

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Abstract:
उदयपुर जिल्लाको सदरमुकाम गाईघाटमा त्रियुगा नगरपालिका रहेको छ । यसको पूर्वमा चौेदण्डीगढी नगरपालिका, उत्तरमा रौतामाई गाउँपालिका र खोटाङ जिल्ला, पश्चिममा उदयपुरगढी गाउँपालिका र सप्तरी जिल्ला तथा दक्षिणमा सप्तरी जिल्ला रहेका छन् । त्रियुगा नदीलाई प्राचीनकालमा तिरुवा भनिन्थ्यो र पछि अपभ्रंश भई त्रियुगा भनिएको भन्ने मान्यता रहँदै आएको छ । चुरे पहाड, भित्री मधेश, महाभारत श्रृंखलाका रुपमा उदयपुरको भूगोलको स्वरुप रहेको छ । यसको दक्षिणको भाग विदेह वा मिथिला र उत्तरी भाग माझ किरातको प्रभाव क्षेत्रमा प्राचीनकालदेखि रहदै आएको पाइन्छ । विदेहको सीमाना पूर्वमा कोशी नदी, दक्षिणमा गंगा नदी, उत्तरमा हिमालय पहाड
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सुवेदी, धनप्रसाद. "नेपाली कवितामा जनजातीय बिम्बको प्रयोजन". DMC Journal 9, № 8 (2024): 1–14. https://doi.org/10.3126/dmcj.v9i8.74868.

Full text
Abstract:
यस अनुसन्धानमा समकालीन नेपाली कवितामा जनजातीय बिम्बको प्रयोजनको खोजी गरिएको छ।नेपाली कवितामा जनजातीय बिम्बहरूको धेरथोर प्रयोग हुँदै आएको भए पनि पछिल्लो समयमा यसको सचेत प्रयोग हुन थालेको छ।पछिल्लो समयमा जातीय, भाषिक, सांस्कृतिक जागरण बढेको छ र नेपाली साहित्यको मूल विषय नै पहिचान बन्दै गएको छ।जनजातीय बिम्बको प्रयोग विशेषगरी राई, लिम्बु, तामाङ, नेवार, चेपाङ, शेर्पा, थारु, मगर, गुरुङ आदि जनजातिका इतिहास, संस्कृतिसँग सम्बन्धित छन्।जनजातीय बिम्बको माध्यमबाट नेपाली समाजको विविधताको प्रतिबिम्बन गरिएको।जनजातिमाथिका उत्पीडन, विभेदको चित्रण गर्दै त्यस्तो विभेदको अन्त्यको आवश्यकता औंल्याइएको पाइन्छ।त्यसरी
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डॉ., राजेश. "ज्योतिसर की मनोवैज्ञानिक उपादेयता". 'Journal of Research & Development' 14, № 23 (2022): 42–44. https://doi.org/10.5281/zenodo.7524395.

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Abstract:
प्रस्तुत शोध पत्र महाभारत जैसे अद्वितीय सत्य पर आधारित संग्राम की रणभूमि को आधार मान के लिखा गया है, जिसमें कुरुक्षेत्र के वीरों की अमरगाथा को याद करते हुए अर्जुन और कृष्ण के संवाद श्रीमदभागवत गीता&nbsp; पर विचार व्यक्त किये गये हैं | वैसे तो दुनिया के लोग कुरुक्षेत्र को गीता की जन्मस्थली मानते है लेकिन आज आपको जानकर बेहद आश्चर्य होगा की गीता ने कुरुक्षेत्र के ज्योतिसर में जन्म लिया है | स्थानीय लोगों &nbsp;की माने तो ज्योतिसर वह पवित्र स्थान है जहां गीता जैसे पवित्र ग्रन्थ का जन्म हुआ | ज्योतिसर कुरुक्षेत्र का सबसे सम्मानित तीर्थ है | हरियाणा प्रदेश के इतिहास में इस स्थल का गौरवमय इतिहास रहा
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मिश्रा, आशा. "पुरातन में निहित नवीनता: भारतीय ज्ञान परंपरा का सामाजिक और शैक्षिक योगदान". Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education 22, № 01 (2025): 477–83. https://doi.org/10.29070/adcd6897.

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Abstract:
भारतीय ज्ञान वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, लोककथाओं और पारंपरिक प्रथाओं से समृद्ध है, जो शासन, नैतिकता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक संरचना और आध्यात्मिक ज्ञान सहित विभिन्न विषयों को समाहित करती है। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद न केवल धार्मिक ग्रंथ हैं, बल्कि इनमें विज्ञान, गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र और दर्शन के गहरे बीज भी निहित हैं। महाभारत, रामायण, मनुस्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, चरक और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथों ने राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा विज्ञान में अद्वितीय योगदान दिया। इन ग्रंथों में पुरातन में ही नवीनता निहित है। भारत की सामाजिक संरचना — वर्ण, आश्रम, जाति
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पराजुली Parajuli, जगतप्रसाद Jagatprasad. "सामाजिक–सांस्कृतिक समन्वयको केन्द्र : छिन्ताङ जाल्पादेवी (अन्वेषणात्मक ऐतिहासिक अध्ययन) {Center for Socio-Cultural Coordination: Chintang Jalpadevi (Exploratory Historical Studies)}". HISAN: Journal of History Association of Nepal 8, № 1 (2022): 94–109. http://dx.doi.org/10.3126/hisan.v8i1.53084.

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Abstract:
ऐतिहासिक कालखण्डदेखि नै आफ्नो मौलिक पहिचान र प्रसिद्धिको शिखरमा रहेको धनकुटा सुन्दरतम, आकर्षकीय प्राकृतिक छटाहरूको कारण निकै महत्वपूर्ण मनोरम् जिल्ला मानिन्छ । महाभारत पर्वतीय शृंखलाको उत्तरी भागमा अवस्थित धनकुटालाई तेह्रथुम, पाँचथर, भोजपुर, उदयपुर, संखुवासभा, मोरङ र सुनसरी जिल्लाहरूले स्पर्श गरेका छन् । यसको केही सीमित क्षेत्रलाई शिवालिक पर्वतीय शृंखलाले पनि छोएको छ । धनकुटाबाट लगभग २४ कि.मी पश्चिम–दक्षिण दिशामा छिन्ताङ गाउँपालिका पर्दछ । यस जिल्लामा रहेका ३५ वटा गाउँपालिकाहरूमध्ये ‘छिन्ताङ’ सबैभन्दा ठूलो र पैmलहर क्षेत्रमा अवस्थित छ । यस अन्तर्गत रहेका ९ वटा वडाहरूमध्ये १ , २ र ३ वडाहरूको कर
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कुमार, देवेन्द्र, та रविन्द्र कुमार. "श्रीगंगा का प्राचीन साहित्यिक एवं धार्मिक महत्त्व". Dev Sanskriti Interdisciplinary International Journal 10 (31 липня 2017): 11–15. http://dx.doi.org/10.36018/dsiij.v10i0.92.

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Abstract:
प्रस्तुत अनुसन्धान का उद्देष्य गंगा की महिमा के विशय में ज्ञान प्राप्त करने और उसकी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृश्ठभूमि को समझने का प्रयास है। भारतीय जनमानस के लिए गंगा भारत की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक रही है। अपने स्वरूप व प्रवाह में निरन्तर बदलाव लाने पर भी अपने मूल रुप में तो वही गंगा ने युगों-युगों तक एक समूची सभ्यता को न केवल सिंचित किया है बल्कि उसका भरण-पोशण भी किया है। गंगा षाष्वता का प्रतीक है तथा कला, पौराणिक कथाएँ एवं साहित्य सभी उसका गुणगाण करते हंै। गंगा परम्परा, पुराण, कला, संस्कृति एवं इतिहास से जुड़ी हुई है। उसका उल्लेख हमें प्राचीन भारतीय वाड.मय में स्थान-स्थान पर मनन
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प्रा., डॉ. वनिता त्र्यंबक पवार निकम. "हिंदी मे अनुदित सर्जनात्मक मराठी पौराणिक उपन्यास'ययाति' एक अध्ययन". Journal of Research & Development' 14, № 12 (2022): 3–7. https://doi.org/10.5281/zenodo.7053410.

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Abstract:
<strong>सारांश</strong><strong>-&nbsp; </strong>&lsquo;ययाति&rsquo; वि.स.खांडेकर रचित मूल मराठी उपन्यास है। जिसका हिंदी अनुवाद मोरेश्वर तपस्वी ने किया है। यह एक रचनात्मक, सर्जनात्मक मराठी पौराणिक उपन्यास है। यह उपन्यास ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित है। यह&nbsp; उपन्यास ययाति की कामकथा है, देवयानी की संस्कार कथा है, शर्मिष्ठा की प्रेम कथा है और कच की अलग-अलग भक्तीगाथा है। इन चार प्रमुख पात्रों के आगे पीछे चलने वाली, फिसलने वाली, हल होती और व्यापक बनती ययाति की कथा में मनुष्य के अंतर मन के राग, द्वेष, लोभ और मोह आदि किसी भी प्रकार के आवरण बिना वर्णित कथा है। मूल रूपसे ययाति की कथा वेध व्यास रचित
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प्रदीप, गणेश झाडे. "स्वातंत्र्यवीर सावरकर यांचे जीवचरित्र( Life Biography of Swatantryaveer Savarkar )". International Journal of Advance and Applied Research 2, № 21 (2022): 73–78. https://doi.org/10.5281/zenodo.7063807.

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Abstract:
&nbsp; <strong>प्रस्तावना,:-</strong> &nbsp;&nbsp; &nbsp;विनायक दामोदर सावरकर (२८ मे १८८३&ndash;२६ फेब्रुवारी १९६६) भारतीय स्वातंत्र्याच्या प्राप्तीसाठी सशस्त्र क्रांतीचा पुरस्कार करणारे थोर देशभक्त, साहित्यिक आणि समाजसुधारक. &lsquo;स्वातंत्र्यवीर&rsquo; म्हणून विख्यात. जन्म नासिकपासून काही अंतरावर असलेल्या भगूर ह्या गावी. सावरकर कुटुंब हे कोकणातील गुहागर पेट्यातून देशावर आले. गुहागरजवळ सांवरवाडी म्हणून एक ठिकाण आहे. त्यावरून &lsquo;सावरकर&rsquo; हे आडनाव आले असावे, असा अंदाज प्रत्यक्ष सावरकरांनीच केला आहे. थोरले गणेश आणि सर्वांत धाकटे डॉ.नारायण हे त्यांचे दोन भाऊ. सावरकरांचे शिक्षण भगूर, नासि
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कुमार, सत्येन्द्र. "धर्मवीर भारती के साहित्य में युद्ध और शांति का विमर्श". Journal of Research & Development 17, № 1 (2025): 227–30. https://doi.org/10.5281/zenodo.14964915.

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Abstract:
<strong><em>सारांश:</em></strong> <em>धर्मवीर भारती हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिनकी कृतियों में युद्ध और शांति का गहन विमर्श मिलता है। विशेष रूप से अंधा युग नाटक में, उन्होंने महाभारत के युद्ध के बाद के सामाजिक, नैतिक और दार्शनिक प्रभावों को उकेरा है। यह नाटक केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं है, बल्कि आधुनिक समय के लिए भी गहरे अर्थ रखता है। इसमें युद्ध की विभीषिका, सत्ता की लालसा, नैतिक पतन और शांति की खोज को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है।भारती युद्ध को केवल शारीरिक विनाश तक सीमित नहीं रखते, बल्कि वह इसे मानवता के नैतिक और मानसिक संकट के रूप में भी चित्रित करते हैं। अंधा युग के प
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वासिनी, डॉ. शिखर. "वैदिक कालीन नारी शिक्षा: एक अध्ययन". INTERNATIONAL EDUCATION AND RESEARCH JOURNAL - IERJ 11, № 3 (2025): 24–27. https://doi.org/10.5281/zenodo.15582394.

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Abstract:
प्राचीन भारत में स्त्री शिक्षा अपनी उच्चतम सीमा पर थी। वह पुरूषों के समकक्ष बिना भेद-भाव के शिक्षा प्राप्त करती थी। बुद्धि और ज्ञान में अग्रणी थी। पुत्र की तरह पुत्री का भी विद्यारम्भ से पूर्व उपनयन संस्कार सम्पन्न किया जाता था तथा वह भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विभिन्न विषयों का अध्ययन करती थी। उसे यज्ञ सम्पादन और वेदाध्ययन का पूर्ण अधिकार था, दर्शन और तर्कशास्त्र में स्त्रियाँ निपुण थी। सभा व गोष्ठियों में वे ऋग्वेद् की ऋचाओं का गान किया करती थी। ऋग्वेद् में उल्लिखित है कि कतिपय विदुषी स्त्रियों ने ़ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं के प्रणयन में योग दान प्रदान किया था। पति के साथ समान रूप में वे यज्ञ
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प्रा., डॉ. कल्पना तायवाडे. "महात्मागांधी व सर्वोदय समाज". उदयगिरी - बहुभाषिक इतिहास संशोधन पत्रिका 01, № 04 (2023): 1076–80. https://doi.org/10.5281/zenodo.10287759.

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Abstract:
मोहनदास करमचंद गांधी यांचा जन्म 2 ऑक्टोबर । 869 साली काठेवाडीतील पोरबंदर येथे झाला. त्यांचे वडील संस्थानाचे दिवाण होते. निस्पृह व स्वच्छ शासनाबद्दल त्यांची ख्याती होती. त्यांच्या मातोश्री कमालीच्या धार्मिक वृत्तीच्या होत्या. त्याचा परिणाम गांधीजीच्या जीवनावर सर्वाधिक झाला.इसवी सन १८८८ मध्ये एक सामान्य विद्यार्थी म्हणून मॅट्रिकची परीक्षा उत्तीर्ण झाल्यावर कायद्याच्या अभ्यासासाठी त्यांची इंग्लंडला रवानगी झाली. तेथे त्यांनी कायद्याबरोबरच धार्मिक व नैतिक चळवळीचा अभ्यास केला । 891 मध्ये भारतात परत आल्यानंतर त्यांनी काठेवाड आणि मुंबई येथे वकिली व्यवसाय चालू केला. । 893 मध्ये ते दक्षिण आफ्रिकेत गेले
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सौरभ, श्रीवास्तव. "भीमबेटका चित्रकला तकनीक एवं इतिहास". Science world a Monthly e magazine 5, № 1 (2025): 6116–18. https://doi.org/10.5281/zenodo.14773218.

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Abstract:
भारत के हृदय एवं मध्य क्षेत्र के रूप में जाना जाने वाला राज्य मध्य प्रदेश जो अपनी कई कला एवं गुफा कला के रूप में विख्यात है, उनही में से एक स्थान मध्य प्रदेश में बसे भोपाल के भीमबैठिका का भी है । भीमबेटका मध्यप्रदेश के भोपाल से करीब 44से 50 किमी की दूरी पर स्थित है । कई शीलश्रयों के झुंडो के रूप मे विख्यात यह स्थल अपने गुफा चित्र के लिए एवं मानव विकास के इतिहास को दर्शाने के लिए विख्यात है । <strong>चित्र 1-</strong> <strong>भीमबेटका</strong><strong> प्रवेशद्वार शीला</strong>&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; <strong>चित्र 2</strong>- <strong>भीमबेटक
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Ojha, Devendra Nath. "The Art of Writing in Ancient India (प्राचीन भारत में लेखन-कला)". SHODH KALPTARU, № 08 (31 березня 2013): 168–77. https://doi.org/10.5281/zenodo.8013959.

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Abstract:
<strong>Hindi Abstract:</strong>: भारत में लेखन कला का इतिहास उतना ही अनिश्चित है जितना कि भारत का सामान्य इतिहास। भारतीय परंपराएं, विदेशी प्रभाव, स्थानीय रीति-रिवाज, विदेशी लेखकों की गवाही, साहित्यिक साक्ष्य और शेष रचनाएं भारत में लेखन की प्राचीनता को स्थापित करती हैं। यह प्राचीनता चौथी शताब्दी ईसा पूर्व की है। भारत में लेखन कला के विषय में साहित्यिक और गैर-साहित्यिक दोनों प्रकार के कार्य शामिल हैं। साहित्यिक कार्यों में वेद, उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथ और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य शामिल हैं, जबकि गैर-साहित्यिक कार्यों में स्मारकों, सिक्कों और मुहरों पर शिलालेख शामिल हैं। निश्चितता की कमी
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प, ्रदीप कुमार चा ेपडा. "गायन स् ंागीत में नवाचार म ंच की आधुनिक तकनीक". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.885871.

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Abstract:
स ंगीत एक ऐसा माध्यम ह ै, जो साधक आ ैर श्रोता दोनों का े एक सम्मोहन मंे बाँध कर रखता ह ै, प ंरन्तु मन ुष्य की ध्वनि की कुछ सीमायंे होती ह ै, आ ैर जहाँ तक उसकी ध्वनि प ्राकृतिक रूप से जाती है, वहाँ तक ही वह असरदार सिध्द होती ह ै, इसलिए रिकाॅर्डिंग को मृत संगीत कहा जाता है । प ुराने समय मे संगीत में जो, मंच हा ेता था उसकी कुछ सीमाये ं थी, उससे सिर्फ उतने ही लोग लाभ उठा पाते थ े, जहाँ तक साधक (संगीतकार/ वादक) की ध्वनि पहुॅंचें । परन्तु यह बात सही ह ै, कि उस समय मनुष्य की शक्ति (भा ैतिक रूप से ) आज क े मनुष्य की तुलना में ज्यादा होती थी । इसके प ्रमाण रामायण, महाभारत आदि प्राचीन ग्र ंथो में देखने
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डॉ., हरिसिंह राजपुरोहित. "श्रीपरशुरामचरितमहाकाव्यम् - एक दृक्पात". 'Journal of Research & Development' 15, № 16 (2023): 177–80. https://doi.org/10.5281/zenodo.8362665.

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Abstract:
<strong>ग्रन्थ परिचय -</strong> &nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp; &lsquo;&lsquo;श्रीपरशुरामचरितमहाकाव्यम्&rsquo;&rsquo; बीकानेर मण्डलवास्तव्य कविवरेण्य डॉ. पुष्कर दत्त शर्मा द्वारा ग्यारह सर्ग में प्रणीत ऐतिहासिक महाकाव्य है। प्रस्तुत महाकाव्य का प्रकाशन प्रो. प्रभाकर शास्त्री एवं डॉ. सुभाष शर्मा के सम्पादकत्व में वर्ष 2011 में राष्ट्रिय संस्कृत साहित्य केन्द्र, जयपुर द्वारा किया गया। रामायण, महाभारत एवं पुराग्रन्थों को उपजीव्य बनाकर संस्कृत में विरचित ऐतिहासिक महाकाव्यों की संख्या आधुनिक काल में पर्याप्त कही जा सकती है, जिसमें भी ब्रह्मतेजोभास्कर भगवान् श्रीपर
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Dixit, Vibhakar. "श्रीमद्भगवद्गीता में सामाजिक सद्भावना का स्वरूप". Naagfani 12, № 40 (2022): 472–76. https://doi.org/10.5281/zenodo.14973357.

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Abstract:
भारतीय संस्कृत में भगवद्गीता का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह ग्रंथ भारतीय दर्शन के साथ सामाजिक सद्भावना एवं बंधुत्व भाव का भी प्रतिपादक रहा है। महाभारत के युद्ध के समय में राग, द्वेष एवं मोह से वशीभूत अर्जुन जब किंकर्तव्यविमूढ हो गये तब भगवान ने भगवद्गीता के माध्यम से ही कर्तव्य बोध कराया इसीलिए भगवद्गीता में भगवान के द्वारा ऐसे अनेक प्रकार के उपदेश किए गए हैं जो भारतीय समाज में समता एवं संप्रभुता को सम्यक रूप से अवस्थित कर सकते है। भगवद्गीता में समत्व के भाव को ही योग के नाम से कहा गया इसीलिए अपने मन के भाव को सामान रखें तथा सभी प्रकार के भूत भौतिक पदार्थों में समानता को एक विशिष्ट स्थान पर रखे
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निशा, माहौर. "प्राचीन भारतीय ग्रन्थ में चित्रकला उल्लेख". International Journal of Research - Granthaalayah 7, № 11(SE) (2019): 252–56. https://doi.org/10.5281/zenodo.3592634.

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Abstract:
प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में चित्रकला से सम्बन्धित नियमों का उल्लेख विस्तृत रूप से मिलता है जिसमें काव्य, नाटक, महाकाव्य, पुराण, उपनिषद् व विभिन्न विषयों के ग्रन्थों द्वारा भारतीय चित्र लेखन की प्राचीन परम्परा व सांस्कृतिक विधियों एवं जनमानस में उनकी लोकप्रियता का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे ग्रन्थ भी हैं, जिनमें स्वतन्त्र व व्यापक रूप से चित्रकला की व्याख्या विस्तार रूप से की गयी है। उदाहरण स्वरूप विष्णुधर्मोत्तर पुराण मार्कण्डेय द्वारा रचित इस ग्रन्थ में 269 अध्याय हैं। जिसके अन्तर्गत तीसरे खण्ड में संस्कृत विषयों में विशेषकर ललित कलाओं के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। जिसमें अध्याय
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हमाल Hamal, सीता Sita. "चमार जातिको इतिहास". HISAN: Journal of History Association of Nepal 10, № 1 (2024): 231–39. https://doi.org/10.3126/hisan.v10i1.74936.

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Abstract:
चमारलाई नेपाली शब्दसागरमा छालाको मालसामान बनाउने एक जाति, सार्की, मिझार, मिजार (कदर गर्दा) भनिएको छ । चमार जाति भारतको विहार र उत्तरप्रदेश लगायत बङ्गालबाट ईशाको पहिलो शताब्दीतिर नेपालमा प्रवेश गरेर तराई र मधेसका बस्तीहरूमा बसोबास गरेका हुन् । यस जातिलाई नेपालको पहाडी क्षेत्रमा सार्की, हरिजन भनिन्छ भने तराईका विविध क्षेत्रमा यिनीहरूलाई चमार, राम, हरिजन र रविदास भनेर सम्बोधन गरिन्छ । चमार जातिको चर्चा आर्य सनातन हिन्दु धर्म, वर्णव्यवस्था, धर्मग्रन्थ, रामायण र महाभारत, पुराण र उपनिषद र वंशावलीहरूमा पनि पाइएको छ । नेपाली सभ्यता तथा संस्कृतिभित्र अनेकौं जातीय समूहहरूको सिर्जना र संरचना हुँदै दलित स
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Kumawat, Sunil Kumar. "A Geographical Study of Historical Forts in Jhunjhunu District." Research Review Journal of Social Science 4, no. 2 (2024): 25–31. https://doi.org/10.31305/rrjss.2024.v04.n02.004.

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Abstract:
This article highlights the geography, historical events, and cultural significance of Jhunjhunu district. The historical roots of Jhunjhunu trace back to the civilizations of Mohenjo-Daro and Harappa, extending to the Mahabharata era. The prominent forts in the region—Bhopalgarh, Baghore, and Akhegarh—are particularly renowned for their architectural design, natural setting, and historical roles. Bhopalgarh is known for its strategic location and robust structure, while Baghore Fort, situated in a challenging terrain, holds significant strategic importance. Akhegarh Fort stands out for its cr
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प्रो., डॉ. संतोषकुमार गाजले. "भारतीय ज्ञान परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का योगदान". International Journal of Advance and Applied Research S6, № 18 (2025): 155–59. https://doi.org/10.5281/zenodo.15245270.

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Abstract:
हिंदुओं के आराध्य एवं हिन्दू संस्कृति के मुख्य आधार कहे जाते हैं राम मानवीय मूल्यों और सामाजिक सरोकारों से सराबोर है राम और उनका चरित्र मानवीय संवेदना, करुणा, दया, सहानुभूति आदि गुणों के प्रतीक और सबका हित चाहने वाले व्यक्तित्व के रूप में प्रसिद्ध है राम का आदर्श चरित्र हिंदी साहित्य की सगुण भक्ति धारा में काव्य रचना दो तरह की मिलती है- एक कृष्ण पर आधारित काव्य रचना दूसरी राम पर आधारित । राम पर आधारित काव्य रचना करने वाले कवियों ने राम को आराध्य मानकर उनके माध्यम से अपनी काव्य साधना का परिचय दिया । राम को विष्णु अवतार एवं दशरथ पुत्र के रूप में जाना जाता है, अतः राम भक्ति के रूप में वैष्णव भक्त
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शिल्पा, मसूरकर. "स ंगीत म ें नवाचार फ्यूज ़न म्यूजिक". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885869.

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Abstract:
भारत देश कला व संस्कृति का प ्रतीक माना जाता ह ै। भारतीय संगीत हमारे भारत की अमूल्य धरा ेहर क े रूप में अति प ्राचीन काल से ही सर्वोच्च स्थान पर विद्यमान है। सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही संगीत भी अस्तित्व में आया होगा, ऐसा माना गया ह ै, परंतु देखा जाये तो प ्रकृति क े रोम-रोम में ही संगीत बसता है, नदियों की बहती धारा, कल-कल की ध्वनि, हवा की सन्-सन् ध्वनि, पत्तों से टकराती हवा की ध्वनि व पत्तों पर गिरती बारिश के बूंदों क े टप्-टप् की ध्वनि, पक्षियों की चहचहाट आदि में संगीत को देखा, सुना, समझा व महसूस भी किया जा सकता ह ै। संगीत ही धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष का एकमात्र साधन है। भारत में पिछले र्कइ
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Kumar Chopra, Pradeep. "MODERN TECHNIQUE OF INNOVATION PLATFORM IN SINGING MUSIC." International Journal of Research -GRANTHAALAYAH 3, no. 1SE (2015): 1–2. http://dx.doi.org/10.29121/granthaalayah.v3.i1se.2015.3436.

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Abstract:
Music is a medium that binds both the seeker and the listener under a hypnosis, but there are some limits to the sound of a human being, and as far as his sound goes naturally, it is effective only in that, Hence recording is called dead music. In the old times, what used to be stage in music had some limitations, only that many people could benefit from it, as far as the sound of the seeker (musician / player) can reach. But it is true that at that time the power of man (physically) was more than that of man today. Evidence of this is found in ancient texts like Ramayana, Mahabharata etc. So
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प्रा., प्रवीण कारभारी शिंदे. "नई शिक्षा नीति २०२० की विशेषताएं और लाभ". International Journal of Advance and Applied Research 4, № 6 (2023): 79–81. https://doi.org/10.5281/zenodo.7663377.

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Abstract:
शिक्षा हर एक व्यक्ती के जीवन मे महत्वपूर्ण साधन है। जिसके माध्यम से व्यक्ती एक अच्छा जीवन बीता सकता है ।शिक्षा के बिना व्यक्ती का जीवन अधूरा है। आज हम जिस सुसंस्कृत समाज मे जी रहे है ।इस समाज मे शिक्षा के बिना जीना संभव ही नही है। शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ती के बुद्धी और मन का अच्छा विकास होता है। व्यक्ति को अपने जीवन मे सफल होने के लिए शिक्षा अनिवार्य है। हमने रामायण और महाभारत जैसे धर्मग्रंथ मे भी पढा है। की श्रीराम ने शिक्षा के लिए अपने गुरु के आश्रम मे शिक्षा प्राप्त की थी और श्रीकृष्ण ने भी गुरुकुल मे जाकर गुरु के पास शिक्षा प्राप्त की थी। इन दोनो ने अपने आचरण से बता दिया की शिक्षा और
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Rajopadhyaya, Shreelochan. "इन्द्रचोकको साँस्कृतिक सम्पदाको अध्ययन {The Study of the Cultural Heritages of Indrachok}". Nepalese Culture 16, № 1 (2023): 128–40. http://dx.doi.org/10.3126/nc.v16i1.54159.

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Abstract:
लिच्छविकालमै विकास भइसकेको ग्राम क्षेत्रअन्तर्गत इन्द्रचोक पनि एक हो । इन्द्रचोकबाट ६ वटा विभिन्न टोल जाने बाटो छन् । यसै ६ टोलहरुको केन्द्रविन्दुका रुपमा इन्द्रचोकलाई मानिएको छ । इन्दचोकमै आकाश भैरव मन्दिर छ । आकाश भैरवलाई किराँती पहिलो राजा यलम्बरसँग जोडिएर हेरिन्छ । त्रेता युगमा महाभारत युद्धको समयमा यलम्बर युद्ध हेर्न गएका थिए । यलम्बरले युद्धमा पराजित हुने समूहको पक्षमा आफू लड्ने निर्णय लिए । श्रीकृष्णले महादेवको अंशरुपी यलम्बर कौरवको पक्षबाट युद्ध लड्दा पाण्डव पराजित हुने भयले यलम्बरको शिर छेडने गरे । यलम्बरको त्यहीँ शिर आकाश मार्ग हुँदै इन्द्रचोकमा पुग्यो । विहान भएकाले शिर भैरवको रुपमा
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साधना, राज. "वर्तमान समय की सामाजिक आवश्यक्ता संगीत चिकित्सा". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.884736.

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Abstract:
अर्था त् गान, वाद्य आ ैर नृत्य तीनों का संगीत में अ ंतर्भा व हो गया ह ै। संसार में सभी जातिया ें में युद्ध उत्सव आ ैर प्रार्थ ना क े समय मानव संगीत का उपया ेग करता ह ै। इसमें फँूक कर बजाने वाले वाद्य (सुषिर) जिसमें बाँसुरी, अलगा ेजा, षहर्नाइ , तूर, तुरही, सिंगी षंख, सम्मिलित ह ै, तार या ताँत क े वाद्य (तत्), में वीणा, सितार, सरा ेद व सारंगी का उपया ेग होता ह ै और चमड़े से मढ़े ह ुए ठोंककर बजाने वाले वाद्य (अवनद्ध या आनद्ध) में मृदंग, मर्दल, दुंदुभि, ढोलक, डफ, सम्मिलित ह ै। भारत में भी संगीत की समृद्ध परम्परा रही ह ै। कुछ ही देशों में संगीत की इतनी पुरानी एवं समृद्ध परम्परा पायी र्गइ है। भारतीय
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प, ्रो. हर्ष वर्धन ठाकुर, та ्रो. रुपश्री दुबे प. "सितार क े प्रस्तुतिकरण म ें नवाचार का इतिहास". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886972.

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Abstract:
विभिन्न व ैदिक कालीन संगीत ग्र ंथ¨ं यथा ऋग्वेद, सामव ेद, षाखायण ब्राह्मण, षतपथ ब ्राह्मण आदि के अलावा रामायण, महाभारत से ल्¨कर प ुराण परंपरा तथा भरत क े नाट््य षाó एवं अभिनव भारती, संगीत रत्नाकर आदि समस्त ग्रंथ¨ं में तंत्र्ाी वाद्य¨ ं का वर्णन मिलता है। आगे चलकर संगीत दाम¨दर, आइने अकबरी, राग विब¨ध, संगीत पारिजात, राधाग¨विंद संगीत सार आदि, मध्यकालीन एवं 19वीं षती के ग्र ंथ¨ं में भी चार प्रकार क े वाद्य¨ं का वर्णन मिलता है। उल्ल्¨खनीय ह ै कि उपर¨क्त ग्र ंथ¨ं में वीणा का उल्ल्¨ख पाया जाता है जिससे यह कहा जा सकता ह ै कि प्राचीनकाल से ही वीणा वाद्य का भारतीय संगीत में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत
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