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रेखा, धीमान. "मुगल कालीन रंग निर्माण -प्रक्रिया (जहाँगीर काल क े संदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890563.

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Abstract:
म् ुागल चित्रकला सम्प ूर्ण एषिया में स्वतंत्र आ ैर महत्वपूर्ण पहचान बनाये हुए है। तैमूर वंष की पांचवी पीढ़ी क े बाबर ने सन् 1527 में भारत के कुछ हिस्सा ें पर अपना आधिपत्य कर मुगल संस्कृति का े स्थापित किया। जिसे ह ुमा ंयू , अकबर, जहाँगीर, षाहजहँा आ ैर आ ैरंगज ेब आदि षासकों ने विस्तार दिया। इस समय सभी कलाआ ें का समुचित विकास हुआ। षाहजहँा के षासन काल तक म्ुागल कालीन चित्रकला चरम - व ैभव को प ्राप्त थी। इस पर्र इ रानी, चीनी आ ैर पष्चिमी कला ष ैली का प ्रभाव पडा। इस समय चित्रकला लघ ु आ ैर स्फ ुट चित्रा ें क े रुप प ्रभावषाली रही। ’जहाँगीर काल (1605 स े 162र्7 इ . तक) चित्रकला लघ ुचित्रा ें क े रुप
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श्रीमती, सुधा शाक्य. "र ंग दृष्टि दा ेष: र ंग अ ंधता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.889298.

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Abstract:
्रस्तावना:- मानव में र्कइ प्रकार की संव ेदनाएं होती हैं जैसे दृष्टि, श्रवण, स्पर्श , गंध, स्वाद आदि। इनकी उत्पत्ति उद्दीपका ें से होती ह ै, जिसे व्यक्ति अपने बाह ्य पर्यावरण से ग्रहण करता ह ै, यह उद्दीपक ज्ञानेन्द्रिया ें अर्था त आंख, कान, त्वचा, नाक आ ैर जिव्हा को उद्दीप्त करते ह ैं, आ ैर विभिन्न संव ेदना को उत्पन्न करते ह ै ं। आइजनेक (1972) क े अनुसार ‘‘ संव ेदना एक मानसिक प ्रक्रम ह ै जा े आगे विभाजन या ेग्य नहीं होता। यह ज्ञानेन्द्रिया ें को प ्रभावित करने वाली बाह ्य उत्तेजना द्वारा उत्पादित हा ेता ह ै, तथा इसकी तीव ्रता उत्तेजना पर निर्भ र करती ह ै, आ ैर इसके गुण ज्ञानेन्द्रिय की प ्रकृत
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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श्रीमती, प. ूनम शर्मा. "विकलांग चित्रकारा ें के चित्रा े ं म ें र ंगा ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.890535.

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Abstract:
रंगा ें के बिना जीवन अपूर्ण ह ै। विकलांग चित्रकारों के चित्रों में रंगा ें का विश ेष महत्व ह ै नीरस जीवन जीने को मजबूर ये कलाकार शारीरिक अक्षमताओं के उपरांत भी अपनें चित्रा े ं में रंगा ें के विशिष्ट संया ेजन कर, उन्ह ें जीवित रुप प ्रदान कर , प ्राण डाल देते ह ै ं ,चित्रा े ं द्वारा मूक अभिव्यक्ति इतनी सशक्त होती ह ै कि देखने वाला स्वप्न में भी यह नहीं सा ेच पाता कि इस चित्र का े बनाने वाला विकला ंग ह ै। ए ेसे विशेष कलाकारों के रंगा ें का चयन अति विलक्षण होता है। वर्णों की विभिन्न रंगता ें के कारण ही हम वर्ण विशेष का नाम ज्ञात कर पाते ह ै ं। इन कलाकारा ें के चित्रा ें में रंगा ें के मान का वि
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सुरभि, त्रिपाठी. "''चित्रकला म ें र ंग'' (प्रागैतिहासिक काल स े वर्तमान काल तक के परिपेक्ष्य में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.890519.

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Abstract:
सुख-दुःख, उत्तेजना, भय, विश्राम, उल्लास आदि का पर्या य ही रंग ह ै। रंग प्रकृति के कण-कण में व्याप्त ह ै। घरा क े प ्रत्येक रंग का अपना एक सौदंर्य व नैसर्गिक गुण होता ह ै, परन्तु उसे किस प ्रकार प ्रयुक्त किया जाय यह कलाकार की क ुशलता एवं दक्षता पर निर्भर करता ह ै, एक प ्रकार से रंग ही मनुष्य की प ्रव ृत्ति की अभिव्यक्ति हैं, जिसे कलाकार अपने अनुभव के साथ प ्रस्तुत करता है। रंगा ें क े प ्रति मनुष्य का आकर्ष ण स्वाभाविक ही नहीं वरन् जन्मजात ह ै, इस प ्रकार रंग व्यक्ति विशेष की कलाक ृति का सबसे महत्वपूर्ण व सार्थ क तत्व ह ै। रंग व्यक्ति विश ेष की अभिव्यक्ति भी ह ै। हिन्दू धर्म में वर्ण (रंग) का
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क, ंचन क. ुमारी. "मधुवनी चित्रकला म ें र ंगा ें का समाव ेष". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889288.

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Abstract:
भारत एक प ्राचीन सा ंस्कृतिक देश ह ै। यहाँ की कला एवं संस्कृति में लोककला का अनूठा समन्वय दिर्खाइ देता ह ै। अनेक विद्वानों ने समय-समय पर लोककला क े महत्त्व को बताया ह ै। लोककलाऐं हमारे देश में लोक परम्पराओं संस्कृति का दर्प ण ह ै। जो विभिन्न रीति रिवाज उत्सव में देख े जा सकते ह ै। भारत जैसे ं देश में विभिन्न प्रान्तों में विविध रूपों में लोककला देखी जा सकती ह ै। जा े विभिन्न नामों से जानी जाती ह ै। जा े विश्वभर में ख्याति प ्राप्त ह ै-मधुवनी की लोक चित्रकला उन्हीं में से एक है। मधुवनी का नाम शायद इसलिए हुआ क्या ेंकि इस नाम का अपना एक महत्व ह ै। जा े यहा की लोक चित्रों में मधु जैसी मिठास है। दर
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आस्था, त्रिपाठी. "गायन विभिन्न सांगितिक विद्याआ ें म ें नवाचार ध्रुवपद षैली म े नवाचार". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.887027.

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Abstract:
भारत मे मुस्लिम सत्ता स्थापित होने क े पहले एक ही संगीत पदधति प ्रचार में थी । पूरे भारत वर्ष में प्रबन्धगान ही था, भारतीय सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक पहचान दैनिक क्रियाकलाप आदि प ्रब ंधो क े इर्द गिर्द ही बने रह े, प ्रायःसभी लोकजीवन का े अपने में आत्मसात कर लेने क े कारण भारतीय संगीत ने बाहरी संस्कृतिया े का े भी अपना लिया तथा उनक े लिये आकर्ष ण का केन्द्र भी बना रहा । जिस ष ैली ने सम्पूर्ण कला जगत का े एक सांगितिक सा ैंदर्य, सा ंगितिक कल्पना, सांगितिक भाषा व आकर्षण में षताब्दिया ें तक बांध े रखा उसी देषी प ्रबन्ध का बदला हुआ रूप ही ध्रुवपद है । ध्र ुवपद गायकी के लिये बनाये गये नियम व उसका अनुष
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अ, ंशुली श. ुक्ला शा ेध छात्रा. "र ंगा ें का चित्रकला म ें महत्वपूर्ण योगदान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.891986.

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Abstract:
प्रागैतिहासिक काल से ही चित्रकला में रंगा ें का मुख्य स्थान रहा है। चित्रकला में रंगा ें की भूमिका आकर्ष ण एवं सुन्दरता का े प्रकट करती ह ै। सामान्यतः प्रकृति रंगा ें की खान ह ै। व ैज्ञानिकों के अनुसार, रंगा ें की उत्पत्ति सूर्य के प्रकाश से ह ुयी ह ै जिसमें रंगा ें का समावेश मिलता ह ै। रंगा ें का संया ेजन भारतीय कला क े अन्तर्गत र्कइ श ैलिया ें जैसे-अजन्ता श ैली, पाल श ैली, अपभ ्रंश शैली, राजस्थानी श ैली, मुगल श ैली, दक्खन शैली, पहाड़ी श ैली आदि में दृष्टव्य ह ै। इसी प्रकार दक्षिण भारतीय राज्यों की चित्रकला रंगा ें के परिप्रेक्ष्य म ें केरल की चित्रकला भी विश ेष भूमिका रखती ह ै। जिसमें सर्व प
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डा, ॅ0 नाजिमा इरफान. "भारतीय चित्रकला में र ंगा ें का या ेगदान (अब्दुर्रहमान चुगताई के विष ेष संदर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889177.

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Abstract:
मानव जीवन में वर्ण का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। प्रत्येक वस्तु का ेई न कोई रंग लिये हुए ह ै। रंगा ें क े प ्रति मानव का आकर्ष ण कभी घटा नही ह ै। इसीलिये आदि मानव से लेकर आधुनिक मानव तक ने सा ैन्दर्य क े विकास में वर्ण का सहारा लिया ह ै। कमरे की रंग व्यवस्था से लेकर बाग बगीचा ें में फ ूल पौधों की रंगया ेजना तक में कलाकार ने अपना हस्तक्ष ेप किया ह ै क्योंकि रंगा ें का अपना एक प्रभाव हा ेता ह ै जो मानव की मानसिक भावनाओं का े उद्वेलित करने की शक्ति रखता ह ै। वर्ण सार्वभौमिक ह ै तथा चित्रकला में सबसे अधिक महत्व रंग का े दिया जाता है। रंगा ें क े विविध रुपों मे ं मन की भावनायें जुड़ी ह ै ं जैसे बसन्त क
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डा, ॅ. नर ेन्द्र कुमार ओझा. "भारत में स ंगीत क े बढ़ते ह ुए कदम". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886970.

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Abstract:
भारत की सभ्यता आ ैर संस्कृति ए ेतिहासिक ह ै। भारत में संगीत विषयक ज्ञान कोई आज का नहीं ह ै, यह बहुत पुराना ह ै। इतिहास में आज भी कई उच्च श्र ेणी क े कलाकार अपना स्थान बना चुके ह ै जैसे- भास्कर बुवा, मियाॅं जान, अब्दुल करीम खाॅ, फ ैयाज खाॅ, ह ैदर खाॅ, वजीर खाॅ, हफीज खाॅ, ओंकारनाथ ठाक ुर आदि। भारतीय कला के विकास में क ेन्द्र आ ैर राज्य सरकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, केन्द्रीय सरकार षिक्षा पात्र विद्यार्थियों का े छात्रव ृत्ति दे रही ह ै। इस प ्रकार से विद्यार्थि यों को प्रोत्साहन मिल रहा ह ै। यह स्पष्ट करते ह ुए कि आजादी की लड़ाई में भारतीय संग्रीत का अपना विषिष्ट स्थान रहा है, संगीत ने ही
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डा, ॅ. श्रीमती प्रतिभा श्रीवास्तव. "र ंग, स ेहत, सब्जियाँ - एक दृष्टिका ेण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.890493.

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Abstract:
रंगा ें का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इनके द्वारा हमें अपने चारों ओर की स्थितिया ें का ज्ञान होता ह ै आ ैर रंगा ें का प्रभाव ज्ञात हा ेता है। रंग मनुष्य की आँख में वर्णक्रम से मिलने पर छाया संब ंधी गतिविधियों से उत्पन्न होते ह ै। मूलरूप से इन्द्रधनुष क े सात रंगा ें का े ही रंगा ें का जनक माना जाता है। ये सात रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला व ब ैंगनी ह ै। मानवीय गुण धर्म में आभासी बोध के अनुसार लाल, नीला व हरा रंग हा ेता है। रंगा ें स े विभिन्न प ्रकार से वस्तु प ्रकाष स्त्रोत एवं श्रेणियां इत्यादि आती ह ै। प ्रकाष स्त्रोता ें के भा ैतिक, गुणधर्म जैसे प्रकाष विलियन, समावेषन, परावर्
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डा, ॅ. श्वेता पाण्डेय. "जामिनी राय की कला म ें र ंग योजना की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888821.

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Abstract:
जामिनी राय ने अपनी कला यात्रा के दौरान असंख्य चित्रा ें का निर्माण किया। इस निर्मा ण कार्य में शायद ही ऐसा कोई विषय हो जो जामिनी राय की तूलिका क े माध्यम से प्रकट ना हो सका हो। कला के प ्रति उनका समर्पण व उनकी निरन्तरता क े कारण ही उन्होंने इतनी बड़ी संख्या में चित्रा ें का निर्माण किया। जामिनी राय ने अपने ही चित्रा ें को र्कइ बार दोहराया है, इसलिये यह कह पाना बड़ा कठिन ह ै कि का ैन सा चित्र पहले का ह ै, कौन सा बाद का, सिर्फ श ैली को देखकर ही निर्मा ण काल का अनुमान लगाया जा सकता है। इसक े अतिरिक्त जामिनी राय ने अपने चित्रा ें में कभी भी तिथि का उल्लेख नही किया है, इस कारण यह समस्या और भी जटिल
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Ruchika, Shrivastava. "र ंगा ें म ें समाहित चित्रकार विकास भट्टाचार्यजी की कलाकृतियाँ". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890547.

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Abstract:
कला का इतिहास उतना ही प ुराना ह ै जितना की मानव का इतिहास। ऐसा कहा जाता ह ै कि मनुश्य ने जिस समय अपने नेत्रा ें का े खा ेला तब से ही वह अपनी आजीविका के लिये दिन प ्रतिदिन नव निर्मा ण के कार्य में जुट गया आ ैर उसकी इस नव निर्मा ण प्रवृति ने उसक े जीवन का े रा ेमा ंचक, खुषहाल व समृद्ध बनाया है। इस रोमांचकता, ख ुषहाली व समृद्धि को दर्षाने के लिये उसनें (मनुश्य नें) चित्रकला का सहारा लिया आ ैर उसे सही रुप में व्यक्त करने क े लिये ं रगा ें का े अपना साथी बनाया। उसने कहीं गहरे रंग ता े कही ं हल्के रंगा ें का प ्रयोग करके अपनी भावनाओं का े देखने वाला ें के सम्मुख प्रस्तुत किया। रंग किसी भी व्यक्ति के
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वर्षा, अग ्रवाल. "राग रागिनी और पर्यावरण का परस्पर सम्बन्ध". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–4. https://doi.org/10.5281/zenodo.883521.

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Abstract:
मन आ ैर उससे जुड ़ा मस्तिष्क जिस प्रकार हमार े भौगोलिक पर्यावरण को द ेखकर उस पर आसक्त होता ह ै और शरीर को अच्छे स्वच्छ पर्या वरण का साथ मानव मन को सुख शान्ति की ओर ले जाता है। भारतीय संगीत में विभिन्न राग-रागनिया ें का ध्यान पर्या वरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। ए ेसा सर्वविदित है कि एक अच्छा सा ेच, अच्छ े विचार, अच्छा स ंगीत आदि सभी अच्छे पर्या वरण का निर्मा ण करत े हैं। नदी का बहना, वायु का प ्रवाहमान होना, व ृक्षों की सांय-सांय सभी एक स ुखद संगीत ध्वनि का निर्माण करत े हैं जा े अला ैकिक है, सार्वभा ैमिक ह ै। परन्त ु हमारे सामव ेद में ऊँ का उच्चारण, मंत्रा ें का उच्चारण उद ्दात, अन ुद ्दात, स्
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डा, ॅ. प्रमिला षेरे. "चित्रकला म ें र ंगा ें का समन्वय एव ं स ंयोजन (प्रागैतिहासिक काल एव ं आधुनिक काल क े स ंदर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888823.

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Abstract:
भारत के विभिन्न क्षेत्रा े ं से उपलब्ध वस्त्रा ें, पाशाणचित्रा ें, मृत्तिका पात्रा ें, लाल-पीले रंगा ें में चित्रित रेंगते ह ुए कीड़ों, पशुओं, पक्षियों मनुष्या ें आदि की आकृति का अध्ययन करके प ्रागैतिहासिक भारत क े कलाप्रेम का सहज ही मंे परिचय मिल जाता है। आज की भाँति आदि मानव भी सौन्दर्या े पासक था। इसी सा ैन्दर्यप ्रेम क े कारण वह अपने अमूर्त भावा ें का े मूर्त रुप देने की ओर प ्रवृत्त ह ुआ। इसके प ्रमाण हमें मोहनजोदड़ा े तथा हडप्पा की ख ुर्दाइ यों से उपलब्ध कला सामग्री में देखने का े मिलते ह ै। ऋगवेद की प ्राचीनतम मंत्र स ंहिता की एक ऋचा से ज्ञात होता ह ै कि उस समय चमड़े पर चित्र अंकित करने
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डा, ॅ. साधना चा ैहान. "आ ंतरिक एव ं बाह ्य सज्जा में र ंग स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890365.

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Abstract:
रंग हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा ह ै, जितनी ख ुबसुरत हमारी यह रंगीन दुनिया है, उतनी ही विलक्षण इन रंगा े की दुनिया ह ै। बचपन में हमे सिर्फ तीन प्राथमिक रंगा े के नाम सिखाये जाते है:- पीला, नीला और लाल, परन्तु सच तो यह है कि, किसी संख्या में रंगा े को सीमित नही कर सकते। रंगा े की का ेई गिनती नही होती, क्या ेंकि इस दुनिया में असंख्य रंग ह ै। इसका कारण यह ह ै कि किन्ही भी दो रंगा े का े मिलाकर हम एक तीसरे रंग का निर्माण कर सकते ह ै आ ैर उन दो रंगा े की मात्रा में फ ेरबदल करके हम अनेक हल्के आ ैर गहरे रंगा े का निर्मा ण कर सकते ह ै। इस तरह हम अलग अलग सामंजस्य (ब्वउइपदंजपवदे) से असंख्य रंगा े का न
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श्रीमती, भारती पहाड़िया. "प्रकृति एव ं र ंग (पर्यावरण के सन्दर्भ में)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890583.

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Abstract:
असंख्य पहाड़, प ेड़, नदिया ं, झीलें, फ ूल-पत्तियां, पश ु-पक्षी अथवा मानव मात्र इस प्रकृति के अ ंग ह ै। मानव ने अपनी सा ैन्दर्या नुभूति का े कला के माध्यम से व्यक्त किया ह ै। रवीन्द्रनाथ टैगा ेर क े अनुसार - “ कलाकार प्रकृति प े्रमी ह ै। अतः उसका दास भी ह ै आ ैर प ्रेमी भी। ” कलाकार प ्रकृति में व्याप्त रंगतों का े एव ं उनक े प ्रभाव को फलक पर उतारते ह ैं, अमूर्त अभिव्यंजनावादी वस्तु का सूक्ष्म अध्ययन का उसक े प ्रभावों का तूलिकाघातों क े व ैविध्य से प ्रभावपूर्ण बनाते ह ै ं। इस प्रकार रंगा ें क े आकर्ष ण से चित्र आ ैर जीवन सजीव हो उठते ह ै ं। मानव जीवन में रंग का महत्वप ूर्ण स्थान है। रंगा े ं
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डाॅ., डाॅ.संगीता अग्रवाल. "चित्रक ृतियों म ें र ंगो का संयोजन (चित्रकार ''राजा रवि वर्मा'' के विश ेष संदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890533.

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Abstract:
चित्रण में रंगा े की ‘‘ स्प ्र ेस क्रिएटिंग प ्रापर्टी ’’ का े रचने वाले चित्रकार राजारविवर्मा का जन्म 29 अप ्रैल 184र्8 इ . में किलीमन्न ूर म ें ह ुआ। उनकी चित्रकला रूचि का े उनकी चित्रांकन रूचि उनके मामा राजवर्मा ने बढावा दिया। चित्रकला रूचि को देखकर उनके मामा अत्यंत प्रसन्नचित्त हुये आ ैर कहा कि ‘‘मनुष्य को केवल सिखा देने से कुछ नहीं आता। कुछ गुण उसमें प ैदाइशी हा ेते ह ैं। मैं तुझ े रंग बनाना सिखाऊॅंगा, पत्ते, फ ूल, रासायनिक दृव्य अनेक जाति और रंग की मिट्टी आदि से रंग तैयार हा ेते ह ै ं, लेकिन अपनी मर्जी का रंग ता े कलाकार का े ही खा ेजना पड़ता ह ै।’’1 विश ेषताय ें:-विशेष रूप से उन्हा ेने
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राय, अजय क. ुमार. "जनसंख्या दबाव से आदिवासी क्षेत्रों का बदलता पारिस्थितिकी तंत्र एवं प्रभाव (बैतूल-छिन्दवाड़ा पठार के विशेष सन्दर्भ में)". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 31–38. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20214.

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Abstract:
जनजातीय पारिस्थितिकी म े ं वन, क ृषि म े ं स ंलग्नता, आवास, रहन-सहन का स्तर, स्वास्थ्य स ुविधाआ े ं का अध्ययन आवश्यक हा ेता ह ै। सामान्यतः धरातलीय पारिस्थ्तििकी का े वनस्पति आवरण क े स ंदर्भ म ें परिभाषित किया जाता ह ै। अध्ययना ें स े यह स्पष्ट ह ैं कि यदि किसी स्थान पर जनस ंख्या अधिक ह ैं आ ैर यदि उसकी व ृद्धि की गति भी तीव ्र ह ै ं ता े वहा ं पर अवस्थानात्मक स ुविधाआ ंे क े निर्मा ण क े परिणास्वरूप तथा विकासात्मक गतिविधिया ें क े कारण विद्यमान स ंसाधना ें पर दबाव निर ंतर बढ ़ता ही जाता ह ैं, प ्रस्त ुत अध् ययन म े ं शा ेधार्थी आदिवासी एव ं वन बाह ुल्य क्ष ेत्र ब ैत ूल-छि ंदवाड ़ा पठार म ें ज
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डाॅ., कुमकुम भारद्वाज. ""समकालीन महिला चित्रकार अर्पिता बसु क े चित्रा ें म े रंग एंव प्रकृति" (पर्यावरण के स ंदर्भ म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.892035.

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Abstract:
मानव जीवन की भांति रंग एंव प ्रकृति के उद्रय का इतिहास भी बडा रहस्यमय आ ेर विराट है मनुष्य ने जिस समय प्रकृति की गोद मे अपनी आॅख खोली उस समय से ही उसने प ्रकृति का े रंगा े के साथ में देखा । रंग ए ंव प ्रकृति के बीना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ह ै। सष्ट्रि क े निर्मा ण के साथ ही रंग ए ंव प ्रकृति का अटूट संबंध रहा है। रंगा े के बिना प्रकृति तथा प ्रकृति के बिना रंगा े की कल्पना नहीं की जा सकती ह ै सष्ट्रि में उपस्थित प्रत्येक प ्रकृति वस्तु जैसे:- प ेड - पा ैधे ,पष ु - पक्षी, जीव - जन्तु ,नदी ,पहाड ,अग्नि ,जल, आकाष आदि सभी एक निष्चित स्वरुप के साथ रंग लिए होते है सष्ट्रि में विद्रमान प्रत्
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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साह ू, प. ्रवीण क. ुमार. "संत कबीर की पर्यावरणीय चेतना". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 57–59. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20219.

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Abstract:
स ंत कबीर भक्तिकालीन निर्ग ुण काव्यधारा अन्तर्ग त ज्ञानमार्गी शाखा क े प ्रवर्त क कवि मान े जात े ह ैं। उनकी वाणिया ें म ें जीवन म ूल्या ें की शाश्वत अभिव्यक्ति एव ं मानवतावाद की प ्रतिष्ठा र्ह ुइ ह ै। कबीर की ‘आ ंखन द ेखी’ स े क ुछ भी अछ ूता नही ं रहा ह ै। अपन े समय की प ्रत्य ेक विस ंगतिया ें पर उनकी स ूक्ष्म निरीक्षणी द ृष्टि अवश्य पड ़ी ह ै। ए ेस े म ें पर्या वरण स ंब ंधी समस्याआ ें की आ ेर उनका ध्यान नही गया हा े, यह स ंभव ही नही ह ै। कबीर क े काव्य म ें प ्रक ृति क े अन ेक उपादान उनकी कथन की प ुष्टि आ ैर उनक े विचारा ें का े प ्रमाणित करत े ह ुए परिलक्षित हा ेत े ह ैं। पर्या वरणीय जागरूक
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शशिकला, दुबे. "भारतीय आ ैर पाश्चात्य स ंगीत म ें नवाचार विषयक पारस्परिकता". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886105.

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Abstract:
वर्तमान समय में व ैश्विक स्तर पर प ्रायः हर क्षेत्र म ें नवाचार क े बढ़ते कदम परिलक्षित हा े रह े ह ैं। संगीत क े क्षेत्र म ें नवाचार का े लेकर नवीन प्रयोग हा े रह े हैं, जिससे संगीत विषयक विभिन्न धारणाओं का े जीवन्त गति मिल रही है। एक समय ए ेसा भी था कि जब भारतीय आ ैर पाश्चात्य संगीत क े मध्य भ ेद का े लेकर कहा जाता था कि भारतीय संगीत को सुनने वाले श्रोताओं क े सिर हिला करते ह ै ं जबकि पाश्चात्य संगीत का े सुनने वालों क े प ैर हिला करते ह ै ं। संगीत क े पारखी सुधीजनों क े बीच आज भी यही मान्यता स्थिर है। लेकिन प ्रयोग की दृष्टि से संयुक्त सृजनात्मकता अपनी बात का े मनवा ही लेती ह ै। संगीत में आ
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विपिन, कुमार. "विभिन्न शैली गत वर्ण विधान". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889314.

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Abstract:
चित्र बनाते समय कलाकार इस बात का ध्यान रखता है कि विषयानुरूप कौन से रंग लगाने चाहिये। लघ ु चित्रों में प ्रयुक्त रंग अधिकांशतः चटकीले ह ै। राजस्थानी, जैन तथा पाल शैली क े चित्रा ें में अधिकांश खनिज रंगा े का प ्रयोग किया गया है। इसका कारण तत्कालीन रंगा े की अपलब्धि भी है । गहरे नीले, लाल आ ैर पीले रंगा े का प ्रयोग चित्रा ें में बह ुतायत से मिलता ह ै। राजस्थानी चित्रों की वर्णिका शा ेख आ ैर चटकीले रंगा े की ह ै। क्योंकि आवागमन क े साधन कम होने की वजह से ये चित्र वाह ्य प ्रभाव स े मुक्त है। मुगल शैली क े चित्रा ें में फारस की कोमल रंगा े वाली पद्वति दिखाई देती ह ै। राजस्थानी की आपेक्षा रंगा े
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डा, ॅ. नीरज राव. "स ंगीत क े प्रचार-प्रसार म ें स ंचार साधना ें की भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.886994.

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Abstract:
मनुष्य को आदिकाल से ही संगीत मना ेरंजन एव ं आमोद-प्रमोद का साधन रहा ह ै। आदिकाल से ही मानव ने अपने मना ेरंजन क े साधन क े लिये विभिन्न प्रकार क े प ्रया ेग किये जैसे-जैसे मानव अपनी सभ्यता का विकास करता गया व ैसे-व ैसे उसकी समझ आ ैर सूझ-बूझ ने नृत्य, गायन आ ैर वादन की ओर आकर्षि त किया। मानव ने सभ्यता और संस्कृति को समझकर अपने का े प ्रकृति क े साथ तालमेल करते ह ुए संगीत का े सीखा। हमारे पा ैराणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख ह ै कि माँ पार्वती की गायन मुद्रा को देखकर भगवान षंकर ने क्रमषः पाँच राग हिंडा ेल, दीपक, श्री, मेघ, का ैषिक आदि रागों की रचना की एवं संगीत की उत्पत्ति भगवान षिव क े ताण्
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डा, ॅ. साधना चैहान. "प्रकृति एव ं र ंग ;पर्यावरण के स ंदर्भ मेंद्ध". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889233.

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Abstract:
मानव जीवन आ ैर प्रकृति का संबध पृथ्वी की रचना के साथ अटूट रहा ह ै, मानव ने प ्रकृति से प ्राप्त सभी चीजा ें का उपभोग अपने जीवनयापन आ ैर मना ेरंजन के लिये किया ह ै, एक ओर उसे प ्रकृति से भोजन, आवास आ ैर वस्त्र प ्राप्त होता है ता े दूसरी ओर प ्रकृति के दृश्या ें को देखकर और कलाकारों क े द्वारा चित्रित कर शान्ति की अदभूत अनुभूति होती ह ै। सर्व प ्रथम कलाकारों द्वारा जो चित्र चित्रित किये गय े उनमें प ्रकृति चित्रण नदी, पेड़, पा ैधे, पर्व त आ ैर पश ु पक्षी सभी चित्रित किये गये तथा इन्हें चित्रित करने में सहायक सामग्री रंग, तुलिका वह भी प्रकृति से प ्राप्त होती ह ै। सर्व प ्रथम कलाकारों ने प ्रकृत
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Tina, Porwal. "चित्रकला की भाषा: रंग,रेखा एव ं रुप". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.888831.

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Abstract:
मनुष्य सामाजिक प ्राणी होने के नाते सदैव इस प ्रयत्न में रहा है कि वह अपनी अनुभ ुतीया ें,भावनाओं तथा इच्छाओं का े दूसरा ें से व्यक्त कर सक े आ ैर दूसरा ें की अनुभुतीयों से लाभ उठा सके। इसके लिए उसे यह आवश्यकता पड़ी कि वह अपने का े व्यक्त करने के साधनों तथा माध्यमों की खा ेज तथा निर्मा ण करे। इसी के फलस्वरुप भाषा की उत्पत्ति हुई आ ैर काव्य,संगीत,नृत्य, चित्रकला,र्मूि र्तकला इत्यादि कलाओं का प्रादुर्भा व ह ुआ। ये सभी हमारी भावनाओं का े व्यक्त करने के माध्यम ह ै। का ेई अपनी भावनाआ ें का े भाषा द्वारा व्यक्त करता है, कोई चित्रकला द्वारा तथा र्कोइ नृत्य द्वारा। लक्ष्य तथा आदर्श सब का एक ही है, केवल
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आशा, सक्सेना स. ुनीता चैहान. "ज ैव विविधता और उसका संस्थितिक एवं असंस्थितिक स ंरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.838910.

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Abstract:
सामान्य शब्दों में जैव विविधता से तात्पर्य सजीवों (वनस्पति और प्राणी) म ें पाए जान े वाले जातीय भेद से ह ै। व्हेल मछली से लेकर सूक्ष्मदर्षी जीवाणु तक मन ुष्य से लेकर फफंूद तक ज ैव विविधता का विस्तार पाया जाता है। पर्या वरणीय ह्रास क े कारण जैव विविधता का क्षय हुआ है। मानव के अनियंत्रित क्रियाकलापा ें, बिजली, लालच और राजनीतिक कारणांे से जैव विविधता का विनाष बहुत त ेजी स े हो रहा ह ै। लगातार बढ ़ती जनसंख्याा, नगरीय क्ष ेत्रों की वृद्धि बाॅधों, भवनो ं तथा सड ़कांे का निर्मा ण, कृषि के लिए वना ें का कटाव, खदाना ें की खुदाई आदि ए ेसे कुछ उदाहरण है जिनसे प ्राक ृतिक संसाधनों में कमी आई है। जैव विविध
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क, े. राजलक्ष्मी. "चित्रकला म े र ंगा ें का सौन्दर्य". International Journal of Research – Granthaalayah Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.890599.

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Abstract:
नीला आकाश, चारा ें तरफ फैली हरियाली रंग-बिरंगे फ ूल एवं सु ंदर-सु ंदर पश ु-पक्षी। ईश्वर की अद्भुत कृति एवं सु ंदर रंग संया ेजन। ऐसा प्रतीत होता ह ै कि मानो भगवान चित्रकार क े रूप में इस संसार रूपी कैनवास पर अपने रंगा ें एव ं रेखाओं क े माध्यम से एक सु ंदर चित्रण कर दिया ह ैं। अगर चित्रण में यदि रंगा ें का समावेश न हा े तो क्या तब भी तब भी यह संसार इतना ही सुंदर दिख ेगा? संभवतः नहीं। मनुष्य अपने नेत्रा ें क े माध्यम से जो कुछ भी देखता उनमें रंगा ें का समावेश होता ही ह ै, अतः यह कहना सर्व था गलत नही ं होगा कि जीवन में रंगा ें का स्थान सर्वोपरि है आ ैर यही रंग हमें अपने सा ैन्दर्य व आकर्ष ण के मा
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डा, ॅ. निषा ज. ैन. "राजस्थानी ला ेक संगीत का समाज पर प्रभाव". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.886822.

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Abstract:
भारत के प ्रदेषा ें में राजस्थान अपनी सभ्यता एव ं संस्कृति की मौलिकता क े कारण सर्वदा से पर्यटक, संगीतकार, षिल्पकार आदि के लिए का ैतूहल का विषय रहा ह ै। राजस्थान की संस्कृति खान-पान, वेषभूषा, नृत्य, संगीत एवं लोक गीतों क े लिए प ्रत्येक समय में विषिष्ट बनी र्ह ुइ ह ै। राजस्थान में पल्लवित लोक संस्कृति में क्षेत्रीय रहन-सहन, खान-पान व लोकगीतों का खजाना छिपा ह ुआ ह ै। यहाँ के रीति-रिवाज रहन-सहन, वेषभूषा, चटकीले रंग, तीज त्या ैहार, मेले, पर्व में पहनावा तथा सिर पर साफे ब ंध े हुए प ुरूष एवं घ ेरदार लहँगे में महिला षहरवासिया ें क े आकर्ष ण का केन्द्र हा ेती ह ै। राजस्थानी लोक संगीत सभी विषिष्ट अवस
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मनीषा, भट्ट. "उत्तराखण्ड की सामाजिक पृष्ठभ ूमि आ ैर लोकसंगीत का सम्बन्ध". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886966.

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Abstract:
समाज शब्द का प्रयोग हम बहुधा दैनिक बोलचाल की भाषा में करते ह ैं, समाजशास्त्र की भाषा में कह ें तो व्यक्तिया ें क े समूह का े ही समाज नहीं कहा जा सकता, व्यक्तिया ें में पाये जाने वाले पारस्परिक सम्बन्धो ं की व्याख्या का े ही समाज कहा जाता ह ै। ‘मैकाइवर एवं प ेज ने इस संदर्भ में उचित ही कहा है कि ‘‘समाज सामाजिक सम्बन्धा ें का जाल है।’’ सामाजिक सम्बन्धों क े लिए तीन बातें आवश्यक है - 1. व्यक्तिया ें का े एक-दूसरे का आभास (जानकारी) होना। 2. उनमें अर्थ पूर्ण व्यवहार होना, तथा 3. उनका एक-दूसरे क े व्यवहार से प्रभावित होना। विश्व मानव समाज की वृहत्तम इर्काइ है और इसका महत्वपूर्ण अ ंग ह ै, समाज। लोक स
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डा, ॅ. सुवर्णा वाड. "स ंगीत क े पाठ्यक्रम में परिवर्तन की स ंभावित दिशाएं". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–5. https://doi.org/10.5281/zenodo.887000.

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Abstract:
प्रस्तुत विषय की प्रस्तावना करते समय विषय के प्रत्येक बिन्दु का विश्लेषण करना आवश्यक ह ै जैसे संगीत के पाठ्यक्रम में परिवर्तन क्या ें? तथा देवी अहिल्या विश्व विद्यालय का विशेष संदर्भ क्या ें? मेरी सम्पूर्ण शिक्षा देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में होने , मैं गत 36 वर्षों से क ंठ संगीत के पाठ्यक्रम क े सम्पर्क में ह ूँ। दे.अ.वि.वि का कंठ संगीत का पाठ्यक्रम र्कइ वर्षा ें तक एक समान ही रहा परन्तु कम्प्यूटर एव ं कॉमर्स जैसे विषयों क े कन्या महाविद्यालयों मे ं पदार्प ण होने से छात्राओं की सा ेच म ें परिवर्तन आया। प ूर्व में कला संकाय में छात्राओं की संख्या काफी सराहनीय होती थी परन्तु धीरे धीरे छात्राओं
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मुक, ुन्द कुमार. "वस्त्र अलंकरण म ें र ंगा ें की पुरातन भ ूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.888816.

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Abstract:
रंग वस्त्र आकल्पन (अलंकरण) का मूलाधार है। वस्त्र्ा के अनुरूप रंग द्रव्य¨ ं ;कलमेद्ध का चयन आ ैर उनक े प्रय¨ग की तकनीक, कलाकार अथवा रंगरेज के निजी दृष्टिक¨ण एवं उनक े अनुभव पर आधारित ह¨ती है। रंग¨ ं का, व्यक्ति की मन¨भावनाअ¨ ं पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन्हीं पहल ुअ¨ं का अध्ययन करके वस्त्र्ा¨ं क े विविध प्रकार क े अनुसार रंगद्रव्य का सफलताप ूर्वक प्रय¨ग किया जाता ह ै। वस्त्र्ा रंर्गाइ की कला अतिप्राचीन ह ै। भारतवर्ष में र्कइ ऐसे प्रमाण मिलते ह ैं जिनमें वस्त्र्ा ब ुर्नाइ एवं वस्त्र्ा-रंर्गाइ के विषय र्में इ सा प ूर्व एवं उत्तरार्ध में मनुष्य¨ ं क¨ ज्ञान था। वस्त्र्ा ब ुनाई अ©र रंर्गाइ के इतिहास
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सचिव, ग©तम (श¨ध छात्र्ा). "चित्र्ाकला म ंे र ंग (प्राग ैतिहासिक काल स े वर्तमान काल तक क े परिप्रेक्ष्य म ें)". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.892056.

Full text
Abstract:
मानव जीवन में वर्ण (रंग) का महत्वपूर्ण स्थान ह ै। प्रत्येक वस्तु क¨ई न क¨ई रंग लिये हुये ह ै। वस्तुअ¨ ं के धरातल में रंग ह¨न े के कारण ही वह हमें दिर्खाइ देती ह ै। रंग¨ ं के प्रति मानव का आकर्ष ण कभी घटा नहीं है। इसीलिये आदिम गुफाचित्र्ा¨ं से ल्¨कर आधुनिक मानव तक ने स©न्दर्य क े विकास में रंग¨ ं का सहारा लिया है। रंग¨ ं का महत्व हमें मानव जीवन के इतिहास के हर अध्याय में देखने क¨ मिलता ह ै। वर्ण प्रभाव अर्थात् रंग प्रभाव के आधार पर चित्र्ा क¨ स©न्दर्य प्रधान बनाया जा सकता है। रंग हमारे जीवन का महत्वप ूर्ण हिस्सा है; इसके बिना प्रकृति उपस्थित किसी भी पदार्थ या जीव का अपना क¨ई वजूद नहीं ह ै। रंग¨
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