Academic literature on the topic 'अपतन'

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Journal articles on the topic "अपतन"

1

Bhole, R.V. "जुआन चीत्कार : एक विश्लेषण". Journal of Research & Development 16, № 5 (2024): 95–96. https://doi.org/10.5281/zenodo.11191307.

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Abstract:
        डॉ. यशोदानाथ झाक जन्म मधुबनी जिलाक ग्रामरत्न सरिसब-पाही स्थित पलिवार महिषी मूलक वत्सगोत्रीय श्रोत्रिय ब्राह्मण पण्डित धरानाथ झाक प्रपौत्र, सुकवि पण्डित गणनाथ झाक पौत्र, कवि पण्डित आनन्दनाध झाक पुत्रक रुपमे छओ जून 1944 ई. में भेल छलनि । यशोदा बाबूकः जन्म ओहि परिवारमे भेल छलनि जे ‘झा परिवार’ मिथिला के कहए, देशसे बाहर विदेशोमे अपन विद्वताक हेतु पूजित-सम्मानित होइत रहैत छल, देश-विदेशकेर विश्वविद्यालयमे बेर-बेर एहि परिवारक चर्चा होइत रहत छल। ओहि परिवारक चर्च करैत डॉ. जगदीश मिश्र लिखने छथि- “ कवि डॉ. यशोदानाथ झाजीक पितामह पाँच भाइ । पाँचो एकसँ बढ़ि एक सर
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मिश्रा, आ. ंनद म. ुर्ति, प्रीति मिश्रा та शारदा द ेवा ंगन. "भतरा जनजाति में जन्म संस्कार का मानवशास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 39–43. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20215.

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Abstract:
स ंस्कार शब्द का अर्थ ह ै श ुद्धिकरण। जीवात्मा जब एक शरीर का े त्याग कर द ुसर े शरीर म ें जन्म ल ेता है ता े उसक े प ुर्व जन्म क े प ्रभाव उसक े साथ जात े ह ैं। स ंस्कारा े क े दा े रूप हा ेत े ह ैं - एक आंतरिक रूप आ ैर द ूसरा बाह्य रूप। बाह ्य रूप का नाम रीतिरिवाज ह ै जा े आंतरिक रूप की रक्षा करता है। स ंस्कार का अभिप्राय उन धार्मि क क ृत्या ें स े ह ै जा े किसी व्यक्ति का े अपन े सम ुदाय का प ुर्ण रूप स े योग्य सदस्य बनान े क े उदद ्ेश्य स े उसक े शरीर मन मस्तिष्क का े पवित्र करन े क े लिए किए जात े ह ै। सभी समाज क े अपन े विश ेष रीतिविाज हा ेत े ह ै, जिसक े कारण इनकी अपनी विश ेष पहचान ह ै,
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निशा, प. ंवार. "ज ैव विविधता एवं संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882969.

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Abstract:
पृथ्वी अपन े म ें असीम संभावनाए ं एकत्रित किये ह ुए है । प ्रकृति के अन ेकान ेक विविधताओ ं की कल्पना कर ही इस बात का पता लगाया जा सकता ह ै कि संभावनाए ं पक्ष की ह ै या विपक्ष की तात्पर्य प ृथ्वी पर अथाह कृषि भूमि, जल वृक्ष, जीव-जन्त ु तथा खाद ्य पदार्थ थे, परन्त ु मानव के अनियंत्रित उपभोग के कारण ये सीमित हा े गये ह ै । पर वास्तव में हम अपन े प्रयासों से इन संपदाओं का उचित प ्रब ंध कर इसे भविष्य के लिए उपयोगी बना सकत े ह ै । जैव विविधता किसी दिये गये पारिस्थितिकी त ंत्र बायोम, या एक प ूर े ग ृह में जीवन क े रूपों की विभिन्नता का परिणाम है । ज ैव विविधता किसी जैविक त ंत्र के स्वास्थ्य का घोतक ह
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म, ुकेश दीक्षित. "सामाजिक समस्याएं व पर्या वरण: उच्चतम न्यायालय की भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882783.

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Abstract:
पर्यावरण से मानव का गहरा संब ंध ह ै। मन ुष्य जब से इस पृथ्वी पर आया, उसन े पर्या वरण को अपन े साथ जोड ़े रखा है। सूर्य, चन्द ्रमा, पृथ्वी, पर्वत, वन, नदियां, महासागर, जल इत्यादि का प्रयोग मन ुष्य मानव विकास के आर ंभ से करता आ रहा है। मन ुष्य अपन े द ैनिक जीवन में लकड ़ी, भोजन, वस्त्र, दवायें इत्यादि प्राप्त करन े हेत ु प्राकृतिक सम्पदा का शुरू से उपयोग किया है और वर्त मान मे निर ंतर जारी है। सामाजिक परिवर्त न क े साथ औद्योगिक विकास एव ं जनसंख्या वृद्धि म ें पर्यावरण को प्रभावित किया है। औद्योगीकरण के कारण व्यक्ति आज अपनी आवश्यकता क े अन ुरूप पर्यावरण को बदलन े के लिये सक्रिय कारक बन गया है। वन
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प्रगति, वर्मा. "प्राक ृतिक संसाधनों का संरक्षण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.882980.

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Abstract:
मानव जीवन का अस्तित्व, प्रगति विकास संसाधनों पर निभ्रर करता है । आदिकाल स े मन ुष्य प्रकृति स े विभिन्न प्रकार की वस्त ुएँ प्राप्त कर अपनी आवष्यकताओं को प ूरा करता ह ै वास्तव में संसाधन व े ह ै जिनकी उपया ेगिता मानव क े लिए हो, अन्य जीवों क े समान ही मानव भी पर्यावरण का ही एक अंग ह ै परन्त ु एक विभिन्नता जो सहज ही परिलक्षित होती ह ै वह यह है कि अन्य जीवों की त ुलना में मानव अपन े चारो ं ओर के पर्या वरण का े प्रभावित तथा कुछ अर्थो में उसे नियंत्रित कर पान े की पर्याप्त क्षमता ह ै यही कारण है कि मानव का पर्यावरण के साथ संब ंधों को इतना महत्व दिया जाता ह ै । आधुनिक जीवन में मानव तथा पर्या वरण के
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चा ैधरी, र. ेखा. "हिन्दी साहित्य म ें नारी पात्रा ें का मना ेविज्ञान". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 91–97. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201915.

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Abstract:
नारी मनोविज्ञान के संबंध में नारी मनोभावों के विभिन्न पक्षें में अचेतन, काम, अहम, अंतद्व र्न्द, हीनता, श्रेष्ठता, आत्मपीड़न, परपीड़न, कुन्ठा की अभिव्यक्ति द ेखन े को मिलती है। मानव मन के विभिन्न स्तरों पर नारी मन की व्यथाओं, भावनाओं संवदनाओं के विभिन्न पक्ष इन उपन्यासों में उभर कर आत े है। इन उपन्यासां में पात्रों की गहन मानसिक प्रक्रिया को उपन्यासकारों न े स्पष्ट किया है साथ ही इन नारी मन और उनके व्यक्तित्व के मूल द्वन्दो को व्यक्त किया हैं इस अध्ययन में जो मनोवैज्ञानिक उपनन्यास चुने गये उनके मार्मिक जीवन की जटिलता के कारण युवा मनोविज्ञान, व्यक्तित्व मनोविज्ञान और असामान्य जीवन की अभिव्यक्तियां
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डाॅ., आरती तिवारी. "सामाजिक मुद ्दे एव ं पर्यावरण". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574865.

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Abstract:
मन ुष्य अपन े पर्यावरण क े साथ ही जन्म लेता ह ै। और उसके बीच ही अपना जीवन यापन करता ह ै। द ूसर े शब्दों में सारा समाज पर्यावरण के बीच अर्था त प्रकृति की गोद में अपना जीवन यापन करता ह ै। किन्त ु इस जीवनयापन के लिए मन ुष्य मुख्य रूप से पर्यावरण पर निर्भर करता है। अपन े जीवन को स ुचारू रूप से चलाए रखन े एव ं उसे और अधिक ब ेहतर बनान े के लिए मन ुष्य निर ंतर प्रयास करता है तथा इसके लिए वह प्राक ृतिक संसाधनों का दोहन करता है। इस प्रकार मन ुष्य आदिम युग स े आज तक निरंतर प्रकृतिक संसाधनों से अपना जीवन चलाता आया है। जिससे प्रकृति का े कुछ नुकसान भी पहुंचा है। क्योंकि मन ुष्य न े आधुनिकता की अंधीदौड में
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प, ूर्णेन्द ु. शर्मा. "पर्यावरण संरक्षण सब का दायित्व". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.883541.

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Abstract:
सृष्टि के प्रारम्भ से वर्त मान युग तक मन ुष्य न े विकास की लम्बी यात्रा तय की है। किन्त ु इस यात्रा में वह जीवन के शाश्वत सत्य को पीछ े छोड ़कर अकेला आगे निकल आया है जिसके परिणाम में पर्यावरण की प्रलयंकारी समस्याओं न े जन्म ले लिया ह ै आ ैर विश्व समुदाय विगत र्कइ दशकों से इनसे जूझता हुआ आग े बढ ़न े का प्रयास कर रहा है। 1972 में इसकी गम्भीरता को द ेखत े हुए स्टाॅकहोम मे ं संयुक्त राष्ट ª सम्म ेलन आयोजित किया गया जिसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी न े पर्यावरण संरक्षण एव ं मानव जाति के कल्याण हेत ु दिय े गये अपन े वक्तव्य म ें कहा कि, ’’मन ुष्य तब तक सभ्य एव ं सच्चा मानव नहीं हो सकता जब तक कि वह सम्प
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ब ेगम, आब ेदा. "छŸासगढ ़ क े महाप ुरूषा ें का सामाजिक समरसता म ें या ेगदान’". Mind and Society 8, № 01-02 (2019): 87–90. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-81-2-201914.

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Abstract:
सामाजिक समरसता एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा करना एवं इसे ठीक प्रकार से कार्यान्वित करना आज समाज एवं राष्ट ्र की मूलभूत आवश्यकता है। इसके लिए हमें सर्वप्रथम सामाजिक समरसता के अर्थ का व्यापक अध्ययन करना आवश्यक है। संक्षेप में इसका अर्थ है सामाजिक समानता। यदि व्यापक अर्थ द ेखें तो इसका अर्थ है जातिगत भेदभाव एव ं अस्पृश्यता का जड ़मूल से उन्मूल कर लोगों में परस्पर प्रेम एवं सौहाद र् बढ ़ाना तथा समाज के सभी वर्गों एव ं वर्णों के मध्य एकता स्थापित करना। समरस्ता का अर्थ है सभी को अपन े समान समझना। सृष्टि में सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान है और उनमें एक ही चैतन्य विद्यमान है इस बात को हृदय से स्वीकार
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आलोक, गोयल किरण बड े़रिया राकेश कवच े. "विकास के लिए पर्या वरण क े क्षेत्र म ें मनुष्य की नैतिक भूमिका". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH 3, № 9 (Special Edition) (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.574866.

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Abstract:
मानव जीवन का समूचा अस्तित्व पर्यावरण पर आधारित है। जहाँ पर्यावरण का सन्त ुलन विकास मार्ग का सन्त ुलन विकास मार्ग की प्रगति को प्रषस्त करता है। वहीें पर्यावरण का असन्त ुलन व्यक्ति ही नहीं समूच े समाज और मानव स ंसाधनों के विनाष का प्रमुख कारण ह ै। स ुन्दरलाल बहुगुणा का कहना है कि ‘‘पहले मन ुष्य प्रक ृति का ही एक अभिन्न हिस्सा था। प्रक ृति से उसका रिष्ता अहिंसक आ ैर आत्मीयता का था। स्वार्थ आ ैर भोग संस्क ृति के कारण अब यह न क ेवल बदल गया बल्कि विकृत हो गया।’’ मन ुष्य क े अन ैतिक आचरण से जहां पर्यावरण सहित लगभग सभी क्षेत्रों मंे पतन हुआ ह ै वहीं अच्छ े आचरण और सामाजिक स्वीकृति से किया जान े वाले व
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Dissertations / Theses on the topic "अपतन"

1

Rai, Lalita. "Tulsi `apotan` ka kavyakritiharuko bislesanatmok adhyayan तुलसी 'अपतन' -का काब्यकृतिहरुको विश्लेषणात्मक अध्ययन". Thesis, University of North Bengal, 2006. http://hdl.handle.net/123456789/1696.

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