Academic literature on the topic 'शारीरिक विकास'

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Journal articles on the topic "शारीरिक विकास"

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ख ुट, डिश्वर नाथ. "बस्तर का नलवंश एक ऐतिहासिक पुनरावलोकन". Mind and Society 9, № 03-04 (2020): 47–52. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-93-4-20217.

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Abstract:
सभ्यता का विकास पाषाण काल स े प ्रार ंभ हा ेता ह ै। इस काल म ें बस्तर म े रहन े वाल े मानव भी पत्थर क े न ुकील े आ ैजार बनाकर नदी नाल े आ ैर ग ुफाआ ें म ें रहत े थ े। इसका प ्रमाण इन्द ्रावती आ ैर नार ंगी नदी के किनार े उपलब्ध उपकरणों स े हा ेता है। व ैदिक युग म ें बस्तर दक्षिणापथ म ें शामिल था। रामायण काल म ें दण्डकारण्य का े उल्ल ेख मिलता ह ै। मा ैर्य व ंश क े महान शासक अशा ेक न े कलि ंग (उड ़ीसा) पर आक्रमण किया था, इस य ुद्ध म ें दण्डकारण्य क े स ैनिका ें न े कलि ंग का साथ दिया था। कलि ंग विजय क े बाद भी दण्डकारण्य का राज्य अशा ेक प ्राप्त नही ं कर सका। वाकाटक शासक रूद ्रस ेन प ्रथम क े समय
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द्विजेश, उपाध् याय, та मकुेश चन्‍द र. पन डॉ0. "तबला एवंकथक नृत्य क अन् तर्सम्‍ बन् धों का ववकार्स : एक ववश् ल षणात् मक अ्‍ ययन (तबला एवंकथक नृत्य क चननांंक ववे ष र्सन् र्भम म)". International Journal of Research - Granthaalayah 5, № 4 (2017): 339–51. https://doi.org/10.5281/zenodo.573006.

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Abstract:
तबला एवांकथक नृत्य ोनन ताल ्रधाान ैं, इस कारण इनमेंसामांजस्य ्रधततत ैनता ै। ूरवव मेंनृत्य क साथ मृो ां की स ां त ैनतत थत ककन्तुबाो म नृत्य मेंजब ्ृां ािरकता ममत्कािरकता, रांजकता आको ूैलुओांका समाव श ैुआ तन ूखावज की ांभतर, खुलत व जनरोार स ां त इन ूैलुओांस सामांजस्य नै ब।ाा ूा। सस मेंकथक नृत्य क साथ स ां कत क कलए तबला वाद्य का ्रधयन ककया या कजस मृो ां (ूखावज) का ैत ूिरष्कृत एवां कवककसत प ू माना जाता ै। तबला वाद्य की स ां त, नृत्य क ल भ सभत ूैलुओांकन सैत प ू में्रधस्तुत करन मेंस ल साकबत ैु। कथक नृत्य की स ां कत में ूररब बाज, मुख्यत लखन व बनारस ररान का मैत् वूरणव यन ोान रैा ै। कथक नृत्य की स ां कत
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मंज, ू. गा ैतम. "र ंग आ ैर राग का समन्वयः काँगड़ा चित्रा ें क े संदर्भ में". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.889215.

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Abstract:
काँगड़ा चित्रकला में संगीत व चित्रकला का अद्भूत समन्वय संसार भर की कलाआंे मंे एक अद्वितीय उपलब्धि ह ै यही कारण ह ै कि काँगड़ा चित्रकला का े कला विद्वाना ें ने समस्त पहाड़ी चित्रकला का पर्याय भी माना है। काँगड़ा चित्रश ैली में निर्मित चित्रो की रंग या ेजना अनूठी ह ै ए ेसा प्रतीत होता ह ै कि काँगड़ा का समस्त प ्रकृति सा ैन्दर्य कलाकार ने रंग व रेखाओं क े माध्यम स े चित्रा ें में भर दिया। विषया ें की विविधता इस श ैली का गुण ह ै। यहाँ क े कलाकार ने साहित्य एव ं काव्य के साथ संगीत की अमूर्त, तथा ध्वन्यात्मक विषय वस्तु का े भी रंग एव ं रेखाओं द्वारा साकार रूप प ्रदान किया जो कि विश्व की किसी अन्य कल
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डाॅ., भावना ग. ्रोवर. "कत्थक नृत्य में नवीन प्रया ेगः विश्ल ेष्णात्मक अध्ययन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.886073.

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Abstract:
भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक की आरंभ से ही एक विशाल व समृद्ध परम्परा रही ह ै। प्रारंभ से ही समय परिवर्तन के साथ-साथ कथक नृत्य में नवीन प ्रयोग हा ेते रह े आ ैर नृत्य परिवर्तित भी होता गया। सोलहवीं शताब्दी जिसे हम रीति-काल क े नाम से पहचानते ह ै उस समय तक कथक नृत्य पर राम व कृष्ण भक्ति का प्रभाव था तथा राम व कृष्ण लीलाआ ें ही कत्थक नृत्य का मुख्य आधार थी। सत्र्ाहवीं व अठारहवीं शताब्दी में जब कथक नर्तको को नवाबा े व राज्या े ं का संरक्षण प ्राप्त ह ुआ आ ैर कथक नृत्य में नये प ्रया ेग ह ुए फलतः अनेक परिवर्तन आये। हिन्दु राजाओं क े यहाँ कथक नृत्य का सात्विक रूप रहा आ ैर मुस्लिम नवाबों जा े स्वभावतः
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चा ैहान, ज. ुवान सि ंह. "प ्रवासी जनजातीय श्रमिका ें की प ्रवास स्थल पर काय र् एव ं दशाआ ें का समाज शास्त्रीय अध्ययन". Mind and Society 8, № 03-04 (2019): 38–44. http://dx.doi.org/10.56011/mind-mri-83-4-20196.

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Abstract:
भारत म ें प ्रवास की प ्रक्रिया काफी लम्ब े समय स े किसी न किसी व्यवसाय या रा ेजगार की प ्राप्ति ह ेत ु गतिशील रही ह ै आ ैर यह प ्रक्रिया आज भी ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाय म ें गतिशील दिखाइ र् द े रही ं ह ै। प ्रवास की इस गतिशीलता का े रा ेकन े क े लिए क ेन्द ्र तथा राज्य सरकार न े मनर ेगा क े तहत ् प ्रधानम ंत्री सड ़क या ेजना, स्वण र् ग ्राम स्वरा ेजगार या ेजना ज ैसी सरकारी या ेजनाआ े ं का े लाग ू किया ह ै, ल ेकिन फिर ग ्रामीण जनजातीय ला ेगा े ं क े आथि र्क विकास म े ं उसका असर नही ं दिखाइ र् द े रहा ह ै। ग ्रामीण जनजातीय सम ुदाया ें म े ं निवास करन े वाल े अधिका ंश अशिक्षित हा ेन े क े कारण शा
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Dr., Vasundhara Pawar. "राजास्थानी चित्रकला म ें र ंग स ंयोजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1–2. https://doi.org/10.5281/zenodo.891808.

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Abstract:
‘‘पर्व ता ें में सुमेरु, पक्षियों में गरुण, व्यक्तिया ें में राजा श्र ेष्ठ ह ै, व ैसे ही कलाओं में ‘‘चित्रकला‘‘ श्र ेष्ठ मानी गई है।‘‘ मानव की अनुभूतिया ें की अभिभक्ति का नाम कला ह ै। कुमार स्वामी ने काहा ह ै कि कला केवल भावों का प ्रदर्शन ही नही करती अपितु अध्यात्मिक सन्देश की वाहक भी ह ै। कला‘ शब्द का उल्लेख ऋग्व ेद के आठवें मण्डल मे मिलता ह ै। महाजनपद काल तक 64 कलाओं की गणना प्रारम्भ हो चुकी थी। भारतीय चित्रकला का स्वरूप जितना प्रशस्त ह ै, उतना ही इसका इतिहास प ुरातन है। भारत मे चित्रकला क े प्राचिन्तम नमूने प ्रागैतिहासिक शैल चित्रा े मे मिलते ह ै। जिनमें मिर्जा पुर, भीमव ेटिका तथा बाघ की
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श्रीमती, मनीषा शर्मा. "स ंगीत म ें नवाचार का माध्यम स ंस्कृत भाषा". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.885863.

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Abstract:
मानव सभ्यता के साथ-साथ कलाओं का विकास हुआ है । व ैदिक युग क े अ ंतिम कालखण्ड तक संगीत संब ंधी का ेई स्वतंत्र ग्र ंथ उपलब्ध नही ं ह ै तथापि संगीत कला के संबंध में उल्लेख स्थान पर अवश्य प ्राप्त होते ह ैं । ऋग्वेद में गीत, वाद्य आ ैर नृत्य तीना ें क े संब ंध में अन ेक उल्लेख पाये जाते ह ै ं। ऋग्वेद में गीत क े लिए गीर, गातु, गाथा, गायत्र तथा गीति जैसे शब्दों का प ्रयोग किया जाता था । यह सभी तत्कालीन गीत प्रकार थ े और इनका आधार छन्द आ ैर गायन श ैली थी । गीत तथा उसकी धुन के लिए ‘साम‘ संज्ञा भी रही । साम धुन या स्वरावली क े लिए पर्या यवाची शब्द रहा ह ै। यह तत्कालीन जनसंगीत क े अ ंतर्गत गायी जाने वा
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डा, ॅ. अल्पनारानी गाँधी. "चिकित्सा क े क्ष ेत्र म ें स ंगीत का प्रया ेग: एक स ंक्षिप्तावलोकन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.887025.

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Abstract:
संगीत एक ऐसी कला ह ै जिससे न क ेवल चेतन अपितु जड़ भी प्रभावित होता ह ै। संगीत क ेवल आनंदानुभूति ही नहीं देता वरन् मनुष्य या प ्राणी की मानसिक स्थितिया ें की भी सूचक होता ह ै आ ैर हमारे मना ेभावों का े भी प ्रभावित करता ह ै। संगीत म ें स्वर व गति (लय) का समाव ेश हमारी आत्मा को प ्रभावित करता ह ै। मानवीय क्रियाए ं भी गत्यात्मक होती ह ैं दोनों म ें सादृश्यता होने क े कारण ही राग रागनियाँ हमारी आत्मा और शरीर को प ्रभावित करती ह ैं। राग और लय की शक्ति इनकी नियमितता क े कारण ही आती ह ै। यह मनुष्य का स्वभावगत व्यवहार ह ै कि असंतुलन में संतुलन, अव्यवस्था में व्यवस्था आ ैर असामंजस्य में सामंजस्य लाने क
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उषा, महोबिया. "मुगल चित्रकला म ें र ंग स ंया ेजन". International Journal of Research - GRANTHAALAYAH Composition of Colours, December,2014 (2017): 1. https://doi.org/10.5281/zenodo.891884.

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Abstract:
प ्राचीन समय से ही भारतीय चित्रकला का इतिहास बह ुत समृद्ध विषाल एवं विस्तृत रहा है। मुस्लिम आक्र्रमण से प ूर्व जैन, बौद्ध एवं हिन्दुओ ने चित्रकला के क्षंेत्र में अपना योग दान दिया। अज ंता चित्रकला विष्व में प ्रसिद्ध ह ै, आ ैर इन चित्रो का निर्माण गुप्त काल मे ह ुआ जिन पर प्राकृतिक रूप से बने रंगा े का प ्रयोग किया गया ह ै। मध्यकाल मे चित्रकला मै महात्वप ूर्ण परिवर्तन आये, सल्तनत काल की चित्रकला र्मै इ रानी प ्रभाव देखने को मिलता ह ै। दरबारी चित्र, वीणा, सितार, वेषभूषा, आभ ूषण आदि के चित्रा े में सजीव रंगा े का प ्रया ेग किया गया । जिनसे चित्र सजीव, जीव ंत प्रतीत होते है । आ ैर इन चित्रो में न
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डॉ., गा ेमती च. ेलानी. "स ंगीत आ ैर समाज". International Journal of Research – Granthaalayah Innovation in Music & Dance, January,2015 (2017): 1–3. https://doi.org/10.5281/zenodo.884620.

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Abstract:
जीवन में कला का महत्वप ूर्ण स्थान ह ै। मानव की अनुकरण व ृत्ति आ ैर सा ैंदर्य-प्रियता का े कला की जननी माना जाता है। कला का सृजन करना तथा उसका उपभा ेग करना, यह मनुष्य जाति की अपनी विशिष्ट शक्ति है। अपनी इसी विशिष्टठ शक्ति क े कारण वह अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ कहलाता ह ै। कला आत्मा का े समृद्ध बनाती ह ै अतः कहा जाता ह ै कि आत्म तृप्ति की क्षुधा से ही कलाओं की उत्पत्ति होती ह ै। कलाओं क े मुख्य दो प्रकार बताए गए ह ैं . 1. ललित कलाएं आ ैर 2. ललित ेर कलाए ं। जा े कलाए ं मुख्यतः मानव की भौतिक आवश्यकताओं को प ूर्ण करती हैं, उन्ह ें ललितेर कलाए ं कहते ह ैं। जैसे शिल्प कार्य बर्ढ़इ का कार्य, ब ुनाई का
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